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बुधवार, 4 अप्रैल 2018

मोसुल के पास एक टीले में दफ़्न 39 अभागे भारतीयों की लाशें मिल गयी हैं। उनके लम्बे बालों से पहचान हुई है कि मारे गए अधिकाँश लोग सिक्ख थे। अपनी धरती से दूर पैसा कमाने गये लोगों की मौत दुखद है। हम भारतीयों की आक्रोश से मुट्ठियाँ भिंच जानी चाहिए थीं मगर हुआ यह है कि टी वी की बहसों के लिये मसाला मिल गया है। यह बहसें हो रही हैं। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने पूछा है कि जून 2014 से जुलाई 2017 के बीच सात बार विदेशमंत्री ने कहा है कि अपहृत भारतीय जीवित हैं। सरकार को बताना चाहिए कि वह क्यों झूठा आश्वासन दे रही थी ? आई एस आई एस की विचारधारा से प्रेरित कटटरपंथियों के लोनर वुल्फ़ अटैक { अकेले आतंकवादी का हमला } से निबटने का तरीक़ा अमरीका और योरोप समेत दुनिया के कई देशों को समझ नहीं आ रहा। आई एस आई एस से बड़ा ख़तरा ईराक़ और सीरिया से भाग कर पूरी दुनिया में फैल गये उसके लडके और उनकी कट्टर विचारधारा है। भारतीय सुरक्षा एजेंसियाँ हालाँकि देश में आई एस आई एस के अस्तित्व से इंकार करती हैं मगर कश्मीर में विरोध प्रदर्शनों में आई एस आई एस का झंडा लहराना आम बात हो गयी है। एक मात्र जीवित बचे हरजीत मसीह ने फिर से मीडिया के सामने आ कर बताया कि वो और मारे गए 39 भारतीयों के साथ 60 बांग्लादेशी भी एक ईराक़ी कम्पनी में काम करते थे। 2014 में जब ईराक़ पर आतंकियों ने क़ब्ज़ा किया तो एक रात क़रीब नौ बजे सभी लोगों को गाड़ियों में बिठा कर सुनसान जगह पर ले गए। यहाँ दो दिन रखने के बाद बांग्लादेश के नागरिकों को भारतीयों से अलग कर दिया गया और मेरे सहित सभी भारतीयों को गोली मार दी गयी। क़िस्मत से एक गोली मेरी टांग छू कर निकल गयी और मैं बच कर भाग निकला। आतंकियों ने मुझे फिर पकड़ लिया। मैंने खुद को बांग्लादेशी और नाम अली बताया। वहां से मुझे बांग्लादेशी कैम्प भेजा गया और फिर मैं भारत लौट आया। यहाँ एक बात स्पष्ट दिखाई दे रही है कि हर बहस, लेख से मसीह का यह वक्तव्य नदारद है कि "बांग्लादेश के नागरिकों को भारतीयों से अलग कर दिया गया और मेरे सहित सभी भारतीयों को गोली मार दी गयी" आख़िर उन्होंने अजनबी भाषा बोलने वाले, अपरिचित 39 भारतीयों को क्यों मारा और बंग्लादेशियों को क्यों छोड़ दिया ? यह कोई पहली घटना नहीं है। भारत की धरती पर तो शताब्दियों से ऐसे नृशंस नरसंहार चल रहे हैं। गुरु नानकदेव जी ने बाबर के पैशाचिक हत्याकांडों को जम कर कोसा है। नवीं पादशाही गुरु तेग बहादुर जी की साथियों सहित शहीदी, दसवीं पादशाही गुरु गोविंद सिंह जी के 2 बच्चों को मुसलमान न बनने पर दीवार में जीवित चुना जाना, वीर हक़ीक़त राय की बोटियाँ नोच-नोच कर बलिदान करना, वीर बंदा बैरागी के छोटे से बच्चे का कलेजा उनके मुँह ठूंसना फिर उनके टुकड़े-टुकड़े कर मारा जाना इतिहास के माथे पर अंकित है। 39 केशधारियों की दुखद हत्या विषयक लेख के इस मोड़ पर कुछ प्रश्न मन में कौंध रहे हैं। अभी कैनेडा के प्रधानमंत्री के भारत आगमन पर कैनेडा के ही ख़ालिस्तान समर्थक व्यवसायी को उनकी एम्बेसी के निमंत्रण की ख़ासी आलोचना हुई है। गुप्तचर एजेंसियों को इस की भी सूचना है कि कैनेडा, अमरीका, ब्रिटेन सहित अनेकों देशों में पाकिस्तान की फंडिंग से ख़ालिस्तान के आंदोलन को फिर से खड़ा करने की जीतोड़ कोशिश हो रही है और तथाकथित खाड़कुओं की पाकिस्तान में ट्रेनिंग चल रही है। ख़ालिस्तान के पक्ष में आंदोलन करने वाले अंड-बंड कमांडो फ़ोर्स के मरजीवड़ों से सवाल पूछना चाहूंगा कि क्या तुम्हारी आँखें यह नहीं देख पा रही हैं कि मारे गए ये 39 अभागे लोग सिक्ख थे ? क्या तुम समझ पा रहे हो कि इन लोगों की मौत उसी कारण हुई जिस कारण गुरु तेग बहादुर जी का दिल्ली में शीश उतारा गया था। तुम्हें अंदाज़ा है न कि जिस कारण साहबज़ादे दीवार में चुने गए थे उसी कारण ये 39 लोग भी मार दिए गए ? तुम्हें कभी सूझा है कि वो दो छोटे बच्चे ज़िंदा दीवार में चुने जाने पर कैसे तड़प-तड़प कर मरे होंगे ? उनकी जान कैसे घुट-घुट कर निकली होगी ? जिस धर्म की रक्षा के लिये इतने बलिदान हुए उस की विरोधी विचारधारा के साथ खड़े होते हुए तुम्हारे पैर नहीं टूट गये ? जिस धर्म के लिये गुरुओं ने बलिदान दिए, उसके शत्रुओं से पैसे लेते हुए तुम्हारे हाथ नहीं गल गये ? तुम गुरु गोविंद सिंह जी की यह वाक भूल गए कि "तेल में हाथ डाल कर तिलों में हाथ डालने पर जितने तिल चिपकें, उतनी क़सम भी तुर्क खाये तो भरोसा मत करना" । अब धर्म पर ही नहीं अपितु विश्व भर पर संकट आया है और रक्षा के लिये उठ खड़े होने का समय है। तुफ़ैल चतुर्वेदी

रविवार, 1 अप्रैल 2018

"मुस्लिम पिटाई दिवस" का संदेश ब्रिटेन के बाद अब फ्रांस, जर्मनी और आस्ट्रेलिया के साथ पूरे यूरोप में फैला। 3 अप्रैल को ले कर पुलिस के साथ सेना भी हाई अलर्ट पर" हिंदी की सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली लेखिका शिवानी जी की एक कहानी से बात शुरू करना चाहूँगा। वो अपनी एक कहानी में किसी हिल स्टेशन की बस यात्रा का ज़िक्र करती हैं। बस में एक कॉन्वेंट की नन अपनी कुछ छात्राओं के जा रही थीं। उसी बस में कुछ ब्रिटिश सैनिक भी यात्रा कर रहे थे। लड़कियों को देख कर उनमें से कुछ ब्रिटिश सैनिक फब्तियाँ कसने, सीटियाँ बजने लगे। नन ने नाराज़ हो कर केवल एक वाक्य कहा 'It is very unbritish of you' और सारे ब्रिटिश लड़के बिल्कुल चुप लगा कर बैठ गए। यह जानने और अनुकरण करने योग्य बात है कि ब्रिटेन के समाज में अपने राष्ट्र के सम्मान को ले कर बहुत गौरव और असम्मान को ले कर प्रतिकार का भाव है। भारत में ब्रिटिश राज के समय अफ़ग़ानिस्तान के बॉर्डर पर सैनिक छावनी के बाहर से कुछ पठानों ने एक अंग्रेज़ महिला का अपहरण कर लिया। इस काण्ड की गूँज भारत के ब्रिटिश राज्य में ही नहीं अपितु ब्रिटिश पार्लियामेंट तक पहुँची। बहुत हंगामा हुआ। अंग्रेज़ी सरकार ने क़बाइली उड्डंदता से चल रहे समाज से दोषी माँगे। न देने पर सर्च अभियान चलाया। सैकड़ों को इस प्रक्रिया में मारा, अंततः दोषियों का वध किया और ब्रिटिश स्त्री को वापस लाये। वह स्त्री इस घटना के बाद इंग्लैण्ड वापस नहीं गयी और वहीँ रही। पठानों में पूरी ज़िम्मेदारी से मेसेज पहुँचाया कि यह ब्रिटिश सम्मान का विषय है और इसके दोषी पाताल से भी खींच कर निकाले जायेंगे। ब्रिटिश सम्मान को वापस बहाल किया गया और पठानों को सदैव के लिए सुधारा गया। उसके बाद कभी ऐसी कोई घटना दुबारा नहीं घटी। इन दो घटनाओं का उल्लेख केवल इस कारण किया है कि हम यह पूरी तरह जान-समझ लें कि ब्रिटिश समाज न्यायप्रिय और अपने बनाये, स्वीकार किये संविधान के अनुसार चलना पसंद करता है। ब्रिटिश विश्व भर में अपनी कॉलोनी स्थापित करते रहे हैं और उन्होंने अपने अधिकृत हर देश में क़ानून का शासन लागू किया था। तो अब क्या हो गया कि ब्रिटेन में वहाँ का न्यायप्रिय समाज 'Punish a Muslim Day' मनाने जा रहा है। आइये जानें कि 'Punish a Muslim Day' या 'मुसलमान पिटाई दिवस' है क्या ? किसी या किन्हीं अज्ञात संगठनों ने लगभग 20-25 दिन पहले से ब्रिटिश समाज में पैम्फ्लेट्स और पत्रों द्वारा 'मुसलमान पिटाई दिवस की सूचना फैलानी शुरू की। 3 अप्रैल को इसे मनाये जाने की घोषणा है। इन पत्रकों में इस दिवस को मनाने के लिए आयोजकों ने पौरुष के अनुसार पॉइंट्स की व्यवस्था की है। किसी मुस्लिम को गाली देने पर 10 पॉइंट, मुस्लिम महिला का बुरका खींचने पर 25 पॉइंट, चेहरे पर एसिड फेंकने पर 50 पॉइंट, बुरी तरह छिताई करने पर 100 पॉइंट, वध करने पर 500 पॉइंट्स दिए जायेंगे। पॉइंट्स का यह सिलसिला कृत्य की प्रखरता के क्रम में 2,500 पॉइंट्स तक जाता है। इस दिवस को मनाने के लिए पूरे लन्दन में पम्फलेट बांटे गए हैं और यह पम्फलेट डाक द्वारा लन्दन के मुस्लिम समुदाय को भी भेजे जा रहे हैं। इस आयोजन से लन्दन का मुस्लिम समुदाय भयभीत है और ब्रिटेन सरकार व पुलिस से अपनी जान बचाने की गुहार लगा रहा है। ब्रिटेन से शुरू हुआ ये सन्देश अब वायरल हो कर पूरे यूरोप में फैल चुका है। ब्रिटेन, जर्मनी और फ्राँस जैसे एक दूसरे के परम विरोधी राष्ट्र के लोगों ने भी 3 अप्रैल के "मुस्लिम पिटाई दिवस" को मनाने के लिये हाथ मिला लिये हैं और यह सब महान इस तेजस्वी गीत 'साथी हाथ बढ़ाना, एक अकेला कम पड़ता है मिल कर लट्ठ बजाना, साथी हाथ बढ़ाना' को अंग्रेज़ी, जर्मन, फ्रेंच में दुहराते हुए एक साथ आ गए हैं। ब्रिटेन की पुलिस को इस दिवस के आयोजकों का कोई ठोस सुराग हाथ नहीं लग पाया है। ब्रिटेन में आज तीन मुस्लिम विरोधी चरमपंथी संगठन सक्रिय हैं। जिनके नाम ब्रिटेन फ़र्स्ट, इंग्लिश डिफेन्स लीग, न्यू नाज़ी हैं। ब्रिटिश अधिकारियों के अनुसार संभावना है कि इस हिंसक आयोजन में इन संगठनों की भूमिका हो। उनके अनुसार यह संगठन इस्लामिक चरमपंथी मानसिकता को उसी के अंदाज़ में जवाब देने की बात करते हैं। इस 'Punish a Muslim Day' की विचित्रता यह भी है कि 3 अप्रैल आने से पहले ही योरोपियन लोगों ने मुस्लिमों को पीटना शुरू कर दिया है। उन पर आक्रमण होने लगे हैं। उनकी सम्पत्तियों को भी हानि पहुंचाई जाने लगी है। इस दिवस के आयोजन का असर लन्दन के अलावा शेष ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और जर्मनी में भी देखा जा रहा है जहां मुस्लिमों पर हमलों में अचानक प्रखरता आई है। यह जानना उचित होगा कि न्यायप्रिय समाज ने यह रास्ता क्यों अख़्तियार किया ? हो सकता है कि इससे कोई बदलाव न आये मगर समाज में कौन सी अंतर्धारा बह रही है, इसका पता तो चलेगा ? इन तीन संभावित संगठनों के नाम ब्रिटेन फ़र्स्ट, इंग्लिश डिफेन्स लीग, न्यू नाज़ी ही इस प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं। आख़िर ब्रिटेन जैसी महाशक्ति के लोगों को क्या आवश्यकता आ पड़ी कि उन्हें लंदन में ही ब्रिटेन फ़र्स्ट, इंग्लिश डिफेन्स लीग जैसे संगठन बनाने पड़े ? जर्मनी से सदियों से लड़ते आये, दो-दो विश्व युद्ध लड़े ब्रिटेन के लोगों ने जर्मनी के नेता हिटलर के नाम का अपने देश में न्यू नाज़ी संगठन क्यों बनाया ? निकट अतीत में स्वतंत्र मानवाधिकारों की स्थापना करने वाले, स्त्री-पुरुष के बराबरी के अधिकारों की सभ्य व्यवस्था प्रजातंत्र देने वाले यूरोपियों देश में मुस्लिम आव्रजन को ले कर बेचैनी है ? क्यों इन समाजों में मुस्लिम आव्रजन को मुस्लिम घुसपैठ कहा जा रहा है ? क्यों मुस्लिम प्रवृत्तियों को असहिष्णु प्रवृत्तियां और मुस्लिम माँगों को तलब करने को आतंकवाद कहा जा रहा है ? क्यों न्यायप्रिय योरोपीय समाज युद्धों में मारे गए अपने राष्ट्र के लोगों की मृत्यु के लिए समूचे इस्लामी समाज को ज़िम्मेदार ठहरा रहा है ? क्यों मारे गए लोगों के लिए प्रत्येक मुसलमान को दोषी ठहरा कर उनके क़त्ल का बदला लो के नारे उछाले जा रहे हैं ? कहीं ऐसा तो नहीं कि क़ुरआन की यह बातें इंटरनैट के ज़माने में सारे जतन के बाद बाहर आ गयी हों। शांतिप्रिय समाज शांतिदूतों की असलियत समझने लगा हो और अपने बचाव के लिये चौकन्ना हो कर बदले की कार्यवाही पर उतर आया हो ? ओ मुसलमानों तुम ग़ैर मुसलमानों से लड़ो। तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { क़ुरआन 9-123 } और तुम उनको जहां पाओ क़त्ल करो { क़ुरआन 2-191 } काफ़िरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { क़ुरआन 8-39 } ऐ नबी ! काफ़िरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो. उनका ठिकाना जहन्नुम है { क़ुरआन 9-73 और 66-9 } अल्लाह ने काफ़िरों के रहने के लिये नर्क की आग तय कर रखी है { क़ुरआन 9-68 } उनसे लड़ो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं, न आख़िरत पर; जो उसे हराम नहीं समझते जिसे अल्लाह ने अपने नबी के द्वारा हराम ठहराया है. उनसे तब तक जंग करो जब तक कि वे ज़लील हो कर जज़िया न देने लगें { क़ुरआन 9-29 } मूर्ति पूजक लोग नापाक होते हैं { क़ुरआन 9-28 } जो कोई अल्लाह के साथ किसी को शरीक करेगा, उसके लिये अल्लाह ने जन्नत हराम कर दी है. उसका ठिकाना जहन्नुम है { क़ुरआन 5-72 } तुम मनुष्य जाति में सबसे अच्छे समुदाय हो, और तुम्हें सबको सही राह पर लाने और ग़लत को रोकने के काम पर नियुक्त किया गया है { क़ुरआन 3-110 } हिंदी के सर्वोत्तम व्यंग्य उपन्यास रागदरबारी में उसके लेखक स्वर्गीय श्रीलाल शुक्ल ने संस्कृत का एक सुभाषित 'भयानाम भयं भीषणं भीषणानाम' प्रयोग है। राष्ट्रबन्धुओ ! मुझे लगता है कि आपने रागदरबारी पढ़ी हो या न पढ़ी हो मगर उन्होंने रागदरबारी पढ़ ली है या संस्कृत का यह सुभाषित आप तक पहुंचे या न पहुंचे मगर उन तक पहुंच गया है। तुफ़ैल चतुर्वेदी

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

तहज़ीबी नर्गीसीयत { सांस्कृतिक नार्सिसिज़्म }

तहज़ीबी नर्गीसीयत पाकिस्तान के वरिष्ठ चिंतक, लेखक, शायर मुबारक हैदर साहब की किताब है। इसका शाब्दिक अर्थ है सांस्कृतिक नार्सिसिज़्म। बात शुरू करने से पहले आवश्यक है कि जाना जाये कि नार्सिसिज़्म है क्या ? यह शब्द मनोवैज्ञानिक संदर्भ का शब्द है जो ग्रीक देवमाला के एक चरित्र से प्राप्त हुआ है। ग्रीक देवमाला की इस कहानी के अनुसार नार्सिस नाम का एक देवता प्यास बुझाने झील पर गया। वहाँ उसने ठहरे हुए स्वच्छ पानी में स्वयं को देखा। अपने प्रतिबिम्ब को देख कर वो इतना मुग्ध हो गया कि वहीँ रुक-ठहर गया। पानी पीने के लिये झील का स्पर्श करता तो प्रतिबिम्ब मिट जाने की आशंका थी। नार्सिस वहीँ खड़ा-खड़ा अपने प्रतिबिम्ब को निहारता रहा और भूख-प्यास से एक दिन उसके प्राण निकल गए। उसकी मृत्यु के बाद अन्य देवताओं ने उसे नर्गिस के फूल की शक्ल दे दी। अतः नर्गीसीयत या नार्सिसिज़्म एक चारित्रिक वैशिष्ट्य का नाम है। नार्सिसिज़्म शब्द का मनोवैज्ञानिक अर्थ यह है कि कोई व्यक्ति, समाज स्वयं को आत्ममुग्धता की इस हद तक चाहने लगे जिसका परिणाम आत्मश्लाघा, आत्मप्रवंचना हो। इसका स्वाभाविक परिणाम यह होता है कि ऐसे व्यक्ति, समाज को स्वयं में कोई कमी दिखाई नहीं देती। यह स्थिति व्यक्ति तथा समाज की विकास की ओर यात्रा रोक देती है। ज़ाहिर है बीज ने मान लिया कि वो वृक्ष है तो वृक्ष बनने की प्रक्रिया तो थम ही जाएगी। विकास के नये अनजाने क्षेत्र में कोई क़दम क्यों रखेगा ? स्वयं को बदलने, तोड़ने, उथल-पुथल की प्रक्रिया से गुज़ारने की आवश्यकता ही कहाँ रह जायेगी ? किन्तु नार्सिसिज़्म का एक पक्ष यह भी है कि आत्ममुग्धता की यह स्थिति कम मात्रा में आवश्यक भी है। हम सब स्वयं को विशिष्ट न मानें तो सामान्य जन से अलग विकसित होने यानी आगे बढ़ने की प्रक्रिया जन्म ही कैसे लेगी ? हमें बड़ा बनना है, विराट बनना है, अनूठा बनना है, महान बनना है, इस चाहत के कारण ही तो मानव सभ्यता विकसित हुई है। मनुष्य स्वाभाविक रूप से अहंकार से भरा हुआ है मगर इसकी मात्रा संतुलित होने की जगह असंतुलित रूप से अत्यधिक बढ़ जाये तो ? यही इस्लाम के साथ हुआ है, हो रहा है। न न न न मैं यह नहीं कह रहा बल्कि पाकिस्तान के एक चिंतक, लेखक, शायर मुबारक हैदर कह रहे हैं। मुबारक हैदर साहब की उर्दू किताबें तहज़ीबी नर्गीसीयत { सांस्कृतिक आत्मप्रवंचना }, मुग़ालते-मुग़ालते { भ्रम-भ्रम }, "Taliban: The Tip of A Holy Iceberg" लाखों की संख्या में बिक चुकी हैं। इन किताबों ने पाकिस्तान और भारत के उर्दू भाषी मुसलमानों की दुखती रग पर ऊँगली रख दी है। उनकी किताब के अनुसार नार्सिसिस्ट व्यक्तित्व स्वयं को विशिष्ट समझता है। क्षणभंगुर अहंकार से ग्रसित होता है। उसको अपने अलावा और कोई शक्ल दिखाई नहीं पड़ती। उसके अंदर घमंड, आत्ममुग्धता कूट-कूट कर भरी होती है। वो ऐसी कामयाबियों का बयान करता है जो फ़ैंटेसी होती हैं। जिनका अस्तित्व ही नहीं होता। ऐसे व्यक्तित्व स्वयं अपने लिये, अपने साथ के लोगों के लिये अपने समाज के लिये हानिकारक होता है। अब वो प्रश्न करते हैं कि ऐसे दुर्गुण अगर किसी समाज में उतर आएं तो उसका क्या होगा ? वो कहते हैं "आप पाकिस्तान के किसी भी क्षेत्रीय या राष्ट्रीय समाचारपत्र के किसी भी अंक को उठा लीजिये। कोई कॉलम देख लीजिये। टीवी चैनल के प्रोग्राम देख लीजिये। मुहल्लों में होने वाली मज़हबी तक़रीर सुन लीजिये। उन मदरसों के पाठ्यक्रम देख लीजिये, जिनसे हर साल 6 से 7 लाख लड़के मज़हबी शिक्षा ले कर निकलते हैं और या तो पुरानी मस्जिदों में चले जाते हैं या नई मस्जिदें बनाने के लिये शहरों में इस्लाम या सवाब याद दिलाने में लग जाते हैं। रमज़ान के 30 दिन में होने वाले पूरे कार्यक्रम देख लीजिये। बड़ी धूमधाम से होने वाले वार्षिक मज़हबी इज्तिमा {एकत्रीकरण} देख लीजिये, जिनमें 20 से 30 लाख लोग भाग लेते हैं। आपको हर बयान, भाषण, लेख में जो बात दिखाई पड़ेगी वो है इस्लाम की बड़ाई, इस्लाम की महानता का बखान, मुसलमानों की महानता का बखान, इस्लामी सभ्यता की महानता का बखान, इस्लामी इतिहास की महानता का बखान, मुसलमान चरित्रों की महानता का बखान, मुसलमान विजेताओं की महानता का बखान। मुसलमानों का ईमान महान, उनका चरित्र महान, उनकी उपासना पद्यति महान, उनकी सामाजिकता महान। यह भौतिक संसार उनका, पारलौकिक संसार भी उनका, शेष सारा संसार जाहिल, काफ़िर और जहन्नुम में जाने वाला अर्थात आपको इस्लाम और मुसलमानों की महानता के बखान का एक कभी न समाप्त होने वाला अंतहीन संसार मिलेगा। इस्लाम अगर मज़हब को बढ़ाने के लिये निकले तो वो उचित, दूसरे सम्प्रदायों को प्रचार से रोके तो भी उचित, मुसलमानों का ग़ैरमुसलमानों की आबादियों को नष्ट करना उचित, उन्हें ज़िम्मी-ग़ुलाम बनाना भी उचित, उनकी स्त्रियों को लौंडी {सैक्स स्लेव} बनाना भी उचित मगर ग़ैरमुस्लिमों का किसी छोटे से मुस्लिम ग्रुप पर गोलियाँ चलना इतना बड़ा अपराध कि मुसलमानों के लिये विश्वयुद्ध छेड़ना आवश्यक। इस्लाम का अर्थशास्त्र, राजनीति, जीवन शैली, ज्ञान बड़ा यानी हर मामले में इस्लाम महान। केवल इस्लाम स्वीकार कर लेने से संसार की हर समस्या के ठीक हो जाने का विश्वास। ग़ैरमुस्लिमों के जिस्म नापाक और गंदे, ईमान वालों {मुसलमानों} को उनसे दुर्गन्ध आती है। उनकी आत्मा-मस्तिष्क नापाक, उनकी सोच त्याज्य, उनका खाना गंदा और हराम, मुसलमानों का खाना पाक-हलाल-उम्दा, दुनिया में अच्छा-आनंददायक और पाक कुछ है तो वो हमारा यानी मुसलमानों का है। इस्लाम से पहले दुनिया में कोई सभ्यता नहीं थी, जिहालत और अंधकार था। संसार को ज्ञान और सभ्यता अरबी मुसलमानों की देन है। अब अगर आप किसी इस आत्मविश्वास से भरे किसी मुस्लिम युवक से पूछें, कहते हैं चीन में इस्लामी पैग़ंबर मुहम्मद के आने से हज़ारों साल पहले सभ्य समाज रहता था। उन्होंने मंगोल आक्रमण से अपने राष्ट्र के बचाव के लिये वृहदाकार दीवार बनाई थी। जिसकी गणना आज भी विश्व के महान आश्चर्यों में होती है। भारत की सभ्यता, ज्ञान इस्लाम से कम से कम चार हज़ार साल पहले का है। ईरान के नौशेरवान-आदिल की सभ्यता, जिसे अरबों ने नष्ट कर दिया, इस्लाम से बहुत पुरानी थी। यूनान और रोम के ज्ञान तथा महानता की कहानियां तो स्वयं मुसलमानों ने अपनी किताबों में लिखी हैं। क्या यह सारे समाज, राष्ट्र अंधकार से भरे और जाहिल थे ? आप बिलकुल हैरान न होइयेगा अगर नसीम हिज़ाजी का यह युवक आपको आत्मविश्वास से उत्तर दे, देखो भाई ये सब काफ़िरों की लिखी हुई झूठी बातें हैं जो मुसलमानों को भ्रमित करने और हीन-भावना से भरने के लिए लिखी गयी हैं और अगर इनमें कुछ सच्चाई है भी तो ये सब कुफ़्र की सभ्यताएँ थीं और इनकी कोई हैसियत नहीं है। सच तो केवल यह है कि इस्लाम से पहले सब कुछ अंधकार में था। आज भी हमारे अतिरिक्त सारे लोग अंधकार में हैं। सब जहन्नुम में जायेंगे। कुफ़्र की शिक्षा भ्रमित करने के अतिरिक्त किसी काम की नहीं। ज्ञान केवल वो है जो क़ुरआन में लिख दिया गया है या हदीसों में आया है। यही वह चिंतन है जिसके कारण इस्लाम अपने अतिरिक्त हर विचार, जीवन शैली से इतनी घृणा करता है कि उसे नष्ट करता आ रहा है, नष्ट करना चाहता है। चिंतक, लेखक, शायर मुबारक हैदर समस्या बता रहे हैं कि पाकिस्तान की दुर्गति की जड़ में इस्लाम और उसका चिंतन है। वो कह रहे हैं कि हम जिहाद की फैक्ट्री बन गए हैं। यह छान-फटक किये बिना कि ऐसा क्यों हुआ, हम स्थिति में बदलाव नहीं कर सकते। संकेत में वो कह रहे हैं कि अगर अपनी स्थिति सुधारनी है तो इस चिंतन से पिंड छुड़ाना पड़ेगा। उनकी किताबों का लाखों की संख्या में बिकना बता रहा है कि पाकिस्तानी समाज समस्या को देख-समझ रहा है। यह आशा की किरण है और सभ्य विश्व संभावित बदलाव का अनुमान लगा सकता है। आइये इस चिंतन पर कुछ और विचार करते हैं। ईसाई विश्व का एक समय सबसे प्रभावी नगर कांस्टेंटिनोपल था। 1453 में इस्लाम ने इस नगर को जीता और इसका नाम इस्ताम्बूल कर दिया। स्वाभाविक ही मन में प्रश्न उठेगा कि कांस्टेंटिनोपल में क्या तकलीफ़ थी जो उसे इस्ताम्बूल बनाया गया ? बंधुओ, यही इस्लाम है। सारे संसार को, संसार भर के हर विचार को, संसार भर की हर सभ्यता को, संसार भर की हर आस्था को.......मार कर, तोड़ कर, फाड़ कर, छीन कर, जीत कर, नोच कर, खसोट कर.......येन-केन-प्रकारेण इस्लामी बनाना ही इस्लाम का लक्ष्य है। रामजन्भूमि, काशी विश्वनाथ के मंदिरों पर इसी कारण मस्जिद बनाई जाती है। कृष्ण जन्मभूमि का मंदिर तोड़ कर वहां पर इसी कारण ईदगाह बनाई जाती है। पटना को अज़ीमाबाद इसी कारण किया जाता है। अलीगढ़, शाहजहांपुर, मुरादाबाद, अलीपुर, पीरपुर, बुरहानपुर और ऐसे ही सैकड़ों नगरों के नाम.......वाराणसी, मथुरा, दिल्ली, अजमेर चंदौसी, उज्जैन जैसे सैकड़ों नगरों में छीन कर भ्रष्ट किये गए मंदिर इन इस्लामी करतूतों के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। आपने कभी कुत्ता पाला है ? न पाला हो तो किसी पालने वाले से पूछियेगा। जब भी कुत्ते को घुमाने ले जाया जाता है तो कुत्ता सारे रास्ते इधर-उधर सूंघता हुआ और सूंघे हुए स्थानों पर पेशाब करता हुआ चलता है। स्वाभाविक है कि यह सूझे यदि कुत्ते को पेशाब आ रहा है तो एक बार में क्यों फ़ारिग़ नहीं होता, कहीं उसे पथरी तो हो नहीं गयी है ? फिर हर कुत्ते को पथरी तो नहीं हो सकती फिर उसका पल-पल धार मारने का क्या मतलब है ? मित्रो! कुत्ता वस्तुतः पेशाब करके अपना इलाक़ा चिन्हित करता है। यह उसका क्षेत्र पर अधिकार जताने का ढंग है। बताने का माध्यम है कि यह क्षेत्र मेरी सुरक्षा में है और इससे दूर रहो अन्यथा लड़ाई हो जाएगी। ऊपर के पैराग्राफ़ और इस तरह की सारी करतूतें इस्लामियों द्वारा अपने जीते हुए इलाक़े चिन्हित करना हैं। अब बताइये कि सभ्य समाज क्या करे ? इसका इलाज ही यह है कि समय के पहिये को उल्टा घुमाया जाये। इन सारे चिन्हों को बीती बात कह कर नहीं छोड़ा जा सकता चूँकि इस्लामी लोग अभी भी उसी दिशा में काम कर रहे हैं। बामियान के बुद्ध, आई एस आई एस द्वारा सीरिया के प्राचीन स्मारकों को तोडा जाना बिल्कुल निकट अतीत में हुआ है। इस्लामियों के लिये उनका हत्यारा चिंतन अभी भी त्यागने योग्य नहीं हुआ है, अभी भी कालबाह्य नहीं हुआ है। अतः ऐसी हर वस्तु, मंदिर, नगर हमें वापस चाहिये। राष्ट्रबन्धुओ! इसका दबाव बनाना प्रारम्भ कीजिये। सोशल मीडिया पर, निजी बातचीत में, समाचारपत्रों में जहाँ बने जैसे बने इस बात को उठाते रहिये। यह दबाव लगातार बना रहना चाहिए। पेट तो रात-दिन सड़कों पर दुरदुराया जाते हुए पशु भी भर लेते हैं। मानव जीवन गौरव के साथ, सम्मान के साथ जीने का नाम है। हमारा सम्मान छीना गया था। समय आ रहा है, सम्मान वापस लेने की तैयारी कीजिये। तुफ़ैल चतुर्वेदी

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

जावेद अख़्तर की काइयाँ वाचाली

आजकल whatsapp पर एक वीडिओ बहुत वायरल हो रहा है। इसमें मुंबई फ़िल्म जगत के लेखक-शायर जावेद अख़्तर, कुख्यात पत्रकार राजदीप सरदेसाई और उसी थैली के चट्टे-बट्टे बात करते दिखाई दे रहे हैं। हाल में कई जालीदार टोपियाँ भी मय मुसम्मात दिखाई दे रही हैं। जावेद अख़्तर इस विडिओ में क्लेम कर रहे हैं कि वो " एथीस्ट (नास्तिक) हैं। मैं यह छुप कर नहीं हूँ। मैं यह टीवी पर भी बोलता हूँ। अपने इंटरव्यू में भी बोलता हूँ। मैंने लिखा भी है. मेरा कोई रिलिजियस बिलीव नहीं है। नॉट एट ऑल. आई डोंट बिलीव इन दि एग्ज़िस्टेंस ऑफ़ गॉड. आई डोंट बिलीव एनी वॉइस कम्स फ्रॉम एनी वेयर, बिकॉज़ देयर इज़ नो वेयर नो वन. देट इस आई बिलीव. फिर वो आगे कहते हैं। उसके बारे में यहाँ से ख़त्म कर बात शुरू करता हूँ। इससे आप बात सही प्रोस्पेक्टिव में समझ पायेंगे। यहाँ से एक बात कही। कैनेडा से आप आये हैं। मैंने नोट किया है कि इस मामले में एन.आर.आई. अधिक सेंसटिव होते हैं।" ".... हिन्दू भगवानों की मोकरी की गयी। मुझे लगता है जो लोग रिलिजन का धंधा करते हैं उनकी मोकरी की गयी। एक..... दूसरे मैंने एक इंटरव्यू में ये बात कही थी और बहुत दुःख के साथ कही थी कि शोले में एक सीन था। जिसमें धर्मेंदर जो है जा के शिव जी की मूर्ति के पीछे छुप जाता है और हेमा मालिनी आती है तो धर्मेंदर कहता है। सुनो हम तुमसे... और वो समझती है शिवजी बोल रहे हैं। और वो हाथ जोड़ती है ये करती है..... आज अगर पिक्चर बने तो शायद मैं वो सीन नहीं लिख पाऊँगा। बिकॉज़ इट विल क्रिएट प्रॉब्लम। 1975 में इसका प्रॉब्लम नहीं हुआ था।" "उनके अनुसार यह इतनी क़ीमती चीज़ है जो उसे आप हाथ से मत जाने दीजिये। व्हाट इस सो ब्यूटीफुल अबाउट हिन्दू कम्युनिटी, हिन्दू कल्चर ? वो ये इजाज़त देता है कि कुछ भी कहो, कुछ भी सुनो और कुछ भी मानो। इस पर हॉल के कुछ लोग ताली पीटते हैं। आगे वो कहते हैं यही वैल्यू, यही ट्रेडिशन है जिसकी वज्ह से इस मुल्क में डेमोक्रेसी है इस मुल्क से निकलेंगे तो मेडिटेरियन कोस्ट तक डेमोक्रेसी नहीं मिलती। मगर मुझे हैरत होती है। आई मीट पीपल जो मुझे कहते हैं साहब पीके में तो आपने हिन्दू धर्म के बारे में तो इतनी लिबर्टी ले ली, क्या मुसलमानों के साथ लेते ? तो क्या मुसलमानों जैसे बनना चाहते हो" आप वैसे मत बनिए बरबाद हो जायेंगे। उन्हें ठीक कीजिये, ख़ुद वैसे मत बनिए। इसी तरह की कई बातों की चर्चा करते हुए यह 4 मिनिट 12 सैकिंड का यह विडिओ समाप्त होता है। जावेद साहब की घनीभूत पीड़ा है कि शायद वो भगवान शंकर की खिल्ली उड़ाने वाले सीन को आइंदा वैसा लिखने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे। वह एक किसी पुरानी पिक्चर के बारे में कह रहे हैं कि दिलीप कुमार जिनका उनके अनुसार अस्ली नाम यूसुफ़ ख़ान है, ने एक फ़िल्म में भगवान की मूर्ति को उठा कर कहा है कि.... मैं इसे नाले में फेंक दूंगा। पूरे विडियो में उनका यह दर्द हिलोरें मार रहा है कि अब ऐसे डायलॉग नहीं लिखे जा सकते। उनका सुझाव है कि हमें तालिबान नहीं बनना चाहिए। मैं यहाँ यह समझने में अक्षम हूँ कि वो इस वाक्य में " हमें " शब्द का प्रयोग कैसे और क्यों कर रहे हैं ? इस क्षण तक की मेरी जानकारी के अनुसार वो हिन्दू तो नहीं बने हैं। मेरी दृष्टि में वह स्वयं को एथीस्ट बताने भर से इस महान देश की संस्कृति के आधारभूत समाज हिन्दुओं से ख़ुद को जोड़ने का अधिकार तब तक नहीं है जब तक वो अपनी शुद्धि नहीं करवा लेते। घर वापस नहीं लौट आते। उनकी जानकारी के लिये निवेदन है कि एथीस्ट होना और हिन्दू होना साथ-साथ चल सकता है। यह पूरा वीडियो, हमारी संस्कृति महान है, सहिष्णु है आदि आदि से सना-पुता हुआ है। जावेद अख़्तर की यह बातें जितनी गंभीर और पवित्र हैं उससे अधिक गंभीर चर्चा, तार्किक चिंतन की मांग करती हैं। बंधुओ, मैं पवित्र भाव से ऐसा ही करने नहा-धो कर, आसन बिछा कर, अगरबत्ती जला कर बैठा मगर क्या किया जाए कि उनके इस जूनियर शायर को उनकी हर बात झूट, बेईमानी, फ़रेब, दग़ा और काफ़िरों के लिये ख़ास सामयिक इस्लामी दाँव तक़ैया नज़र आयी। बंधुओ, वह वीडियो में ख़ुद को एथीस्ट बता रहे हैं, गॉड से इंकार करते हैं मगर उनके पवित्र मुख से उनका अपना शब्द अल्लाह कुछ नहीं है, नहीं निकला। क्या जालीदार टोपियाँ मय मुसम्मात पर्दादारान की मौजूदगी ज़बान पकड़ कर बैठ गयी ? जावेद अख़्तर ईसाई मूल के नहीं हैं तो फिर यह क्यों कह रहे हैं ? आई डोंट बिलीव एनी वॉइस कम्स फ्रॉम एनी वेयर, बिकॉज़ देयर इज़ नो वेयर नो वन। जावेद आप अपने कुल की परम्परा के अनुसार साफ़ क्यों नहीं बोलते कि कहीं कोई अल्लाह नहीं है। उसका आख़िरी क्या कोई पैग़म्बर नहीं है। उनके मुँह से, जब अल्लाह ही नहीं तो पैग़ाम कैसा, उसका पैग़म्बर कौन क्यों नहीं निकलता ? उन्हें वीडियो में अपनी लिखी फ़िल्म शोले का भगवान शंकर की खिल्ली उड़ाने वाली बेहूदगी वाला सीन याद आता है मगर उसी शोले की कहानी में पैबन्द की तरह ख़ामख़ा जोड़ा गया पात्र अंधा रहीम चाचा याद नहीं आता। जिसमें अज़ान सुन कर बेटे की लाश पड़ी रहने पर भी "मैं चलता हूँ नमाज़ का टाइम हो गया" वाली नमाज़ की पाबंदी यानी नमाज़ की अत्यंत महान आवश्यकता और उसकी समय पर पढ़े जाने की याद दिलाई जाती है। इससे वो अल्लाह और उसके दीन की पवित्रता कुटिल चालाकी के साथ चुपके से स्थापित कर गए। वो बला की ऐबदारी बरतते हुए कहते हैं कि भारत के बाद प्रजातंत्र दूर मेडिटरेनियन पर मिलता है। यहाँ वो इस बात को बिल्कुल गोल कर जाते हैं कि भारत के बाद प्रजातंत्र इज़राइल में है और बीच में सब मुसलमान देश हैं। वो इस तथ्य पर चर्चा करने की आवश्यकता ही अनुभव नहीं करते कि क्यों किसी भी इस्लामी देश में प्रजातंत्र यानी सबके समान अधिकार वाली व्यवस्था नहीं है ? वो बराबर के देश की हालत को संकेत में ख़राब कहते हैं मगर बर्बादी के कगार पर पहुँचे पाकिस्तान ही नहीं विश्व में आतंकवाद की स्थिति का कारण इस्लाम है, बताने जगह मुँह में दही जमा लेते हैं। ज़ाहिर है ऐसा कुछ बोलते ही दही बिगड़ जाने का ख़तरा तो होगा ही ना...... बंधुओ, आपको 'शोले' और इसी तरह की फ़िल्मों के क्रम की 'ग़दर एक प्रेम कथा' ध्यान होगी। इसमें सनी दियोल एक सिख बने हैं जो 1947 के दंगों के समय एक मुस्लिम लड़की किसका चरित्र अमीषा पटेल ने निभाया है से विवाह कर लेते हैं। आगे कहानी इस विवाह को इस तरह ठंडा करती है कि उसमें सनी दियोल का पाकिस्तान जाना और वहां मुसलमान बनना दिखा दिया जाता है। संभवतः डाइरेक्टर, प्रोड्यूसर के ध्यान में था कि फ़िल्म में भी किसी सिख लड़के की मुसलमान लड़की की शादी दर्शकों के एक बड़े वर्ग को कुपित कर सकती है और फ़िल्म ठप हो सकती है। अभी कुछ दिनों पहले आयी एक और फ़िल्म गोलमाल-4 ध्यान कीजिये। उसमें एक ऐसे पात्र को जिसे भूत दिखाई पड़ते हैं, एक प्रेत अपनी समस्या बताता है। मैं हिंदू था और मेरी बेटी ने एक मुसलमान से शादी कर ली। मैं उससे बहुत नाराज़ था। बाद में मेरी नाराज़गी दूर हुई और मैंने उसे पत्र लिखे मगर भेज नहीं पाया और मेरी मृत्यु हो गयी। वह पत्र मेरी बेटी को भिजवा दो तो मेरी आत्मा को शांति मिल जाएगी। लड़की को पत्र मिल जाते हैं। वो पत्र पढ़ लेती है और प्रेतात्मा की मुक्ति हो जाती है। यहाँ स्वयं से एक बहुत गंभीर प्रश्न पूछिए कि हिंदु लड़कियों के मन में इस्लामियों से विवाह सामान्य बात है, कैसे बैठा ? इस्लाम के प्रति यह बिना जाने कि इस्लाम क्या है, अनायास सहज भाव कैसे बैठ गया ? सर्वधर्म समभाव हमारी कुछ लड़कियों के चिंतन का अंग कैसे बना ? यह बहुत सोच-विचार कर बनायी गयी योजना है। लगातार मस्तिष्क पर जाने-अनजाने छोड़ी गयीं काल्पनिक मगर धूर्त बातें सबकॉन्शस ब्रेन का हिस्सा बन गयीं। अब जावेद अख़्तर और ऐसे हर व्यक्ति से थोड़ी सी खरी-खरी बातें कहने का उपयुक्त समय है। आपके पिता की पीढ़ी के मुसलमानों ने 1947 में भारत माता का विभाजन कांग्रेस के हाथों करवाया। उसके तुरंत बाद खंडित भारत में पहला चुनाव 1952 में हुआ। स्वाभाविक था कि इस चुनाव में मतों ध्रुवीकरण हिंदूवादी दलों के पक्ष में होता। आपको जानना चाहिए लुटे-पिटे, आहत-कराहते, झुलसे-सुलगे हुए हिन्दुओं ने उस आम चुनाव में केवल 2 सीटें तथाकथित हिंदूवादी पार्टी जनसंघ को जिताईं थीं। जनसंघ की पहली सीट श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी कोलकाता से जीते थे। आप उस काल की राजनीति के शीर्ष पुरुष थे। स्वयं नेहरू के मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री रह चुके थे। दूसरी सीट जम्मू से प्रेम नाथ डोगरा जी की थी। वह भी जम्मू-कश्मीर के निर्विवाद सबसे बड़े नेता थे। महाराज हरिसिंह जी के परम विरोधी और जनता के चहेते नेता थे। इन दोनों की जीत हिंदूवादी दल के प्रत्याशी होने के कारण नहीं हुई बल्कि यह अपने व्यक्तित्व के कारण जीते थे। सोचिये आज ऐसा क्या हो गया कि केंद्र में तथाकथित हिंदूवादी दल भाजपा की प्रबल सरकार है ? क्यों इस्लामियों का साथ चाहने-मांगने वाली हर पार्टी चुनावी राजनीति से बाहर खदेड़ी जा रही है ? क्यों भाजपा को हिंदूवादी लोग एक जुट हो कर वोट दे रहे हैं ? क्यों एक एक कर प्रदेशों से भी मुसलमानों के वोटों के लिए जीभ लपलपाने, कमर नचाने वाली पार्टियों के हाथों सरकारें निकलती जा रही हैं ? वह कौन सा तत्व है जिसके कारण लाखों-करोड़ों लोग अपनी जेब से मोबाइल रिचार्ज करा-करा कर प्रिंट और इलेक्ट्रिक मिडिया के समानांतर सोशल मीडिया खड़ा कर रहे हैं ? उन्हें मोदी जी अथवा योगी जी की जीत से निजी रूप से कुछ नहीं मिलने वाला, न इन्हें कुछ लेना है मगर यह सब अपनी जान क्यों झोंक रहे हैं ? मेरी समझ से आपको इस बदलाव को बहुत गंभीरता से लेना चाहिए। जावेद साहब, इसके लिये इस्लाम के उद्दंड और वाचाल लोग ज़िम्मेदार हैं। आपको ध्यान होगा इस्लामी नेताओं द्वारा "पी ए सी मस्ट बी स्टोनड" { पी ए सी के लोगों को पत्थर मार मर कर कुचल दो } जैसे बयान दिए गए हैं। "भारत माता डायन है" जैसी बातें कही गयी हैं। "5 मिनिट के लिए पुलिस हटा लीजिये फिर दिखा देंगे किसमें कितना दम है" जैसी बातें सार्वजनिक मंचों से बोली गयी हैं। हर उत्पाती इस्लामी नेता का प्रत्येक बेहूदा बयान कानों में खौलते तेल की तरह जाता है और एक एक दग्ध ह्रदय को जोड़ता चला जाता है। इस्लाम की गुप्त वैश्विक योजनायें इंटरनेट और सोशल मीडिया के कारण गुप्त नहीं रहीं। इसी कारण अब आपके जैसे चतुर चालाक लोगों की सत्यता भी छिपी नहीं है। लोग इस्लामी जनसंख्या के अनुपात बढ़ने और उसके कारण उसकी बदलने वाली चालों को समझने लगे हैं। वो जानते हैं कि क्यों मुसलमान स्वयं को कम्युनिस्ट, एथीस्ट, एग्नॉस्टिक कहते-बताते हैं मगर उनके किसी हमले का निशाना इस्लाम नहीं होता। लोग यह भी जानते हैं इस्लाम वह मज़हब है जिसमें 1500 वर्ष से आज तक कोई बदलाव नहीं आया बल्कि बदलाव सोचा तक नहीं गया। तीन तलाक़, हलाला जैसे विषयों पर आपकी चुप्पी उन्हें जाना-सोचा दाँव लगती है। जो कि वस्तुतः सच भी है। राष्ट्रबन्धुओ ! जावेद अख़्तर और ऐसा हर चालाक हमें बेवक़ूफ़ समझता है, बनाना चाहता। इस्लाम को प्रजातांत्रिक साबित करने से ले कर स्वयं को सर्वधर्म समभाव मानने वाला, नास्तिक कुछ भी इसी चाल और चिन्तन के कारण बताता है। उसका लक्ष्य केवल यह है कि इस्लाम के प्रभावी, वर्चस्वी होने तक आप ग़फ़लत की नींद सोये रहें और भारत के टुकड़े तोड़े जाते रहें। देश से अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश नोचा जा सके। जगह-जगह कश्मीर बनाये जा सकें। राष्ट्र को समाप्त किया जा सके। तुफ़ैल चतुर्वेदी

बुधवार, 1 नवंबर 2017

सभ्य सँसार के इस्लामी दुनिया को ले कर दायित्व

सभ्य सँसार और इस्लामी दुनिया के चिंतन-जीवन में इतनी दूरी है कि सभ्य सँसार इस्लामी दुनिया को समझ ही नहीं सकता। सभ्य समाज में स्त्रियों के बाज़ार जाने, रेस्टोरेंट जाने, स्टेडियम जाने को ले कर कोई सनसनी जन्मती ही नहीं। यह कोई समाचार ही नहीं है मगर इस्लामी सँसार के लिए यह बड़ा समाचार है कि सऊदी अरब अब अपने देश में होने वाली खेल प्रतियोगिताएं को देखने के लिए महिलाओं को स्टेडियम में जाने की अनुमति देगा। यह अनुमति 2018 में लागू होगी। अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि महिलाएं स्टेडियम में जा कर खुद भी खेल सकेंगी कि नहीं। यह फ़ैसला युवराज मुहम्मद बिन सलमान ने समाज को आधुनिक बनाने और अर्थ व्यवस्था को बढ़ाने के तहत किया है। प्रारम्भ में इसे तीन बड़े नगरों रियाद, जद्दा और दम्माम में बने स्टेडियमों में लागू किया जायेगा। अब उन्हें पुरुषों के खेल देखने की अनुमति भी होगी। सऊदी अरब खेल प्राधिकरण के अनुसार नई व्यवस्था के लिये स्टेडियम परिसर में रैस्टोरेंट, कैफ़े, सी.सी.टी.वी. कैमरे, स्क्रीन और ज़रूरी व्यवस्थाएं की जायेंगी। 32 वर्षीय युवराज के विज़न 2030 के तहत जल्द ही देश में म्युज़िक कंसर्ट और सिनेमा देखने का सिलसिला प्रारंभ होने की उम्मीद है। इसमें अभी भी पेच है। किसी भी सामान्य मस्तिष्क में भी प्रश्न आयेगा कि आख़िर औरतों को स्टेडियम में खेल देखने की यह अनुमति 2018 में लागू क्यों होगी ? आज ही लागू करने में क्या परेशानी है ? इसमें पेच यह है कि सऊदी व्यवस्था को स्टेडियम परिसर में रैस्टोरेंट, कैफ़े, सी.सी.टी.वी. कैमरे, स्क्रीन और ज़रूरी व्यवस्थाएं बनानी हैं। इसका मतलब यह है कि औरतों के लिये यह सारी व्यवस्था स्टेडियम में अलग से बने हिस्से में होगी। जिसमें बैठी महिलायें न दायें-बायें देख सकेंगी, न उनके बॉक्स में कोई बाहर से देख सकेगा। यह एक बक्सा सा होगा जो तीन तरफ़ से बंद और केवल सामने से खुला होगा। आपने यदि ताँगे के घोड़े को देखा हो तो आप पायेंगे कि उसकी आँखों के दोनों ओर चमड़े का बनी खिड़की की झावट सी होती है। जिसके होने से वो केवल सीधा ही देख सकता है। सभ्य समाज के अपने लिए ही नहीं बल्कि मुल्ला समाज के लिए जानना और जनवाना उपयुक्त होगा कि सऊदी अरब ही नहीं अपितु पूरे अरब जगत में औरतें भारी बंदिशें झेल रही हैं। उनके पहनावे के कड़े नियम हैं। सार्वजनिक गतिविधियों, ग़ैरमर्द से बात करने पर प्रतिबंध हैं। पुरुषों के साथ काम करने पर रोक है। घर से अकेले निकलने पर रोक है। इससे उस घोर-घुटन, संत्रास, पीड़ादायक जीवन का अनुमान लगाइये जो क़ुरआन और हदीसों के पालन के नियम ने मुसलमानों के आधे हिस्से को सौंपा है। पुरुष अभिभावक के बिना स्त्री कहीं और जाना तो दूर डॉक्टर के पास भी नहीं जा सकती। कल्पना कीजिये कि सऊदी अरब में कोई लड़की या औरत घर पर अकेली हो और उसके चोट लग गयी हो। साहब जी, इस्लामी क़ानून के अनुसार उसकी विवशता है कि उसका कोई पुरुष अभिभावक आये और उसे डाक्टर के पास ले जाये अन्यथा वह घायल बाध्य है कि तड़प-तड़प कर, रो-रो कर मर जाये। बंधुओ! यह सभ्य समाज की मानवीय ज़िम्मेदारी { moral duty } है कि आप और हम इस्लाम के शिकंजे से मुसलमान समाज को मुक्ति दिलायें। इसके लिये अनिवार्य शर्त इस्लाम से मुसलमानों को परिचित कराना, उसकी सत्यता का मुसलमानों को अहसास कराना है। एक बार मुसलमान स्थिति को समझ गये तो इस्लाम में बदलाव ले आयेंगे। तुफ़ैल चतुर्वेदी

शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

अनंत कुमार हेगड़े जी का टीपू सुल्तान की जयंती का बहिष्कार

तीन-चार सूचनाएं जानने, मनन करने और चिंतन की दिशा तय करने में सहायक होंगी। पहली यह कि केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने टीपू सुल्तान को बर्बर हत्यारा बताते हुए उसकी जयंती पर कर्नाटक सरकार द्वारा 10 नवंबर को किये जाने वाले कार्यक्रम से किनारा कर लिया है। उन्होंने कहा है कि कर्नाटक सरकार बर्बर हत्यारे, घृणित कट्टरपंथी और सामूहिक दुष्कर्म करने वाले को गौरवान्वित करने के शर्मनाक कार्यक्रम में मुझे आमंत्रित न करे। जिस पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री श्री सिद्धरमैया ने कहा है कि हेगड़े को ऐसा नहीं करना चाहिए था। उन्होंने मामले का राजनीतिकरण करने की निंदा की। साथ ही 18 वीं सदी के मैसूर के शासक टीपू सुल्तान को स्वतंत्रता सेनानी बताया। कहा कि टीपू ने अंग्रेज़ों के साथ चार लड़ाइयाँ लड़ीं। जिस पर भाजपा संसद प्रह्लाद जोशी ने टीपू को हिन्दू विरोधी, कन्नड़ विरोधी बताया। दूसरी यह कि कुछ दिन पहले मीडिया पर हिन्दू-मुस्लिम एकता की महान प्रतीक बताई जा रहीं वाराणसी की मुस्लिम महिलाओं, जिन्होंने दीपावली की पूर्व संध्या पर भगवान राम की आरती उतारी, को ईमान से ख़ारिज कर दिया गया है। दारुल-उलूम ज़करिया, सहारनपुर { दारुल उलूम की ढेरों शाखाएं हैं। इसे रक्तबीज ही जानिए और वैसा ही व्यवहार करने की व्यवस्था कीजिये } के उस्ताद और फ़तवा ऑन लाइन के चेयरमैन अरशद फ़ारूक़ी ने फ़तवा दिया है कि वह औरतें अपनी ग़लती मान कर कर दुबारा ईमान लायें। वह कलमा पढ़ कर लोगों को बतायें कि उन्होंने अपनी ग़लती की तौबा कर ली है। जिस पर श्री राम की आरती उतारने वाली नाज़नीन अंसारी जी ने दारुल उलूम के ख़िलाफ़ एफ़ आई आर करवाने की बात कही है। उन्होंने कहा है कि दारुल उलूम का कहना है कि जो महिलाएं श्री राम की आरती करती हैं उन्हें इस्लाम स्वीकार नहीं करता। दारुल उलूम कोई ठेकेदार नहीं, न ही उनके पास कोई अधिकार है इस तरह का आदेश देने का। उन्होंने सरकार से माँग की है कि दारुल उलूम की फंडिंग आदि की जाँच की जाये और इस संगठन पर ताला लगाया जाये, क्योंकि 2014 में जब सुप्रीम कोर्ट ने फ़तवे पर रोक लगा दी थी तो दारुल उलूम कैसे किसी के ख़िलाफ़ फ़तवा दे सकता है ? उनके अनुसार सवाल उठता है कि जब हिन्दू मज़ार पर जा कर चादर चढ़ा सकता है तो मुस्लिम श्री राम की आराधना क्यों नहीं कर सकते ? तीसरी यह कि अवैध खनन को ले कर चर्चित पूर्व एम एल सी हाजी इक़बाल ईमान से ख़ारिज कर दिए गए हैं। ग्लोबल विश्वविद्यालय के कैम्पस में स्थित आयुर्वेदिक कॉलिज में धन्वंतरि जयंती पर हवन-पूजन का आयोजन किया गया था। जिसमें हाजी इक़बाल ने भी आहुति डाली थी, जिसका वीडिओ सार्वजनिक हो गया। फ़तवा ऑन लाइन के चेयरमैन अरशद फ़ारूक़ी ने इन पर भी फ़तवा दिया है कि हाजी इक़बाल भी इस्लाम से ख़ारिज हैं और उन्हें भी तौबा करनी चाहिए और दुबारा कलमा पढ़ना चाहिए। चौथी और इनमें सबसे पुरानी मगर महत्वपूर्ण बात अटल बिहारी बाजपेयी जी का बौद्धिक है। कृपया YouTube खोलिये और Atal Bihari Speech About Battle Of Plasi डालिये। अद्भुत वक्ता अटल जी 6 मिनिट 51 सेकिंड के विडिओ में अपने पूरे फ़ॉर्म में हैं। इस बौद्धिक का प्रारंभ इस वाक्य से होता है। "प्लासी की लड़ाई में जितने लोग मैदान में लड़ रहे थे थे उससे ज़ियादा लोग मैदान के बाहर खड़े हो कर तमाशा देख रहे थे। लड़ाई का परिणाम सुनने की प्रतीक्षा कर रह थे। देश के भाग्य का निर्णय होने जा रहा था मगर उस निर्णय में सारा देश शामिल नहीं था........" इन घटनाओं की छानफटक की जाये तो तथ्य यह हाथ लगते हैं कि टीपू सुल्तान, अनंत कुमार हेगड़े, नाज़नीन अंसारी, अरशद फ़ारूक़ी, हाजी इक़बाल, अटल बिहारी बाजपेयी और ........को भी ले लीजिये, की दृष्टि देश और राष्ट्र पर अलग-अलग है। इसे इस तरह देखिये कि टीपू सुल्तान, अरशद फ़ारूक़ी, हाजी इक़बाल और ऐसे न जाने कितने लोगों के लिए महमूद ग़ज़नवी हीरो है। पाकिस्तान के कोर्स की किताबों में उसकी गौरव-गाथा पढ़ाई जाती है मगर अनंत कुमार हेगड़े, ........ और संभवतः अटल बिहारी बाजपेयी की दृष्टि में भी बर्बर हत्यारा, लुटेरा, घृणित है। टीपू सुल्तान अनंत कुमार हेगड़े जैसे बहुतों के लिये बर्बर हत्यारा, घृणित कट्टरपंथी, सामूहिक दुष्कर्म करने वाला पापी है मगर कर्नाटक सरकार उसकी जयंती मना रही है। प्लासी की लड़ाई पर विकीपीडिया पर जानकारी देखिये........ "प्लासी का युद्ध 23 जून 1757 को मुर्शिदाबाद के दक्षिण में 22 मील दूर नदिया जिले में गंगा नदी के किनारे 'प्लासी' नामक स्थान में हुआ था। इस युद्ध में एक ओर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना थी तो दूसरी ओर थी बंगाल के नवाब की सेना। कंपनी की सेना ने रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में नबाव सिराज़ुद्दौला को हरा दिया था। किंतु इस युद्ध को कम्पनी की जीत नहीं मान सकते क्योंकि युद्ध से पूर्व ही नवाब के तीन सेनानायक, उसके दरबारी तथा राज्य के अमीर सेठ जगत सेठ आदि से क्लाइव ने षडंयत्र कर लिया था। नवाब की तो पूरी सेना ने युद्ध में भाग भी नहीं लिया था। युद्ध के फ़ौरन बाद मीर जाफ़र के पुत्र मीरन ने नवाब की हत्या कर दी थी। युद्ध को भारत के लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण माना जाता है इस युद्ध से ही भारत की दासता की कहानी शुरू होती है।"........इसमें अटल जी वाली ही लाइन ली गयी है कि भारत में मुग़ल सत्ता और उसके अवशेष भारत के अस्ली शासक थे। यहाँ यह जानना उपयोगी होगा कि प्लासी की लड़ाई में अंग्रेज़ों के हाथों इस्लाम की हार के उपरांत सैकड़ों वर्षों बाद कोलकाता में सार्वजनिक दुर्गा-पूजा हो सकी थी जिसमें क्लाइव भी सम्मिलित हुआ। वर्तमान भौगोलिक दृष्टि से देखें तो उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल........ में हिंदु राजाओं की पराजय के बाद से ही हमारे पूर्वज पूजा नहीं कर सकते थे। इस्लामी सत्ता ने मंदिर बनाने, भग्न होते मंदिरों की मरम्मत पर रोक लगा दी थी। चैतन्य महाप्रभु जैसे अनेकों के सार्वजनिक कीर्तन करने पर कोड़ों से पीटे जाने के उल्लेख मिलते ही हैं। इस्लामियों द्वारा उन पर ही नहीं सामान्य हिन्दुओं पर गौ माँस के टुकड़े फेंके जाते थे। हिंदु तिलक नहीं लगा सकते थे। जनेऊ नहीं पहन सकते थे। इस्लाम हमें अपमानित कर जज़िया वसूलता था। हमारे विश्वविद्यालय नष्ट कर दिए गए थे। हमारी लड़कियों पर इस्लामियों द्वारा सार्वजनिक बलात्कार सामान्य बात थी। हमें इस्लामियों ग़ुलाम बना कर बाज़ारों में बेचा जाना सामान्य बात थी। चूँकि हिन्दू पीपल, वट वृक्ष की पूजा करते थे अतः शिर्क़, कुफ़्र होने के कारण इस्लामियों ने उन्हें यथासंभव काट डाला था। यहाँ प्रश्न उठता है कि राष्ट्रवादी शक्तियों के प्रमुख सार्वजनिक स्तम्भ को नवाब सिराजुद्दौला का अंग्रेज़ों द्वारा हराया जाना देश की पराजय क्यों लगा ? स्पष्ट है कि उस चिंतन धारा के लोगों और अनंत कुमार हेगड़े जैसे लोगों की राष्ट्र की समझ में मूल और बहुत बड़ा अंतर है। उस चिंतन धारा के लोग वही हैं जो मानते हैं कि यह राष्ट्र दुनिया भर से इकट्ठे हुए लोगों का कुनबा है। उनके लिए यह भांति-भांति के लोगों का मेला भर है। विषय यह नहीं है कि ऐसा मानने वाले वामपंथी हैं या राष्टवादी, विषय राष्ट्र और देश की ग़लत समझ का है। चूँकि निकटतम शासन अंग्रेज़ों का रहा है, 1947 में मिली कँटी-फटी स्वतंत्रता की यादें ताज़ा हैं अतः स्वभाविक रूप से अंग्रेज़ राष्ट्र के शत्रु थे। जिसने अंग्रेज़ों से लड़ाई लड़ी, जिसको अंग्रेज़ों ने प्रताड़ित किया वो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी है। चाहे वो टीपू जैसा बर्बर हत्यारा, घृणित कट्टरपंथी, सामूहिक दुष्कर्म करने वाला पापी हो। यहाँ यह गंभीर निवेदन करता चलूँ कि 1857 को भी इसी कसौटी के कारण स्वतंत्रता संग्राम कहा गया है कि वह अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ था। यह बात सिरे से ग़ायब कर दी गयी है कि अगर वो देश छोड़ कर चले जाते तो सत्ता कौन संभालता.......बर्बर हत्यारे मुगल बर्बर और उनके बग़ल -बच्चे ? टीपू जैसा इस्लामी घृणित कट्टरपंथी ? वह सारे लोग और उनकी मूल चिंतन धारा जिसने, जितनी बुराई सोची जा सकती है, तक हमें अपमानित, प्रताड़ित किया को भूला जा सकता है, भुला दिया जाना चाहिए। यहाँ यह सोचने की बात है कि जो चिंतन प्रणाली हिन्दुस्थान में कुफ़्र-शिर्क़ मिटाने, काफ़िरों-मुशरिक़ों की इबादतगाहों को ढाने {रामजन्मभूमि, कृष्णजन्म भूमि, काशीविश्वनाथ जैसे हज़ारों मंदिरों के तोड़ने के संदर्भ लीजिये}, काफ़िरों को ख़त्म करने, उनको ग़ुलाम बनाने आई थी, वह तो आज भी वैसी की वैसी है। 1947 में उसकी शक्ति बँट गयी अतः गाँधी-नेहरू के षड्यंत्र से हमारे हाथ आयी कँटी-फटी मातृभूमि में वो यह सब उतने बड़े पैमाने पर तो नहीं कर पा रही है मगर मुसलमानों को काफ़िरों-मुशरिक़ों के साथ जाने में रोक रही है। अनंत हेगड़े जी के साहस ने अवसर दिया है कि राष्ट्र को परिभाषित कीजिये। इतिहास की किताबों में आज भी सम्मान से पढ़ाये जाते सिद्धांत "गू खा तसले में" के गुलाम, ख़िलजी, तुग़लक़, सैयद, लोदी, मुग़ल वंश को भारत का शासक बताने की जगह आक्रमणकारी घुसपैठिये, बर्बर हत्यारे, घृणित कट्टरपंथी लिखिए, जो वो वस्तुतः थे। दारुल-उलूम ज़करिया के उस्ताद और फ़तवा ऑन लाइन के चेयरमैन अरशद फ़ारूक़ी उन हत्यारों के प्रशंसक इसी कारण हैं कि उन्होंने कुफ़्र, शिर्क़ मिटाया था और इस्लाम का बोलबाला किया था। वह नाज़नीन अंसारी, हाजी इक़बाल के ख़िलाफ़ इसी चिंतन के कारण फ़तवा देते हैं। अरशद फ़ारूक़ी और इस तरह के लोग इसी तर्क और कसौटी के कारण राष्ट्र के शत्रु हैं। उनको अंतिम परिणिति तक पहुंचाइये। तुफ़ैल चतुर्वेदी

बुधवार, 27 सितंबर 2017

सँसार की सबसे बड़ी ख़बर

हो सकता है आप इस छोटे से लेख पर सबसे बड़ी ख़बर का शीर्षक पढ़ कर हँसने लगें। सँसार की सबसे बड़ी ख़बर, इस्लामी उम्मा के आधे नाक़िस उल अक़्ल हिस्से, न न मैं नहीं कह रहा ये पोपट सरकार बल्कि चौपट सरकार और उनकी किताब का फ़रमान है, को सऊदी अरब में गाड़ी चलने की अनुमति मिल गयी है। दुनिया के लिये आख़िरी मुकम्मल दीन के दावा करने वालों की जमात के संरक्षक, वित्त-पोषक, प्रेरक { यहाँ भड़काऊ अर्थ लें } सऊदी अरब के शाह ने औरतों को गाड़ी चलाने की अनुमति दे दी है। सऊदी अरब में यह ख़बर सुन कर औरतें गाड़ी ले कर रात में ही सड़कों पर निकल आईं। 'आई एम माय ओन गार्जियन' जैसे हैश टैग सऊदी सोशल मिडिया पर छा गये। गाड़ी चलाना भर इन बदनसीबों को अपना गार्जियन बनने की ओर बढ़ता हुआ क़दम लग रहा है ? इससे उस घोर-घुटन, संत्रास, पीड़ादायक जीवन का अनुमान लगाइये जो क़ुरआन और हदीसों के पालन के नियम ने मुसलमानों के आधे हिस्से को सौंपा है। आज भी सऊदी अरब में लड़की अपने अभिभावक की अनुमति के बिना शादी नहीं कर सकती। काले रंग के पूरे शरीर को ढकने वाले अबाया नाम के वस्त्र को ढंके बिना किसी सार्वजनिक स्थान पर नहीं जा सकती। पुरुष अभिभावक के बिना स्त्री डॉक्टर के पास भी नहीं जा सकती। पुरुष अभिभावक की लिखित अनुमति के बिना पासपोर्ट नहीं बनवा सकती। पुरुष अभिभावक की अनुमति के बिना पहचान-पत्र नहीं बनवा सकती। किस रेस्त्रां के परिवारी सैक्शन में ही खाना खा सकती है। पुरुष गारंटर के बिना बिज़नेस नहीं कर सकती। पैतृक सम्पत्ति में लड़की को भाई से आधे भाग का ही अधिकार है। तलाक़ हो जाये तो लड़के के 7 साल और लड़की के 9 साल के होने से पहले उसे अपनी संतान को अपने पास रखने का अधिकार नहीं है। कोर्ट में दो औरतों की गवाही एक पुरुष के बराबर मानी जाती है { यह क़ुरआन का आदेश है } गाड़ी चलने की अनुमति देना कितना बड़ा साहसी क़दम है। स्त्री अभी तक ड्राइविंग लाइसेंस नहीं बनवा सकती थी। सऊदी अरब के शाह को अपने सीने पर पत्थर बल्कि पहाड़ रख कर यह निर्णय लेना पड़ा होगा। सँसार भर में मुल्ला जमात औरतों के गाड़ी चलाने को सामाजिक मान्यताओं का उल्लंघन मानती है। इस वाक्य का ख़ुलासा करें तो यह मुल्ला सोच बरामद होती है कि औरतें अगर मर्द की पहरेदारी के बिना गाड़ी चलायेंगी वो घर का सौदा-सुल्फ़........सब्ज़ी-गोश्त लेने, बच्चे को डॉक्टर के पास या ऐसे ही किसी आवश्यक काम से नहीं जाएँगी वो बदचलनी करने जाएँगी। यह वाक़ई तकलीफ़ देने वाली बात है। मुल्ला जिन मदरसों में पढ़े हुए हैं वहां का वातावरण स्त्री-विरोधी और पुरुष-प्रेमी होता है। स्पष्ट है यह उनके अधिकारों का हनन है और अपने अधिकार छिनवाना कौन चाहेगा ? यह जानना ठीक होगा कि सँसार में ग़ुलामी और लौंडियाँ रखने को ग़ैरक़ानूनी क़रार देने वाला आख़िरी देश कौन सा है ? साहब जी, सऊदी अरब जी हाँ सऊदी अरब मानवता का अंतिम कैंसर था। सँसार भर के दबाव के बाद इस देश के शासकों ने ग़ुलामों और लौंडियाँ रखने को ग़ैरक़ानूनी क़रार दिया था। यह निर्णय आसान नहीं था कि यह मुहम्मद की सुन्नत थी और इस्लामी दृष्टि में मुहम्मद का किया-धरा अपने जीवन में उतारना सवाब का काम है। उसका उल्लंघन कौन करे ? सऊदी अरब के शाह ने यही कर दिखाया है। साहब जी मैं तो यह ख़बर पढ़ते ही फूट-फूट कर रोने लगा। इतना भावुक हो गया हूँ........पता नहीं आज यह आँसू रुकेंगे कि नहीं। सऊदी अरब के बादशाह आपकी जय हो। इस चिंतन की जड़ ही काट डालिये, पत्ते नोचने से कुछ नहीं होगा। वरना सभ्य समाज आपकी काट डालेगा तुफ़ैल चतुर्वेदी