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मंगलवार, 5 जुलाई 2016
घोड़े की टाँग औऱ राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा की मज़बूती
देहरादून में घोड़े की टाँग टूटने का तीजा हो गया यानी तीन दिन बीत गये। उठावनी हो गयी, रंडरोवना बंद हुआ और कौए दूसरी सभा में कांव-कांव करने चले गये। चौबीस घंटे के टी वी चैनलों को आख़िर कुछ तो दिखाना होगा। यहाँ बहुत से दर्शकों सहित मुझे भी ये बात सूझती है कि मीडियाकर्मियों रिपोर्टिंग में एक ख़ास पैटर्न दिखाई देता है।
सभ्य समाज और राक्षसी चिंतन
सभ्य समाज एक दिन में इस स्थिति में नहीं आया. सैकड़ों वर्षों के विकास के कारण समाज इस स्थिति में पहुंचा है कि उसे सभ्य कहा जा सकता है. आपसी सौहार्द के नियमों में लगातार कांट-छांट और बढ़ोत्तरी, प्रत्येक जीवन को समान महत्व देने के नियम, स्त्रियों के समान अधिकार, व्यक्ति या समूह के विशेषाधिकारों का निषेध, प्रजातंत्र और प्रत्येक व्यक्ति के वोट का समान महत्व जैसी अनेक बातों का अनुसरण करते-करते यानी जीवन शैली में लगातार परिवर्तन करते-करते समाज ऐसी स्थिति में पहुंचा है जिसे अपेक्षाकृत सभ्य कहा जा सकता है. ये बातें परंपरागत भी हैं और वर्तमान काल में तय की हुई भी. इन्हें विशेषकर इस कारण लिखित रूप दिया गया है कोई भी इनकी मनमानी अवहेलना न कर सके।
फिर भी सभ्य समाज को पीड़ा देने वाले व्यक्ति और समूह मिल ही जाते हैं. इसी कारण इन्हें असामाजिक तत्व कहा जाता है. इनकी असभ्यता की रोकथाम के दंड-विधान की व्यवस्था है. कभी-कभी ये आचरण इतने बुरे होते हैं समाज मृत्यु-दंड की व्यवस्था करता है मगर ये दंड मनमर्ज़ी पर नहीं होता. इसके लिये विभिन्न चरणों की सजग न्याय-प्रणाली होती है. मृत्यु-दंड भी बिरले ही दिया जाता है. अब तो विभिन्न देशों में मृत्यु-दंड पर रोक लगायी जा चुकी है. इसका तर्क ये है कि मनुष्य को जीवन का मौलिक अधिकार है और ये अधिकार बुरे से बुरे मनुष्य से भी नहीं छीना जा सकता. अधिकतम उस व्यक्ति को उसकी अंतिम साँस तक जेल में बंद कर समाज से दूर रक्खा जा सकता है. ये सर्वमान्य और सर्वस्वीकृत तथ्य हैं. सभ्य समाज की इस स्थिति के बावजूद आइये अपनी जानकारी में कुछ बढ़ोत्तरी की जाये।
ईराक में एक अल्पसंख्यक समूह है. जिसे वहां यज़ीदी पुकारा जाता है. यज़ीदी समाज मूलतः कुर्द है. ये लोग उस क्षेत्र के सबसे पुराने निवासी हैं और पारसी, ईसाई और इस्लाम के संक्षिप्त रिवाजों को मानते हैं. उनके अनुसार ये रिवाज मूलतः उनके हैं जिन्हें दूसरे समाजों ने अपना लिया है. ये ईसाईयों की तरह बपतिस्मा करते हैं, मुसलमानों की तरह खतना करते हैं और पारसियों की तरह अग्नि को पूज्य मानते हैं. इन सब बातों के बाद भी ये अपनी जड़ें अरबी नहीं मानते. ये मलक ताऊस अर्थात मोर फ़रिश्ते को भी पवित्र मानते हैं. इस समाज के पीछे इन दिनों आई एस आई एस के आतंकवादी पड़े हुए हैं और औरतों बच्चों सहित 500 लोगों को क़त्ल कर चुके हैं. इस समाज के लोगों की सामूहिक कब्रे मिलीं हैं. इन कब्रों में यजीदी लोगों को जीवित ही दफना दिया गया।
ये दंड मुस्लिम सत्ता के काल में भारत में भी दिया जाता था. दसवीं पादशाही गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज के 2 साहबज़ादों को दीवार में चुन कर मार डाले जाने का प्रसंग प्रत्यक्ष है. ऐसा नहीं है कि ये हत्या कांड अभी हो रहे हैं. 18वीं, 19वीं शताब्दी में तुर्की खिलाफत के काल में { जिसे प्रथम विश्व युद्ध में ख़त्म कर दिया गया था और इसे वापस लाने के लिए कांग्रेस और गांधी जी ने भी ज़ोर लगाया था } भी इनका 72 बार नरसंहार हुआ था. अब ये ६ लाख से भी कम रह गये हैं. इन्हीं लोगों को आई एस आई एस के गुंडे मार धमका कर उस देश से जो मूलतः इनका ही है, भगा देना चाहते हैं. यही इस्लामी आतंकवादियों ने कश्मीर में किया था. यही बंगाल और असम के बांग्ला देश से लगते सीमावर्ती क्षेत्रों में हो रहा है. सभ्य समाज इस स्थिति पर इन परिस्थितियों पर मौन है।
ख़ामोशी या निस्तब्धता केवल कह पाने कि असमर्थता ही नहीं होती. सच के पक्ष में हाथ उठाने में भय की अनुभूति, समाज की नसों में शताब्दियों से प्रसारित और व्याप्त डर भी खामोश कर देता है. अन्यथा कोई कारण नहीं कि ईराक के इन हत्याकांडों पर भारतीय प्रेस और राजनैतिक दल मौन रहें. इसी तरह अंग्रेजी प्रेस तो पीड़ितों के पक्ष को थोड़ा समझने का प्रयास कर भी रहा है मगर हिंदी मीडिया को तो सांप सूंघ गया है. इतिहास के कूड़ेदान में फेंके जा चुके वामपंथी और तालिबानी मानसिकता वाले लोग हमेशा की तरह इस्लामी आतंकवादियों और आई एस आई एस के पक्ष में बोल रहे हैं।
सामान्य घरेलू तथा पड़ौस के झगड़े भी इस तरह शांत नहीं होते. और इस विषय में तो आक्रामक स्वयं को मनमाने तर्क से सही और दूसरे को गलत ठहरा रहे हैं. क्या मुझे अधिकार है कि मैं किसी के एकेश्वरवाद को गलत ठहराऊं ? यदि नहीं तो आप मेरी उपासना पद्यति की आलोचना करने वाले और मुझे वाजिबुल-क़त्ल ठहरने वाले कौन हैं. हम सबके जीवन में कुछ न कुछ ऐसा मिल जायेगा जो दूसरे की दृष्टि में गलत होगा. तो क्या सभ्य संसार ऐसी हत्यारी सोच को केवल इस लिए सहता रहेगा कि वो किसी की निजी उपासना पद्यति का हिस्सा है ? यदि ये मौन रहने की जगह है तो सभ्य समाज ने नरमांस-भक्षण करने वाले समूहों को क्यों नष्ट कर दिया ? उनकी सोच में और इस सोच में केवल मांस खाने का ही तो अंतर है अन्यथा मनुष्य की हत्या तो उससे भी कहीं अधिक अर्थात समूह की, की जा रही है. नरमांसभक्षी तो केवल खाने के लिये मारते थे यहाँ तो इन हत्याकांडों के धर्म ग्रन्थ में तर्क भी ढूंढे जाते हैं. ये कैसी आस्था-प्रणाली है जो अपने कुढब मापदंडों पर संसार को जांचती है. आंकती है और फिर उसे हांकती है. उसकी आस्थाएं तार्किक हैं या विचित्र, उसके मापदंड सभ्य हैं या जंगली उसे इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता. चलिए ऐसा ही सही चूँकि हर उत्पाती के पास अपने उत्पात को सही ठहरने के लिये तर्क होते हैं मगर सभ्य समाज जो इससे प्रभावित है उसे क्या हो गया है ?
इतिहास के विद्यार्थियों को ध्यान होगा माओ ने एक समय स्टालिन को एक बर्बर सलाह दी थी कि रूस को अमरीका पर हमला कर देना चाहिए. उसके पीछे उसकी सोच थी कि चीनी लोग विश्व की सबसे बड़ी जनसँख्या हैं. युद्ध के उपरांत जितने भी लोग बचेंगे उनमें चीनी लोगों का बाहुल्य होगा. अतः युद्ध के बाद संसार पर चीनी मूल के लोगों का शासन हो जायेगा. अब यही सोच सऊदी अरब के वहाबी शासकों और उनसे पैसा पाने वाले अल क़ायदा, बोको हराम, लश्करे-तय्यबा, आई एस आई एस, हमास जैसे संगठनों की है. तार्किक रूप से इस सोच को पराजित करने के साथ-साथ इनका बीज नष्ट करने के अतिरिक्त सभ्य समाज के पास और कोई विकल्प नहीं है।
हत्वा वा प्राप्यसे स्वर्गं जित्वा वा भोक्षसे महीम
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृत निश्चयः { भगवद-गीता }
तुफैल चतुर्वेदी
बिसाहड़ा के निर्दोष बच्चों के प्रति हमारा कर्तव्य
Account Details
Sanjay Rana, Syndicate bank, Account no 87672200060453
IFSC code SYNB0008767, Bisahara distt Gautambudh nagar
मित्रो, बिसाहड़ा के अख़लाक़ के घर से बरामद किये गये मांस की रिपोर्ट आ गई है और वह गौमांस निकला है। जब अख़लाक़ और उसके परिवार ने गौहत्या का पाप किया है तो उन पर् इस सज्ञेय अपराध के लिये मुक़दमा चलना चाहिये। उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य मंत्री श्री अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री कोष से जो लगभग एक करोड़ रुपये और नोएडा में तीन फ़्लैट इन अभियुक्तों को दिये हैं वो सरकार को ज़ब्त कर लेने चाहिये। मुख्यमंत्री कोष अभियुक्तों की सहायता के लिये नहीं होता।
अभी तक इस विषय पर मेरा योगदान केवल यह था कि मैंने पांचजन्य में इस विषय पर एक लेख लिखा था। जिसको ले कर प्रेस में कई दिन तक हंगामा मचता रहा था "संघ के मुख पत्र में लेखक ने गौ हत्या करने वाले का वध उचित ठहराया है, वेदसम्मत बताया है " । मेरी दृष्टि में इस विषय पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, हिन्दू जागरण मंच, विश्व हिन्दू परिषद, अधिवक्ता परिषद, भाजपा, भाजपा की स्थानीय विधायक विमला बाथम, भाजपा के स्थानीय सांसद/ मंत्री डॉक्टर महेश शर्मा सक्रिय थे और यथायोग्य कर रहे थे। यानी अभियुक्त ठहराये और बंदी बनाये गये 18 बच्चों की चिंता हो रही थी।
अब नई परिस्थिति पैदा हो गयी तो मन किया कि चलिये बिसाहड़ा चला जाये और छह दिन पहले मैं तथा फ़ेस बुक के एक मित्र निर्भय यादव बिसाहड़ा चले गये। जीवन की मार से त्रस्त, थके-थके चेहरे, बुझी-बुझी अांखें, ऐसे नितांत निर्धन लोग जिनके बदन पर् कपड़े तक कटे-फटे थे, से भेंट हुई। मुख्य अभियुक्त के पिता श्री संजय राणा जो भाजपा और संघ के 30 वर्ष पुराने कार्यकर्ता हैं के अनुसार, 9 माह में उन लोगों से मिलने वाला मैं दूसरा और सहायता करने वाला पहला व्यक्ति हूँ। ज्ञात हुअा कि इन 18 बच्चों में से 6 के परिवार में रोटियों के भी लाले हैं।
मैं कुछ देर के लिये सुन्न रह गया। जिसे ब्लैक अाउट कहते हैं, ऐसी स्थिति अा गयी। कुछ देर बाद जब दिमाग़ से अंधेरा हटा तो जो पहले विचार उभरे वो यह थे...... " क्या हम हिन्दू ....समाज हैं भी ? हममें जीवित रहने का कोई लक्षण है भी ? हमारे संगठन क्या कर रहे हैं ? मैं ही कितना स्वार्थी-अालसी हूँ कि मेरी अांखें नौ माह बाद अपने भाइयों के अाँसुओं को देख पाईं ? देश में लाचार, बेसहारा हिंदुओं की चिंता करने वाला कोई है भी ?
हिन्दू संगठनों के नेताओं की उस समय की प्रेस कॉन्फ्रेंस, टी वी बाइट, अख़बारों में बयानबाज़ी ध्यान कीजिये। लोग गांव में मन्दिर तक जाते थे। प्रेस को इंटरव्यू दे कर कर्तव्य पूर्ण हुअा समझ लेते थे। बंधुओ, गिरफ़्तार 18 लोगों में अभी भी 17 लोग जेल में हैं। कोई आर्थिक सहायता, वकीलों की व्यवस्था कभी नहीं हुई। गांव वालों ने अापस में चंदा एकत्र कर दो लाख रुपये जमा किये हैं। जिन वकीलों को इन पीडितों ने कोर्ट में खड़ा किया उन्होंने निश्चित रूप से अपनी ओर से कुछ नहीं मांगा। उसी 2 लाख से जो इन्होंने वकीलों को दिया वो उन्होंने बिना कुछ कहे चुपचाप रख लिया।
अभी पांचजन्य के पिछले किसी अंक में मेवात पर यह रिपोर्ट अाई है। मेवात देश की राजधानी दिल्ली से मात्र 60 किलोमीटर की दूरी पर गुड़गांव से अलवर के रास्ते आगे बढ़ने पर सोहना के बाद शुरू हो जाता है। 1947 में बंगलादेश में करीब 30 प्रतिशत और मेवात में भी लगभग 30 प्रतिशत हिन्दू थे। जैसे बंगलादेश में करीब 8 प्रतिशत हिन्दू रह गए हैं, यही स्थिति मेवात की भी हो गई है। आज हरियाणा के मेवात में हिन्दुओं के साथ वह सब हो रहा है जो बंगलादेश या पाकिस्तान में हिन्दुओं के साथ होता है। हिन्दू लड़कियों और महिलाओं का अपहरण और फिर किसी मुस्लिम के साथ जबरन निकाह। हिन्दू व्यापारियों से जबरन पैसे की वसूली करना। मंदिरों और श्मशान के भूखंडों पर कब्जा करना। बंगलादेशी घुसपैठियों को बसाना। हिन्दुओं को झूठे मुकदमों में फंसाना। हिन्दुओं के यहां डाका डालना।
अब मैं यह प्रश्न सबसे पहले अापसे फिर सभी हिन्दू संगठनों के नेताओं से पूछना चाहता हूंं कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश के बाद वर्तमान कटे-फटे-शेष बचे भारत को बचाने का रास्ता क्या है ? बंगाल तथा असम के बांग्लादेश से लगते अनेकों ज़िलों, बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, हरियाणा, पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों में तेज़ी से उभर रही इस समस्या का समाधान क्या है ? क्या तेजस्वी हिंदुओं को प्रभावी, शक्तिशाली बनाने, उनके साथ हर प्रकार से खड़े होने के अतिरिक्त कोई मार्ग है ? क्या बंद कमरों के भाषण, फ़ेस बुक की गर्मागर्म पोस्टिंग, लाइक, शेयर इस सिलसिले में कुछ भी कर सकते हैं ? हमारा सारा तेज अगर हमारी अपनी जेब से धन नहीं निकलवा सकता तो कुछ समय बाद कैराना, मेवात और इसी तरह के गांवों, नगरों, बस्तियों को उजड़ने से कौन रोक सकता है ? हम जूझ नहीं सकते तो लड़ने वालों के साथ तो खड़े हो सकते हैं।
मेरा प्रस्ताव है कि हमें उन अट्ठारह बच्चों के लिये प्रति बच्चा एक लाख रुपया उनके परिवारों तक पहुंचाना चाहिए। इससे उनका और प्रत्येक तेजस्वी चिंतन वाले व्यक्ति का सम्बल बढ़ेगा। ऐसे लोगों तक यह संदेश जाना कि अाप अकेले नहीं हैं, समाज साथ खड़ा है, उनकी उर्जा को बढ़ायेगा। समाज में इन वीरों का अनुकरण के लिये लोग तैय्यार होंगे और यही हल है। महाराणा प्रताप के इन सिसोदिया वंशजों के साथ खड़े होने के लिये भामाशाह बनिए। स्वयम पर दबाव डाल कर अपनी मासिक आमदनी का 10% या 5,000 जो भी अधिक हो दीजिये। मित्र-बंधुओं की भी प्रेरित कीजिए। अाश्वस्त रहिये कि ऊपर दिए गये इस अकाउंट में जमा धन उन 18 बच्चों के परिवार तक बराबर बांटा जायेगा।
तुफ़ैल चतुर्वेदी
Sanjay Rana, Syndicate bank, Account no 87672200060453
IFSC code SYNB0008767, Bisahara distt Gautambudh nagar
मित्रो, बिसाहड़ा के अख़लाक़ के घर से बरामद किये गये मांस की रिपोर्ट आ गई है और वह गौमांस निकला है। जब अख़लाक़ और उसके परिवार ने गौहत्या का पाप किया है तो उन पर् इस सज्ञेय अपराध के लिये मुक़दमा चलना चाहिये। उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य मंत्री श्री अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री कोष से जो लगभग एक करोड़ रुपये और नोएडा में तीन फ़्लैट इन अभियुक्तों को दिये हैं वो सरकार को ज़ब्त कर लेने चाहिये। मुख्यमंत्री कोष अभियुक्तों की सहायता के लिये नहीं होता।
अभी तक इस विषय पर मेरा योगदान केवल यह था कि मैंने पांचजन्य में इस विषय पर एक लेख लिखा था। जिसको ले कर प्रेस में कई दिन तक हंगामा मचता रहा था "संघ के मुख पत्र में लेखक ने गौ हत्या करने वाले का वध उचित ठहराया है, वेदसम्मत बताया है " । मेरी दृष्टि में इस विषय पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, हिन्दू जागरण मंच, विश्व हिन्दू परिषद, अधिवक्ता परिषद, भाजपा, भाजपा की स्थानीय विधायक विमला बाथम, भाजपा के स्थानीय सांसद/ मंत्री डॉक्टर महेश शर्मा सक्रिय थे और यथायोग्य कर रहे थे। यानी अभियुक्त ठहराये और बंदी बनाये गये 18 बच्चों की चिंता हो रही थी।
अब नई परिस्थिति पैदा हो गयी तो मन किया कि चलिये बिसाहड़ा चला जाये और छह दिन पहले मैं तथा फ़ेस बुक के एक मित्र निर्भय यादव बिसाहड़ा चले गये। जीवन की मार से त्रस्त, थके-थके चेहरे, बुझी-बुझी अांखें, ऐसे नितांत निर्धन लोग जिनके बदन पर् कपड़े तक कटे-फटे थे, से भेंट हुई। मुख्य अभियुक्त के पिता श्री संजय राणा जो भाजपा और संघ के 30 वर्ष पुराने कार्यकर्ता हैं के अनुसार, 9 माह में उन लोगों से मिलने वाला मैं दूसरा और सहायता करने वाला पहला व्यक्ति हूँ। ज्ञात हुअा कि इन 18 बच्चों में से 6 के परिवार में रोटियों के भी लाले हैं।
मैं कुछ देर के लिये सुन्न रह गया। जिसे ब्लैक अाउट कहते हैं, ऐसी स्थिति अा गयी। कुछ देर बाद जब दिमाग़ से अंधेरा हटा तो जो पहले विचार उभरे वो यह थे...... " क्या हम हिन्दू ....समाज हैं भी ? हममें जीवित रहने का कोई लक्षण है भी ? हमारे संगठन क्या कर रहे हैं ? मैं ही कितना स्वार्थी-अालसी हूँ कि मेरी अांखें नौ माह बाद अपने भाइयों के अाँसुओं को देख पाईं ? देश में लाचार, बेसहारा हिंदुओं की चिंता करने वाला कोई है भी ?
हिन्दू संगठनों के नेताओं की उस समय की प्रेस कॉन्फ्रेंस, टी वी बाइट, अख़बारों में बयानबाज़ी ध्यान कीजिये। लोग गांव में मन्दिर तक जाते थे। प्रेस को इंटरव्यू दे कर कर्तव्य पूर्ण हुअा समझ लेते थे। बंधुओ, गिरफ़्तार 18 लोगों में अभी भी 17 लोग जेल में हैं। कोई आर्थिक सहायता, वकीलों की व्यवस्था कभी नहीं हुई। गांव वालों ने अापस में चंदा एकत्र कर दो लाख रुपये जमा किये हैं। जिन वकीलों को इन पीडितों ने कोर्ट में खड़ा किया उन्होंने निश्चित रूप से अपनी ओर से कुछ नहीं मांगा। उसी 2 लाख से जो इन्होंने वकीलों को दिया वो उन्होंने बिना कुछ कहे चुपचाप रख लिया।
अभी पांचजन्य के पिछले किसी अंक में मेवात पर यह रिपोर्ट अाई है। मेवात देश की राजधानी दिल्ली से मात्र 60 किलोमीटर की दूरी पर गुड़गांव से अलवर के रास्ते आगे बढ़ने पर सोहना के बाद शुरू हो जाता है। 1947 में बंगलादेश में करीब 30 प्रतिशत और मेवात में भी लगभग 30 प्रतिशत हिन्दू थे। जैसे बंगलादेश में करीब 8 प्रतिशत हिन्दू रह गए हैं, यही स्थिति मेवात की भी हो गई है। आज हरियाणा के मेवात में हिन्दुओं के साथ वह सब हो रहा है जो बंगलादेश या पाकिस्तान में हिन्दुओं के साथ होता है। हिन्दू लड़कियों और महिलाओं का अपहरण और फिर किसी मुस्लिम के साथ जबरन निकाह। हिन्दू व्यापारियों से जबरन पैसे की वसूली करना। मंदिरों और श्मशान के भूखंडों पर कब्जा करना। बंगलादेशी घुसपैठियों को बसाना। हिन्दुओं को झूठे मुकदमों में फंसाना। हिन्दुओं के यहां डाका डालना।
अब मैं यह प्रश्न सबसे पहले अापसे फिर सभी हिन्दू संगठनों के नेताओं से पूछना चाहता हूंं कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश के बाद वर्तमान कटे-फटे-शेष बचे भारत को बचाने का रास्ता क्या है ? बंगाल तथा असम के बांग्लादेश से लगते अनेकों ज़िलों, बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, हरियाणा, पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों में तेज़ी से उभर रही इस समस्या का समाधान क्या है ? क्या तेजस्वी हिंदुओं को प्रभावी, शक्तिशाली बनाने, उनके साथ हर प्रकार से खड़े होने के अतिरिक्त कोई मार्ग है ? क्या बंद कमरों के भाषण, फ़ेस बुक की गर्मागर्म पोस्टिंग, लाइक, शेयर इस सिलसिले में कुछ भी कर सकते हैं ? हमारा सारा तेज अगर हमारी अपनी जेब से धन नहीं निकलवा सकता तो कुछ समय बाद कैराना, मेवात और इसी तरह के गांवों, नगरों, बस्तियों को उजड़ने से कौन रोक सकता है ? हम जूझ नहीं सकते तो लड़ने वालों के साथ तो खड़े हो सकते हैं।
मेरा प्रस्ताव है कि हमें उन अट्ठारह बच्चों के लिये प्रति बच्चा एक लाख रुपया उनके परिवारों तक पहुंचाना चाहिए। इससे उनका और प्रत्येक तेजस्वी चिंतन वाले व्यक्ति का सम्बल बढ़ेगा। ऐसे लोगों तक यह संदेश जाना कि अाप अकेले नहीं हैं, समाज साथ खड़ा है, उनकी उर्जा को बढ़ायेगा। समाज में इन वीरों का अनुकरण के लिये लोग तैय्यार होंगे और यही हल है। महाराणा प्रताप के इन सिसोदिया वंशजों के साथ खड़े होने के लिये भामाशाह बनिए। स्वयम पर दबाव डाल कर अपनी मासिक आमदनी का 10% या 5,000 जो भी अधिक हो दीजिये। मित्र-बंधुओं की भी प्रेरित कीजिए। अाश्वस्त रहिये कि ऊपर दिए गये इस अकाउंट में जमा धन उन 18 बच्चों के परिवार तक बराबर बांटा जायेगा।
तुफ़ैल चतुर्वेदी
.............ख़ैरात लगी बंटने
भारत के ही नहीं बल्कि विश्व भर के इस्लामियों और उनके सबसे विश्वस्त दलाल वामपंथियों के पेट में पानी होने लगा है। प्रकट में तो बहसें नहीं कर रहे हैं मगर आंतरिक रूप से लगभग हाहाकार सा मचा है। कारण भी गम्भीर है कि अमेरिका के राष्ट्रपति पद के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की ओर से डोनाल्ड ट्रम्प का नाम तय हो गया है। अमरीका में राष्ट्रपति प्रणाली है और उसके चुनाव में भाग लेने वाले प्रत्याशियों को पहले अपने दल का एकमेव प्रत्याशी बनना पड़ता है। वहां भारत जैसी स्थिति नहीं है कि हर पार्टी, वरिष्ठ नेताओं की बपौती हो। अमेरिका में वास्तविक लोकतंत्र है। विभिन्न चरणों में ट्रम्प ने रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्याशियों पर बढ़त हासिल की और अब वो अमेरिका के अगले राष्ट्रपति बनने की मार्ग पर अग्रसर हो गए हैं।
अपने चुनावी अभियान में उन्होंने "हम अमेरिका में मुसलमानों का आना रोक देंगे" जैसा गम्भीर बयान दिया। विश्व राजनीति के मंच पर ऐसी सोच के अमेरिकी राष्ट्रपति का संभावित अवतरण विश्व भर के इस्लामियों और उनके सबसे विश्वस्त दलाल वामपंथियों के लिये चिंता का विषय होना भी चाहिये। ऐसा अमेरिकी राष्ट्रपति विश्व में ऐसी वैचारिक उथल-पुथल मचा सकता है जिससे सैकड़ों वर्षों से चले आ रहे इस्लामी मनमानेपन की नींव खिसक सकती है।
आइये इतिहास के प्रकाश में देखें कि अमेरिका क्या है ? आज एक देश के रूप में सुगठित अमेरिका सरलता से देश नहीं बना। स्वतंत्र देश बनने की प्रक्रिया में अमेरिकी राष्ट्र तात्कालिक विश्व-शक्ति ब्रिटेन से लड़ा। उसने भयानक गृह-युद्ध भी झेला। उसे देश और राष्ट्र बनने वाले लोग उसी मूल के थे जिन्होंने वहां के मूल निवासियों का संहार किया मगर उनके वंशजों ने शेष बचे मूल निवासियों को अधिकार दिये। स्त्रियों की बराबरी को संविधान द्वारा पुष्टि किया। हर प्रकार के अधिकारों से हीन अफ्रीका से पकड़ कर लाये गये दासों को स्वतंत्र कर उन्हें अमेरिका की बराबरी की नागरिकता दी। अमेरिका में विचारों को प्रकट करने की अबाध स्वतंत्रता तय की। देश के लिये वयस्क-मताधिकार की प्रजातान्त्रिक प्रणाली तय की। हर वयस्क का मत एक समान बनाया। स्वतंत्र न्याय प्रणाली बनायी। न्याय के शासन को स्थापित करने के लिये विभिन्न संस्थान बनाये।
अपने चुनावी अभियान में उन्होंने "हम अमेरिका में मुसलमानों का आना रोक देंगे" जैसा गम्भीर बयान दिया। विश्व राजनीति के मंच पर ऐसी सोच के अमेरिकी राष्ट्रपति का संभावित अवतरण विश्व भर के इस्लामियों और उनके सबसे विश्वस्त दलाल वामपंथियों के लिये चिंता का विषय होना भी चाहिये। ऐसा अमेरिकी राष्ट्रपति विश्व में ऐसी वैचारिक उथल-पुथल मचा सकता है जिससे सैकड़ों वर्षों से चले आ रहे इस्लामी मनमानेपन की नींव खिसक सकती है।
आइये इतिहास के प्रकाश में देखें कि अमेरिका क्या है ? आज एक देश के रूप में सुगठित अमेरिका सरलता से देश नहीं बना। स्वतंत्र देश बनने की प्रक्रिया में अमेरिकी राष्ट्र तात्कालिक विश्व-शक्ति ब्रिटेन से लड़ा। उसने भयानक गृह-युद्ध भी झेला। उसे देश और राष्ट्र बनने वाले लोग उसी मूल के थे जिन्होंने वहां के मूल निवासियों का संहार किया मगर उनके वंशजों ने शेष बचे मूल निवासियों को अधिकार दिये। स्त्रियों की बराबरी को संविधान द्वारा पुष्टि किया। हर प्रकार के अधिकारों से हीन अफ्रीका से पकड़ कर लाये गये दासों को स्वतंत्र कर उन्हें अमेरिका की बराबरी की नागरिकता दी। अमेरिका में विचारों को प्रकट करने की अबाध स्वतंत्रता तय की। देश के लिये वयस्क-मताधिकार की प्रजातान्त्रिक प्रणाली तय की। हर वयस्क का मत एक समान बनाया। स्वतंत्र न्याय प्रणाली बनायी। न्याय के शासन को स्थापित करने के लिये विभिन्न संस्थान बनाये।
सोमवार, 13 जून 2016
"अति पवित्र " इस्लामिक प्रथा हलाला
चौबीस घंटे के ख़बरिया चैनलों की अपनी मुसीबत है। हर पल कुछ न कुछ करना होगा। अलादीन का जिन्न सा पीछे पड़ा रहता है कि कोई काम बताओ। चौबीस घंटे बिज़ी रखना मामूली काम नहीं है। कभी बोर वैल में गिरे बच्चे के पीछे 48 घंटों तक कैमरामैन समेत एंकर को घुसे रहना पड़ता है। कभी लंका में वो जगह मिल गयी....... जिसे हनुमान जी ने जलाया था, को दाढ़ी-मूंछ से भरे मुंह को मेंढक की तरह गलफड़े फुला कर बताना पड़ता है। कभी 24 फुट के कंकाल की घोषणा करनी पड़ती है। सामान्यतः ऐसे बांगड़ू मुद्दे 2 दिन तक तो खेंचे ही जाते हैं। गम्भीर मुद्दे इससे अधिक समय पाने के अधिकारी होते हैं। क्षमता और आवश्यकता के अनुसार 4 से 7 दिन तक उनकी परिधि होती है। मगर पहली बार दिखाई दे रहा है कि सुप्रीम कोर्ट में शरीयत को चुनौती का मामला मीडिया ने पूरे एक दिन भी नहीं चलाया। आइये जानें कि शरिया है क्या और इस पर नया विवाद कैसे शुरू हुआ ?
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के काल में 1973 में बनाया गया था। ये सुन्नी मुसलमानों की अच्छी बड़ी संख्या के लिये उनके निजी विषयों को इस्लामी क़ानूनों के हिसाब से चलने के लिये बनाया गया। इस की जड़ें1857 में मुग़ल सत्ता की फ़ाइनल तेरहवीं के बाद अंग्रेज़ों द्वारा मुसलमानों के लिये बनायी गयी एंग्लो-मुहमडन अदालतों के फ़ैसलों में हैं। इसके अंतर्गत निकाह, तलाक़, पुनर्निकाह और उसके लिये अनिवार्य अरबी रस्म हलाला, वसीयत, पैतृक सम्पत्ति का बंटवारा आते हैं। इसके बनते समय ही ताहिर महमूद , आरिफ़ मुहम्मद ख़ान जैसे विभिन्न इस्लामी विद्वानों ने इसका विरोध किया था। { ज्ञातव्य है सुन्नी मुसलमानों के ही कई वर्ग उदाहरण के लिये कच्छी मेमन इसके अंतर्गत नहीं आते और उनके निजी विषय हिन्दू लॉ के अनुसार निर्धारित होते हैं। पाकिस्तान के आंदोलन के सबसे मुखर मुस्लिम भाग अहमदिया इससे इस कारण बाहर रखे गये हैं कि सुन्नी उन्हें मुसलमान नहीं मानते। शिया समाज का अपना शिया पर्सनल लॉ है }
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के काल में 1973 में बनाया गया था। ये सुन्नी मुसलमानों की अच्छी बड़ी संख्या के लिये उनके निजी विषयों को इस्लामी क़ानूनों के हिसाब से चलने के लिये बनाया गया। इस की जड़ें1857 में मुग़ल सत्ता की फ़ाइनल तेरहवीं के बाद अंग्रेज़ों द्वारा मुसलमानों के लिये बनायी गयी एंग्लो-मुहमडन अदालतों के फ़ैसलों में हैं। इसके अंतर्गत निकाह, तलाक़, पुनर्निकाह और उसके लिये अनिवार्य अरबी रस्म हलाला, वसीयत, पैतृक सम्पत्ति का बंटवारा आते हैं। इसके बनते समय ही ताहिर महमूद , आरिफ़ मुहम्मद ख़ान जैसे विभिन्न इस्लामी विद्वानों ने इसका विरोध किया था। { ज्ञातव्य है सुन्नी मुसलमानों के ही कई वर्ग उदाहरण के लिये कच्छी मेमन इसके अंतर्गत नहीं आते और उनके निजी विषय हिन्दू लॉ के अनुसार निर्धारित होते हैं। पाकिस्तान के आंदोलन के सबसे मुखर मुस्लिम भाग अहमदिया इससे इस कारण बाहर रखे गये हैं कि सुन्नी उन्हें मुसलमान नहीं मानते। शिया समाज का अपना शिया पर्सनल लॉ है }
पैग़म्बर मुहम्मद जी और 9 वर्ष की आयशा के यौन सम्बन्ध इस्लामी वांग्मय से प्रमाण
इस्लाम के पैग़म्बर मुहम्मद जी के 52 वर्ष की आयु में 6 वर्ष की आयशा से विवाह और 3 वर्ष बाद मुहम्मद जी के 55 वर्ष और आयशा के 9 वर्ष की आयु में यौन सम्बन्ध स्थापित करने के इस्लामी वांग्मय से ही प्रमाण
The Islamic Evidence
We now present the Islamic data showing that Aisha was a girl of nine when Muhammad consummated his marriage to her. All bold, capital and underlined emphasis is ours.
SAHIH AL-BUKHARI
Narrated Aisha:
The Prophet engaged me when I was a girl of six (years). We went to Medina and stayed at the home of Bani-al-Harith bin Khazraj. Then I got ill and my hair fell down. Later on my hair grew (again) and my mother, Um Ruman, came to me while I was playing in a swing with some of my girl friends. She called me, and I went to her, not knowing what she wanted to do to me. She caught me by the hand and made me stand at the door of the house. I was breathless then, and when my breathing became all right, she took some water and rubbed my face and head with it. Then she took me into the house. There in the house I saw some Ansari women who said, "Best wishes and Allah's Blessing and a good luck." Then she entrusted me to them and they prepared me (for the marriage). Unexpectedly Allah's Apostle came to me in the forenoon and my mother handed me over to him, and at that time I was a girl of nine years of age. (Sahih Al-Bukhari, Volume 5, Book 58, Number 234)
Narrated Hisham's father:
Khadija died three years before the Prophet departed to Medina. He stayed there for two years or so and then he married 'Aisha when she was a girl of six years of age, and he consumed that marriage when she was nine years old. (Sahih Al-Bukhari, Volume 5, Book 58, Number 236)
Narrated 'Aisha:
Allah's Apostle said to me, "You were shown to me twice (in my dream) before I married you. I saw an angel carrying you in a silken piece of cloth, and I said to him, 'Uncover (her),' and behold, it was you. I said (to myself), 'If this is from Allah, then it must happen.' Then you were shown to me, the angel carrying you in a silken piece of cloth, and I said (to him), 'Uncover (her), and behold, it was you. I said (to myself), 'If this is from Allah, then it must happen.'" (Sahih Al-Bukhari, Volume 9, Book 87, Number 140; see also Number 139)
Narrated 'Aisha:
that the Prophet married her when she was six years old and he consummated his marriage when she was nine years old, and then she remained with him for nine years (i.e., till his death). (Sahih Al-Bukhari, Volume 7, Book 62, Number 64; see also Numbers 65 and 88)
SAHIH MUSLIM
The Islamic Evidence
We now present the Islamic data showing that Aisha was a girl of nine when Muhammad consummated his marriage to her. All bold, capital and underlined emphasis is ours.
SAHIH AL-BUKHARI
Narrated Aisha:
The Prophet engaged me when I was a girl of six (years). We went to Medina and stayed at the home of Bani-al-Harith bin Khazraj. Then I got ill and my hair fell down. Later on my hair grew (again) and my mother, Um Ruman, came to me while I was playing in a swing with some of my girl friends. She called me, and I went to her, not knowing what she wanted to do to me. She caught me by the hand and made me stand at the door of the house. I was breathless then, and when my breathing became all right, she took some water and rubbed my face and head with it. Then she took me into the house. There in the house I saw some Ansari women who said, "Best wishes and Allah's Blessing and a good luck." Then she entrusted me to them and they prepared me (for the marriage). Unexpectedly Allah's Apostle came to me in the forenoon and my mother handed me over to him, and at that time I was a girl of nine years of age. (Sahih Al-Bukhari, Volume 5, Book 58, Number 234)
Narrated Hisham's father:
Khadija died three years before the Prophet departed to Medina. He stayed there for two years or so and then he married 'Aisha when she was a girl of six years of age, and he consumed that marriage when she was nine years old. (Sahih Al-Bukhari, Volume 5, Book 58, Number 236)
Narrated 'Aisha:
Allah's Apostle said to me, "You were shown to me twice (in my dream) before I married you. I saw an angel carrying you in a silken piece of cloth, and I said to him, 'Uncover (her),' and behold, it was you. I said (to myself), 'If this is from Allah, then it must happen.' Then you were shown to me, the angel carrying you in a silken piece of cloth, and I said (to him), 'Uncover (her), and behold, it was you. I said (to myself), 'If this is from Allah, then it must happen.'" (Sahih Al-Bukhari, Volume 9, Book 87, Number 140; see also Number 139)
Narrated 'Aisha:
that the Prophet married her when she was six years old and he consummated his marriage when she was nine years old, and then she remained with him for nine years (i.e., till his death). (Sahih Al-Bukhari, Volume 7, Book 62, Number 64; see also Numbers 65 and 88)
SAHIH MUSLIM
मंगलवार, 8 मार्च 2016
इंडियन एयर लाइंस के IC 814 का अपहरण
तुर्रा-ए-इम्तियाज़ अरबी भाषा का एक समास है। जिसका अर्थ है पगड़ी या मुकुट में लगने वाला विशेष पंख। इस समास का प्रयोग किसी संदर्भ में ख़ास बात की प्रभावकता बढ़ाने या विशेष ध्यान दिलाने के लिये किया जाता है। साहित्यिक संदर्भ में शायरी के अलावा मेरी पगड़ी में अगर कुछ तुर्रा-ए-इम्तियाज़ हैं तो वो कुछ अनुवाद हैं। पाकिस्तानी लेखक मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी साहब के व्यंग्य के अद्भुत उपन्यासों 'खोया पानी', 'धन यात्रा', 'मेरे मुंह में ख़ाक' के अतिरिक्त जसवंत सिंह जी की किताब 'जिन्ना भारत विभाजन के आईने में' का अंग्रेज़ी से हिंदी तथा उर्दू अनुवाद भी करने का अवसर मुझे मिला है। इस किताब का अनुवाद करते समय स्वाभाविक रूप से मुझे जसवंत सिंह जी की आत्मीयता का अवसर मिला।
उनके विदेश मंत्री रहते समय राष्ट्र का मुंह काला करने वाली एक बहुत बुरी घटना घटी थी। 24 दिसम्बर 1999 को इंडियन एयर लाइंस के IC 814 के अपहरण हुआ और दबाव में प्रधान मंत्री अटल बिहारी बाजपेयी, गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी की सरकार ने मसऊद अज़हर, मुश्ताक़ अहमद ज़रगर, अहमद उमर तथा सईद शेख़ को रिहा किया था। उनको पहुँचाने तथा किसी आपात्कालिक स्थिति में निर्णय लेने के लिये वित्त मंत्री जसवंत सिंह जी क़न्धार गए थे। आत्मीयता के उन क्षणों में मैंने उनसे पूछा कि स्वयं को राष्ट्रीय, सबल-सक्षम, हिंदू विचार की सरकार का यश क्लेम करने वालों ने किस कारण से इन हत्यारों को रिहा किया ? क्यों वह विमान अमृतसर में ही रोका नहीं गया ?
उन्होंने जो कुछ मुझे बताया उसका यहाँ पर जानने वाला हिस्सा ये है कि सरकार पर प्रेस और अपहृत लोगों के परिवारी जनों का दबाव था। प्रेस के लोग कांग्रेसी नेताओं की सहायता से अपहृत लोगों के 70-80 परिवारी जनों को एकत्र करके प्रधानमंत्री आवास पर नारे लगते हुए ले आये। विवश हो कर सरकार ने ये अपमानजनक निर्णय लिया। इसी बातचीत के संदर्भ में ये प्रश्न भी उठा " क्या दिल्ली और कम पड़े तो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भाजपा, जनता युवा मोर्चा, विद्यार्थी परिषद, किसान संघ, मज़दूर संघ, सैकड़ों सरस्वती शिशु मंदिरों के छात्र तथा शिक्षक, अधिवक्ता परिषद, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, जामवंत दल जैसे पचासों संगठन के प्रचारक-संगठन मंत्री, कार्यकर्त्ता, सदस्य और स्वयंसेवक प्रधान मंत्री पर दबाव बनाते प्रेस के लोगों को दबोचने और उनका दबाव ठंडा करने के लिये 200 लोग एकत्र नहीं कर सकते थे ? मैं उनसे ये सुन कर अवाक रह गया "सब के हाथ-पांव फूले हुए थे। किसी को सूझ ही नहीं रहा था कि क्या किया जाये"। कल्पना कीजिये कि उस समय अपहृत लोगों के परिवारी जनों तथा उन्हें उकसाने वाले कांग्रेसी नेताओं और प्रेस के लोगों को केवल 200 राष्ट्रवादियों की भीड़ घेर लेती तो इन हत्यारों को रिहा कर देश का मुंह काला करने वाली घटना घट पाती ?
मुझे बसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कांशी राम जी की एक मज़ेदार, आनंददायक और अनुकरणीय घटना याद आती है। दिल्ली के उनके घर में एक सुहानी दोपहर को एक पत्रकार मय कैमरामैन के घुस गया और उन पर इंटरव्यू के लिये दबाव डाला। कांशी राम जी ने मना किया और कहा '' मुझे सोने दो''। वो पत्रकारिता के स्वभाविक बन चुके घमंड में नहीं माना और बात "बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी" तक खिंच गयी। कांशी राम जी ने चप्पल उठायी और पत्रकार को पीटते हुए खदेड़ना शुरू किया। साहिबो कर्तृत्व का धनी कैमरामैन अपने काम में लगा रहा। चप्पल की चटाख-पटाख और पत्रकार की माता, भगिनी के यशोगान का तब तक लाइव प्रसारण होता रहा जब तक चप्पल की दिशा कैमरामैन की ओर नहीं घूमी। राजनेताओं से पांच तारा होटलों में स्कॉच तथा मुर्ग़-मुसल्लम की अभ्यस्त, स्विस घड़ियों, मोब्लां पैनों को दर्प सहित स्वीकार करने वाली पत्रकारिता का जनाज़ा धूम से निकला। चप्पल की चटाख-पटाख में भागते गैल नहीं मिली। संकरे में भी समधियाना नहीं निभा।
काश ये दबाव 24 दिसम्बर 1999 को इंडियन एयर लाइंस के IC 814 के अपहरण के समय बनाया गया होता। मगर क्या जे एन यू में भी क्या यही गलती नहीं हो रही है ? निश्चित रूप से मैं या मेरे जैसे सोशल मिडिया के सब मिल कर भी जे एन यू पर पचास हज़ार लोग नहीं चढ़ा ला सकते मगर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में भाजपा, जनता युवा मोर्चा, विद्यार्थी परिषद, किसान संघ, मज़दूर संघ, सैकड़ों सरस्वती शिशु मंदिरों के छात्र तथा शिक्षक, अधिवक्ता परिषद, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, जामवंत दल जैसे पचासों संगठन के प्रचारक-संगठन मंत्री क्यों ऐसा आह्वान नहीं करते ? राष्ट्रवाद के स्वयंभू नेताओं आगे आइये। समाज का आह्वान कीजिये और ''तुम कितने अफ़ज़ल मारोगे-घर घर से अफ़ज़ल निकलेगा" कहने वालों के घर तक चलिये। इन दुष्टों को घसीट-घसीट कर जे एन यू से निकालिये। इस बार इस कांटे के पेड़ को जड़ से उखाड़िये। चाहे पुलिस रोके या कोई और आश्वस्त करता हूँ कि मैं और सोशल मिडिया के लोग सबसे आगे रहेंगे।
तुफ़ैल चतुर्वेदी
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