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मंगलवार, 16 अगस्त 2016

========अनिवार्य हस्तक्षेप======
सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टजः कट्यां कृतांको निर्वास्यहः स्फिचं वास्यावर्कतयेत :मनु स्मृति, अध्याय 8 श्लोक 281 
जो शूद्र ब्राह्मण के साथ एक आसान पर बैठना चाहे तो राजा उसकी कमर पर दगवा कर उसे देश से निकलवा दे, व उसके चूतड़ कतरवाले। इसी तरह की असह्य बातें मनु स्मृति के श्लोक नम्बर 277, 279, 280, 282, 283 में कही गयी हैं। आप, मैं या कोई भी कोई भी सामान्य मेधा, ज्ञान को उपलब्ध व्यक्ति इस तरह की बातों को सिरे से अनुचित और बुरा बतायेगा। इसी मनुस्मृति में इस प्रकार के श्लोक भी मिलते हैं 

शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम क्षत्रियाज्जातमेवम तु विध्याद्वैश्यात्तथैव च :मनु स्मृति अध्याय10 श्लोक 65
ब्राह्मण शूद्र बन सकता है और शूद्र ब्राह्मण हो सकता है। इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपना वर्ण बदल सकते हैं। 
मनु स्मृति :अध्याय 2  श्लोक 168 जो ब्राह्मण वेदों को न पढ़ कर अन्य अन्य शास्त्रों में ही परिश्रम करता है, वह जीते जी कुटुंब सहित शीघ्र शूद्र बन जाता है। 

यहाँ एक वैदिक ऋषि की चर्चा करना उपयुक्त होगा। ऋषि कवष ऐलूष ने वेद में अक्ष-सूक्त जोड़ा है। अक्ष जुए खेलने के पाँसे को कहते हैं। इस सूक्त में ऋषि कवष ऐलूष ने अपनी आत्मकथा और जुए से जुड़े सामाजिक आख्यान, उपेक्षा, बदनामी की बात करुणापूर्ण स्वर में लिखी है। कवष इलूष के पुत्र थे जो शूद्र थे। ऐतरेय ब्राह्मण बताता है कि सरस्वती नदी के तट पर ऋषि यज्ञ कर रहे थे कि शूद्र कवष ऐलूष वहां पहुंचे। सामाजिक रूप से प्रताड़ित जुआरी कवष ऐलूष को ऋषियों ने यज्ञ में भाग लेने के लिये मना किया और अपमानित कर निष्काषित कर ऐसी भूमि पर छोड़ा गया जो जलविहीन थी। कवष ऐलूष ने उस जलविहीन क्षेत्र में देवताओं की स्तुति में सूक्त की रचना की और कहते हैं सरस्वती नदी अपना स्वाभाविक मार्ग बदल कर शूद्र कवष ऐलूष के पास आ गयीं। सरस्वती की धारा ने कवष ऐलूष की परिक्रमा की, उन्हें घेर लिया। यज्ञकर्ता ऋषि दौड़े-दौड़े आये और शूद्र कवष ऐलूष की अभ्यर्थना की। उन्हें ऋषि कह कर पुकारा। उनके ये सूक्त ऋग्वेद के दसवें मंडल में मिलते हैं। इस घटना से ही पता चलता है कि शूद्र का ब्राह्मण वर्ण में आना सामान्य घटना ही थी। ध्यान रहे कि वर्ण और जातियों में अंतर है। वर्णों में एक-दूसरे में आना-जाना चलता था और इसे उन्नति या अवनति नहीं समझा जाता था। ये केवल स्वभाव के अनुसार आर्थिक विभाजन था। भारत में वर्ण जन्म से नहीं थे और इनमें व्यक्ति की इच्छा-क्षमता के अनुसार बदलाव होता था। वर्ण-व्यवस्था समाज को चलाने की एक व्यवस्था थी। 

दोनों प्रकार के श्लोक मनुस्मृति और इस तरह के अन्यान्य ग्रन्थों में मिलते हैं। किसे ठीक माना जाये ? स्पष्ट है कि मनुस्मृति वेद से बड़ी और प्रमुख तो नहीं हो सकती अतः निश्चित रूप से मनुस्मृति के यह श्लोक प्रक्षिप्त हैं। वेद के मूल स्वर के विपरीत वेदांग और स्मृतियाँ नहीं हो सकते और कहीं हैं तो स्वीकार नहीं किये जा सकते। मगर यह तो शास्त्रीय पक्ष है। व्यवहार में बहुत भिन्नता है। व्यवहार का सत्य यह है कि 1978 में अल्मोड़ा के रघुनाथ मंदिर के सामने से एक हरिजन की घोड़े पर निकलती विवाह की यात्रा पर आक्रमण होता है और कई लोगों की हत्या कर दी जाती है। दक्षिण के अनेकों मंदिरों में, नाथद्वारा के मंदिर में आज भी हरिजनों का प्रवेश घोषित रूप से बंद है। यह सच है कि इन मंदिरों में प्रवेश के समय कोई जाति नहीं पूछता मगर ऐसी दुष्ट घोषणा जो वेद-विरोधी, मानवता-विरोधी है कैसे सही जा सकती है ?
गुजरात के ऊना में मृत गौ की खाल उतारने वाले लोगों पर प्राणघाती आक्रमण होता है। यह ठीक है कि गुजरात के ऊना में दलितों की पिटाई के मामले में साजिश खुल गयी है। दलित परिवार ने बताया है कि गांव के सरपंच प्रफुल कोराट ने ही उनकी पिटाई करवाई थी। यह सरपंच लोकल कांग्रेस विधायक का करीबी है। मारपीट का जो वीडियो वायरल हुआ वो सरपंच प्रफुल कोराट के मोबाइल फोन से ही बनाया गया था। सीआईडी के सूत्रों के मुताबिक खुद प्रफुल्ल कोराट भी मारपीट वाली जगह पर मौजूद था। जांच में यह बात भी साफ हो चुकी है कि वीडियो में जो लोग मारपीट करते दिख रहे हैं उनका गोरक्षा समितियों से कोई लेना-देना नहीं है। पुलिस से पूछताछ में भी उन्होंने यह बात कबूली है कि इससे पहले उन्होंने गायों की रक्षा से जुड़े किसी काम में हिस्सा नहीं लिया था। पीड़ित परिवार का आरोप है कि सरपंच की नजर उनके इस्तेमाल में आ रही एक जमीन पर थी। इसे खाली कराने के लिए उसने बालू सरवैया को कई बार धमकियां दी थीं। 

बंधुओ, यह तथ्यात्मक रूप से ही ठीक है मगर पर्याप्त नहीं है। यह पाप कांग्रेस के व्यक्तियों ने किया, जानना भर काफ़ी नहीं है। अन्यथा ऐसा कैसे हो गया कि इस भयानक घटना के विरोध में होने वाली महारैली में विश्व हिन्दू परिषद्, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बजरंग दल, हिन्दू जागरण मंच, आर्य समाज, हिन्दू महासभा जैसे संगठनों के लोग अपने बैनरों के साथ सम्मिलित नहीं हुए। धरातल पर वास्तविकता यह है कि समाज के सारे राष्ट्रवादी संगठनों के अधिकारी, हम सब राष्ट्रवादी मित्तल, त्यागी, पाठक, तोमर, मलिक, अवस्थी, कंसल, यादव, गुप्ता चौधरी, राव, रेड्डी, नायक.........मौन हैं और इस मौन से यही सन्देश जा रहा है कि जय मीम जय भीम का कुटिल नारा लगाने वालों की बात ठीक है। हिन्दू समाज की जाति व्यवस्था भयानक रूप से अन्यायी है। यह अपने ही हिस्से को मानव-जीवन के मूल अधिकार भी नहीं देना चाहती। इस सड़न का उपचार नहीं किया जा सकता और उसे छोड़ कर मुसलमान या ईसाई बनना ही उपयुक्त है। 
हम संगठनों को प्रेरित करें यह आवश्यक है मगर अपने स्तर पर ईमानदारी से अपने दिल पर हाथ रख कर सोचिये। क्या आपने कभी अपने घर में सफ़ाई के लिये आने वाली मेहतरानी को, सड़क पर झाड़ू लगाने वाले व्यक्ति को उसी प्याले में चाय पिलायी है जिसमें आप पीते हैं ? गर्मी में घर में आये इस अन्त्यज को अपने वाले गिलास से ठंडा पानी पिलाया है ? आपके जूते की मरम्मत करने वाले गरीब को भाई की दृष्टि से देखा है ? जब आपके नगर के दलित बंधु अंबेडकर जी की शोभा-यात्रा निकलते हैं तो उसमें भगवा पटका गले में डाल कर हर हर महादेव के नारे लगते हुए अग्रणी पंक्ति में निकलने की सोची है ? आख़िर अम्बेडकर जी वही महापुरुष हैं जिन्होंने इस्लामियों के प्रबल लालच के बाद भी मुसलमान बनने की जगह बौद्ध बनना तय किया। जिनके कारण दलित बंधु मुसलमान नहीं बने। 

बंधुओ , यह व्यवहार अक्षम्य है। यह घोर पाप है। अपने बंधुओं के साथ यह व्यवहार न केवल हमें बल्कि सम्पूर्ण हिन्दू समाज को कम्भीपाक नर्क में सड़ायेगा। हर हिन्दू को इसका हर प्रकार से विरोध करना चाहिये। आज हम यह नहीं कह सकते कि हम विरोध कैसे करें। टीवी, समाचारपत्र हमारी बात नहीं प्रसारित करते। हमारे पास सोशल मीडिया का सहारा है। हमें इस पर अपनी आवाज़ ऊँची करनी चाहिए। सारे भारत में ज़ोरशोर से यह सन्देश जाना ही चाहिये कि हिन्दू समाज ऐसी हर घटना का विरोध कर रहा है।
तुफ़ैल चतुर्वेदी 


सोमवार, 1 अगस्त 2016

========गुजरात के ऊना पर अनिवार्य हस्तक्षेप======

========अनिवार्य हस्तक्षेप======

सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टजः 
कट्यां कृतांको निर्वास्यहः स्फिचं वास्यावर्कतयेत :मनु स्मृति, अध्याय 8 श्लोक 281 

जो शूद्र ब्राह्मण के साथ एक आसान पर बैठना चाहे तो राजा उसकी कमर पर दगवा कर उसे देश से निकलवा दे, व उसके चूतड़ कतरवाले। इसी तरह की असह्य बातें मनु स्मृति के श्लोक नम्बर 277, 279, 280, 282, 283 में कही गयी हैं। आप, मैं या कोई भी कोई भी सामान्य मेधा, ज्ञान को उपलब्ध व्यक्ति इस तरह की बातों को सिरे से अनुचित और बुरा बतायेगा। इसी मनुस्मृति में इस प्रकार के श्लोक भी मिलते हैं 


शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम 
क्षत्रियाज्जातमेवम तु विध्याद्वैश्यात्तथैव च :मनु स्मृति अध्याय10 श्लोक 65

ब्राह्मण शूद्र बन सकता है और शूद्र ब्राह्मण हो सकता है। इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपना वर्ण बदल सकते हैं। 

मनु स्मृति :अध्याय 2  श्लोक 168 जो ब्राह्मण वेदों को न पढ़ कर अन्य अन्य शास्त्रों में ही परिश्रम करता है, वह जीते जी कुटुंब सहित शीघ्र शूद्र बन जाता है। 


यहाँ एक वैदिक ऋषि की चर्चा करना उपयुक्त होगा। ऋषि कवष ऐलूष ने वेद में अक्ष-सूक्त जोड़ा है। अक्ष जुए खेलने के पाँसे को कहते हैं। इस सूक्त में ऋषि कवष ऐलूष ने अपनी आत्मकथा और जुए से जुड़े सामाजिक आख्यान, उपेक्षा, बदनामी की बात करुणापूर्ण स्वर में लिखी है। कवष इलूष के पुत्र थे जो शूद्र थे। ऐतरेय ब्राह्मण बताता है कि सरस्वती नदी के तट पर ऋषि यज्ञ कर रहे थे कि शूद्र कवष ऐलूष वहां पहुंचे। सामाजिक रूप से प्रताड़ित जुआरी कवष ऐलूष को ऋषियों ने यज्ञ में भाग लेने के लिये मना किया और अपमानित कर निष्काषित कर ऐसी भूमि पर छोड़ा गया जो जलविहीन थी। कवष ऐलूष ने उस जलविहीन क्षेत्र में देवताओं की स्तुति में सूक्त की रचना की और कहते हैं सरस्वती नदी अपना स्वाभाविक मार्ग बदल कर शूद्र कवष ऐलूष के पास आ गयीं। सरस्वती की धारा ने कवष ऐलूष की परिक्रमा की, उन्हें घेर लिया। यज्ञकर्ता ऋषि दौड़े-दौड़े आये और शूद्र कवष ऐलूष की अभ्यर्थना की। उन्हें ऋषि कह कर पुकारा। उनके ये सूक्त ऋग्वेद के दसवें मंडल में मिलते हैं। इस घटना से ही पता चलता है कि शूद्र का ब्राह्मण वर्ण में आना सामान्य घटना ही थी। ध्यान रहे कि वर्ण और जातियों में अंतर है। वर्णों में एक-दूसरे में आना-जाना चलता था और इसे उन्नति या अवनति नहीं समझा जाता था। ये केवल स्वभाव के अनुसार आर्थिक विभाजन था। भारत में वर्ण जन्म से नहीं थे और इनमें व्यक्ति की इच्छा-क्षमता के अनुसार बदलाव होता था। वर्ण-व्यवस्था समाज को चलाने की एक व्यवस्था थी। 


दोनों प्रकार के श्लोक मनुस्मृति और इस तरह के अन्यान्य ग्रन्थों में मिलते हैं। किसे ठीक माना जाये ? स्पष्ट है कि मनुस्मृति वेद से बड़ी और प्रमुख तो नहीं हो सकती अतः निश्चित रूप से मनुस्मृति के यह श्लोक प्रक्षिप्त हैं। वेद के मूल स्वर के विपरीत वेदांग और स्मृतियाँ नहीं हो सकते और कहीं हैं तो स्वीकार नहीं किये जा सकते। मगर यह तो शास्त्रीय पक्ष है। व्यवहार में बहुत भिन्नता है। व्यवहार का सत्य यह है कि 1978 में अल्मोड़ा के रघुनाथ मंदिर के सामने से एक हरिजन की घोड़े पर निकलती विवाह की यात्रा पर आक्रमण होता है और कई लोगों की हत्या कर दी जाती है। दक्षिण के अनेकों मंदिरों में, नाथद्वारा के मंदिर में आज भी हरिजनों का प्रवेश घोषित रूप से बंद है। यह सच है कि इन मंदिरों में प्रवेश के समय कोई जाति नहीं पूछता मगर ऐसी दुष्ट घोषणा जो वेद-विरोधी, मानवता-विरोधी है कैसे सही जा सकती है ?

गुजरात के ऊना में मृत गौ की खाल उतारने वाले लोगों पर प्राणघाती आक्रमण होता है। यह ठीक है कि गुजरात के ऊना में दलितों की पिटाई के मामले में साजिश खुल गयी है। दलित परिवार ने बताया है कि गांव के सरपंच प्रफुल कोराट ने ही उनकी पिटाई करवाई थी। यह सरपंच लोकल कांग्रेस विधायक का करीबी है। मारपीट का जो वीडियो वायरल हुआ वो सरपंच प्रफुल कोराट के मोबाइल फोन से ही बनाया गया था। सीआईडी के सूत्रों के मुताबिक खुद प्रफुल्ल कोराट भी मारपीट वाली जगह पर मौजूद था। जांच में यह बात भी साफ हो चुकी है कि वीडियो में जो लोग मारपीट करते दिख रहे हैं उनका गोरक्षा समितियों से कोई लेना-देना नहीं है। पुलिस से पूछताछ में भी उन्होंने यह बात कबूली है कि इससे पहले उन्होंने गायों की रक्षा से जुड़े किसी काम में हिस्सा नहीं लिया था। पीड़ित परिवार का आरोप है कि सरपंच की नजर उनके इस्तेमाल में आ रही एक जमीन पर थी। इसे खाली कराने के लिए उसने बालू सरवैया को कई बार धमकियां दी थीं। 


बंधुओ, यह तथ्यात्मक रूप से ही ठीक है मगर पर्याप्त नहीं है। यह पाप कांग्रेस के व्यक्तियों ने किया, जानना भर काफ़ी नहीं है। अन्यथा ऐसा कैसे हो गया कि इस भयानक घटना के विरोध में होने वाली महारैली में विश्व हिन्दू परिषद्, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बजरंग दल, हिन्दू जागरण मंच, आर्य समाज, हिन्दू महासभा जैसे संगठनों के लोग अपने बैनरों के साथ सम्मिलित नहीं हुए। धरातल पर वास्तविकता यह है कि समाज के सारे राष्ट्रवादी संगठनों के अधिकारी, हम सब राष्ट्रवादी मित्तल, त्यागी, पाठक, तोमर, मलिक, अवस्थी, कंसल, यादव, गुप्ता चौधरी, राव, रेड्डी, नायक.........मौन हैं और इस मौन से यही सन्देश जा रहा है कि जय मीम जय भीम का कुटिल नारा लगाने वालों की बात ठीक है। हिन्दू समाज की जाति व्यवस्था भयानक रूप से अन्यायी है। यह अपने ही हिस्से को मानव-जीवन के मूल अधिकार भी नहीं देना चाहती। इस सड़न का उपचार नहीं किया जा सकता और उसे छोड़ कर मुसलमान या ईसाई बनना ही उपयुक्त है। 

हम संगठनों को प्रेरित करें यह आवश्यक है मगर अपने स्तर पर ईमानदारी से अपने दिल पर हाथ रख कर सोचिये। क्या आपने कभी अपने घर में सफ़ाई के लिये आने वाली मेहतरानी को, सड़क पर झाड़ू लगाने वाले व्यक्ति को उसी प्याले में चाय पिलायी है जिसमें आप पीते हैं ? गर्मी में घर में आये इस अन्त्यज को अपने वाले गिलास से ठंडा पानी पिलाया है ? आपके जूते की मरम्मत करने वाले गरीब को भाई की दृष्टि से देखा है ? जब आपके नगर के दलित बंधु अंबेडकर जी की शोभा-यात्रा निकलते हैं तो उसमें भगवा पटका गले में डाल कर हर हर महादेव के नारे लगते हुए अग्रणी पंक्ति में निकलने की सोची है ? आख़िर अम्बेडकर जी वही महापुरुष हैं जिन्होंने इस्लामियों के प्रबल लालच के बाद भी मुसलमान बनने की जगह बौद्ध बनना तय किया। जिनके कारण दलित बंधु मुसलमान नहीं बने। 


बंधुओ , यह व्यवहार अक्षम्य है। यह घोर पाप है। अपने बंधुओं के साथ यह व्यवहार न केवल हमें बल्कि सम्पूर्ण हिन्दू समाज को कम्भीपाक नर्क में सड़ायेगा। हर हिन्दू को इसका हर प्रकार से विरोध करना चाहिये। आज हम यह नहीं कह सकते कि हम विरोध कैसे करें। टीवी, समाचारपत्र हमारी बात नहीं प्रसारित करते। हमारे पास सोशल मीडिया का सहारा है। हमें इस पर अपनी आवाज़ ऊँची करनी चाहिए। सारे भारत में ज़ोरशोर से यह सन्देश जाना ही चाहिये कि हिन्दू समाज ऐसी हर घटना का विरोध कर रहा है।

तुफ़ैल चतुर्वेदी 

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

:::::::::::::मिस्र के तहरीर चौक से देवबंद के रणखंडी मंदिर तक

मिस्र के तहरीर चौक से:----अभी कुछ वर्ष पहले ही मिस्र में तहरीर चौक से प्रारम्भ हुई क्रांति में उमड़े जनज्वार के परिणामस्वरूप मुस्लिम ब्रदरहुड सत्ता में आया। इसने ऐसे-ऐसे क़ानून लागू किये, ऐसा विकट मरकट-नृत्य { बंदर-नाच } किया कि जनता त्राहि-त्राहि कर उठी और सेना का दुबारा समर्थन कर सत्ता में बिठाया। इसके बाद जनरल फ़तह अल सीसी ने इस्लामी विश्व के सबसे प्रतिष्ठित केंद्र अल अजहर यूनिवर्सिटी गये। यहाँ यह जानकारी आवश्यक है कि अल अजहर यूनिवर्सिटी क्या है ? यहाँ से कैसे-कैसे फ़तवे आये हैं इसको जानने से इस केंद्र की मानसिकता बल्कि मानसिक सीमा-क्षमता का अनुमान लग सकेगा। अल अज़हर ने फ़तवे दिए हैं। 


मुसलमान औरतों का केला, खीरा ख़रीदना हराम है। इन फलों का आकार के लिंग जैसा होने के कारण उनमें मानसिक भ्रष्टता आती है। 

किसी औरत को समुद्र में स्नान नहीं करना चाहिये। समन्दर पुल्लिंग है और स्त्री के शरीर के स्पर्श से उसमें उत्तेजना आ सकती है। 

किसी भी आयु की बच्ची से शादी की जा सकती है बशर्ते वह मर्द के बदन का बोझ बर्दाश्त कर ले। 

इन मूढ़ लोगों का ऐसी चित्र-विचित्रताओं के साथ-साथ काफ़िर वाजिबुल क़त्ल, क़त्ताल फ़ी सबीलिल्लाह { अल्लाह की राह में क़त्ल करो } जिहाद फ़ी सबीलिल्लाह { अल्लाह की राह में जिहाद करो } में भी अटूट विश्वास है। इसी दर्शन को व्यवहार में फैलाने में मुस्लिम ब्रदरहुड लगा था। इस दर्शन की किताबों क़ुरआन, हदीस इत्यादि का यहाँ अध्ययन किया जाता है। 


जनरल फ़तह अल सीसी ने अल अज़हर यूनिवर्सिटी के छात्रों, उलमा के बीच कहा कि यह असम्भव है कि 160 करोड़ मुसलमान 600 करोड़ अमुस्लिमों को ख़त्म करने की इच्छा रखें। { यही अस्ली समस्या है और यही संसार भर में अशांति का कारण है } जनरल फ़तह अल सीसी ने इस जिहादी विचारधारा के प्रसार पर विभिन्न प्रतिबन्ध लगाये हैं। उलमा को आदेश दिये गए हैं कि वह सरकारी मस्जिदों में सरकार द्वारा अधिकृत उपदेश ही दें। यहाँ तर्क-बुद्धि तो यह कहती है कि सरकारी मस्जिदों में सरकारी उपदेश ही देने से यह समस्या समाप्त नहीं हो सकती। ये उलमा-मुल्ला निजी चर्चा में जो कुछ कहेंगे उसे कैसे रोका जायेगा ? 



यह समस्या मुल्ला-जनित नहीं है। देखना होगा यह हत्यारा दर्शन आ कहाँ से रहा है ? उसकी जड़ कहाँ है ? केवल पत्तियां नोचने से जड़ नष्ट नहीं हो पायेगी ? 160 करोड़ मुसलमानों का 600 करोड़ अमुस्लिमों को ख़त्म करने की इच्छा रखना ही यह समझने के लिये पर्याप्त है कि समस्या बहुत गंभीर है। इस पागलपन को उपजाने वाली विषबेल की जड़ काटने की जगह पत्तियों के नोचने से कुछ नहीं होगा। जैसे ज़ाकिर नायक के टीवी चैनल को बंद करना भी विषबेल की पत्तियां नोचना है। ऐसे हर ज़ाकिर की खाट खड़ी होना, उसकी ऐसी दुर्गति होना कि अगला ज़ाकिर बनने की इच्छा रखें वाले की रूह तक कांप उठे इसका हल है। 160 करोड़ मुसलमान 600 अमुस्लिमों को ख़त्म करने की इच्छा रखें यह असम्भव ही नहीं है बल्कि असहनीय है। ऐसी हर खोपड़ी को भेजे सहित भयावह रूप से दण्डित किये बिना विश्व के शांतिपूर्ण जीवन का मार्ग प्रशस्त नहीं होगा। मुल्ला-उलमा जब तक स्थानीय स्तर पर रगड़े नहीं जायेंगे कुछ बदलाव नहीं आने का। 


देवबंद के रणखंडी मंदिर तक:-----परसों देवबंद नगर के रणखंडी रोड पर शास्त्री चौक के पास बने मंदिर में मूर्तियां तोड़ दी गयीं। सादिक़ नाम का 21 वर्षीय युवक पकड़ लिया गया है और राहत ख़ान और ताहिर लुहार फ़रार हो गये। नई घटना नहीं है और पहले भी ऐसा होता रहा है। अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे देशों में यह कुकृत्य सैकड़ों वर्षों से होता आया है। नयापन केवल इसमें इतना है कि सादिक़ ने यह दुस्साहस अच्छी भरी-पूरी हिन्दू बस्ती में किया है। राक्षसी धावे अब अपने संख्या-बल की चिंता किये बिना होने लगे हैं। यह गंभीर चिंता का विषय है। कोई दूसरे पक्ष पर अंधाधुंध नहीं टूट पड़ता। ऐसा तभी सम्भव है जब आक्रमणकारी को अपनी विजय अथवा सुरक्षित लौट आने या शत्रु के घोर कायर होने की आश्वस्ति हो। कृपया सोचिये कि हमारे व्यवहार में क्या ऐसा है कि राक्षसी धावे बढ़ते जा रहे हैं। आक्रमण के लिये शत्रु की क्षमता से पहले हमारी अक्षमता-अकर्मण्यता ज़िम्मेदार है। 

तुफ़ैल चतुर्वेदी 





मंगलवार, 26 जुलाई 2016

:::::::::::::::: My name is khan and I am....... not or a terrorist ?
आज के दैनिक जागरण के अंतिम पृष्ठ पर हैडिंग है "ब्रिटिश पब में इस्लाम लिखा जैकेट उतरवाया" विस्तृत रिपोर्टिंग यह है "संसार में मुस्लिम समुदाय के साथ भेदभाव की घटनायें बढ़ती जा रही हैं। ताज़ा मामले में पब में एक स्कूल टीचर से इस्लाम लिखे जैकेट को उतारने को कहा गया। कुछ दिनों पहले न्यूज़ीलैंड में एक महिला को हिजाब के बिना नौकरी के लिये आवेदन करने को कहा गया। अंतिम पंक्तियाँ इस तरह हैं "पब के एक कर्मचारी ने उनसे { नूरुल से } कहा कि वहां मौजूद लोगों को इससे असुविधा हो रही है, लिहाज़ा इसे उतार लें या फिर यहाँ से जायें। नूरुल ने बताया कि इससे वो भौंचक्के रह गये। उन्होंने कहा, सरनेम के चलते मेरे साथ भेदभाव किया जा रहा था। इस घटना से मैं बहुत परेशान था। मेरे मुस्लिम होने से लोगों का इस तरह चिंतित होना मेरे लिये ख़ौफ़नाक है"। ध्यान रखिये कि यह ब्रिटेन में हुआ है जहाँ के लोगों ने इसी समस्या के कारण स्वयं को योरोपीय यूनियन से अलग कर लिया है।
मित्रो, ये कोई नई बात नहीं है। आपको कुछ माह पहले, ग ग ग गलती बोलने वाले हकले अभिनेता के तथाकथित बयान का उल्लेख ध्यान होगा। जिसमें इसके अनुसार भारत में असहिष्णुता बढ़ती जा रही है। उस ने इस विषय को पैसे कमाने का मौक़ा ताड़ कर My name is khan and I am not terrorist बना मारी। फिर भी मेरे लिये किसी के साथ भी ऐसा व्यवहार बहुत पीड़ादायक है। किसी को भी ख़ान, सिद्दीक़ी, अली, मुहम्मद, उस्मान, मुस्तफ़ा, अबू बकर, उमर फ़ारूक़, उस्मान....... होने के कारण भेदभाव का सामना करना पड़े यह सभ्य समाज के लिये बहुत बुरी बात है। हम निष्पक्ष-तटस्थ नियमों-क़ानून द्वारा संचालित होते हैं। सभ्य विश्व किसी बादशाह, अमीर या नवाब की मनमानी सनकों से नहीं चलता।
एक और समाचार; 6 जुलाई के हिंदुस्तान एक्सप्रेस के अनुसार मुस्लिमों के सबसे पवित्र महीने रमजान में इस्लामिक आतंकियों ने जम कर हमले किये। इस महीने में कम से कम 1671 जानें गयीं। एक महीने के अंदर दुनिया के 31 देशों में आतंकवादियों ने 308 हमले किये। इसके लिये ज़िम्मेदार मुस्लिम ब्रदरहुड, सलफ़ी, ज़िम्मा इस्लामिया, बोको हराम, जमात-उद-दावा, तालिबान, ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामी मूवमेंट, इख़वानुल मुस्लिमीन, लश्करे-तैय्यबा, जागृत मुस्लिम जनमत-बांग्ला देश, इस्लामी स्टेट, जमातुल-मुजाहिदीन, अल मुहाजिरो, दौला इस्लामिया जैसे प्रकट और गुप्त सैकड़ों संगठनों के नाम ध्यान कीजिये। अब एक सवाल ख़ान, सिद्दीक़ी, अली, मुहम्मद, उस्मान, मुस्तफ़ा, अबू बकर, उमर फ़ारूक़, उस्मान जैसे नामों वाले देशवासियो !विश्ववासियो ! से करना चाहूंगा।
क्या कभी आपको सूझा है कि इसी रमज़ान के केवल एक महीने में मरने वाले 1671 लोगों के लिये कोई एक दुखप्रदर्शन, शांति सभा की जाये। अपने नामों वालों के अलावा आप जिस समाज में रहते हैं उस को यह अहसास कराया जाये कि आप इन संगठनों के साथ नहीं हैं। भारत, पाकिस्तान, बांग्ला देश, इंडोनेशिया, कंपूचिया, थाई लैंड, मलेशिया, चीन, अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, ईराक़, सीरिया, लीबिया, नाइजीरिया, अल्जीरिया, मिस्र, तुर्की, स्पेन, रूस, इटली, फ़्रांस, इंग्लैंड, जर्मनी, डेनमार्क, हॉलैंड, यहाँ तक कि इस्लामी देशों से भौगोलिक रूप से कटे संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में भी आतंकवादी घटनाएँ हो रही हैं, होती आ रही हैं। ऐसे हजारों साल से होते चले आ रहे बर्बर हत्याकांडों के विरोध में आप कभी खड़े हुए हैं ? आपने कभी भी इन राक्षसों और इनकी प्रेरणास्रोत राक्षसी विचारधारा से स्वयं को अलग माना है ? आपने कभी ऐसा सोचा भी है ? या आप उस समय हकले अभिनेता की तरह ड ड ड ड ड डा डा डायलॉग भूल गया का बहाना करते हैं ?
जब आप संसार भर में किसी दूसरे मुसलमान से मिलते समय बिरादरे-इस्लाम से मुसाफ़ा { इस्लामी ढंग से हाथ मिलाना } करते हैं। उसके कारण आश्वस्ति पाते हैं तो इस्लाम से दुखी-खिन्न लोगों की बेचैनी भी तो आपकी होगी। आप मज़हब के कारण सारे विश्व में राष्ट्रीयता का विरोध करते हैं। आपके सारे प्रमुख मौलाना स्वयं कहते हैं कि इस्लाम उम्मा { इस्लामी बंधुत्व } की भावना रखता है। इस्लाम की दृष्टि में सारे मुसलमान भाई हैं, एक हैं। इस्लाम का राष्ट्रवाद में विश्वास नहीं है तो राष्ट्रवाद में विश्वास रखने वाले लोग आपको विदेशी एजेंट समझते हैं तो क्या ग़लत करते हैं ? ऐसे लोग आपको अपने देशों में नहीं देखना चाहते हैं तो इसमें ग़लत क्या है ? आपके जैसे नाम वाले जिस किताब, जिस विचारधारा के कारण इतने हिंसक हैं उसे सभ्य समाज समझता है। इंटरनैट के काल में सब कुछ उपलब्ध है। सभ्य समाज उसे पढ़ भी रहा है। आप और आप जैसे बहुतों के यह कहने "आतंकवादी मुसलमान नहीं हैं" लोग समझते हैं कि उनको कहाँ से प्रेरणा मिल रही है। लोग सच जानते हैं।
ओ मुसलमानों तुम गैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { 9-123 }
और तुम उनको जहां पाओ कत्ल करो { 2-191 }
काफिरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { 8-39 }
ऐ नबी ! काफिरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो. उनका ठिकाना जहन्नुम है { 9-73 और 66-9 }
अल्लाह ने काफिरों के रहने के लिये नर्क की आग तय कर रखी है { 9-68 }
उनसे लड़ो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं, न आखिरत पर; जो उसे हराम नहीं जानते जिसे अल्लाह ने अपने नबी के द्वारा हराम ठहराया है. उनसे तब तक जंग करो जब तक कि वे जलील हो कर जजिया न देने लगें { 9-29 }
तुम मनुष्य जाति में सबसे अच्छे समुदाय हो, और तुम्हें सबको सही राह पर लाने और गलत को रोकने के काम पर नियुक्त किया गया है { 3-110 }
जो कोई अल्लाह के साथ किसी को शरीक करेगा, उसके लिये ने जन्नत हराम कर दी है. उसका ठिकाना जहन्नुम है { 5-72 }
आप इससे पूरी तरह समझ लीजिये कि अब बात ग ग ग गलती हो गयी, ड ड ड ड ड डा डा डायलॉग भूल गया से बहुत आगे आ गयी है। विश्व भर का सभ्य समाज खौल रहा है। उसकी मुट्ठियां भिंची हुई हैं और वो तमतमाया हुआ है। आप काल की पदचाप सुन पा रहे होंगे। सारे संसार में आप जैसे नाम वालों के विरोध में ज़बरदस्त अंतर्धारा बह रही है। जगह-जगह ये दिखाई भी दे रही है। जर्मनी में नक़ाब पहने हुए मोटरसाइकिल सवार नवयुवकों ने सीरियाई, ईराक़ी शरणार्थियों के गोलियां मारनी शुरू कर दी हैं। इन हिंसक आक्रमणों के विरोध में विश्व भर में युद्ध के नगाड़े बज रहे हैं। सभ्य समाज इस किताब और किताब से निकली विचारधारा का उपाय जिस दिशा में तलाश कर रहा है उसे सम्भवतः देख पा रहे होंगे। समाचार की अंतिम पंक्ति पर ध्यान दीजिये। "मेरे मुस्लिम होने से लोगों का इस तरह चिंतित होना मेरे लिये ख़ौफ़नाक है "
अर्थात सभ्य संसार तय करने के कगार पर हैं कि ख़ौफ़ ही इस समस्या का इलाज है। आप पुरज़ोर और स्पष्ट दिखाई देने वाले प्रयास से इस समस्या से स्वयं को दूर नहीं करेंगे तो आप पायेंगे कि सभ्य समाज आपसे दूरी बरत रहा है। वो आपकी दुकान पर नहीं जायेगा। आपको काम नहीं देगा। शायद आपको माल बेच देगा मगर आपसे कुछ ख़रीदेगा नहीं यानी आपसे आर्थिक दूरी बरतेगा। सभ्य समाज आपके जैसे नाम वालों का भरपूर सैन्य प्रतिकार तो करेगा ही करेगा मगर ध्यान रखें एक जैसे नामों के कारण आप अभी इसकी चपेट में आ सकते हैं। आप अगर सभ्य समाज के साथ ताल ठोक कर इन राक्षसों के विरोध में आगे नहीं आये तो आप भी अपने जैसे नाम वालों के साथ ख़ौफ़ का शिकार बन जाने को अभिशप्त होंगे।
तुफ़ैल चतुर्वेदी

सोमवार, 18 जुलाई 2016

बुर्क़ा, हिजाब, नक़ाब

बुर्क़ा, हिजाब, नक़ाब ....... ये सारे अरबी मूल के शब्द हैं. ये 1400 वर्ष पुरानी इस्लामी परंपरा है। इन्हीं का समानार्थक एक और शब्द पर्दा है। ये फ़ारसी मूल का शब्द है और शब्दकोष में इनके अर्थ आड़, ओट, लज्जा, लाज, शर्म, संकोच, झिझक, हिचकिचाहट आदि हैं। सुनने में इन शब्दों से सामान्य लाज का भाव उभरता है
मगर इन शब्दों के सही अर्थ समझने हों तो स्वयं को पूरे क़द की एक बोरी में बंद कर लीजिये। इस बोरी के सर पर इस तरह गांठ लगी हुई होनी चाहिये कि गर्दन मोड़ना भी संभव न हो। कहीं दायें-बाएं देखना हो तो गर्दन मोड़ने की जगह पूरा घूमना पड़े। केवल आँखों का हिस्सा खुला होना चाहिये बल्कि आँखों के आगे भी जाली लगी हो तो सबसे अच्छा रहेगा। बाहर की हवा आने-जाने का कोई रास्ता नहीं होना चाहिए बल्कि अपनी अंदर की हवा के भी बाहर आने-जाने का रास्ता नहीं होना चाहिए।
बिलकुल ऋतिक रौशन की फिल्म 'कोई मिल गया' के अंतरिक्ष से उतरे, बोरी में बंद प्राणी 'जादू' की तरह। फिर भर्रायी हुई आवाज़ में 'जादू' की तरह धूप-धूप पुकारिये। जब ऐसा कर चुकें तो धूप-धूप बोलना भी बंद कर दीजिये और केवल तरसी हुई निगाहों से जाली के पार की दुनिया को देखिये। हो गए न रोंगटे खड़े ? सोचने भर से आप को सन्नाटा आ गया। अब उन औरतों की कल्पना कीजिये जिन्हें 10-12 बरस की आयु से इस घनघोर घुटन में फेंक दिया जाता है।
इसका तर्क ये दिया जाता है कि किसी लड़की या औरत को देख कर पुरुष में कुत्सित भाव जागृत हो सकता है। काम भाव केवल स्त्री को देख कर पुरुष के मन में ही जागृत होता है ? अगर ऐसा है तो अभियुक्त पुरुष पर कार्यवाही की जानी चाहिये। ये तो अभियुक्त को सजा देने की जगह पीड़ित की दुर्गति करना है। फिर काम का भाव सामान्य मानवीय प्रवृत्ति है। ये पुरुष को देख कर स्त्री के मन में भी जागृत हो सकता है। तो क्या पुरुष भी बुर्क़ा, हिजाब, नक़ाब, पर्दा करें ?
वैसे तो किसी सामान्य मदरसे में जा कर वातावरण देखिये तो आप पाएंगे कि वहां तो पुरुष को देख कर पुरुष के मन में जागृत होने का विचार भी चलता है। पाकिस्तान के कराची के मदरसे में एक बार आग लग गयी थी जिसमें किशोर आयु के बच्चे जल कर मर गए। कारण ये था कि उनको वरिष्ठ छात्रों से बचाव के लिए ताला-बंद करके रखा जाता था।
चिड़ियाघर में भी जानवर पिंजरों में रखे जाते हैं मगर ऐसी मनहूस घोर-घुटन उनके नसीब में भी नहीं होती। फिर ये भी है कि उन जानवरों को उनके साथी जानवरों ने इस घुटन पर मजबूर नहीं किया। उस मानसिक दबाव की कल्पना कीजिये जहाँ औरतें अपने ही परिवार, समाज के पुरुषों के दबाव में इस वीभत्सता की स्थिति को स्वीकार कर लेती हैं और चलती-फिरती जेलों की सी हालत में जीती हैं।

शनिवार, 9 जुलाई 2016

अटल बिहारी बाजपेयी जी की कविता के क्रम में मेरी कुछ पंक्तियाँ

हिन्दू जीवन हिन्दू तन-मन रग-रग हिन्दू मेरा परिचय

उपनिषद्-पुराण महाभारत वेदामृत पान किया मैंने 
अपने पग काल-कंठ पर रख गीता का ज्ञान दिया मैंने 
संसार नग्न जब फिरता था आदिम युग में हो कर अविज्ञ
उस कालखंड का उच्चभाल मैं आर्य भट्ट सा खगोलज्ञ 
पृथ्वी के अन्य भाग का मानव जब कहलाता था वनचर 
मैं कालिदास कहलाता तब मेघदूत की रचना कर
जब त्रस्त व्याधियों से हो कर अगणित जीवन मिट जाते थे
अश्वनि कुमार, धन्वन्तरि, सुश्रुत मेरे सुत कहलाते थे


कल्याण भाव हर मानव का मेरे अंतरमन का किसलय 
हिन्दू जीवन हिन्दू तन-मन रग-रग हिन्दू मेरा परिचय




मेरी भृकुटि यदि तन जाये तीसरा नेत्र मैं शंकर का 
ब्रह्माण्ड कांपता है जिससे वह तांडव हूँ प्रलयंकर का
मैं रक्तबीज शिरउच्छेदक काली की मुंडमाल हूँ मैं
मैं इंद्रदेव का तीक्ष्ण वज्र चंडी की खड्ग कराल हूँ मैं 
मैं चक्र सुदर्शन कान्हा का मैं कालक्रोध कल्याणी का
महिषासुर के समरांगण में मैं अट्टहास रुद्राणी का 
मैं भैरव का भीषण स्वभाव मैं वीरभद्र की क्रोध ज्वाल
असुरों को जीवित निगल गया मैं वह काली का अंतराल


देवों की श्वांसों से गूंजा करता है निश-दिन वह हूँ जय 
हिन्दू जीवन हिन्दू तन-मन रग-रग हिन्दू मेरा परिचय





मैं हूँ शिवि,बलि सा दानशील मैं हरिश्चंद्र सा दृढप्रतिज्ञ
मैं भीष्म-कर्ण सा शपथधार मैं धर्मराज सा धर्मविज्ञ
मैं चतुष्नीति में पारंगत मैं यदुनंदन, यदुकुलभूषण 
मैंने ही राघव बन मारे मारीच-ताड़का-खर-दूषण
मैं अजय-धनुर्धन अर्जुन हूँ मैं भीम प्रचंड गदाधारी 
अभिमन्यु व्यूहभेदक हूँ मैं भगदत्त समान शूलधारी 
मैं नागपंचमी के दिन यदि नागों को दूध पिलाता हूँ 
तो आवश्यकता पड़ने पर जनमेजय भी बन जाता हूँ 


अब भी अन्याय हुआ यदि तो कर दूंगा धरती शोणितमय 
हिन्दू जीवन हिन्दू तन-मन रग-रग हिन्दू मेरा परिचय





शत-प्रबल-खड्गरव वेगयुक्त आघातों को मैंने झेला
भीषण शूलों की छाया में मेरा जीवन पल-पल खेला
संसार-विजेता की आशा मेरे ही आगे धूल हुई 
यवनों की वह अजेय क्षमता मेरे ही पग पर फूल हुई
मेरी अजेय असि की गाथा संवत्सर का क्रम सुना रहा
यवनों पर मेरी विजयकथा बलिदानों का क्रम बता रहा
पर नहीं उठायी खड्ग कभी मैंने दुर्बल-पीड़ित तन पर
अपने भाले की धार न परखी मैंने आहत जीवन पर



इतिहास साक्षी दुर्ग नहीं, हैं बने ह्रदय मेरा आलय
हिन्दू जीवन हिन्दू तन-मन रग-रग हिन्दू मेरा परिचय





युग-युग से जिसे संजोये हूँ बाप्पा के उर की ज्वाल हूँ मैं
कासिम के सर पर बरसी वह दाहर की खड्ग विशाल हूँ मैं
अस्सी घावों को तन पर ले जो लड़ता है वह शौर्य हूँ मैं
सिल्यूकस को पददलित किया जिसने असि से वह मौर्य हूँ मैं
कौटिल्यह्रदय की अभिलाषा मैं चन्द्र गुप्त का चन्द्रहास
चमकौर दुर्ग पर चमका था उस वीर युगल का मैं विलास
रणमत्त शिवा ने किया कभी निश-दिन मेरा रक्ताभिषेक
गोविन्द, हकीकत राय सहित जिस पथ पर पग निकले अनेक


वो ज्वाल आज भी धधक रही है तो इसमें कैसा विस्मय
हिन्दू जीवन हिन्दू तन-मन रग-रग हिन्दू मेरा परिचय


बर्मा के बौद्ध भिक्षु पूज्य अशिन बिराथु के चरणों में 


मैं शुद्ध, बुद्ध, चैतन्य-आत्मा अंतर का वैज्ञानिक था 
जो व्योम-ज्वाल बन कर उड़ता जाये ऐसा वैमानिक था 
मैं शांति अहिंसा के कारण महलों को तज कर वन निकला 
मेरे पीछे-पीछे हिंसा से व्याकुल जन-जीवन निकला 
गांधार, चीन, ईरान, स्याम, बर्मा, श्रीलंका आलिंगित 
हर ओर शांति की ध्वजा, हर इक धरती पर मेरे पग चिन्हित 
धीरे-धीरे सारा भूमण्डल ही अनुगामी हो आया 
हर आहत पीड़ा से व्याकुल मानव ने मुझको अपनाया 


तुमने मेरी प्रतिमाओं से जड़वाए अपने शौचालय 
बदला लेने को आतुर हूँ तो है इसमें कैसा विस्मय 

हिंदू जीवन हिंदू तन-मन रगरग हिंदू मेरा परिचय 

तुफ़ैल चतुर्वेदी 

बुधवार, 6 जुलाई 2016

........ख़लीफ़ा अबू बकर अल बग़दादी का ख़लीफ़ा मुस्तअसिम के पथ पर गमन

मुहावरे भाषा के बढे हुए नाख़ून होते हैं। लम्बे समय तक एक तय शब्द समूह का प्रयोग कर समाज उसे विशिष्ट अर्थवत्ता, गुणवत्ता, मारकता प्रदान करता है। मुहावरों का प्रयोग घने अन्धकार में बिजली की कौंध की तरह होता है जिनसे दूर तक अर्थ स्पष्ट हो जाता है। इन्हीं मुहावरों में से एक बुरी मौत मरने के लिए '....... की मौत मरना' है। मौत सदैव ही अप्रिय अरुचिकर घटना है। उसे न तो महिमामण्डित करने का कुछ अर्थ होना चाहिए न उसे वीभत्स बनाने का कोई कारण, फिर भी समाज में इस सिलसिले के शहीद, हुतात्मा, बलिदानी और ....... की मौत मरना जैसे शब्द और मुहावरे चलन में हैं तो इसका कोई गंभीर कारण अवश्य होना चाहिये।


बंधुओ ! इसका कारण समाज के हित-अहित यानी समष्टि के हित-अहित का विचार है। भयानक बर्फीली दुर्गम चोटियों पर.…… भीषण गर्मी से झुलसते हुए बीहड़ रेगिस्तान में.……अथाह-अगाध समुद्र में .…… देश की रक्षा करते हुए शत्रु की गोली खा कर मरने वाला सैनिक कोई बहुत शांत, सहज मौत नहीं मरता। उसे भी वही पीड़ा होती है जो संभवतः आई एस आई एस के सरगना अबू बकर अल बगदादी को हुई होगी मगर हर मृतक सैनिक को प्रत्येक राष्ट्र इसी कारण शहीद कहता है, समाज उसकी अंत्येष्टि में इसी लिए उमड़ पड़ता है कि उसके प्राण देश की रक्षा में गए हैं। ये मृत्यु को आरामदेह तो नहीं बनता मगर देश के लिये प्राण देने की प्रेरणा देता है। इसी तरह एड़ियां रगड़-रगड़ कर एकाकी मरना आई. सिस. के सरगना अबू बकर अल बगदादी जैसे लोगों का भाग्य होता है।


अबू बकर अल बगदादी का मरना कोई बहुत बड़ी या प्रमुख घटना नहीं है। ऐसे लोग ऐसी ही मौत मरते हैं। अफगानिस्तान की पहाड़ियों में दुर-दुर करते जीवन से भाग कर पाकिस्तान में बीबियों और पोर्नोग्राफी की सी.डी. के ढेर में छिप कर रह रहे ओसामा को मछलियों की चीर-फाड़ नसीब हुई। इस या इसके जैसे लोग इसी मृत्यु को प्राप्त होते हैं। विशेष बात उसकी दुर्गति होने के पीछे छिपे कारण हैं। आइये उन पर विचार किया जाये।



ईराक में टिगरिस नदी के किनारे बसा समारा नगर एक समय में अब्बासी खिलाफत का केंद्र रह चुका है। इसी नगर के देहाती क्षेत्र में बगदादी पैदा हुआ। शांत स्वभाव का बगदादी अपने अध्ययन के समय एकाकी रहने वाला था। अल बगदादी में अपने शुरुआती जीवन में फुटबॉल के लिए एक जुनून था। 2003 तक वह बगदाद के पश्चिमी किनारे पर एक निर्धन बस्ती में स्थानीय मस्जिद से जुड़े एक छोटे से कमरे में रहता था। वहां उसे शांत, कम बोलने, कम मिलने-जुलने वाला माना जाता था। अपने काम से काम रखने वाला अबू बकर अल बगदादी अकेले समय बिताता था।



यहाँ रहते हुए उसके जीवन में एक बदलाव का क्षण आया और उसने बगदाद के इस्लामी विश्वविद्यालय में प्रवेश ले लिया। इस्लामी विश्वविद्यालय से उसने बी.ए., एम.ए.और इस्लामी अध्ययन में पी.एच.डी. प्राप्त की। यही शिक्षण वो कारण था जिसने अबू बकर अल बगदादी के जीवन में इतना बड़ा परिवर्तन ला दिया। सामान्य शांत रहने वाला व्यक्ति, फुटबॉल के लिए दीवाना जिहाद का दीवाना बन गया। उसकी चिंत्तन-प्रणाली बदल गयी और वो पेले, मैरिडोना, बैकम, लोथार मथायस जैसे विश्व प्रसिद्ध फुटबॉल खिलाडियों की जगह अबू बकर, उमर फारूक जैसे इस्लामी खलीफाओं के लिए दीवाना हो गया। उसके जीवन के अन्य सारे रस सूख गए। क़त्ताल फी सबीलिल्लाह……जिहाद फी सबीलिल्लाह उसका जीवन दर्शन हो गया। अमुस्लिमों के लिए घृणा से भरी बातें, जीवन शैली उसका ध्येय बन गयी। क़ुरआन और हदीसों का ये दर्शन उसका जीवन दर्शन बन गया।


ओ मुसलमानों तुम ग़ैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { 9-123 }
और तुम उनको जहां पाओ क़त्ल करो { २-191 }
काफ़िरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { 8-39 }
ऐ नबी ! काफ़िरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो. उनका ठिकाना जहन्नुम है { 9-73 और 66-9 }
अल्लाह ने काफ़िरों के रहने के लिये नर्क की आग तय कर रखी है { 9-68 }
उनसे लड़ो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं, न आख़िरत पर; जो उसे हराम नहीं समझते जिसे अल्लाह ने अपने नबी के द्वारा हराम ठहराया है. उनसे तब तक जंग करो जब तक कि वे ज़लील हो कर जज़िया न देने लगें { 9-29 }
मूर्ति पूजक लोग नापाक होते हैं { 9-28 }
जो कोई अल्लाह के साथ किसी को शरीक करेगा, उसके लिये अल्लाह ने जन्नत हराम कर दी है. उसका ठिकाना जहन्नुम है { 5-72 }
तुम मनुष्य जाति में सबसे अच्छे समुदाय हो, और तुम्हें सबको सही राह पर लाने और ग़लत को रोकने के काम पर नियुक्त किया गया है { 3-110 }



इस चिंतन को कार्यान्वित करने के लिए उसने 2003 में ईराक में अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद सुन्नी लड़ाकों का समूह बनाया और उसकी शरीयत समिति के प्रमुख के रूप में कार्य किया। 2006 में उसने अपने सुन्नी लड़ाकों के समूह को मुजाहिदीन शूरा परिषद (एम.एस.सी.) में मिला दिया। 2006 में इराक के इस्लामी राज्य {आई.सिस.} के रूप में एम.एस.सी. के नाम बदलने के बाद, अल बगदादी आई.सिस. की शरीयत समिति का पर्यवेक्षक और समूह के वरिष्ठ सलाहकार परिषद क एक सदस्य बन गया। ईराक के इस्लामी राज्य {आई.सिस.} को ईराक में अल-कायदा के रूप में जाना जाता है। अल बगदादी को इस्लामी राज्य { आई.सिस. } के नेता अबू उमर अल बगदादी की मृत्यु के बाद 16 मई 2010 को आई.सिस. का नेता बनाया गया। अबू बकर अल बगदादी ने खुद को मुसलमानों की दुनिया के नेता घोषित कर दिया और उसके हिमायतियों ने संसार भर के मुसलमानों को उसका आदेश मानने, उसका समर्थन करने के लिए के लिए कहा। अपनी मृत्यु तक के इस काल में अबू बकर अल बगदादी ने योरोप में इस्लामी खिलाफत स्थापित करने के इरादे जताये। स्पेन को दुबारा मुसलमानों की आधीनता में लाने की बड़ मारी। रोम को इस्लामी केंद्र बनाने की लम्बी हाँकी।


अबू बकर अल बगदादी अक्टूबर 2014 में गठबंधन बलों द्वारा शुरू की तीव्र बमबारी अभियान के कारण गंभीर रूप से घायल हुआ और अब उसकी मौत की सूचना मिली है। इसकी पुष्टि केवल ईरान कर रहा है मगर इसे झूठा मानने का कोई कारण नहीं है, चूँकि आगे-पीछे ये होना ही था। तलवार को जीवन दर्शन मानने वाले तलवार के द्वारा ही मारे जाने के लिए अभिशप्त होते हैं। इसकी पक्की पुष्टि तो तभी संभव है जब खांटी इस्लामी लड़ाकों के प्रिय तरीके से उसका सर काट कर भाले पर घुमाया जाये अन्यथा ऐसे समाचारों की प्रामाणिक पुष्टि कभी संभव नहीं है। 'मर गया और दफना दिया गया' ही ऐसे लोगों का भाग्य है। किसी विश्व-विख्यात नेता के देहावसान की तरह से लाखों लोगों के सम्मिलित होने, लाखों लोगों की शोक-वेदना के साथ उसका अंतिम संस्कार तो होने से रहा बल्कि दफनाते समय भी उसके गिने-चुने हिमायतियों को इसकी आशंका सता रही होगी कि कहीं फिर विमान बम न बरसाने लगें और उनकी हड्डियों का भी कीर्तन न हो जाये।


अबू बकर अल बगदादी ही यजदी समूहों के नरसंहार का आधार था। सोशल मिडिया में इसी के हत्यारों द्वारा शिया समूहों, ईसाइयों, यजदियों की गर्दनें काटने , मरते हुए लोगों के सरों पर ठोकरें मारते लोगों के पैशाचिक वीडियो बनाये-भेजे गए। ऐसी जघन्य हत्याओं के समय अल्लाहो-अकबर के नारे लगाते लोगों के उन्मादी whatsapp इसी के समूह की करतूतें हैं। शिया, ईसाई, यजदी लड़कियों के जंजीरों में बांध कर बेचने की मंडियां इसी ने लगवायी थीं। जिहाद के विस्तृत दर्शन के रूप में शत्रु पक्ष की स्त्रियों को लौडी { sex slave } बनाया जाना वैसे तो मूल इस्लामी ग्रंथों में ही है मगर इस शताब्दी में इस घोर निंदनीय इस्लामी व्यवस्था का दुबारा चलन इसी की प्रेरणा से हुआ था। मुंबई का आरिब अपने तीन दोस्तों अमन, फहद और साहिम के साथ आई.सिस. के लड़ाकों की यौन-सेवा से तंग आ कर भारत वापस भाग आया। उसके दुर्गति करवा कर लौटने के पीछे 'जिहादियों की हर तरह से खिदमत करनी चाहिए' इसी का दर्शन है।


ये भी संभव है कि उसके जीवित बच जाने की अफवाहें उड़ाई जाएँ। ये भी संभव है कि वो इस हमले में जीवित बच जाये मगर उसके नसीब में आगे-पीछे यही निन्दित मृत्यु है। भारतीय परम्परा में मृतक सम्मान पाने का अधिकारी है। हमारा समाज दुष्ट से दुष्ट व्यक्ति का उसके देहांत के बाद सम्मान करता है या चुप लगा जाता है, मगर इस सामान्य-शांत जीवन जीने वाले व्यक्ति का जिस उपद्रवी विचारधारा के कारण रूपांतरण हुआ है उसकी भर्त्सना, निंदा न करने से उसे बढ़ावा मिलता है। ऐसे महादुष्टों की और उन्हें उपजाने, पनपाने वाली विचारधारा की भर्त्सना आवश्यक है। एक-आध दिन में ओसामा बिन लादेन जी के मानसिक सम्बन्धी दिग्विजय जी सार्वजनिक मंच पर असह्य वेदना दिखाते हुए प्रकट होने ही वाले होंगे। उनके निंदा के लिए भी तैयार रहिये।


तुफैल चतुर्वेदी