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मंगलवार, 17 नवंबर 2015

कांधला के निकट एक ट्रेन में तब्लीगी जमात के कुछ लोगों के साथ मार-पीट

ये ओसामा बिन लादेन के तिक्का-बोटी दिवस की बरसी थी। टी वी के इक्का-दुक्का चैनलों पर घूँघट काढ़े एक समाचार फ़्लैश हुआ कि कांधला के निकट एक ट्रेन में तब्लीगी जमात के कुछ लोगों के साथ मार-पीट हुई और अगले दिन बीकानेर से हरिद्वार जाने वाली ट्रेन रोक कर उस पर पत्थर बरसाए गए। एक-आध बार के बाद घूँघट वाला शरमाया-शरमाया समाचार भी गायब हो गया मगर सोशल मीडिया विशेष रूप से फेस बुक पर 'एक और असफल गोधरा' के शीर्षक से ये समाचार बड़े विस्तार से चर्चा का केंद्र बना। घटना की मोटी-मोटी जानकारी ये है कि तब्लीगी जमात के एक समूह ने ट्रेन में यात्रा कर रहे लोगों { काफिरों } को कुफ्र-ईमान, दारुल-हरब और दारुल-इस्लाम समझने का प्रयास किया। इस पर कुछ बहस हुई। बहस धींगा-मुश्ती में बदल गयी और जमातियों के गाल गुलाबी हो गए। 

 इसका एक वर्ज़न और भी है जो एक कुटे हुए जमाती ने बताया है। उसके अनुसार वो और उसके कुछ साथी दिल्ली में एक इज्तमा { इस्लामी एकत्रीकरण } में भाग लेने महाराष्ट्र से आये थे। इज्तमा के बाद उनकी इच्छा अपने मूल केंद्र सहारनपुर स्थित मदरसे मजाहिरे-उलूम जाने की हुई। वो ट्रेन में सवार हुए। रास्ते में वो पेशाब जाने के लिए सामूहिक रूप से उठे। टायलेट के दरवाजे पर भीड़ थी। उन्होंने वहां खड़े लोगों से रास्ता छोड़ने के लिए कहा और वहां खड़े लोगों ने उनकी पिटाई शुरू कर दी। किसी भी तरह ये मानना कठिन है कि पेशाब करने जाने के निवेदन पर लोगों ने 6 मासूम लोगों को अकारण पीटना शुरू कर दिया होगा। मारपीट का प्रारम्भ सदैव बातचीत के बहस, बहस के कठहुज्जती, कठहुज्जती के व्यक्तिगत कटाक्षों / आक्षेपों में बदल जाने के कारण होता है। बहरहाल पिटे-छिते जमातियों ने अगले स्टेशन पर ट्रेन से उत्तर कर स्थानीय इमाम से सम्पर्क किया। इमाम ने सैकड़ों लोगों के साथ थाना घेर लिया। प्रशासन ने मामला दर्ज कर जाँच के आदेश दे दिये। 

कुछ प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार दिल्ली से सहारनपुर जा रही ट्रेन में महाराष्ट्र के पांच जमातियों के साथ मारपीट का कारण ये था कि ट्रेन में तबलीगी मुजाहिद कुछ महिलाओं को छेड़ रहे थे। महिलाओं के प्रतिवाद करने पर यात्रिओ ने उन्हें जुतियाया। समाजवादी पार्टी के स्थानीय विधायक नाहीद हसन को इस जाँच के आदेश से चैन नहीं पड़ा और उन्होंने अगले दिन अपने हजारों समर्थकों के साथ ट्रेन की पटरी पर धरना दिया। भीड़ उग्र हो उठी और उसने बीकानेर से हरिद्वार जा रही ट्रेन नंबर 04735 को रोक कर उस पर पथराव किया। उसमें आग लगाने की कोशिश की। स्थानीय डी एम के नेतृत्व में पुलिस ने भीड़ को लाठी चार्ज कर के तितर-बितर कर दिया और ट्रेनों को आगे रवाना किया। इस घटना में 16 पुलिस वाले भी घायल हुए। 

इससे पहले कि ये विषय समाज के ध्यान से उतर जाये, आवश्यक है कि इस बात, बहस, झगडे, उपद्रव की जड़ तक जाया जाये, अर्थात समझा जाये कि जमात किस बला का नाम है ? जमात का शाब्दिक अर्थ समूह है मगर इसके व्यवहारिक अर्थ हैं ' उन लोगों का समूह जो नवधर्मांतरित मुस्लिमों को कट्टर मुसलमान यानी अपनी दृष्टि में सही मुसलमान बनाने का कार्य करते हैं'। जमात इस्लामी चिंतन का पहले दिन से हिस्सा हैं। इस्लाम ने अपने जन्म के साथ ही अपनी दृष्टि से संसार के दो भाग किये। पहला अहले-इस्लाम यानी मुसलमान और उनके प्रभुत्व-स्वामित्व वाली धरती यानी दारुल-इस्लाम।  दूसरा मुस्लमों से इतर लोगों यानी काफिरों, मुशरिकों, मुलहिदों, मुन्किरों, मुरतदों का समाज और उनकी धरती यानी दारुल-हरब अर्थात युद्ध क्षेत्र।  दारुल-हरब के लोगों को मुसलमान बनाना और दारुल-हरब को दारुल-इस्लाम में बदलना हर मुसलमान का कर्तव्य है। यही इस्लाम के पहले दिन यानी 1400 वर्षों से पल-पल, क्षण-क्षण विचार, क्रिया के स्तर पर घटित होने वाला उपद्रव है। यही जिहाद है। 

ये बहला-फुसला कर, मार-पीट कर, लड़कियां भगा कर यानी जैसे बने करने वाला अनवरत द्वंद्व है। इस प्रक्रिया को इस तरह समझें। मान लीजिये कि कोई मतिमन्द , मतकटा हिन्दू, ईसाई, पारसी, यहूदी किसी तरह मुसलमान बनाने के लिए तैयार हो जाये तो एक दाढ़ीदार मुल्ला उसे कलमा पढ़ायेगा और उसका नाम बदल कर अरबी मूल का रख देगा। मगर धर्मान्तरित व्यक्ति और मुल्ला समूह ऐसे ही नहीं मान लेगा कि वो मुसलमान हो गया चूँकि इस्लाम की मांगें तो सम्राज्यवादी हैं। अब अनिवार्य रूप से उस व्यक्ति को अपने पूर्वजों से आत्मिक-मानसिक सम्बन्ध तोड़ने होंगे। अपने आस्था केन्द्रों, अपनी धरती, अपनी प्रथाओं, अपने इतिहास पुरुषों से घृणा करनी पड़ेगी। स्वयं को कृतिम रूप से अरबी बनाने के काम में लगना पड़ेगा। ये कुछ-कुछ अफ़्रीकी मूल के अमरीकी गायक माइकिल जैक्सन के अपने शरीर की काली चमड़ी को गोरा करवाने की तरह है। इस प्रक्रिया में माइकिल जैक्सन को बरसों रात-दिन भयानक पीड़ा होती रही और अंत में पीड़ा-निवारक दवाओं के भारी सेवन के कारण ही उसके प्राण निकले। 

ये कार्य अत्यंत दुष्कर है अतः पीढ़ियों चलता है। हर पीढ़ी को मार-मार कर मुसलमान रखना पड़ता है। जमात इसी काम को समझा-बुझा कर करने वाला उपकरण है। जमात में सम्मिलित व्यक्ति मानसिक रूप से काफिरों से नापाक धरती की अल्लाह की धरती बनाने में लगा रहता है। ये मदरसों, जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अध्यापक और छात्रों का समूह होते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार को छोड़ कर देश के अन्य भागों का मुसलमान अभी तक पूरी तरह तालिबानी नहीं बना है। ये समूह छुट्टियों में भारत के मुस्लिम क्षेत्रों में फ़ैल जाते हैं और उसे दिन में पांच बार नमाज़ पढने, अल्लाह एक है और उसमें कोई शरीक नहीं है-बताने, मुहम्मद उसका आखिरी पैगम्बर है समझाने में लग जाते हैं। कुरआन में मुकम्मल दीन है , मुहम्मद का किया-धरा जो हदीसों में वर्णित है को अपने जीवन में उतारने को सुन्नत बताने,  सुन्नत को जीवन में उतारना अनिवार्य है समझाने,  यानी 1400  वर्ष पूर्व के अरबी चिंतन को आज के लोगों के दिमाग में ठूंसने में अनवरत कोशिश करते हैं। नवधर्मांतरित मुसलमानों को  को सही मुसलमान बनाना यानी तालिबानी बनाना बड़ा पवित्र काम है। 

ऐसा करना जन्नत का दरवाजा खोलता है। जहाँ 72 कुंवारी हूरें हैं जिनके साथ अनंत काल तक बिना थके, बिना रुके, बिना स्खलित हुए भोग किया जा सकता है। ये हूरें भोग के बाद फिर से कुंवारी हो जाने की अजीब सी, अनोखी क्षमता रखती हैं। जन्नत में गिलमां भी { कमनीय काया वाले लड़के } तत्पर मिलते हैं। तिरमिजी के खंड 2 पृष्ठ 138 में कहा गया है ' जो आदमी जन्नत जाता है उसे 100 पुरुषों के पुरुषत्व के बराबर पौरुष दिया जायेगा' 'उनके पास ऐसे लड़के आ जा रहे हैं जिनकी अवस्था एक ही रहेगी तुम उन्हें देखो तो समझोगे कि मोती बिखरे हैं'। अब उन लोगों की कल्पना कीजिये जो हर पल इस अहसास से भरे हैं कि वो काफिरों, शैतानों को दुनिया में हैं। उनका काम इसे बदलना है और पुरुस्कार रूप में जन्नत जाना है। इन लोगों के लिए पृथ्वी घर नहीं है। पृथ्वी तो ट्रांजिट कैम्प है जहाँ इस्लाम की खिदमत करते हुए अपनी सूखी-सड़ी बीबियों के साथ कुछ समय बिताना है। असली घर तो जन्नत है जहाँ हूरें और गिलमां आतुरता से उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। लार टपकाता, कमर लपलपाता हुआ ये मानस हर समय इसी उधेड़-बुन में लगा रहता है और जगह-बेजगह विवाद खड़े करता है।

नमाज में एक क्रिया होती है। नमाज पढ़ने वाला अपने दायें हाथ की तर्जनी उठा कर कहता है खुदा एक है और मैं इसकी गवाही देता हूँ। यही बात संभवतः यही विवाद की जड़ थी। ट्रेन में ऐसे लोग भी थे जिन्होंने दायें हाथ की चारों उँगलियाँ, अंगूठा और हथेली की गद्दी उठा कर प्रमाणित किया कि वो इसके विपरीत गवाही दे रहे हैं। इस मासूम सी क्रिया के कारण गाल गुलाबी करने और फांय-फांय करने की क्या ज़रूरत है ?
…………………………"इस तरह के कामों में इस तरह तो होता है "

खैर जमात पर लौटते हैं। जमातों का कार्य कितनी प्रबलता से और अनवरत किया जाता है, को इस रौशनी में देखें। अफगानिस्तान के हिन्दू-बौद्ध अतीत को नोच-नोच कर, खुरच-खुरच कर अफगानी समाज से निकलने का काम इन्हीं जमतियों ने किया है। कश्मीर में भारत विरोधी भावनायें भड़काने का काम, कश्मीरी समाज को भारत द्रोही-हिंदुद्रोही बनाने का काम वहां सदियों से आ रही तब्लीगी जमातों और इनके अड्डे मदरसों ने किया है। पारसी, बहाई, इस्माइली तीनों मज़हबों का जन्म ईरान में हुआ मगर आज इनका नामलेवा-पानीदेवा ईरान में कोई नहीं बचा। इनके मानने वाले प्रमुख रूप से भारत में पाये जाते हैं। कहने के लिए कुछ मुल्ला कहते हैं कि मजहब में कोई जबरदस्ती नहीं तो ये तीनों ईरान से कैसे गायब हो गए ? इसकी जड़ में यही तब्लीगी जमातों का अनवरत परिश्रम है। अतीत में भारतीय अपने स्वाभाविक संस्कारों के कारण इस धर्मांतरण को गुरु बदलने की तरह देखते थे। ऐसी भोली-भाली मगर बौड़म सोच का परिणाम बड़े पैमाने पर धर्मान्तरण और उसकी अनिवार्य परिणिति देश के उन हिस्सों के भारत से टूट जाने में हुई। 

आज उत्तर प्रदेश को उत्तर भारत कहा जाता है। सर कनिंघम 1871 में छपी अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Ancient Geography Of India में उत्तर प्रदेश से हजारों मील दूर गजनी को उत्तर भारत दिखाते हैं। अफगानिस्तान का गजनी 1871 में उत्तर भारत था तो भारत की सीमा कहाँ थी ? भरत-वंशियो ! आपके महान तेजस्वी पूर्वज 1000 वर्ष पहले रोम ही तक विजय कर के आये हैं। आज भी जिसकी घोषणा करता शिलालेख उज्जैन में लगा हुआ है। शक, हूण, कुषाण, यवन, पल्हव, बाल्हीक, किरात, पारद, दरद आपके ही रक्त-मांस के सहोदर भरतवंशी क्षत्रिय हैं। महाकाल और भगवती दुर्गा के अनन्य उपासक महान योद्धा शकों, हूणों और इन उल्लेखित योद्धा जातियों के इन्हीं नामों से रामायण और महाभारत में वर्णन उपलब्ध हैं। आपके महान पूर्वजों के साम्राज्य इन क्षेत्रों में सदियों रहे हैं। बंधुओं सारा यूरेशिया हमारा था। ये क्षेत्र हमारी सैनिक पराजयों के कारण अलग नहीं हुए। कनिंघम के गजनी में दिखाए उत्तर भारत को इन जमातों के कारण केवल 144 वर्ष में हजारों मील खिसक कर मुजफ्फरनगर-कांधला आना पड़ गया। देश को तोड़ने का काम करने वाली जमातों का विरोध मध्य भारत से जबरदस्ती खिसका कर उत्तर भारतीय बना दिए गए भरतवंशी कर रहे हैं तो ये तो पुण्य कार्य है, राष्ट्र-रक्षा का कार्य है। आखिर हिन्दुस्तान की चिंता हिन्दू नहीं करेंगे तो कौन करेगा ? तब्लीगी जमात के मुल्ला मीठी बोली में नहीं सुनते तो मेरठ-मुजफ्फरनगर की खड़ी बोली में समझाने के अलावा और क्या उपाय है ? 

तुफैल चतुर्वेदी         

सोमवार, 16 नवंबर 2015

नथूराम गोडसे पर मेरी पोस्ट जिसे फ़ेस बुक ने किन्हीं सज्जनों की शिकायत पर हटा दिया, उसे आप चाहें तो मेरे ब्लॉग पर विराट रूप में पढ़ सकते हैं।

सैनिक और हत्यारे में क्या अंतर है ? हत्यारा व्यक्तिगत कारण से किसी के प्राण लेता है किन्तु सैनिक सदैव राष्ट्र के हित के लिये शत्रु के प्राण लेता है। उसके कारण हम सुरक्षित होते हैं। हत्यारे को व्यवस्था प्राणदंड देती है किन्तु सैनिक को वीर-चक्र, महावीर-चक्र, परमवीर-चक्र देती है। उसकी समाधि पर प्रधानमंत्री सैल्यूट करते हैं। समाज फूल चढ़ाता है। केवल लक्ष्य के अंतर से एक उपेक्षा और दूसरा प्रशंसा पाता है।

राष्ट्र के इतिहास में अगर किसी एक व्यक्ति का नाम ढूंढा जाये, जिसके कारण देश का एक तिहाई भाग ग़ुलाम बन गया। लाखों लोग हिन्दू मारे गए, करोड़ों हिंदुओं को अपनी संपत्ति, भूमि, व्यापार छोड़ कर अनजाने क्षितिज की और आना पड़ा, जिसके कारण पवित्र मातृभूमि का बंटवारा हुआ, हिन्दू समाज पर इतिहास की सबसे बड़ी विपत्ति आयी। जिसके कारण सर्वाधिक हिन्दू नष्ट हुए। जिसके कारण वेदों के प्रकट होने का स्थान ग़ुलाम हो गया, जिसके कारण भारत का ध्वज स्वर्ण गैरिक भगवा के स्थान पर तिरंगा हुआ, जिसके कारण वंदेमातरम् की जगह चाटुकारिता का गीत जन-मन-गण हम पर लाद दिया गया, जिसने 1948 में देश पर पाकिस्तानी आक्रमण के समय पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये दिलवाने के लिये आमरण-अनशन किया तो केवल एक मात्र गांधी जी का नाम आयेगा। जितने भयानक हत्याकांड 300 वर्ष का मुस्लिम शासन भी नहीं कर पाया था, उससे अधिक के निमित्त गांधी जी बने ।

उनको दंड देने का कार्य राज्य का था मगर राज्य ने यह कार्य नहीं किया अतः जिस व्यक्ति ने ये आवश्यक कार्य किया वो समाज की उपेक्षा का शिकार है। नथु राम गोडसे की कोई निजी शत्रुता गांधी जी से नहीं थी। वो सुशिक्षित वकील थे। समाचारपत्र के सम्पादक थे। वो जानते थे " गांधी जी को प्राणदंड देते ही मैं नष्ट कर दिया जाऊंगा। मेरा परिवार नष्ट कर दिया जायेगा मगर किसी को भी मातृभूमि के विभाजन का घोर पाप करने का अधिकार नहीं है। ऐसे पापी को दण्डित करने का और कोई उपाय नहीं था अतः मैंने गांधी जी का वध करने का निश्चय किया। मैं गांधी जी पर गोली चलाने के बाद भागा नहीं और तबसे अनासक्त की भांति जीवन जी रहा हूँ। यदि देशभक्ति पाप है तो मैं स्वयं को पापी मानता हूँ और पुण्य तो मैं स्वयं को उस प्रशंसा का अधिकारी मानता हूँ"! हमारे हित के लिये अपने परिवार सहित स्वयं को बलिदान कर देने वाले महापुरुष की छवि उज्जवल हो इतना तो हमें करना ही चाहिये। उस परमवीर महापुरुष नथु राम गोडसे को शत-शत प्रणाम
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देश-वासियो !
कोई भी काम अपने लक्ष्य के कारण छोटा/बड़ा/महान होता है। हम सब अपनी संपत्ति, परिवार, जीवन की रक्षा करते हैं मगर सम्मान सैनिक को मिलता है चूँकि वो निजी काम की जगह समष्टि की रक्षा करता है। यहाँ ध्यान रहे, सैनिक का काम उसे जीवन-यापन भी कराता है, अर्थात देश की रक्षा में लगे सैनिक और उसके परिवार का जीवन सैनिक के वेतन पर निर्भर होता है। उसे कठिन जीवन जीना होता है मगर बलिदान हो जाना कोई आवश्यक नहीं होता। तो उस सामान्य मनुष्य को क्या कहेंगे जिसने अपना जीवन राष्ट्र के लिए बलिदान कर दिया। एक ऐसा व्यक्ति जिसे अपना सम्मान प्राणों से भी प्यारा था, जिसे पता था कि उसके गोली चलाते ही उसका, उसके परिवार का जीवन पूर्णतः नष्ट कर दिया जाये, लोग उस पर थू थू करेंगे मगर देश और राष्ट्र के हित में उसने अपना बलिदान कर दिया ? महान राष्ट्र भक्त नथु राम गोडसे के अतिरिक्त ऐसा पूज्य योद्धा कौन है ?

राष्ट्र के इतिहास में अगर किसी एक व्यक्ति का नाम ढूंढा जाये, जिसके कारण लाखों लोग हिन्दू मारे गए, करोड़ों हिंदुओं को अपनी संपत्ति, भूमि, व्यापार छोड़ कर अनजाने क्षितिज की और आना पड़ा, जिसके कारण पवित्र मातृभूमि का बंटवारा हुआ, किसके कारण वेदों के प्रकट होने का स्थान ग़ुलाम हो गया, जिसके कारण भारत का ध्वज स्वर्ण गैरिक भगवा के स्थान पर तिरंगा हुआ, जिसके कारण वंदेमातरम् की जगह चाटुकारिता का गीत जन-मन-गण हम पर लाद दिया गया तो केवल एक मात्र गांधी जी का नाम आयेगा। जितने भयानक हत्याकांड 300 वर्ष का मुस्लिम शासन भी नहीं कर पाया था, उससे अधिक के निमित्त गांधी जी बने । ऐसे व्यक्ति का प्राणांत करने वाला योद्धा क्या महापुरुष कहलाने का अधिकारी नहीं है ? ये उस महापुरुष की विडम्बना है कि उसने हिन्दू समाज के लिये बलिदान दिया। कहीं वो मुसलमान होते तो मुस्लिम समाज कृतज्ञता से उनके पैर धो धो कर पीता

सोमवार, 9 नवंबर 2015

आठ नवंबर की सुबह से सोशल मिडिया, ट्विटर इत्यादि पर मौन छाया हुआ है।

आठ नवंबर की सुबह से सोशल मिडिया, ट्विटर इत्यादि पर मौन छाया हुआ है। इसका कारण है कि बिहार विधानसभा के चुनाव में भाजपा हार गयी और नितीश कुमार, लालू यादव का गठबंधन जीत गया। यह एक राजनैतिक घटना है और ज़ाहिर है इसके निहितार्थ भी होंगे। भिन्न-भिन्न लोग अपने-अपने हिसाब से इसका राजनैतिक विश्लेषण भी करेंगे ? यह न हुआ होता और यह हो गया होता जैसी ढेर सारी बातें निकली जायेंगी मगर इस हार के कारण मित्रो आपमें ग्लानि का भाव कैसे दिख रहा है ?
आक्षेप के स्वर में पूछ रहा हूँ क्या आप यहाँ बिहार में सुशील मोदी या भाजपा के किसी अन्य नेता की सरकार बनवाने के लिये प्राणप्रण से सक्रिय थे ? क्या आपका लक्ष्य भारत माता को जगज्जननी के सिंहासन पर बैठे देखने की जगह बिहार में भाजपा की सरकार बनवाना था ? क्या आपका लक्ष्य राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति नहीं है ? क्या आप राष्ट्र को परम वैभव के शिखर पर विराजमान देखने के अतिरिक्त भी कुछ चाहते हैं ? मैं जानता हूँ कि आप सब अपनी आजीविका, विकास के लिये किसी पर निर्भर नहीं हैं ? कोई संगठन आपको सोशल मिडिया पर नहीं लाया है। राष्ट्र की चिंता, उसके प्रति जागरूकता, उस के प्रति पीड़ा आपको बाध्य करती है कि आप अपना समय केवल स्वयं को देने के स्थान पर समाज के हित में लगाते हैं।
ज़ाहिर है आप जिस लक्ष्य के प्रति समर्पित हैं उसके लिये बिहार में नितीश कुमार, लालू यादव, इटैलियन देवी के गठबंधन के स्थान पर भाजपा का होना सहयोगी होता मगर निश्चित ही आपका कार्य केंद्र और प्रदेशों में भाजपा की सरकारें बनवाना नहीं है। आपका लक्ष्य उससे बहुत बड़ा है। आपकी लड़ाई तो बहुत लंबी है। सदियों से आहत, क्लांत, खिन्न राष्ट्र को उबारना, उभारना आपका कार्य है। तो एक छोटी पराजय से सम्पूर्ण सेना हत-बल, हत-तेज कैसे दिखाई दे रही है ? राष्ट्र के शरीर पर लगे 1200 वर्ष के घाव एक प्रान्त की हारजीत से भरने से रहे। भारत माता के कटे हुए दोनों हाथ बिहार की जीत से वापस तो हो नहीं सकते थे।
आप का मनोबल टूटना पदातिकों का मनोबल टूटना नहीं है बल्कि सेनापतियों का मनोबल टूटना है ? हुंकार भरिये । बहुत से लोग रोकेंगे मगर जीतना तो है। कई बाधायें आएँगी, कई हार होंगी मगर अंतिम विजय राष्ट्रवादियों की यानी आपकी ही होगी। ये महाभारत आपको जीतना ही है। संभव है ये कार्य 10-15 की जगह 20-30 वर्ष ले ले मगर कटिबद्ध तो होना ही है।
विश्व इस दानव से जूझने के लिये तैयार होता दिख रहा है। रूस ने इस्लामी ख़िलाफ़त के दावेदार और वर्तमान स्वरूप आई.एस.आई.एस. की लगातार ठुकाई के बाद डेढ़ लाख सैनिक सीरिया में उतार दिए हैं। सीरिया पर होने वाले किसी भी हमले को रूस स्वयं पर हमले की तरह लेगा। अमरीका के नेतृत्व में सीरिया पर होने वाले आक्रमण के जवाब में रूस तुरंत सऊदी अरब पर प्रहार करेगा। तृतीय विश्व युद्ध के बादल विश्व-क्षितिज पर घिरते दिख रहे हैं। हम भारत-वासी भरतवंशी, हमारा सैन्य विश्व-शांति के इस महायज्ञ में पूर्णाहुति डालने के लिये बाध्य हैं। प्रथम विश्वयुद्ध, द्वितीय विश्वयुद्ध हम भरतवंशियों ने ही लड़ा था और तीसरा और अंतिम विश्वयुद्ध भी हम ही लड़ेंगे। किसी राष्ट्र के पास इतना सैन्य नहीं है। फिर यह तो 1200 वर्षों से रिसते आ रहे घावों को सिलने का समय है। राष्ट्र को तैयार कीजिये। पौरुष का उसी तरह आह्वान कीजिये जैसा कल तक आप करते आ रहे थे। महाकाल हमें यशस्वी करेंगे और हमारा भारत पुनः अखंड होगा।
तुफ़ैल चतुर्वेदी

सोमवार, 26 अक्टूबर 2015

बुर्क़ा, हिजाब, नक़ाब .....1400 वर्ष पुरानी इस्लामी परंपरा

बुर्क़ा, हिजाब, नक़ाब ....... ये सारे अरबी मूल के शब्द हैं. ये 1400 वर्ष पुरानी इस्लामी परंपरा है। इन्हीं का समानार्थक एक और शब्द पर्दा है। ये फ़ारसी मूल का शब्द है और शब्दकोष में इनके अर्थ आड़, ओट, लज्जा, लाज, शर्म, संकोच, झिझक, हिचकिचाहट आदि हैं। सुनने में इन शब्दों से सामान्य लाज का भाव उभरता है
मगर इन शब्दों के सही अर्थ समझने हों तो स्वयं को पूरे क़द की एक बोरी में बंद कर लीजिये। इस बोरी के सर पर इस तरह गांठ लगी हुई होनी चाहिये कि गर्दन मोड़ना भी संभव न हो। कहीं दायें-बाएं देखना हो तो गर्दन मोड़ने की जगह पूरा घूमना पड़े। केवल आँखों का हिस्सा खुला होना चाहिये बल्कि आँखों के आगे भी जाली लगी हो तो सबसे अच्छा रहेगा। बाहर की हवा आने-जाने का कोई रास्ता नहीं होना चाहिए बल्कि अपनी अंदर की हवा के भी बाहर आने-जाने का रास्ता नहीं होना चाहिए।
बिलकुल ऋतिक रौशन की फिल्म 'कोई मिल गया' के अंतरिक्ष से उतरे, बोरी में बंद प्राणी 'जादू' की तरह। फिर भर्रायी हुई आवाज़ में 'जादू' की तरह धूप-धूप पुकारिये। जब ऐसा कर चुकें तो धूप-धूप बोलना भी बंद कर दीजिये और केवल तरसी हुई निगाहों से जाली के पार की दुनिया को देखिये। हो गए न रोंगटे खड़े ? सोचने भर से आप को सन्नाटा आ गया। अब उन औरतों की कल्पना कीजिये जिन्हें 10-12 बरस की आयु से इस घनघोर घुटन में फेंक दिया जाता है।
इसका तर्क ये दिया जाता है कि किसी लड़की या औरत को देख कर पुरुष में कुत्सित भाव जागृत हो सकता है। काम भाव केवल स्त्री को देख कर पुरुष के मन में ही जागृत होता है ? अगर ऐसा है तो अभियुक्त पुरुष पर कार्यवाही की जानी चाहिये। ये तो अभियुक्त को सजा देने की जगह पीड़ित की दुर्गति करना है। फिर काम का भाव सामान्य मानवीय प्रवृत्ति है। ये पुरुष को देख कर स्त्री के मन में भी जागृत हो सकता है। तो क्या पुरुष भी बुर्क़ा, हिजाब, नक़ाब, पर्दा करें ?
वैसे तो किसी सामान्य मदरसे में जा कर वातावरण देखिये तो आप पाएंगे कि वहां तो पुरुष को देख कर पुरुष के मन में काम जागृत होने का विचार भी चलता है। पाकिस्तान के कराची के मदरसे में एक बार आग लग गयी थी जिसमें किशोर आयु के बच्चे जल कर मर गए। कारण ये था कि उनको वरिष्ठ छात्रों से बचाव के लिए ताला-बंद करके रखा जाता था।
चिड़ियाघर में भी जानवर पिंजरों में रखे जाते हैं मगर ऐसी मनहूस घोर-घुटन उनके नसीब में भी नहीं होती। फिर ये भी है कि उन जानवरों को उनके साथी जानवरों ने इस घुटन पर मजबूर नहीं किया। उस मानसिक दबाव की कल्पना कीजिये जहाँ औरतें अपने ही परिवार, समाज के पुरुषों के दबाव में इस वीभत्सता की स्थिति को स्वीकार कर लेती हैं और चलती-फिरती जेलों की सी हालत में जीती हैं।

मेरठ दंगे का चर्चित हिस्सा बने हाशिमपुरा पर न्यायलय का फ़ैसला और उस पर सिक्युलर कांव कांव

अभी मेरठ दंगे का चर्चित हिस्सा बने हाशिमपुरा पर न्यायलय का फैसला आया है।  न्यायालय ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया है। अंग्रेजी मीडिया, विदेशों से चंदा खाने वाले हिन्दू विरोधी एन.जी.ओ., मुस्लिम वोटों के लिए जीभ लपलपाने वाले राजनेता एक से बढ़ कर एक मरकट-नृत्य में संलग्न हो गए हैं। मेरे विचार से इस विषय की चर्चा करने के साथ इसी तरह के दंगे और उस पर बरसों चले हाहाकार की समवेत चर्चा उपयुक्त है। गोधरा में ट्रेन जलाने के बर्बर, पैशाचिक हत्याकांड के कारण उपजे आक्रोश से गुजरात के दंगे हुए। इस दंगे में प्रशासन, पुलिस प्रशासन पर मुसलमानों के प्रति दुर्भावना रखने और हिन्दुओं के पक्ष में होने के आरोप लगाये हैं। आइये तत्कालीन घटना कर्म को एक बार दैनंदिन रूप से याद कर लिया जाये। 
 
साबरमती एक्सप्रेस की बोगी नंबर S-6 में विश्व हिन्दू परिषद् के कार-सेवक यात्रा कर रहे थे।  27 फरवरी 2002 की सुबह 7:30 बजे के लगभग इस बोगी को निशाना बना कर गोधरा के मुसलमानों द्वारा हिन्दू विरोधी नारों के बीच आग लगा दी गई। आग लगाने वालों की संख्या 1500 के क़रीब थी। इस अग्निकांड में 72 से अधिक लोग जला कर मार दिए गए। जिसमें अधिकांश महिलाएं और बच्चे थे। कोई हिंदू यात्री बोगी से बाहर ना निकल पाए इसीलिए योजना के अनुसार उन पर पत्थर भी बरसाए जाने लगे। गुजरात पुलिस ने भी अपनी जांच में ट्रेन जलाने की इस वारदात को आई.एस.आई. की साजिश ही करार दिया, जिसका उद्देश्य हिन्दू कारसेवकों की हत्या कर राज्य में साम्प्रदायिक तनाव पैदा करना था। 

मुख्‍यमंमंत्री नरेंद्र मोदी शाम 4.30 बजे गोधरा पहुंचे और वहां जली हुई बोगियों का निरीक्षण किया। उसके बाद संवाददाता सम्‍मेलन में नरेंद्र मोदी ने कहा कि गोधरा की घटना बेहद दुखदायी है, लेकिन लोगों को कानून व्‍यवस्‍था अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए। सरकार उन्‍हें आश्‍वस्‍त करती है कि दोषियों के खिलाफ महत्‍वपूर्ण कार्रवाई की जाएगी। उसी दिन गोधरा व उसके आसपास कर्फ्यू लागू कर दिया गया। राज्‍य सरकार ने केंद्र सरकार से गुजरात में पैरा मिलिट्री फोर्स की 10 कंपनियां और साथ ही रेपिड एक्‍शन फोर्स की चार अतिरिक्‍त कंपनी बहाल करने का अनुरोध किया। दंगा भड़कने से रोकने के लिए सुरक्षा के लिहाज से बड़े पैमाने पर संदिग्‍ध लोगों को गिरफ्तार किया गया। जिन 217 लोगों को गिरफ्तार किया गया उनमें 137 हिंदू और 80 मुसलमान थे। गोधरा के बाद पहले ही दिन गुजरात के संवेदनशील व अतिसंवेदनशल क्षेत्र में 6000 पुलिस के जवानों की तैनाती की गई। स्‍टेट रिजर्व पुलिस फोर्स की 62 बटालियन थी, इसमें 58 स्‍टेट रिजर्व पुलिस फोर्स और चार सेंट्रल मिलिट्री फोर्स की बटालियन शामिल थी। गुजरात की मोदी सरकार ने सभी 62 बटालियन को संवेदनशील क्षेत्र में तैनाती के आदेश दे दिए। गोधरा से लौटने के बाद मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी ने देर रात 11 बजे अपने घर पर वरिष्‍ठ अधिकारियों की बैठक बुलाई और कानून व सुरक्षा की स्थिति का जायजा लिया। मोदी ने अधिकारियों से कहा कि सेना के जवानों की मदद भी लेनी पड़े तो लें लेकिन कानून व्‍यवस्‍था को चरमराने न दें। स्‍थानीय आर्मी हेडक्‍वार्टर ने जवाब दिया कि उनके पास सेना की अतिरिक्‍त बटालियन नहीं है। युद्ध जैसे हालात को देखते हुए सभी बटालियन को पाकिस्‍तान से सटे गुजरात बॉर्डर पर लगाया गया है। सेना की बटालियन उपलब्‍ध न होने के कारण गुजरात सरकार ने अपने पड़ोसी राज्‍य महाराष्‍ट्र, मध्‍यप्रदेश और राजस्‍थान से अतिरिक्‍त पुलिस बल की मांग की, लेकिन कांग्रेसी सरकारों ने गुजरात की कोई मदद नहीं की। 

दिग्विजय सिंह उस वक्‍त मध्य प्रदेश, अशोक गहलोत राजस्‍थान और विलासराव देखमुख महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री थे।  दिग्विजय सिंह व अशोक गहलोत सरकार ने यह कह कर गुजरात सरकार को पुलिस फोर्स देने से मना कर दिया कि उनके पास अतिरिक्‍त जवान नहीं हैं। विलासराव देशमुख ने थोड़े से पुलिस के जवान भेजे, जिन्‍हें कहा गया था कि स्थिति के नियंत्रित होते ही लौट आयें। नरेंद्र मोदी ने तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्‍ण आडवाणी से सेना के जवानों की तैनाती का अनुरोध किया। इसके बाद रक्षा मंत्रालय अन्‍य राज्‍यों में तैनात जवानों को हवाई मार्ग द्वारा गुजरात लाया। 

इस बीच नरेंद्र मोदी ने निर्देश दिया कि 6000 हाजी हज कर गुजरात लौट रहे हैं। उन्हें हर हाल में सुरक्षा प्रदान किया जाए। ये सभी हाजी गुजरात के 400 गांव व कस्‍बों से हज करने गए थे।  सरकार ने सभी 6000 हाजियों को सुरक्षित उनके घर तक पहुंचा दिया। हालात के नियंत्रित होने और इन्‍हें सुरक्षित घर तक पहुंचाने में सरकार को 20 मार्च 2002 तक का वक्‍त लग गया लेकिन इनमें से एक को भी हिंसा का सामना नहीं करना पड़ा। सेना के जवानों को लेकर आने वाली पहली उड़ान 28 फरवरी की मध्‍य रात्रि को अहमदाबाद में उतरी। राज्‍य की सुरक्षा को बनाए रखने के लिए 13 सैन्‍य टुकडि़यों को बहाल किया गया। 1 मार्च 2002: दंगाईयों को गोली मारने का आदेश दिया गया। दंगा 28 को भड़का था और उसके 24 घंटे के अंदर पहली मार्च को गुजरात सरकार के मुख्‍य सचिव ने दंगाइयों को देखते ही गोली मारने का आदेश जारी कर दिया था।

2 मार्च 2002 को पुलिस की गोली से 12 हिंदू और चार मुसलमान मरे। दो मार्च को 573 दंगाइयों को हिरासत में लिया गया था, जिसमें से 477 हिंदू और 96 मुसलमान थे। 3 मार्च 2002 को पुलिस ने 363 दंगाइयों को पकड़ा जिनमें 280 हिन्दू और 83 मुसलमान थे।  इसी दिन फायरिंग में 10 हिंदू मारे गए। 4 मार्च को 285 लोगों को हिरासत में लिया गया। जिसमें 241 हिंदू और 44 मुसलमान थे। पुलिस फायरिंग में 4 हिंदुओं की मौत हुई। पूरे दंगे के दौरान 66,268 हिंदू और 10,861 मुसलमानों को हिरासत में लिया गया था। दंगे के शुरुआती तीन दिनों मे ही मोदी सरकार ने यह कार्रवाई की थी। 

कांग्रेस और अन्य लोगों की मिलीभगत से बनी सरकार ने 11 मई 2005 में संसद के अंदर अपने लिखित जवाब में बताया था कि 2002 के दंगे में 1044 लोगों की मौत हुई थी, जिसमें से 790 मुसलमान और 254 हिंदू थे। गुजरात दंगा पूरे आजाद भारत के इतिहास का एक मात्र दंगा है जिस पर अदालती फैसला इतनी शीघ्रता से आया है और इतने बड़े पैमाने पर लोगों को सजा भी हुई है. अगस्‍त 2012 में आए अदालती फैसले में 19 मुकदमे में 249 लोगों को सजा हुई है। जिसमें से 184 हिंदू और 65 मुसलमान हैं। इन 65 मुसलमान में से 31 को गोधरा में रेलगाड़ी जलाने और 34 को उसके बाद भड़के दंगे में संलिप्‍तता के आधार पर सजा मिली है।  

तथ्यों से स्पष्ट है कि प्रशासन और पुलिस ने प्राण-प्रण से दंगा रोकने का प्रयास किया और इसी कारण दंगा गुजरात के बहुत छोटे से हिस्से से आगे नहीं बढ़ पाया। इसका एक दूसरा खुला प्रमाण ये भी है कि पुलिस की गोलियों से मुसलमानों की अपेक्षा हिन्दू अधिक मारे गए। यदि पुलिस दंगा रोकने का प्रयास नहीं कर रही थी तो हिन्दू पुलिस की गोलियों से मारे ही कैसे गए ? फिर भी ट्रेन में लोगों को जला कर मार देने जैसे भयानक काम का पक्ष लेने में अंग्रेजी मीडिया, विदेशों से चंदा खाने वाले हिन्दू विरोधी एन.जी.ओ., मुस्लिम वोटों के लिए जीभ लपलपाने वाले राजनेता एक से बढ़ कर एक मरकट-नृत्य करते रहे । बरसों गुजरात के प्रशासनिक अधिकारियों पर मुकदमे चले। नरेंद्र मोदी जी, अमित शाह सहित न जाने कितने भाजपा के अधिकारियों, विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ताओं, संघ के लोगों पर मुकदमे चलाये गए। अब सवाल उठता है कि विदेशी फंड पर पलने वाली मीडिया, वामपंथियों, कांग्रेस, तीस्‍ता जावेद सीतलवाड़, संजीव भट्ट जैसों की बात यदि सच है तो फिर 254 हिंदुओं की हत्‍या किसने की थी ? लेकिन संच को आंच नहीं लगती देर से ही सही नरेंद्र मोदी जी, अमित शाह जैसे लोग न्यायिक आयोगों द्वारा मुक़दमों से बरी कर दिए गए 

अब उसी तरह के मुस्लिम दंगे पर 28 साल बाद ऐसा ही एक और फैसला आया है। उस घटना को भी जानना ठीक रहेगा। फैजाबाद न्यायालय द्वारा फरवरी 1986 में राम जन्म भूमि का असंवैधानिक रूप से लगाया गया ताला खुलवाने का आदेश देने के बाद देश के विभिन्न भागों में दंगे शुरू हो गए। मेरठ में भी मुस्लिम दंगा शुरू हो गया। जिन मित्रों को मुस्लिम दंगे शब्द से विरोध है वो कृपया अभी हाल ही में हुए मुजफ्फरनगर के दंगे की जानकारी कर लें। मैं आश्वस्त हूँ कि उसकी जानकारी करने के बाद वह मेरे इन शब्दों की सत्यता से परिचित हो जायेंगे। मेरठ में अप्रैल 1987 में दंगा फैलाया गया। प्रशासन ने दंगा दबा दिया। दंगा शांत होने के बाद सुरक्षा बलों की टुकड़ियों को हटा लिया गया। 18 मई को दंगा फिर शुरू कर दिया गया। 21 मई को मेरठ के तब तक शांत इलाके हाशिमपुरा में अपने मुस्लिम मरीज को देखने गए डाक्टर अजय को उनकी कार में ही जिन्दा जल दिया गया और हाशिमपुरा, मलियाना में भी दंगा भड़क उठा। नारा ए तकबीर के नारों के बीच 23 मई 1987 को आरोप लगाया गया कि पी ए सी के 41 वीं वाहिनी के बल ने हाशिमपुरा से एक मस्जिद के बाहर चल रही सभा में से 42 लोगों को पकड़ लिया और उन्हें गोली मार दी। यहाँ यह प्रश्न उठाया जाना ही चाहिए कि कर्फ्यू लगे क्षेत्र में मस्जिद के बाहर सभा कैसे संभव थी ? 

पी ए सी के 19 लोगों को आरोपी बनाया गया। मुक़दमे को वादियों की मांग पर उत्तर प्रदेश से बाहर दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया। ये लोग 28 बरस तक पेशियां भुगतते रहे। राष्ट्र की सेवा की शपथ लिए सामान्य आर्थिक स्थिति के ये जवान  बसों, रेलों में टक्करें मारते पेशियों पर साल दर साल जाते रहे।   कलंक के इस दाग को अपने माथे पर लिए, दर-दर भटकते रहे।  अपने-पराये की संदेह भरी नजरें झेलते रहे। 28 बरस बाद इस घोर कष्टपूर्ण तपस्या का फल आया है और माननीय न्यायालय ने16 लोगों को बरी कर दिया गया है। 3 लोग ये बोझ अपने सीने पर रखे संसार छोड़ कर जा चुके हैं। इन 16 लोगों में समीउल्लाह नाम के मुस्लिम जवान भी हैं। उस तिरस्कार, अपमान, पीड़ा की कल्पना करें जो इन 28 वर्षों तक मुस्लिम समुदाय के समीउल्लाह को अपने समाज में झेलना पड़ा होगा। 
भारत में न्याय का शासन है। वादियों की मांग पर मुक़दमे स्थानांतरित करने के बावजूद आज जब फैसला आ गया है तो प्रेस के महारथी, अंग्रेजी मीडिया, विदेशों से चंदा खाने वाले हिन्दू विरोधी एन.जी.ओ., मुस्लिम वोटों के लिए जीभ लपलपाने वाले राजनेता माननीय न्यायालय पर भी उँगलियाँ उठा रहे हैं, भौं चढ़ा रहे हैं, आँखें दिखा रहे हैं। 
क्यों इस अघोरी दल को अभी भी चैन नहीं है ? क्या ये वर्ग तभी किसी बात को मानेगा जब उसकी इच्छा पर न्यायालय फैसला देगा ? ये भी एक गंभीर विचारणीय बिंदु है। पाकिस्तानी मूल के कैनेडियन लेखक, प्रतिष्ठित पत्रकार तारिक फातेह के शब्दों में इसका सबसे बड़ा कारण हिन्दू गिल्ट है। हिन्दू अपने होने से लज्जित हैं। वो अपने से, अपने सत्व से, अपनी चिति से शर्मिंदा हैं यानी लार्ड मेकॉले की शिक्षा पद्यति भरपूर सफल हुई है। अन्यथा क्या कारण है कि हिंदी के समाचार पत्र 22 मार्च के संस्करणों में पूरे पेज पर न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले पर सवालिया निशान लगाते हैं ? राष्ट्र विरोधी मुस्लिम प्रचार तंत्र को अनर्गल आरोप लगाने के लिए मसाला सप्लाई करते हैं ? अशिष्ट रूप से न्यायालय को कठघरे में खड़ा करते हैं ? न्यायायिक फैसले पर लगभग कोसने, थू-थू करने की शैली में की गयी ये रिपोर्टिंग मैं सर-माथे रख लेता मगर जब विश्व हिन्दू परिषद रामजन्मभूमि को आस्था का विषय कह कर उस पर दृढ़ता दिखती है तो वो सांप्रदायिक हो जाती है। तो आपको न्याय व्यवस्था की अवमानना करने वाला उद्दंड संवाददाता, संपादक, मालिक क्यों न माना और कहा जाये ? आप राष्ट्र के संस्थानों को अपनी मनमर्ज़ी से क्यों हांक रहे हैं ? समाज को आपका बहिष्कार क्यों नहीं करना चाहिए ? 

रविवार, 25 अक्टूबर 2015

खूसटावस्था की दहलीज़ पर क़दम रखने के बावजूद तरुण तेजपाल की ऐबदारी

पिछले एक पक्ष से मिडिया में अजीब सा ऊधम मचा हुआ है. तरुण तेजपाल नाम के स्वनामधन्य सज्जन { सवनाम धन्य इस लिये कि लगभग खूसटावस्था की दहलीज़ पर क़दम रखने के बावजूद वो तारुण्य के पराक्रम में संलिप्त दिखे } के कृत्यों पर समाज उद्वेलित है और भर्त्सना की बात है कि साहित्यिक जगत और मीडिया के वामपंथी और राष्ट्र विरोधी logपिछले एक पक्ष से मिडिया में अजीब सा ऊधम मचा हुआ है. तरुण तेजपाल नाम के स्वनामधन्य व्यक्ति { सवनाम धन्य इस लिये कि लगभग खूसटावस्था की दहलीज़ पर क़दम रखने के बावजूद वो तारुण्य के पराक्रम में संलिप्त दिखे } के कृत्यों पर समाज उद्वेलित है और भर्त्सना की बात है कि साहित्यिक जगत और मीडिया के वामपंथी और राष्ट्रविरोधी लोग इस दुष्कर्म को कम आंकने, कम दिखाने, कम महसूस कराने में लगे हैं.

प्रिंट तथा इलेकट्रोनिक मीडिया के लोग निजी बातचीत में यहाँ तक चर्चा कर रहे हैं कि धुंआ अपने आप नहीं निकलता. वो लड़की भी कुछ न कुछ पैमाने पर दोषी है. इस काम में अंग्रेज़ी के चैनलों और अख़बारों के साथ हिंदी के कुछ महारथी भी शरीक हैं. जिनमें सर्वप्रमुख जनसत्ता का संपादक मंडल और उसके लेखक हैं. यहाँ विशेष रूप से महात्मा गांधी हिंदी संस्थान की पत्रिका हिंदी समय के भूतपूर्व संपादक राज किशोर जी अग्रणी हैं. उनके दो लेख इस विषय पर जनसत्ता में पिछले दिनों छपे हैं. पहले लेख में उन्होंने तरुण तेजपाल के 6 माह के संपादन को छोड़ने और क्षमा मांगने को महत्व देते हुए इस विषय को अब शांत कर देने की मार्मिक अपील ब्रॉडकास्ट की और नये लेख में उन्होंने तरुण तेजपाल को कलाकार मानते हुए इन शब्दों में उसका स्वस्ति-गान किया है. ' पत्रकारिता एक कला है और तरुण तेजपाल हमारे समय के उल्लेखनीय कलाकार हैं. उनके काटे हुए कई लोग आज भी बिलबिला रहे हैं.' उनके वाक्य का अंतिम टुकड़ा बता रहा है कि राजकिशोर जी किस लिये तरुण तेजपाल का अपराध कम करने के लिये कोशिश कर रहे हैं. क्या विशेष विचारधारा { इसे राष्ट्रवाद का विरोध पढ़ा जाये } के लिये काम करना किसी का अपराध कम कर देता हैं. तरुण स्टिंग ऑपरेशन के महारथी रहे हैं. उनकी शैली रही है कि पहले वातावरण तैयार करो. शेर के सामने बकरी बांधो, शेर को बकरी खाने के लिये फुसलाओ और फिर हाहाकार मचाओ कि शेर ने बकरी खा ली. बंगारू लक्ष्मण जैसे सरल लोग उनके इन षड्यंत्रों का शिकार हुए हैं. 

इस विषय को थोडा विस्तार में देखने की ज़ुरूरत है. कवि, लेखक, संगीतकार, चित्रकार, मूर्तिकार, राजनीतिज्ञ, मीडिया के लोग यानी समाज में अपनी प्रभावी उपस्थिति दिखा पाने, दर्शा पाने वाले लोग सदा-सर्वदा से इन दुष्कर्मों में संलिप्त रहे हैं. शेक्सपियर की मृत्यु सिफ़लिस से हुई थी. आस्कर वाइल्ड के कृत्यों को सारा साहित्यिक जगत जानता है. छायावाद की प्रमुख नेत्री, फ़िराक़ गोरखपुरी अपने प्रसंगों के लिये चर्चित रहे हैं. केनेडी, जवाहर लाल नेहरू, अय्यूब ख़ान के बारे में दुनिया जानती है. इन लोगों में यश, पद, प्रभाव का प्राचुर्य था और लोग इनकी ओर आकर्षित होते थे. इसका ही परिणाम ये कानाफूंसियां थीं. 

मगर यहाँ एक पेंच है और ये पेंच बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण है.  इन लोगों ने कभी इस हाथ दे और उस हाथ ले जैसा कुछ नहीं किया. ये कभी ' आज मेरी गाड़ी में बैठ जा ' या  ' आती क्या खंडाला ' जैसा प्रस्ताव देते धरे नहीं गये. गोवा के 5 सितारा होटल में किया गया काण्ड स्टिंग ऑपरेशन नहीं था. वहाँ किसी शेर के सामने बकरी बाँध कर उसे फुसला कर बदनाम करने का षड्यंत्र नहीं किया गया था बल्कि ये  एक धूर्त व्यक्ति का अपने पद के दुरुपयोग का उदाहरण है.  तरुण का कृत्य अपने पद के दबाव में स्त्री अस्मिता को रौंद देने का है. किसी सामान्य व्यक्ति के द्वारा भी ये काम किया जाता तो निश्चित रूप से प्रताड़नीय और दंडनीय होता ही होता मगर यहाँ तो मामला एक लड़की को अपने पद के दवाब में कुचल डालने का है. उस पर तुर्रा ये कि तुम्हारे पास अपनी नौकरी बचाने का ये ही एक मात्र रास्ता है. 

इसी रौशनी में मैं एक प्रश्न इस घटना को कम करके आंकने वाले, कम दिखाने  वाले महानुभावों से करना चाहूंगा. अगर इस लड़की कि जगह उनकी बेटी या बहन होती तो क्या तब भी वो बलात्कारी को कलाकार मानते और क्षमा करने की बात करते. अगर हाँ तो मैं 6  माह के लिये लफ्ज़ का संपादन छोड़ने और सहर्ष क्षमा मांगने के लिये तैयार हूँ. बताइये कब और कहाँ भेंट की जाये.

तुफ़ैल चतुर्वेदी 

----------------------हुड़दंगी जत्थे और साहित्य

----------------------हुड़दंगी जत्थे और साहित्य 

साहित्य समाज से कटता जा रहा है। पाठक और श्रोता कम हो रहे हैं। ये एक तथ्य है और इस के कारण साहित्यकारों में ये विचार आम है कि हम सही काम नहीं कर पा रहे। कुछ अधूरापन, लक्ष्य से भटकाव आ गया है। हमारा काम समाज के हित-अहित को उदघाटित, परिभाषित करना है। हम जिस समाज का अंग हैं उसके संरक्षण,संवर्धन का लक्ष्य ही साहित्य का लक्ष्य होना चाहिये। ऊपरलिखित वाक्यों में ही हिंदी-उर्दू साहित्य की दुर्दशा, समाज से कट जाने, मूलविहीन हो जाने की गाथा छिपी हुई है। 

1947 में लगभग दो तिहाई भारत स्वतंत्र हुआ। ये वो समय था जब द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व भर में मंदी थी। समाज अभावों से घिरा था। करोड़ों लोग मारे गये थे। विस्थापित, बरबाद हुए थे। ये समय आँखों से सपने छिन जाने, जीवन के ताने-बाने के उधड़ जाने,बिखर जाने का था। सृष्टि में निर्वात कहीं नहीं रहता। ज़ाहिर है इस शून्य को भी भरा ही जाना था। मज़ेदार बात ये है कि आँखों में वापस सपने सजाने की घोषणा उन लोगों ने की जिन्होंने अभी-अभी सपने उजाड़े थे। द्वितीय विश्व युद्ध में धुरी राष्ट्र जर्मनी, इटली का अनन्य सहयोगी रूस था और इस कारण सारी दुनिया के कम्युनिस्ट उसकी ढपली बजा रहे थे। अच्छे-ख़ासे समय तक ये युद्ध के आक्रामक पक्ष में बने रहे। हिटलर की मदद करते रहे। बाद में हिटलर ने रूस पर हमला कर दिया तो रातों-रात धुरी राष्ट्रों के विरोधी हो गये। जिस समय रूस की सीमाओं पर जर्मनी की फ़ौजें करोड़ों रूसियों को मार रही थीं, उसी काल में स्टालिन के नेतृत्व में रुसी कम्युनिस्ट पार्टी भी अपने ही करोड़ों नागरिकों की हत्या कर रही थी।
वो राजनैतिक विचारधारा जिसने अपने ही करोड़ों लोगों को मार डाला मज़दूरों,किसानों, कमज़ोर वर्गों की हितैषी होने का ड्रामा करती थी। नेहरू वामपंथ के प्रति भावुक थे और उनके हिमायतियों के प्रति उदार थे। इस उदारता के कारण पद, प्रतिष्ठा, धन पाने के लिये रोमांटिक मुखौटा लगाये हथौड़ाधारी हत्यारी विचारधारा का पोषण साहित्यकारों का का उद्देश्य बन गया। साहित्य की श्रेष्टता इस बात से तय होने लगी ' पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ' जो इस ख़ेमे में नहीं वो साहित्यकार नहीं। साहित्य की उत्कृष्टता की कसौटी विचारधारा ही हो सकती है। साहित्य से समाज से कटते जाने के लिये ये सोच और इसका क्रियान्वन ज़िम्मेदार है। यहाँ प्रश्न ये है की ये कसौटी ठीक भी है ? 

जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पन्त जैसे लोग मुक्तिबोध द्वारा रचित इस कसौटी के कारण कवि नहीं रहते और निराला 'सुन बे गुलाब' लिखने के कारण कवि हो जाते हैं। इसी से जुडी है साहित्य को हाशिये पर धकेले जाने की दुखद गाथा। साहित्य मूलतः अपने को व्यक्त करने की प्रक्रिया है। इसी का विस्तार अपने से सम्बंधित अन्यों को उद्घाटित करने में भी होता है। यहाँ उल्टा हुआ प्रक्रिया की जगह लक्ष्य तय कर दिये गये। राष्ट्रवादी विचारधारा किसी भी वैश्विक विचारधारा चाहे वो मार्क्सवाद हो, चाहे इस्लाम हो, के अन्त-पन्त विरोध में जाती है। अतः राष्ट्रवाद की जड़ में मट्ठा डालना रणनीतिक ज़ुरूरत बनी। राष्ट्र की, राष्ट्रवाद की रगड़ाई करनी है ....उग्रवाद, आतंकवाद चूंकि राष्ट्रवाद को नुक़सान पहुंचता है, इसलिये उस पर मौन रहना रणनीतिक हथियार बने। साहित्य स्व के विस्तार की प्रक्रिया की जगह कुछ तयशुदा फ्रेमों में विचार ठूंसने का नाम हो गया।

जैसे एक चालक वकील सच और झूट के चक्कर में नहीं पड़ता। अपने मुक़द्दमे को जीतने के लिये दोनों तरह के दाँव-पेच इकट्ठे करता है, आज़माता है।  उसी तरह लक्ष्य तय हुआ साम्यवादी विद्रोह ... उपलक्ष्य तय हुआ राष्ट्र की शक्तियों का कमज़ोर किया जाना। राष्ट्र का विरोध करने वाली सभी शक्तियों से हाथ मिलाना। 
ये अकस्मात नहीं है कि देश के विभाजन का कारण बनी मुस्लिम लीग को विभाजन का दर्शन और तर्क के तीर-तमंचे कम्युनिस्ट पार्टी के सज्जाद ज़हीर 'बन्ने भाई' सप्लाई किये। सज्जाद ज़हीर जिनके साम्प्रदायिकता के विरोधी होने की बातें करते कम्युनिस्ट लोग नहीं थकते, अंततोगत्वा पाकिस्तान चले गये।

अली सरदार जाफ़री, कैफ़ी आज़मी जैसे लोग कभी मुस्लिम लीग, जमाते-इस्लामी पर कभी कुछ नहीं बोले, हाँ राष्ट्रवादियों के नाम पर इनके मिर्चें लगती रहीं। ये दो नाम तो समुद्र में तैरते हिम खंड की तरह केवल नोक हैं। ऐसे असंख्य लोग हैं जिनके सतत राष्ट्रवाद के विरोध को देख कर ऐसा लगता है जैसे महमूद गज़नवी ने मूर्ति-भंजन करने के लिये हरे की जगह लाल कपडे पहन लिये हों। ये वही लोग हैं जो उर्दू के सबसे बड़े कहानीकार किशन चंदर के सलमा सिद्दीक़ी से विवाह करने के लिये मुसलमान बनने का दबाव डालते हैं और उसके बाद निकाह कराते हैं। उर्दू की प्रसिद्ध कहानीकार इस्मत चुगताई की अंतिम इच्छा 'मैं मिट्टी में दब कर अपना जिस्म कीड़ों को नहीं खिलाना चाहती। मुझे इस ख़याल से ही घिन आती है। मुझे मरने के बाद जलाया जाये' पर इतने बौखला जाते हैं कि मुंबई में उनके जनाज़े में केवल एक मुसलमान उनके पति ही शरीक होते हैं। कैफ़ी आज़मी, शबाना आज़मी, जावेद अख्तर जैसों का साम्यवाद हवा हो जाता है, मुल्लाइयत चढ़ बैठती है। 
इस्लाम की अपनी समझ है और वो काफ़िरों, मुशरिकों, मुल्हिदों, मुर्तदों के प्रति भयानक रूप से क्रूर है। इस हद तक कि इस्लामी न्यायशास्त्र के 4 इमामों में से केवल एक काफ़िरों को जज़िया देने और ज़िम्मी बन कर रहने पर ही जीवित छोड़ने का अधिकार देते हैं, बाक़ी को वो भी जिंदा नहीं छोड़ने की व्यवस्था देते हैं। शेष तीन इमाम किसी भी स्थिति में इन सब को जिंदा नहीं रहने देना चाहते। कम्युनिस्ट मुल्हिदों में आते हैं। होना ये चाहिये था कि एक आतताई के दो पीड़ित एक हो जाते मगर हुआ उल्टा कि कम्युनिस्टों और इस्लाम ने राष्ट्रवाद के विरोध में हाथ मिला लिये। देश से सम्बंधित हर बात के विरोध में खड़े हो गये, शत्रुता निभाने लगे। एफ़ एम हुसैन की दुष्ट पेंटिंगों के पक्ष में खड़े होना, सहमत की धूर्तताओं का बचाव करना, रोमिला थापर द्वारा महमूद गज़नवी में गुणों को ढूँढने और उसके बचाव में किताब लिख मरने को आख़िर किस तरह समझा जा सकता है 

मार्क्स के मनमाने सिद्धांत 'समाज का विकास द्वंद से होता है' के आधार पर साहित्य में भी सदैव द्वंद खड़े किये गए,रोपे गये। कविता की छंद से मुक्ति, फिर विचार से मुक्ति, फिर एब्सर्ड लेखन जैसे बेसिरपैर के वाद चलाये ही इस लिये गये।  कविता का आधार छंद मार्क्सवाद की नारेबाज़ी पालकी ढो ही नहीं सकता था। उसे परोसने के लिये कविता के मानकों में तोड़फोड़ करनी ज़ुरूरी थी। नयी कविता के नाम पर मुक्तिबोध से प्रारंभ कर राजेश जोशी , अनुज लुगुन तक जो परोसते हैं वो कल्पित ब्योरों, अपठनीयता से भरा हुआ है। वो सब रौशनाई से दूर केवल सियाही का अंकन है। स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, अल्पसंख्यकों पर प्रलाप जानबूझ कर किये जा रहे ऐसे ही विलाप हैं जिनके कारण पाठक भाग खड़ा हुआ है। आख़िर राग दरबारी के पचीसों संस्करण क्यों निकलते हैं और विष्णु खरे की किताब खोटी क्यों साबित होती है ? उबाऊ होने की सीमा का अतिक्रमण करती, आत्महत्या या हत्या पर उकसाने वाली रचनायें या किताबें किसी को कोई पढ़वा तो नहीं सकता। अकादमी के पुरस्कार पाठक तो नहीं दिला सकते।

इस देश की मिट्टी से जुड़े, अपने समाज के पक्ष में खड़े लोगों पर आरोप चस्पां करने के लिये उन्हें फ़ासीवादी, संस्कृतिवादी, राष्ट्रवादी, सांस्कृतिक राष्ट्रवादी, प्रतिक्रियावादी, शुद्धतावादी, आदर्शवादी और न जाने कैसे-कैसे शब्द गढ़ डालने वाले इन साम्यवादियों की छन-फटक की जाये तो ये स्वयं इसी परिभाषा में आते हैं। आइये इनके सबसे प्रिय आरोप फ़ासीवाद को ही लेते हैं। फ़ासीवाद मोटे तौर पर उस विचारधारा को कहते हैं जो अपने से असहमत हर विचार को ग़लत मानती है, नष्ट का देने योग्य समझती है। जिस विचारधारा के हाथ में शासन सूत्र आने पर प्रत्येक दूसरी विचारधारा को नष्ट किया जाता है। जिसके समय में कोई स्वतंत्र प्रेस नहीं होता। स्वतंत्र न्याय-पालिका नहीं होती ... लगभग तानाशाही होती है। इस परिभाषा पर सारे साम्यवादी देश और इस्लामिक शासन-प्रणाली ही खरे उतरते हैं। यही विचारधारायें अपने अलावा किसी को भी वर्ग-शत्रु या काफ़िर घोषित करके उसको समूल नष्ट करने के तर्क गढ़ती हैं / वाजिबुल-क़त्ल ठहरती हैं। कोई वकील, कोई दलील, कोई अपील कुछ नहीं।

भारत का वैशिष्ट्य ही यही है कि हम एक दूसरे की धुर विरोधी विचारधाराओं का सहजीवन संभव बनाते हैं। हम इस माफियागर्दी को भी अपनी बात कहने का अवसर देते हैं। इसी कारण हम लोकतंत्र हैं। 

हँस पत्रिका के वार्षिक कार्यक्रम में 'अभिव्यक्ति और प्रतिबन्ध' विषय पर आयोजित गोष्ठी में स्वीकृति देने के बाद भी वरवरा कवि और अरुंधती रॉय का न दिल्ली आ कर भी अंतिम क्षण में न आना इसी बात की पुष्टि करता है। वरवरा कवि का स्पष्टीकरण आया है कि उन्होंने ऐसा इस लिये किया कि उन्हें इस मंच पर अशोक बाजपेयी और गोविन्दाचार्य के साथ बैठना था। ये दोनों नाम देश के प्रतिष्ठित नाम हैं। कोई भी श्री अशोक बाजपेयी और श्री गोविन्दाचार्य से असहमत हो सकता है मगर उन्हें अस्पृश्य समझना ? अपनी मनमानी सोच को इस हद तक सही समझना कि अपने से इतर किसी की बात को सुने बिना रद कर देना, फ़ासीवाद है। साम्यवादी हमेशा यही करते आ रहे हैं और आरोप दूसरों पर लगाते हैं। 

जब तक साहित्य इन अंगुलिमालों से मुक्त नहीं होता, पठनीय साहित्य नहीं उभर सकता। पाठक, श्रोता इन बेहूदगियों के कारण ही साथ छोड़ गया। भारतीय स्वभाव से ही शांतिप्रिय हैं। वो इस कोलाहल से भरे तांडव को पसंद नहीं करते। समाज में एक बड़ी शक्ति ये भी होती है कि वो किसी भी तीसमारखां की अवहेलना करके आगे बढ़ जाता है। इसे गौर से देखिये .....वो आगे बढ़ गया है। वो मुशायरे, कवि-सम्मेलन में जाता है। वो श्री लाल शुक्ल, शिवानी, ज्ञान चतुर्वेदी को खोज कर पढ़ता है। उसे नरेन्द्र कोहली की राम कथा, महासमर पसंद हैं। वो सुनील लोढा द्वारा संचालित कार्यक्रम सुनता है। अपनी प्यास बुझाने के लिये वो पचासों तरीक़े अपनाता है किन्तु अकादमी पुरस्कार से सम्मानित स्वयंभू महाकवियों, लेखकों की किताबें की 100 प्रतियां भी नहीं ख़रीदता। 

साम्यवाद में एक रोमांटिक अपील होती है। साम्यवाद चूँकि दुनिया भर में कूड़ेदान में फेंका जा चूका है इसलिये भारत में ये बिरादरी अब अपने आप को पोलिटिकल एक्टिविस्ट, मानवाधिकार कार्यकर्त्ता बताने लगी है। यहाँ एक एक कहानी का ज़िक्र करना उपयुक्त होगा जिसमें एक तवायफ़ पुलिस के पकड़ने पर अपने आप को सोशल वर्कर बताती है और अपने काम को समाज सेवा कहती है। उर्दू के प्रसिद्ध लेखक मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी के अनुसार 'जो चीज़ अक़्ल के ज़रिये खोपड़ी में नहीं घुसी वो अक़्ल के ज़रिये बाहर कैसे निकलेगी।'  तो साहिबो साहित्य में पाठक अपने आप नहीं लौटेंगे। इसके लिये साहित्य की दिशा तय करने वाले, साहित्य पर क़ब्ज़ा जमाये लोगों की सफ़ाई आवश्यक है। ये कूड़ा विश्वविद्यालयों, अकादमियों, संस्थानों, पत्रिकाओं में बुहारी लगाये बिना बाहर नहीं जाने वाला।

तुफ़ैल चतुर्वेदी