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रविवार, 25 अक्टूबर 2015

न्यूयार्क में मोदी जी के भाषण को सुनने के लिए इकट्ठी हुई भीड़ में राजदीप सरदेसाई के साथ हुई झूटी धक्का-मुक्की

.........................................................शठे शाठ्यम समाचरेत................

मीडिया में कुछ दिन से हा-हा-कार बल्कि हू-हू-कार मचा हुआ है. कुछ लोग ऐसे चीख-चिल्ला रहे हैं जैसे कि मधुमक्खी का छत्ता पीछे पड़ गया हो तो कुछ लोग इस कथकली नृत्य को देख कर आनंदित हो रहे हैं. घटना ये कही जा रही है कि न्यूयार्क में राजदीप सरदेसाई के साथ हुई धक्का-मुक्की हुई है और मीडिया के कई हिस्सों में इसे लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ पर प्रहार, चौथे खम्बे को गिराने की कोशिश बताया जा रहा है. मैं फिर ये मुक़दमा पंचों के सामने यानी जनता की अदालत में ले जाना चाहता हूँ.

                        किसी भी चैनल के पास संभवतः इस घटना की आवाज सहित रिकॉर्डिंग नहीं है. अतः उस घटना को विभिन्न टी. वी. चैनलों, फेस-बुक इत्यादि पर अपनी-अपनी विवेचना के साथ दिखाया जा रहा है. बिना इस बात को देखे कि घटना के बारे में किसका क्या मत है, आइये तटस्थ भाव से घटना की विवेचना करें. रिकॉर्डिंग दिखा रही हैं कि न्यूयार्क में मोदी जी के भाषण को सुनने के लिए इकट्ठी हुई भीड़ में भारतीय प्रेस के लोग घूम रहे हैं. वीडिओ में राजदीप भीड़ में लोगों से कुछ बात करते हुए दिखाई दे रहे हैं. भीड़ में से किन्हीं सज्जन ने पलट कर कुछ कहा और राजदीप भड़क कर उन सज्जन पर टूट पड़े. उन्हें धक्का दिया. कुछ धक्का-मुक्की के दृश्य हैं. कृपया ध्यान से देखिये सारे दृश्य राजदीप के टूट पड़ने और हंगामा करने के हैं. ये क्लिपिंग यहीं ख़त्म हो जाती है.

              सामान्य तर्क-बुद्धि यही कहती है कि राजदीप ने नरेंद्र मोदी जी जब अमरीका जा कर विश्व के सामने भारत की ब्रांडिंग कर रहे थे, कुछ ऐसा कहा होगा जिस पर उन सज्जन ने प्रति-प्रश्न किये होंगे. जिस पर राजदीप भड़क गए होंगे. भारत में जनतंत्र का ये तथाकथित चौथा स्तम्भ स्वयं को किसी भी जवाबदेही से ऊपर समझता है. इसके लगुए-भगुए तक चक्रवर्ती सम्राटों से भी अधिक दर्प के अधिकारी, हर विषय के ब्रह्मत्व की हद तक जानकार, स्वयं को रावण जितने शक्तिशाली मानने वाले और रावण जितने ही अहंकारी होते हैं. बंधुओ ये अकारण भी नहीं है. अपने कैरियर की शुरुआत में मुंबई की चालों,  दिल्ली के जमुनापार की बस्तियों से बसों में लटक कर ऑफिस आने वाले लोग, 15-20 साल में 50-50 करोड़ के बंगलों में रहने के क्षमता वाले हो जायेंगे तो ये बिलकुल स्वाभाविक है कि अहंकार प्रचंड हो ही जायेगा. इनमें से कई महापुरुषों के कैरियर की शुरुआत ..." मैं गन्ने के खेत में शौच के लिए गयी थी और..." लिखने से हुई थी और अब ये भारत की जनता को स्पर्श करने वाले हर विषय को मनमानी दिशा देने का प्रयास करते हैं. इनके मन में देश को अपने हिसाब से चलाने के एजेंडे होते हैं. ये मानते ही नहीं बल्कि जानते भी हैं कि इनके पास देश, समाज, व्यक्ति सभी के हर दर्द की दवा है. 
                                                                                       न्यूयार्क में ही एक अन्य भारतीय पत्रकार ने अपने मोबाइल के स्क्रीन पर मोदी जी की फोटो निकाली और राह चलते गोरों से पूछना शुरू किया " क्या आप इन्हें जानते हैं " लोगों के उत्तर नहीं में आये. इसके बाद उन्होंने टिप्पणी ' नरेंद्र मोदी की अमरीका यात्रा कुछ नहीं है केवल मीडिया को मैनेज किया गया है, उन्हें अमरीका के लोग जानते तक नहीं हैं ". इस तरह अगर आप भी बराक ओबामा या संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव का फोटो ले कर दिल्ली में निकल जाएँ और लोग न पहचानें तो इसका मतलब सिर्फ इतना है कि जिन लोगों से पूछा गया है उनका वास्ता इन प्रतिष्ठित लोगों से नहीं पड़ता. इससे न तो बराक ओबामा का महत्व काम होता है न नरेंद्र मोदी जी का. मगर भारतीय पत्रकारिता हद दरजा गैरजिम्मेदार है. इन्हें इसका भी ध्यान नहीं रहा कि यहाँ नरेंद्र मोदी की बखिया उधेड़ने का मतलब भारत की बखिया उधेड़ना होगा.
                                                                                   आप सबको अमरीका में घटी 9-11 की घटना याद होगी. कृपया याद करें कि आप में से कितने लोगों ने भयभीत अमरीकी नागरिकों के रोने-चिल्लाने के दृश्य देखे हैं ? जिस दिन ये घटना हुई थी, भागते लोगों की केवल एक स्टिल फोटो टी वी पर आई थी और उसके बाद वो फोटो अमरीका के टी वी चैनलों पर दुबारा नहीं दिखाई दी. ऐसा नहीं हो सकता कि अमरीकी नागरिक इस वज्रपात पर व्याकुल नहीं हुए होंगे ? डरे नहीं होंगे ? रोये नहीं होंगे ? अमरीका में प्रेस पर पाबन्दी भी संभव नहीं है. ये मीडिया का स्वतंत्र निर्णय था कि अपनी कमजोरी दुनिया को नहीं दिखाएंगे. आतंकवादी हमले करते ही डराने के लिए हैं और हमारे घबराहट दिखाने से उनको लक्ष्य में सफलता मिलती दिखाई देगी. इसकी तुलना भारतीय विमान अपहरण के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री पर दबाव बनाने के लिए मिडिया द्वारा अपहृत लोगों के परिवारी जनों की लगातार हाय-दुहाई को दिखाने से कीजिये. यही मीडिया के लोग अपहृत लोगों के परिवारी जनों को ले कर प्रधानमंत्री निवास पर पहुंचे. इन्हीं ने आतंकियों को छोड़ने का दबाव बनाया और फिर यही प्रधानमंत्री की आलोचना में लग गये. मुंबई में ताज होटल में छिपे आतंकियों को मारने के लिए हैलिकॉप्टरों से कमांडो उतारे जाने की बरखा दत्त द्वारा लाइव रेकॉर्डिंग दिखाना याद कीजिये. कमांडो उतारे जाने की सूचना आतंकियों को तुरंत पाकिस्तान में बैठे उनके आकाओं ने टी वी चैनल देख कर दी और जिसके कारण कमांडो मारे भी गये 

                  राजदीप भारतीय मीडिया में नरेंद्र मोदी जी के धुर विरोधी माने जाते हैं. नरेंद्र मोदी जी के पहले मुख्यमंत्रित्व के काल में 2002 में हुए दंगों को ले कर बहुत मुखर रहे हैं. गुजरात के तीनों चुनावों में न केवल राजदीप बल्कि मीडिया के लगभग सारे प्रमुख लोग मोदी जी के हारने की भविष्यवाणी भी करते रहे हैं. गुजराती समाज को मोदी जी के विरोध में वोट देने के लिए उकसाते रहे हैं. हर बार मुंह की खायी मगर इस हद तक निर्लज्ज हैं कि इनमें से किसी के फूटे मुंह से कभी भी ये नहीं निकला कि हमने गलत किया. मीडिया समाज की आँख और कान कहा जाता है मगर राजदीप या इनके जैसे लोग अपने काम को करने की जगह केवल मुंह बन गए हैं. मुंह भी ऐसा जिसमें कोढ़ हो गया हो / बवासीर हो गयी हो. 
ऐसा व्यवहार समाज में कोई एक व्यक्ति करेगा तो समाज उसे पागल समझ कर एक किनारे लगा देगा और आगे बढ़ जायेगा मगर ये तो संस्थान है और इसकी उद्धतता की कोई सीमा नहीं है. इसकी किसी के प्रति जवाबदेही नहीं है. चक्रवर्ती सम्राट भी न्याय से बंधे हुए होते थे. राजगुरु का कथन उनके लिए आदेश था मगर ये लोग चक्रवर्ती सम्राट, राजगुरु सब कुछ एक साथ हैं. 

                                                                                  देश में किसी भी अन्याय की जाँच की प्रणाली है. उसी का अनुसरण गुजरात के दंगों के दंगों के लिए भी हुआ है. स्वतंत्र न्यायालय, जाँच आयोग ने बरसों जाँच की है और नरेंद्र मोदी जी को किसी भी दंगे के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया. जनता ने भी 3-3 बार उनके बेदाग होने की पुष्टि की है. अब तो सारे राष्ट्र ने नरेंद्र मोदी जी को मुकुट-मणि बना लिया मगर इस चौथे स्तम्भ के ये लोग स्वयं को हर न्यायालय से ऊपर समझते हैं. ये मोदी विरोध में घृणा की हद तक चले गए हैं. इनका बस चले तो ये मोदी को असफल करवाने के लिए देश पर चीन से हमला करवा दें. आतंकवादियों की क्लिपिंग बनाने के लिए स्वयं उनके लिए निशाने तय कर दें. आपको कुछ वर्ष पूर्व गुवाहाटी में एक लड़की के कपडे फाड़ कर उसको लगभग निर्वस्त्र कर देने की घटना की वीडिओ क्लिपिंग का ध्यान होगा. जिस लड़के ने ये क्लिपिंग बनाई थी वो स्वयं इस घटना के लिए जिम्मेदार था और लोगों को भी शामिल होने के लिए उकसा रहा था. 

                                                       मगर इस मानसिकता को बनाने के लिए बंधुओ केवल वो ही जिम्मेदार नहीं हैं. इसके जिम्मेदार हम लोग भी हैं. यहाँ एक सामान्य घटना की चर्चा उपयुक्त होगी. संभवतः 1998 या 99 की बात है. नोएडा में इतनी भीड़ नहीं हुई थी. मैं नॉएडा अथॉरिटी के एक वरिष्ठ अधिकारी के पास बैठा हुआ था. अचानक एक बिल्कुल फटीचर से लड़के ने अपने जूते की नोक मार कर दरवाजा खोला. मैं ये देख कर हतप्रभ रहा गया कि मेरे मित्र अधिकारी उस लड़के के इस व्यवहार पर आक्रोश प्रकट करने की जगह उसके साथ सोफे पर जा बैठे. कुछ देर बाद जब वो लड़का चला गया तो मैंने उनसे इस असभ्यता को पी जाने का कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि ये पत्रकार है. साहब मैं क्या कह सकता था. इस घटना के कुछ वर्ष बाद उसका दबदबा नोएडा अथॉरिटी में और बढ़ गया और उसने दैनिक अखबार निकालना शुरू कर दिया. 

हम लोग हर वर्ष मुशायरा करते हैं. एक साल वो लड़का भी जो अब दैनिक समाचार पत्र का मालिक और संपादक था, मुशायरे में आया. मैं व्यवस्था में लगा हुआ था, मुझे किसी साथी ने सूचना दी कि मुल्ला जी हूटिंग कर रहे हैं. मैं और मेरे दो-तीन मित्र एक सामान्य शालीन ढंग का प्रयोग करते हुए उनके पास जा कर बैठ गये. वो हमें  देख कर 2-3 मिनिट तो शांत रहे फिर हूटिंग करने लगे. उनसे निवेदन किया गया अगर आपको नहीं सुनना है तो न सुनें मगर हमें तो सुनने दें. इस पर वो बौखला कर बोले आप कहें तो मैं मुशायरे से उठ कर चला जाऊँ. मेरे एक साथी ने उन्हें रोका और कहा आप क्यों जाते हैं हम ही आपके जूते लगा कर बाहर फिकवाए देते हैं. मित्रो वो दिन है और आज का दिन है, वो मुल्ला जी जब भी कहीं दिख जाते हैं सदैव पहले नमस्ते करते हैं और खींसे निपोरते हैं.

समस्या ये है कि भारतीय राजनेता और अधिकारी गण अच्छे खासे गड़बड़ रहे हैं. उनकी विवशता है कि वो अपनी सार्वजनिक आलोचना से डरते हैं. हम लोग तो संस्था के लोग थे. एक उद्धत पत्रकार हमारा क्या बिगाड़ सकता था. अधिकतम लिख देगा कि हम संस्था का पैसा खा गये तो ये विषय हमारे घर का है. संस्था जाने हम जानें. सो ऐसी अदभुत पत्रकारिता का यही हल हो सकता है जो उन अमरीकी सज्जन ने किया बल्कि बहुत कम किया. न वहां के अधिकारी गण दयनीयता की हद तक पत्रकारों के दबैल हैं और न वहां के राजनेता इतने रीढ़विहीन हैं. ऐसा ही अभ्यास उन अमरीकी महानुभावों को था और उन्होंने उपयुक्त और स्तुत्य व्यवहार किया.

तुफ़ैल चतुर्वेदी                                             

बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

पेशावर के स्कूल पर आतंकी हमले और सैकड़ों बच्चों के मारे जाने की छान-फटक

                             बहिश्तो-जा कि मुल्ला-ए-न बायद ज़ि मुल्ला शोरो-गोगा-ए-न बायद 
                           { स्वर्ग उसी जगह है जहाँ मुल्ला नहीं हैं और उनका शोर सुनाई नहीं देता-दारा शिकोह }


दक्षिण एशिया यानी अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्ला देश, भारत की स्थिति दिनों-दिन खराब होती जा रही है. अफगानिस्तान से अमरीका के हटने के बाद वहां हमारी उपस्थिति, पाकिस्तान के उत्पात, पाकिस्तान, बांग्ला देश में इस्लामी जिहादियों की हिंसा के तांडव, अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमले, इन घटनाओं पर छायी चुप्पी, गहरी चिंता में डाल रहे हैं. ये क्षण विस्तृत योजना बनाने और उन पर तब तक अमल करने का है जब तक वांछित परिणाम न आ जाएं।

सामान्य जानकारी ये है कि 1979 में रूस ने अफगानिस्तान के तत्कालीन नेतृत्व के निमंत्रण पर अफगानिस्तान में अपनी सेनाएं भेजी थीं. अमरीका वियतनाम की हार के कारण आहत था और बदला लेने की ताक में था. उसने पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जिया-उल-हक़, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात के नेतृत्व को तैयार किया. जिसके कारण धरती का ये भाग कराह रहा है. यहाँ सबसे बड़े कारण का जिक्र नहीं होता कि इन सब कारकों को इकट्ठा तो अमरीका की बदले की भावना ने किया मगर इन सबको मिला कर जो विषैला पदार्थ बना उसे टिकाने वाला, जोड़े रखने वाला Bainding force क्या था ? एक ऐसे देश में लड़ाई के लिए जिससे उनकी सीमाएं भी नहीं लगतीं, अपने खरबों डॉलर झोंकने के लिए सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात क्यों तैयार हो गए ? अगर ये इस्लाम नहीं था तो वो कारण क्या था ?

सबको स्वीकारने, सबको जीवन का अधिकार देने, सबको अपनी इच्छानुसार उपासना करने, सबको स्वतंत्र सांस लेने का अधिकार देने वाली समावेशी मूर्तिपूजक, प्रकृतिपूजक संस्कृति जिसे इस भाग में हिन्दू संस्कृति कहा जाता है, ही विश्व की मूल संस्कृति है. विश्व भर में एक ईश्वर या अल्लाह जैसा कुछ मानने वाले सेमेटिक मजहबों ने इसी के हिस्से तोड़-तोड़ कर अपने साम्राज्य खड़े किये हैं. निकटतम अतीत में हमसे पाकिस्तान और बांग्ला देश छीने गए हैं. जिन दिनों पाकिस्तान बनाने का आंदोलन चल रहा था, मुस्लिम नेता शायर इकबाल की पंक्तियाँ बहुत पढ़ते थे. इकबाल की 'शिकवा' जवाबे-शिकवा' नामक दो लम्बी नज्मों में इस्लाम का मूल दर्शन लिखा हुआ है. उसकी एक बहुत चर्चित पंक्ति है 

" तू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों पर" 

शाहीं यानी बाज़ जो आकाश में सारे पक्षियों से ऊपर उड़ता है. स्वतंत्र जीवन जीता है. पहाड़ों में रहने वाले, छोटी चिड़ियों का झपट्टा मार कर शिकार करने वाले, उनका मांस नोच-नोच कर खाने वाले बाज़ के जीवन-दर्शन को इस्लामी नेतृत्व ने अपने समाज के लिए आदर्श माना। इक़बाल का ही इसी सिलसिले का एक शेर और उद्धृत करना चाहूंगा।

जो कबूतर पर झपटने में मजा है ऐ पिसर { बाज अपने बेटे से कह रहा है }
वो मजा शायद कबूतर के लहू में भी नहीं  

पुरानी कहावत है कि नाग पालने वाले नागों से डँसे जाने के लिए अभिशप्त होते हैं. जिस रूपक की सभ्य समाज उपेक्षा करता, घृणा करता, उसे इस्लामियों ने अपना प्रेरणा-स्रोत माना। अब ये बाजों के झुण्ड कबूतर पर झपटने का मज़ा अधिक पाने के लिए पेशावर में उतर आये हैं. यहां थे की जगह हैं प्रयोग जान-बूझ कर कर रहा हूँ कि ये कोई नई घटना नहीं है. इस्लामी इतिहास को देखें तो मुहम्मद जी ने अपने साथियों के साथ उत्तरी अरब में रहने वाले एक यहूदी कबीले बनू कुरैजाह पर आक्रमण किया.  25 दिन तक युद्ध करने के बाद यहूदियों के इस कबीले ने आत्मसमर्पण कर दिया। इस्लामी सूत्रों के हवाले से एक औरत सहित सारे पुरुषों के गले धड़ से अलग कर दिए गये. अन्य सूत्रों के अनुसार यहूदियों के 400 से 900 पुरुषों के गले काट डाले गए जिनमें बच्चे भी थे. भारत में दसवीं पादशाही गुरु गोविन्द सिंह के दो बेटे साहबज़ादे जोरावर सिंह, साहिबजादे फतह सिंह मुगल नवाब के काल में काजी के फतवे पे दीवार में चुनवा दिए गए थे. 7 साल के बच्चे वीर हकीकत राय की मसलमान न बनने के कारण बोटियाँ नोच ली गयी थीं. भारत में इस तरह की घटनाओं के तो मुस्लिम इतिहासकारों के स्वयं लिखित असंख्य वर्णन मिलते हैं. 2004 में रूस के बेसलान नगर में इस्लामी आतंकवादियों ने एक स्कूल पर कब्ज़ा कर 777 बच्चों सहित 1100 लोगों को बंधक बना लिया था. 3 दिन चले इस संघर्ष में 186 बच्चों सहित 385 बंधक मारे गए.  

ये इस्लामियों का गैरइस्लामी लोगों के साथ सामान्य व्यवहार है. आइये पेशावर की घटना पर लौटते हैं. पेशावर में अरबी नहीं बोली जाती। पेशावर से अरबी बोलने वाले क्षेत्र सैकड़ों किलोमीटर दूर हैं. अपने क्षेत्र से वहां अरबी बोलने वाले मारने-मरने क्यों आये ? छोटे-छोटे बच्चों की आँखों में, सर में गोलियां मारने वाले केवल जुनूनी हत्यारे नहीं हो सकते ? इन लोगों की मग्ज-धुलाई, वो भी इस तरह कि हत्यारे जान लेते हुए अपनी जान देने के लिए आतुर हो जाएं, कोई सामान्य षड्यंत्र का परिणाम नहीं हो सकता. भारत का अरीब और उसके कुछ साथी जिहाद के लिए सीरिया क्यों गए ? नाइजीरिया के स्कूल में रात के दो बजे आग लगा कर ग्यारह साल से अट्ठारह साल के चालीस बच्चों को जला कर क्यों बोको-हराम के लोगों ने मार डाला ?

ये हत्यारे आप-मुझ जैसे पहनावे वाले, खान-पान वाले लोग हैं मगर इनका मानस बिलकुल अलग है. दिन में पांच बार एक विशेष प्रकार के अराध्य की नमाज़ पढने वाले, हर नमाज़ में एक उंगली उठा कर गवाही देने वाले " अल्लाह एक है, उसमें कोई शरीक नहीं, मुहम्मद उसका पैगम्बर है", चौबीसों घंटे स्वयं को शैतानों से भरे समाज में मानने-समझने वाले अगर ऐसा करने पर उतारू हो जाएँ तो ये कोई असामान्य बात नहीं है. ये "कत्ताल फ़ी सबीलल्लाह जिहाद फ़ी सबीलल्लाह" की सामान्य परिणिति है. "अल्लाह की राह में क़त्ल करो-अल्लाह की राह में जिहाद करो" पर अटूट विश्वास का परिणाम है. 

इस सोच की नींव हिलाये बगैर ये दर्शन कैसे ध्वस्त होगा ? सदियों से सभ्य समाज ने इस विषैली विचारधारा को नजरअंदाज किया है. किसी कैंसर-ग्रस्त व्यक्ति के ये मानने से ' मैं स्वस्थ हूँ' वो स्वस्थ नहीं हो जाता. पाकिस्तान का जन्म मुसलमानों ने स्वयं को काफिरों से श्रेष्ठ मानने, सदियों तक अपने गुलाम रहे हिन्दुओं के प्रजातंत्र के कारण स्वयं पर हावी हो जाने की संभावना से बचने के लिए किया था. इसी अनैतिहासिक और ऊटपटांग दर्शन के कारण उन्होंने पाकिस्तान की शिक्षा प्रणाली भी ऐसी ही मूर्खतापूर्ण बनायी. अब इस विषवृक्ष के फल आ गए हैं. इस विचारधारा को माशाअल्लाह और इंशाअल्लाह जप कर ढेर नहीं किया जा सकता. 

इसके लिए मानव सभ्यता के पहले चरण " सभी मनुष्य बराबर हैं " का आधार ले कर इसके विपरीत हर विचार को तर्क, दंडात्मक कारवाही से नष्ट करने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है. इसे परास्त बल्कि नष्ट करने के लिए वैचारिक स्तर पर, उन देशों से जहाँ-जहाँ इसके विष-बीज मौजूद हैं, प्रत्येक स्तर पर लड़ाई लड़नी पड़ेगी. जनतंत्र के सामान्य सिद्धांत " प्रत्येक मनुष्य बराबर है, सभी के अधिकार बराबर हैं. जीवन का अधिकार मौलिक अधिकार है " को विश्व का दर्शन बनाना पड़ेगा। इसके विपरीत विचार रखने वाले व्यक्ति-समूह-समाज का हर प्रकार से दमन करना पड़ेगा. ये जितना पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्ला देश के लिए आवश्यक है उतना हमारे लिए भी आवश्यक है.

पाकिस्तानी पड़ौसियो ! मैं इस दारुण दुःख में आपके साथ हूँ और आपके गम में रोना चाहता हूँ मगर मैं क्या करूँ मेरी आँखे तो बारह सौ साल से लहू रो रही हैं. तो ऐसा करता हूँ मैं इस घटना पर उतना ही दुःख मना लेता हूँ जितना मुंबई में ताज होटल और यहूदी धर्मस्थल पर हुए आतंकी आक्रमण के समय आपने मनाया था 

तुफैल चतुर्वेदी        

सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

संसार के अराष्ट्रीयकरण में मदरसों की भूमिका पर एक टिपण्णी

27 अगस्त के समाचारपत्रों में एक सामान्य सा समाचार है। अमेरिका ने पाकिस्तान स्थित ख़तरनाक हक़्क़ानी नेटवर्क के शीर्ष नेता अब्दुल अज़ीज़ हक़्क़ानी को वैश्विक आतंकवादी घोषित किया है। अज़ीज़ हक़्क़ानी ने अपने भाई बदरुद्दीन हक़्क़ानी की मौत के बाद अल क़ायदा से जुड़े हक़्क़ानी नेटवर्क में नेतृत्व को संभाला था। इसके पते-ठिकाने के बारे में जानकारी देने वाले को 50 लाख डॉलर यानी 33 करोड़ रुपये इनाम में मिलेंगे। इस संगठन के अन्य नेता जलालुद्दीन हक़्क़ानी, सिराजुद्दीन हक़्क़ानी, नसीरुद्दीन हक़्क़ानी इत्यादि हुए हैं। अफ़ग़ानिस्तान-पाकिस्तान में इस संगठन की प्रभावी उपस्थिति है। भारत के ख़िलाफ़ इस संगठन ने अफ़ग़ानिस्तान में कई घातक आतंकी गतिविधियाँ की हैं जिसमें काबुल स्थित भारतीय दूतावास में 2008 में हुआ बम-विस्फोट भी है। जिसमें 58 लोग मारे गए थे। इन सब नामों में एक बात कॉमन है और वो हक़्क़ानी है। ज़ाहिर है किसी भी ऐसे व्यक्ति, संस्थान, राष्ट्र के लिये जो इस विषैले नेटवर्क से निबटना, उसकी योजना बनाना चाहता है, के लिये इसे जानना ज़रूरी है कि इन नामों में हक़्क़ानी क्यों है।

पाकिस्तान के अफगानिस्तान से लगते हुए उत्तर-पश्चिमी प्रान्त में ख़ैबर दर्रे की पूर्व दिशा में कोई दो घंटे की दूरी पर उत्तरी वज़ीरिस्तान में हक़्क़ानी एक देवबंदी विचारधारा का मदरसा है। इस मदरसे में अनुमानतः 3000 से 5000 लड़के क़ुरआन, हदीस, इस्लामी तारीख़ जैसे विषय पढ़ते हैं। मुहम्मद जी का कहा गया जो उनके अनुसार अल्लाह का भेजा हुआ ज्ञान था, 'क़ुरआन' के रूप में संकलित है और यहाँ उसका विषाद अध्ययन किया जाता है। मुहम्मद जी का बिताया हुआ जीवन जो हदीसों में संकलित है, यहाँ उसकी पढाई भी होती है। इन दोनों पुस्तक समूह के अध्ययन के आधार पर इस्लामी दृष्टि से व्यवस्था देने के लिये यहाँ मुफ़्ती भी तैयार किये जाते हैं। मुफ़्ती वो इस्लामी मुल्ला है जो फ़तवे देने का अधिकारी है। फ़तवे; पाजामा कितना नीचा पहनना जायज़ है, दाढ़ी कितनी बड़ी रखनी जायज़ है, जिस बकरी के साथ सम्भोग किया है उसकी क़ुरबानी जायज़ है या नहीं से ले कर किसी इस्लामी मुल्क में ग़ैर मुस्लिम जीने के अधिकारी हैं कि नहीं हैं से होते हुए जिहाद आदि इस्लाम को स्पर्श करने वाले हर विषय पर दिए जाते हैं। कृपया यहाँ ये भी ध्यान रखें कि किसी व्यक्ति, समाज, राष्ट्र का मुसलमान न होना तो विशेष रूप से इस्लाम का विषय होता है अतः फ़तवे वस्तुतः संसार के हर विषय पर दिए जाते हैं। इस मदरसे में पाकिस्तान के अलावा अफगानिस्तान, उज़बेकिस्तान, क़ज़ाक़िस्तान, ताज़िकिस्तान यहाँ तक कि अरबी देशों के बच्चे भी पढ़ते हैं। यहाँ के पढ़े हुए छात्र ही अपने नाम के साथ हक़्क़ानी लगते हैं।

इस मदरसे में हथियार चलना नहीं सिखाया जाता मगर जिस वहाबी-देवबंदी विचारधारा की उपज इस्लाम का विश्वव्यापी आतंकी रूप है पाकिस्तान में उसके ये सबसे बड़े केन्द्रों में से एक है। काफ़िर वाजिबुल-क़त्ल, क़त्ताल फ़ी सबीलिल्लाह, जिहाद फ़ी सबीलिल्लाह का हिंसक दर्शन यहीं सिखाया जाता है। पाकिस्तान में ऐसे हज़ारों मदरसे हैं जिनमें पाकिस्तानी सरकार के आंकड़ों के अनुसार दस लाख से अधिक बच्चे पढ़ रहे हैं। ऐसे ही एक पाकिस्तानी मदरसे के मीठी, शरारती, मुस्कुराती आँखों वाले 6-7 साल के छात्र का वीडिओ व्हाट्सएप, फ़ेसबुक इत्यादि सोशल मिडिया में बहुत तेज़ी से फैल रहा है। बच्चे से एक महिला पूछ रही है 'बड़े हो कर तुम क्या बनोगे' बच्चा जवाब देता है 'शहीद'। कहाँ पर गोली खाओगे, बच्चा सीने पर उंगली रख कर जवाब देता है 'यहाँ पर'। ये बिल्कुल वैसी ही क्रिया है जैसी सामान्य परिवार में किसी मेहमान के आने पर होती है। परिवार के लोग बच्चे को पकड़ कर मेहमान को कोई पोयम या कविता सुनाने के लिये कहते हैं और वो तोतली ज़बान में अटक-अटक कर मेहमान को रटाई गयी कविता सुनाता है। हर बच्चा जो उसे सिखाया जाता है वही दुहराता है यानी मुददा सिखाना है। ऐसे मदरसे ही मानसिक हत्यारों की जन्मस्थली हैं। यहाँ एक बहुत गंभीर बात हमें निश्चित रूप से ध्यान रखनी चाहिये कि इस विचारधारा का प्रारंभिक मदरसा तो देवबंद में है और इसी के कारण इन्हें देवबंदी कहा जाता है। यानी विष-बेल का नाभि-कुण्ड भारत में ही है।


जलालुद्दीन हक़्क़ानी इसी देवबंदी विचारधारा के मदरसे का पढ़ा हुआ है और इसी ने हक़्क़ानी नेटवर्क की स्थापना की है। ओसामा बिन लादेन और अब्दुल्लाह आज़म जैसे दुष्ट आतंकियों ने इसी नेटवर्क के माध्यम से अपना कैरियर शुरू किया था। अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान दोनों देश वैसे ही निर्धन हैं और जिस भाग में ये मदरसा है, वहां ग़रीबी अपनी चरम पर है। इस मदरसे के छात्र ऐसे परिवारों से आते हैं जहाँ माता-पिता बच्चों को दो समय का भोजन भी उपलब्ध नहीं करा पाते और यह विवशता भी उनके माता-पिता को अपने बच्चे इन केन्द्रों में धकेलने पर विवश करती है। यही बच्चे आगे चल कर जलालुद्दीन हक़्क़ानी, सिराजुद्दीन हक़्क़ानी, नसीरुद्दीन हक़्क़ानी, क़साब, नावेद बनते हैं।

ये वैचारिक संघर्ष है और इससे ज़मीनी लड़ाई में निबटने के साथ-साथ विचारधारा के स्तर पर निबटना पड़ेगा ही पड़ेगा। इस विचारधारा को हर तरह से, हर तरफ़ से दबोचना, परास्त करना, कुचलना अनिवार्य है और विचारधारा से लड़ाई दूर तक, देर तक चलने वाली होती है। इसे सतत लड़ना होता है। ये विचारधारा स्वयं को अल्लाह का अस्ली उत्तराधिकारी और अन्य को शैतानी मानती है , उन्हें नष्ट कर देना चाहती है।  इससे निबटने के लिये इसके इस दर्शन, चिंतन को चुनौती देना अनिवार्य है। ये काम बहुत कठिन नहीं है। केवल स्वतंत्र मानवाधिकार, स्त्री-पुरुष के बराबरी के अधिकार, वयस्क मताधिकार यानी जनतंत्र की कसौटी ही इस अधिनायकवादी, मनमानी करती चली आई इस उत्पाती विचारधारा को नष्ट कर देगी। इस के पक्षधर पाकिस्तान-अफ़ग़ानिस्तान में भी बहुत नहीं हैं। वो चुप हैं, कई बार भयभीत लगते हैं मगर इनको चुनौती मिलने पर विरोध करेंगे ही करेंगे। कमाल पाशा ने जब तुर्की में इन दुष्टों का दमन किया था तो परिवर्तन की हवा चलने में 6 माह भी नहीं लगे थे और बदलाव आ गया था। अतः हमारे हित के लिये आवश्यक है कि भारत अफ़ग़ानिस्तान में प्रजातान्त्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार के साथ खड़ा हो। हक़्क़ानी दुष्टों को जड़ से समाप्त करने की हर योजना का अंग बने। हर प्रकार से उसकी सहायता करे।

पाकिस्तान की शक्ति भी पूरी तरह क्षीण करनी होगी। अफगानिस्तान से लगते हुए पख़्तून ख़्वा प्रदेश पर आँखें गड़ाए बैठे पठानों को उसे हस्तगत करने में हर संभव सहायता देनी होगी। जिये सिंध का साथ दे कर उसे स्वतंत्र होने में सहायक होना होगा। बलूचिस्तान की राजशाही के कुचले-दबे लोगों की सहायता कर उनकी पाकिस्तान से अलग होने की पुरानी इच्छा को मूर्त स्वरूप देना होगा। गिलगिल, बाल्टिस्तान, परतंत्र कश्मीर-जम्मू-लद्दाख को ऐसा होते समय वापस झपटना होगा। पाकिस्तान के भरपूर विखंडन से ही भारत के शांत भविष्य का मार्ग निकलता है।

तुफ़ैल चतुर्वेदी         

हिन्दू मंदिरों के धन का अहिन्दू कार्यों में दुरुपयोग

संयुक्त राज्य अमेरिका में स्टीफन नैप नाम के एक विदेशी लेखक की बहुत रिसर्च की हुई पुस्तक " भारत के खिलाफ अपराधों और प्राचीन वैदिक परंपरा की रक्षा की आवश्यकता " प्रकाशित हुई है। ये पुस्तक विदेशों में चर्चित हुई है मगर भारत में उपेक्षित, अवहेलित है। इस पुस्तक का विषय भारत में हिन्दुओं के मंदिरों की सम्पत्ति, चढ़ावे, व्यवस्था की बंदरबांट है। इस पुस्तक में दिए गए आँखें खोल देने वाले तथ्यों पर विचार करने से पहले आइये कुछ काल्पनिक प्रश्नों पर विचार करें।

बड़े उदार मन, बिलकुल सैक्यूलर हो कर परायी बछिया का दान करने की मानसिकता से ही बताइये कि क्या हाजियों से मिलने वाली राशि का सऊदी अरब सरकार ग़ैर-मुस्लिमों के लिये प्रयोग कर सकती है ? प्रयोग करना तो दूर वो क्या वो ऐसा करने की सोच भी सकती है ? केवल एक पल के लिये कल्पना कीजिये कि आज तक वहाबियत के प्रचार-प्रसार में लगे, कठमुल्लावाद को पोषण दे रहे, परिणामतः इस्लामी आतंकवाद की जड़ों को खाद-पानी देते आ रहे सऊदी अरब के राजतन्त्र  का ह्रदय परिवर्तन हो जाता है और वो विश्व-बंधुत्व में विश्वास करने लगता है। सऊदी अरब की विश्व भर में वहाबियत के प्रचार-प्रसार के लिये खरबों डॉलर फेंकने वाली मवाली सरकार हज के बाद लौटते हुए भारतीय हाजियों के साथ भारत के मंदिरों के लिये 100 करोड़ रुपया भिजवाती है। कृपया हँसियेगा नहीं ये बहुत गंभीर प्रश्न है।

क्या वैटिकन आने वाले श्रद्धालुओं से प्राप्त राशि ग़ैर-ईसाई व्यवस्था में खर्च की जा सकती है ? कल्पना कीजिये कि पोप भारत आते हैं। दिल्ली के हवाई अड्डे पर विमान से उतरते ही भारत भूमि को दंडवत कर चूमते हैं। उठने के साथ घोषणा करते हैं कि वो भारत में हिन्दु धर्म के विकास के लिये 100 करोड़ रुपया विभिन्न प्रदेशों के देव-स्थानों को दे रहे हैं। तय है आप इन चुटकुलों पर हँसने लगेंगे और आपका उत्तर निश्चित रूप से नहीं होगा। प्रत्येक धर्म के स्थलों पर आने वाले धन का उपयोग उस धर्म के हित के लिए किया जाता है। तो इसी तरह स्वाभाविक ही होना चाहिए कि मंदिरों में आने वाले श्रद्धालुओं के चढ़ावे को मंदिरों की व्यवस्था, मरम्मत, मंदिरों के आसपास के बुनियादी ढांचे और सुविधाओं के प्रशासन, अन्य कम ज्ञात मंदिरों के रख-रखाव, पुजारियों, उनके परिवार की देखरेख, श्रद्धालुओं की सुविधा के लिये उपयोग किया जाये। अब यहाँ एक बड़ा प्रश्न फन काढ़े खड़ा है। क्या मंदिरों का धन मंदिर की व्यवस्था, उससे जुड़े लोगों के भरण-पोषण, आने वाले श्रद्धालुओं की व्यवस्था से इतर कामों के लिये प्रयोग किया जा सकता है ?

अब आइये इस पुस्तक में दिए कुछ तथ्यों पर दृष्टिपात करें। आंध्र प्रदेश सरकार ने मंदिर अधिकारिता अधिनियम के तहत 43,000 मंदिरों को अपने नियंत्रण में ले लिया है और इन मंदिरों में आये चढ़ावे और राजस्व का केवल 18 के प्रतिशत मंदिर के प्रयोजनों के लिए वापस लौटाया जाता है। तिरुमाला तिरुपति मंदिर से 3,100 करोड़ रुपये हर साल राज्य सरकार लेती है और उसका केवल 15 प्रतिशत मंदिर से जुड़े कार्यों में प्रयोग होता है। 85 प्रतिशत राज्य के कोष में डाल दिया जाता है और उसका प्रयोग सरकार स्वेच्छा से करती है। क्या ये भगवान के धन का ग़बन नहीं है ? इस धन को आप और मैं मंदिरों में चढ़ाते हैं और इसका उपयोग प्रदेश सरकार हिंदु धर्म से जुड़े कार्यों की जगह मनमाना होता है। उड़ीसा में राज्य सरकार जगन्नाथ मंदिर की बंदोबस्ती की भूमि के ऊपर की 70,000 एकड़ जमीन को बेचने का इरादा रखती है।

केरल की कम्युनिस्ट और कांग्रेसी सरकारें गुरुवायुर मंदिर से प्राप्त धन अन्य संबंधित 45 हिंदू मंदिरों के आवश्यक सुधारों को नकार कर सरकारी परियोजनाओं के लिए भेज देती हैं। अयप्पा मंदिर से संबंधित भूमि घोटाला पकड़ा गया है। सबरीमाला के पास मंदिर की हजारों एकड़ भूमि पर कब्ज़ा कर चर्च चल रहे हैं। केरल की राज्य सरकार त्रावणकोर, कोचीन के स्वायत्त देवस्थानम बोर्ड को भंग कर 1,800 हिंदू मंदिरों को अधिकार पर लेने के लिए एक अध्यादेश पारित करने के लिए करना चाहती है।

कर्णाटक की भी ऐसी स्थिति है। यहाँ देवस्थान विभाग ने 79 करोड़ रुपए एकत्र किए गए थे और उसने उस 79 करोड़ रुपये में से दो लाख मंदिरों को उनके रख-रखाव के लिए सात करोड़ रुपये आबंटित किये। मदरसों और हज सब्सिडी के लिये 59 करोड़ दिए और लगभग 13 करोड़ रुपये चर्चों गया। कर्नाटक में दो लाख मंदिरों में से 25 प्रतिशत या लगभग 50000 मंदिरों को संसाधनों की कमी के कारण बंद कर दिया जायेगा। क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि महमूद गज़नी तो 1030 ईसवी में मर गया मगर उसकी आत्मा अभी भी हज़ारों टुकड़ों में बाँट कर भारत के मंदिरों की लूट में लगी हुई है ?


यहाँ यह प्रश्न उठाना समीचीन है कि आख़िर मंदिर किसने बनाये हैं ? हिंदु समाज के अतिरिक्त क्या इनमें मुस्लिम, ईसाई समाज का कोई योगदान है ? बरेली के चुन्ना मियां के मंदिर को छोड़ कर सम्पूर्ण भारत में किसी को केवल दस और मंदिर ध्यान हैं जिनमें ग़ैरहिंदु समाज का योगदान हो ? मुस्लिम और ईसाई समाज कोई हिन्दू समाज की तरह थोड़े ही है जिसने 1857 के बाद अंग्रेज़ी फ़ौजों के घोड़े बांधने के अस्तबल में बदली जा चुकी दिल्ली की जामा-मस्जिद अंग्रेज़ों से ख़रीद कर मुसलमानों को सौंप दी हो।

यहाँ ये बात ध्यान में लानी उपयुक्त होगी कि दक्षिण के बड़े मंदिरों के कोष सामान्यतः संबंधित राज्यों के राजकोष हैं। एक उदाहरण से बात अधिक स्पष्ट होगी। कुछ साल पहले पद्मनाभ मंदिर बहुत चर्चा में आया था। मंदिर में लाखों करोड़ का सोना, कीमती हीरे-जवाहरात की चर्चा थी। टी वी पर बाक़ायदा बहसें हुई थीं कि मंदिर का धन समाज के काम में लिया जाना चाहिये। यहाँ इस बात को सिरे से गोल कर दिया गया कि वो धन केवल हिन्दू समाज का है, भारत के निवासी हिन्दुओं के अतिरिक्त अन्य धर्मावलम्बियों का नहीं है। उसका कोई सम्बन्ध मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी समाज से नहीं है। वैसे वह मंदिर प्राचीन त्रावणकोर राज्य, जो वर्तमान में केरल राज्य है, के अधिपति का है। मंदिर में विराजे हुए भगवान विष्णु महाराजाधिराज हैं और व्यवस्था करने वाले त्रावणकोर के महाराजा उनके दीवान हैं। नैतिक और क़ानूनी दोनों तरह से  पद्मनाभ मंदिर का कोष वस्तुतः भगवान विष्णु, उनके दीवान प्राचीन त्रावणकोर राजपरिवार का, अर्थात तत्कालीन राज्य का निजी कोष हैं। उस धन पर क्रमशः महाराजाधिराज भगवान विष्णु, त्रावणकोर राजपरिवार और उनकी स्वीकृति से हिन्दू समाज का ही अधिकार है। केवल हिन्दु समाज के उस धन पर अब वामपंथी, कांग्रेसी गिद्ध जीभ लपलपा रहे हैं।

यहाँ एक ही जगह की यात्रा के दो अनुभवों के बारे में बात करना चाहूंगा। वर्षों पहले वैष्णव देवी के दर्शन करने जाना हुआ। कटरा से मंदिर तक भयानक गंदगी का बोलबाला था। घोड़ों की लीद, मनुष्य के मल-मूत्र से सारा रास्ता गंधा रहा था। लोग नाक पर कपड़ा रख कर चल रहे थे। हवा चलती थी तो कपड़ा दोहरा-तिहरा कर लेते थे। काफ़ी समय बाद 1991 में फिर वैष्णव देवी के दर्शन करने जाना हुआ। तब तक जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल पद को जगमोहन जी सुशोभित कर चुके थे। आश्चर्यजनक रूप से कटरा से मंदिर तक की यात्रा स्वच्छ और सुविधाजनक हो चुकी थी। कुछ वर्षों में ये बदलाव क्यों और कैसे आया ? पूछताछ करने पर पता चला कि वैष्णव देवी मंदिर को महामहिम राज्यपाल ने अधिग्रहीत कर लिया है और इसकी व्यवस्था के लिये अब बोर्ड बना दिया गया है। अब मंदिर में आने वाले चढ़ावे को बोर्ड लेता है। उसी चढ़ावे से पुजारियों को वेतन मिलता है और उसी धन से मंदिर और श्रद्धालुओं से सम्बंधित व्यवस्थायें की जाती हैं।

ये स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ गया कि मंदिर जो समाज के आस्था केंद्र हैं, वो पुजारी की निजी वृत्ति का ही केंद्र बन गए हैं और समाज के एकत्रीकरण, हित-चिंतन के केंद्र नहीं रहे हैं। अब समाज की निजी आस्था अर्थात हित-अहित की कामना और ईश्वर प्रतिमा पर आये चढ़ावे का व्यक्तिगत प्रयोग का केंद्र ही  मंदिर बचा है। मंदिर के लोग न तो समाज के लिये चिंतित हैं न मंदिर आने वालों की सुविधा-असुविधा उनके ध्यान में आती है। क्या ये उचित और आवश्यक नहीं है कि मंदिर के पुजारी गण, मंदिर की व्यवस्था के लोग अपने साथ-साथ समाज के हित की चिंता भी करें ? यदि वो ऐसा नहीं करेंगे तो मंदिरों को अधर्मियों के हाथ में जाते देख कर हिंदु समाज भी मौन नहीं रहेगा ? मंदिरों के चढ़ावे का उपयोग मंदिर की व्यवस्था, उससे जुड़े लोगों के भरण-पोषण, आने वाले श्रद्धालुओं की व्यवस्था के लिये होना स्वाभाविक है। ये त्वदीयम वस्तु गोविन्दः जैसा ही व्यवहार है। साथ ही हमारे मंदिर, हमारी व्यवस्था, हमारे द्वारा दिए गये चढ़ावे का उपयोग अहिन्दुओं के लिये न हो ये आवश्यक रूप से करवाये जाने वाले विषय हैं। संबंधित सरकारें इसका ध्यान करें, इसके लिये हिंदु समाज का चतुर्दिक दबाव आवश्यक है अन्यथा लुटेरे भेड़िये हमारी शक्ति से ही हमारे संस्थानों को नष्ट कर देंगे।


तुफ़ैल चतुर्वेदी                  

शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

तुर्की के समुद्र तट पर अयलान कुर्दी की डूब कर मौत और उस पर राष्ट्रीय चिंतन

तुर्की के समुद्र तट पर मिले तीन साल के बच्चे की तस्वीर इन दिनों अख़बार, टी.वी. सोशल मीडिया, पर छायी हुई है। सीरिया का अयलान कुर्दी नाम का यह बच्चा अपने माँ और भाई के साथ एक नाव में सवार हो कर अवैध रूप से योरोप जा रहा था। नाव समुद्र में पलट गयी और लोग डूब कर मर गए। उसके 5 वर्षीय बड़े भाई की भी उसी नौका के पलटने से मृत्यु हो गयी है जिसमें वो बैठकर सीरिया से भाग निकलने की कोशिश कर रहे थे।
यह निश्चित नहीं है कि ये परिवार सीरिया में चल रहे युद्ध कारण ही भाग रहा था। कुछ समाचारपत्रों के अनुसार इस परिवार का मुखिया अब्दुल्लाह कुर्दी अपने परिवार सहित तुर्की में ही कई वर्ष से रह रहा था और तुर्की से अवैध रूप से योरोप जा बसने के प्रयास में ये दुर्घटना हुई। इसका शव तुर्की के मुख्य टूरिस्ट रिज़ॉर्ट के समुद्र तट पर पड़ा पाया गया, लेकिन इस तस्वीर ने योरोप में बढ़ रहे आव्रजन के संकट पर लोगों का ध्यान खींचा है। सीरिया की सेना और वहाँ मौजूद इस्लामिक कट्टरपंथी ग्रुप के बीच में वर्षों से गृहयुद्ध चल रहा है। जिसमें लगभग 3 लाख से ऊपर के लोग मारे जा चुके हैं और लाखों विस्थापित हो चुके हैं। सीरिया के आधे से अधिक भाग पर इस्लामिक स्टेट और उसके सहयोगियों का क़ब्ज़ा है और भीषण कत्ले-आम जारी है।
सीरियाई विस्थापित शरण के लिए यूरोप का मुंह ताक रहे हैं। इसी तरह यमन, नाइजीरिया इत्यादि अनेकों देशों से लोग अपने देशों में चल रहे युद्ध से तंग हैं और जान कर भागना चाहते हैं। ब्रिटेन के अनेकों राजनेता, प्रेस इन अवैध अप्रवासियों को शरण देने के पक्ष में हैं। इंडिपेंडेंट अख़बार का कहना है ''अगर ऐसी सशक्त तस्वीरों के बाद भी ब्रिटेन का शरणार्थी के प्रति रवैया नहीं बदलेगा तो फिर किस चीज़ से हालत बदलेंगे ?'' विभिन्न आप्रवासी मूल के मुस्लिम सांसदों के बयान देखिये "ये तस्वीर हम सभी को शर्मिंदा करती है। सीरिया में हम विफल हुए हैं"। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन पर इसके कारण अप्रवासियों को देश में खपाने का दबाव पड़ रहा है। प्रारम्भ में उन्होंने कहा है कि इस समस्या का समाधान अधिक शरणार्थियों को ब्रिटेन में शरण देना नहीं है मगर बाद में उन्होंने हज़ारों सीरियाई शरणार्थियों को श्रं देने की घोषणा की है। फ़्रांस और जर्मनी ने भी उनसे सहमति व्यक्त की है। योरोपीय आयोग के अध्यक्ष जीन क्लाड जंकर ने कहा है कि अगले सप्ताह कम से कम 1. 20 लाख और शरणार्थियों को नई जगह आबंटित की जायेगी।
यहाँ भारतीय मुसलमानों के लिये एक बहुत आवश्यक और पैना सवाल भी मेरे दिमाग़ में फन काढ़े खड़ा है। ये लोग संसार भर के मुसलमानों के वास्तविक गॉड फादर/दाता/त्राता सऊदी अरब से मदद क्यों नहीं मांग रहे ? क्यों सऊदी अरब और ऐसे ही देशों में शरणार्थियों के आने की दर 0% है। आख़िर मौला के मदीने जाने की तमन्ना रखने वाले ये लोग योरोप, अमेरिका क्यों जाना चाहते हैं ? खजूर की ठंडी छाँव, रेगिस्तान की भीनी-भीनी महकती हवा, आबे-ज़मज़म का ठंडा मीठा पानी, मुहम्मद जी के चमत्कारों की धरती क्यों प्रमुखता नहीं रही ? आख़िर मुसलमान मिस्र, लीबिया, मोरक़्क़ो, ईरान, ईराक़, यमन, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंग्लादेश, सीरिया आदि देशों से क्यों निकल रहे हैं और वो किसी भी मुस्लिम देश में क्यों नहीं रहना चाहते ? वो ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, फ़्रांस, इटली, जर्मनी, स्वीडन, अमरीका, कैनेडा, भारत जैसे देशों में ही क्यों जाना चाहते हैं ?
भारत के नाम पर किसी को ऐतराज़ है तो निश्चित ही उसने भारत में करोड़ों बंगलादेशियों, लाखों अफ़ग़ानियों, पाकिस्तानियों की अवैध घुसपैठ और वैध आव्रजन को नहीं पढ़ा-सुना-देखा। वो हर उस देश की ओर ही क्यों उन्मुख हैं जो इस्लामी नहीं है ? अल्लाह की धरती पर आख़िर ऐसा क्या हो गया कि वो धधक रही है ? क्या इसके लिये उनका जीवन दर्शन, नेतृत्व, व्यवस्था ज़िम्मेदार नहीं है ? आख़िर इन देशों में किसी में भी प्रत्येक मनुष्य के बराबरी के अधिकार की व्यवस्था प्रजातंत्र क्यों नहीं है ? किसी तरह रो-पीट कर प्रजातंत्र आ भी जाता है तो टिक क्यों नहीं पाता ? वहां स्त्रियों को पुरुषों के बराबर क्यों नहीं समझा जाता ?
ऐसा नहीं है कि ये आव्रजन अभी शुरू हुआ है। पचासों वर्षों से ये सब चल रहा है। इटली, फ़्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड, स्वीडन इत्यादि देशों में तो जगह-जगह भारत की ही तरह मुस्लिम बस्तियां उभर आयी हैं। इन देशों में शरण लेने वाले लोग ज़ाहिर है अपने देश से संतुष्ट नहीं थे इसी लिये तो शरण लेने आये। फिर इन्हें यहाँ मदरसे, हिजाब, बुरक़ा, हलाल गोश्त, मस्जिदें, जुम्मे की नमाज़ के लिये मस्जिद के बाहर ट्रैफ़िक का रोका जाना क्यों चाहिये ? ये अब अपने नये देशों से क्यों चाहते हैं कि उन्हें अपनी व्यवस्था बदल लेनी चाहिए। वो इन देशों से क्यों मांग करते हैं कि वो स्वयं को उन देशों जैसा बना लें जिन्हें ये छोड़ कर आये हैं ? मदरसे, हिजाब, बुरक़ा, हलाल गोश्त, मस्जिदें, जुम्मे की नमाज़ के लिये मस्जिद के बाहर ट्रैफ़िक का रोका जाना छोड़े गए देशों में बहुतायत में था ही। तो क्या ये ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, फ़्रांस, भारत, इटली, जर्मनी, स्वीडन, अमरीका, कैनेडा जैसे देशों को मिस्र, लीबिया, मोरक़्क़ो, ईरान, ईराक़, यमन, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बंग्लादेश, सीरिया जैसा बनाने के अभियान पर निकले हैं ?
आइये कुछ देर के लिये फ़्रेम के दूसरे हिस्से में जाते हैं। 24 जून 2015 का दैनिक जागरण का समाचार है " सीरिया के 2000 साल पुराने पामीरा शहर में आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट { आइएस } ने ऐतिहासिक विरासतों को नष्ट करने का अभियान शुरू कर दिया है। आतंकियों ने पैग़म्बर मुहम्मद के वंशज मुहम्मद बिन अली का मक़बरा उड़ा दिया है। इसके अलावा निजार अबू बहाउद्दीन का मक़बरा भी ज़मींदोज़ कर दिया गया है.……इसके बाद से शहर में मौजूद यूनेस्को के विश्व विरासत स्थल में शामिल पुरातात्विक भग्नावशेष आतंकियों के रहमो-करम पर हैं। सीरिया के पुरावशेष निदेशक मामून अब्दुल करीम के अनुसार सीरिया में अपने नियंत्रण वाले इलाक़ों में आतंकी संगठन सौ से दो सौ साल पुराने कम से कम 50 मक़बरे अब तक नष्ट कर चुका है।
इसी साल नाइजीरिया के चिबुक क़स्बे में बोको हराम नाम के इस्लामी आतंकी संगठन ने दो सौ छियत्तर ईसाई बच्चियों का अपहरण कर लिया। उन्हें इस्लामी लड़ाकों में बाँट दिया। इस क्रिया को इस्लामी शब्दावलि में माले-ग़नीमत { जिहाद की लूट में प्राप्त सामग्री; जिसका उपयोग, उपभोग हलाल है } कहते हैं। ये केवल दो सौ छियत्तर ईसाई बच्चियों के अपहरण की बात नहीं है, सूत्रों के अनुसार बोको हराम ने ऐसे हज़ारों बच्चियों, लड़कियों का अपहरण कर उन्हें माले-ग़नीमत के हिस्से के रूप में अपने हत्यारे सदस्यों में उनकी यौन-पिपाशा शांत करने के लिये बांटा है।
इस घटना पर 26 अप्रैल के जनसत्ता में भारतीय टिप्पणीकार सय्यद मुबीन जोहरा का कॉमेंट है ''कुछ बच्चियां जो बोको हराम के पंजे से बच निकली थीं, उन्होंने जो कुछ बताया उससे एक बात साफ़ है कि बोको हराम का इस्लाम से दूर-दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है। वे जो कुछ इन बच्चियों के साथ कर रहे हैं इसकी इस्लाम ही क्या कोई धर्म आज्ञा नहीं देता। यह इस्लाम को बदनाम करने की साज़िश तो हो सकती है, इस्लाम बिलकुल नहीं। बोको हराम के क़ब्ज़े से बच निकली एक बच्ची ने बताया कि उनसे मज़दूरों की तरह काम लिया जाता था और एक दिन यह बता दिया गया कि तुम सबका विवाह हो गया। इसके बाद तो हर रात कोई साया उनके शरीर को नोचता था। यज़ीदियों के साथ यही हरकत इस्लामिक स्टेट के नाम पर हुई। यह इस्लाम तो नहीं है। इस प्रकार के ज़ुल्मो-सितम को बढ़ावा नहीं देता बल्कि इस्लाम तो कमज़ोरों के साथ खड़ा होता है। उनके आंसू पोंछता है। बीमारों का इलाज करता है। मजबूरों और लाचारों का सहारा बनता है.……" इसी तरह की झूटी और मनमानी बड़बड़ाहट लेख में भरी हुई है।
सय्यद मुबीन जोहरा बिना किसी तथ्य, तर्क के मनमाने ढंग से इस्लाम के उस पक्ष को छिपा, झुटला रही हैं जो क़ुरआन, हदीसों में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है। आख़िर इन लोगों को इसी जीवन-दर्शन के पालन होने के कारण अपना देश छोड़ना पड़ रहा है। यही तो वो जिहादी संघर्ष है जिस पर प्रत्येक इस्लामी लड़ाका सहर्ष अमल करता रहा है। जो प्रत्येक इस्लामी सेनापति, बादशाह, सूफ़ी का घोषित जीवन लक्ष्य रहा है। जिस जीवन-शैली के कारण ऐसे हर जिहादी, ग़ाज़ी, शहीद के मन में जन्नत, उसमें हूरों, गिलमां, शराब की नदियों की कल्पना-दावा है। यहाँ मुझे पूज्य संत स्वामी विनय चैतन्य जी महाराज के आप्त वाक्य ध्यान आ रहे हैं। ऐसी ही परिस्थिति में उन्होंने एक बार कहा था " उन्हें क्षमा मत करो और जुतियाओ कि वो धूर्त और कुटिल हैं और अपनी धूर्तता को मासूम विद्वता के आवरण में छिपाते हैं "
बंधुओ ये कोई हाल की ही घटनाएँ नहीं हैं। ये तो ऐतिहासिक रूप से चलता आ रहा अत्याचार है। आप किसी भी इस्लामी रहे या वर्तमान इस्लामी देश के किन्हीं चार मुस्लिम इतिहासकारों की किताबें उठा लीजिये आप उनमें सैकड़ों वर्षों का हाहाकार, मज़हब के नाम पर सताए गए, मारे गए, धर्मपरिवर्तन के लिए विवश किये गए अनगिनत लोगों का आर्तनाद, आगजनी, वैमनस्य, आहें, कराहें, आंसुओं की भयानक महागाथा पायेंगे। इस्लाम विश्व में किस तरह फैला इस विषय पर किन्हीं 4-5 इस्लामी इतिहासकारों की ही किताब देख लीजिये। काफ़िरों के कटे सरों को इकठ्ठा करके बनायी गयी मीनारें, खौलते हुए तेल में तले गए लोग, आरे से चिरवाये गए काफ़िर, जीवित ही खाल उतार कर नमक-नौसादर लगा कर तड़पा-तड़पा कर मारे गए काफ़िर, ग़ैर-मुस्लिमों के बच्चों-औरतों को ग़ुलाम बना कर बाज़ारों में बेचा जाना, काफ़िरों को मारने के बाद उनकी औरतों के साथ हत्यारों की ज़बरदस्ती शादियां, उनके मंदिर, सिनेगॉग, चर्च को ध्वस्त किया जाना, ऐसे भयानक वर्णन सैकड़ों वर्षों से हर इस्लामी इतिहासकार की किताब में उपलब्ध हैं।
मगर ऐसा नहीं है कि सभ्य संसार ने इन हत्यारों को सदैव बर्दाश्त ही किया है और उसकी हिंसा को शांत रूप से सहा है। सैकड़ों वर्ष तक भारत में गज़वा-ए-हिन्द { हदीसों में उल्लेखित भारत पर किया जाने वाला इस्लामी आक्रमण } पर काम हुआ मगर लगातार चले हत्यारे प्रयासों के उपरांत भी देश के विभाजन के समय हमारा एक तिहाई वर्ग शिकंजे में नहीं फंसा था। इतिहास की पुस्तकों में उल्लेख न किये जाने के बावजूद सत्य तो यही है कि प्रतिरोध तो प्रबल हुआ ही था अन्यथा ईरान, ईराक़, मिस्र आदि देशों की तरह हम पूरी तरह मुसलमान क्यों नहीं हो पाये ?
जिहाद की इसी श्रंखला में बग़दाद में इस्लामी ख़िलाफ़त सम्हाले आख़िरी अब्बासी खलीफा अल मुस्तसिम बिल्लाह ने भी मूल इस्लामी विचार पर कार्यवाही की, अर्थात बुतपरस्ती कुफ़्र है और कुफ्र को मिटाना प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है पर बड़े पैमाने पर अमल किया। इसको अमल में लाने के लिये काफ़िर वाजिबुल क़त्ल { अपने से भिन्न विश्वासी हत्या के पात्र हैं } क़त्ताल फ़ी सबीलिल्लाह, जिहाद फीसबीलिल्लाह { अल्लाह की राह में क़त्ल करो, अल्लाह के लिए जिहाद करो } के क़ुरआनी आदेशानुसार काफ़िरों की हत्याएं कीं। मंदिर, बौद्ध मठ तोड़े। पूज्य हिंदू सेनापति चंगेज खान, हलाकू खान, कुबलई खान ने पलट कर प्रचंड मार लगायी। पूज्य हलाकू खान तो सीधे बग़दाद पर ही चढ़ दौड़े। काफ़िर वाजिबुल क़त्ल, क़त्ताल फ़ी सबीलिल्लाह, जिहाद फीसबीलिल्लाह दर्शन के केंद्र ढा दिये गये। दबाव के कारण बदलाव किस तेज़ी से आता है इसे इस बात से जाना जा सकता है कि ईरान में इस आक्रमण के बाद ही अरबी की जगह फ़ारसी लिपि-भाषा वापस लिखी-बोली जाने लगी। जम कर लगी मार से त्रस्त मुसलमान भाग कर शांत क्षेत्र यानी अफ़ग़ानिस्तान होते हुए भारत की केंद्रीय भूमि की ओर भाग आये।
भारत के राजाओं, आचार्यों, जनसामान्य के लिये ये एक सामान्य घटना ही थी। उन्होंने शरण मांगने वाले की क्षमता के अनुसार सभी को शरण दी। बिना छान-फटक के अजनबियों को घर में जगह दे दी गयी। ये बात हद दर्जे की अविश्वसनीय मगर सत्य है कि मुहम्मद गौरी के हमलों के समय कन्नौज के अधिपति जयचंद का प्रधान सेनापति मुसलमान था। भारत के राजाओं की सेना में ख़ासे मुसलमान सैनिक सम्मिलित थे। भारत में मस्जिदें बन चुकी थीं और उनमें बग़दाद में ही पढ़ाया-सिखाया जाने वाला क़ुरआन का ये दर्शन बताया, समझाया, सिखाया जाने लगा था।
ओ मुसलमानों तुम ग़ैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { 9-123 }
मूर्ति पूजक लोग नापाक होते हैं { 9-28 }
और तुम उनको जहां पाओ क़त्ल करो { 2-191 }
काफ़िरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { 8-39 }
अल्लाह ने काफ़िरों के रहने के लिये नर्क की आग तय कर रखी है { 9-68 }
उनसे लड़ो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं, न आख़िरत पर; जो उसे हराम नहीं समझते जिसे अल्लाह ने अपने नबी के द्वारा हराम ठहराया है. उनसे तब तक जंग करो जब तक कि वे ज़लील हो कर जज़िया न देने लगें { 9-29 }
जो कोई अल्लाह के साथ किसी को शरीक करेगा, उसके लिये अल्लाह ने जन्नत हराम कर दी है. उसका ठिकाना जहन्नुम है { 5-72 }
तुम मनुष्य जाति में सबसे अच्छे समुदाय हो, और तुम्हें सबको सही राह पर लाने और ग़लत को रोकने के काम पर नियुक्त किया गया है { 3-110 }
इस भयानक भूल का परिणाम कुछ सदी बाद अफ़ग़ानिस्तान के पूरी तरह धर्मान्तरित होने और अगले चरण के रूप में भारत के अंग-भंग में हुआ। करोड़ों लोग विस्थापित हुए। लाखों लोग मारे गए। लाखों स्त्रियां छीन ली गयीं। लाखों के साथ बलात्कार किये गए। वेदों की धरती पंजाब विभाजित कर दी गयी। हिंगुलाज भवानी का मन्दिर, कटासराज के मंदिर, ननकाना साहब का गुरुद्वारा, विश्व में आवासीय शिक्षा का सबसे पहला केंद्र तक्षशिला, भक्त प्रह्लाद का स्थान मुल्तान, भगवान राम के बेटे लव का बसाया शहर लाहौर, उन्हीं के भाई कुश का बसाया शहर कसूर, ढाकेश्वरी माता की धरती हमसे छीन ली गयी। सिंधु पराई हो गयी। करोड़ों लोगों की जीवन-यापन की व्यवस्था ध्वस्त हो गयी। ऐश्वर्यशाली परिवार मिटटी में मिल गये। आज की पीढ़ी को तो इसका अनुमान ही नहीं है कि 1947 में विभाजन के बाद आये लोगों ने कितनी कठिन परिस्थिति में जीवन दुबारा से शुरू किया था। इन सबके लिये पूज्य हलाकू खान की मार से बचे अब्बासियों के अवशेषों को शरण देना और उनका जीवन-दर्शन ही ज़िम्मेदार था। अब फिर से इन भगोड़ों को सभ्य संसार को क्यों शरण देनी चाहिये ? बल्कि इन्हें तो वहीँ रहने पर विवश कर अपने देश की स्थिति, व्यवस्था बदलने के लिए उकसाया जाना चाहिये। आख़िर इनकी आतंरिक वैचारिक बीमारी को अपने राष्ट्र में क्यों फैलने देना चाहिये ? सभ्य संसार बहुत परिश्रम से बनाये गए शांत, आनंददायक संसार को नरक क्यों बना ले ? साहिब जी, क्यों योरोप, अमरीका को मुज़फ़्फ़रनगर, शामली, मेरठ, सरधना, बनाना चाहते हैं ?
अब वापस उसी फ़्रेम में लौटते हुए एक सवाल देशवासी मुसलमानों से करना चाहता हूँ। आप ग़ाज़ा को ले कर इज़राइल से क्रुद्ध रहते ही हैं। आप कुछ साल पहले बहुत प्रतिष्ठित लेखक सलमान रुशदी साहब की किताब "सैटनिक वर्सेस" को ले कर आंदोलित थे। आप अभी बर्मा में 'मुसलमानों पर हो रहे तथाकथित अत्याचार' को ले कर मुखर थे। आप शार्ली अब्दो के कार्टून पर वाचाल थे ? आपमें से बहुत से एक देशद्रोही याक़ूब मेनन के जनाज़े में बड़ी तादाद में सम्मिलित हुए ? तो आप सीरिया, यमन, ईराक़ पर क्यों मौन हैं ? क्या इस लिए कि वहाँ मुसलमान दूसरे मुसलमान को मार रहे हैं ? मुसलमान आपस में लड़-मर लें तो कोई अंतर नहीं पड़ता मगर कोई दूसरे धर्म का व्यक्ति एक कार्टून भी बना दे तो वो इस्लाम पर हमला हो जाता है ? इस्लाम ख़तरे में पड़ जाता है ? आप इन समस्याओं की पहचान और उनसे निबटने के लिये क्यों कुछ नहीं करते ? क्या ये सिर्फ़ मेरी ही समस्या है ? क्या आपके बच्चे इस जीवन को नहीं सहेंगे ? क्या आपने मान लिया है कि आपकी पीढ़ियां इस युद्ध भरे, रक्तपात से बजबजाते वातावरण को झेलने के लिए अभिशप्त हैं ? आप अपनी आवाज़ मुखर क्यों नहीं करते ? आख़िर आप अपनी आने वाली पीढ़ियों लिये कैसी दुनिया छोड़ कर जाना चाहते हैं ? आपकी आवाज़ ही इस स्थिति में बदलाव ला सकती है और आपका मौन विश्व के अंत की भूमिका लिख सकता है।
तुफ़ैल चतुर्वेदी

साहित्य अकादमी के पुरस्कृत साहित्यकारों में से कुछ के अकादमी पुरस्कार लौटाने की फांय-फांय

साहित्य अकादमी केंद्र सरकार के सांस्कृतिक मंत्रालय के अधीन लगभग अर्ध स्वायत्त संस्था है। आज कल साहित्य अकादमी के द्वारा पुरस्कृत साहित्यकारों में से कुछ के अकादमी पुरस्कार लौटाने की चर्चा हो रही है। ये पुरस्कार इन स्वयंभू प्रगतिशील लोगों के अनुसार एम एम कलबुर्गी की हत्या, बिसाहड़ा गांव में अख़लाक़ के पीट-पीट कर प्राण लिये जाने, जिसका कारण वो देश में स्वतंत्र अभिव्यक्ति के संकुचित होते दायरे और वैचारिक मतभेद के प्रति बढ़ती असहिषुणता को मानते हैं, के विरोध में लौटाये गए हैं। इनकी शुरूआत जवाहर लाल नेहरू की भांजी और अंग्रेज़ी की लेखिका नयन तारा सहगल से हुई। अगला वार अशोक वाजपेयी ने किया। इस पथ पर उदय प्रकाश, गणेश देवी, गुलाम नबी ख़याल, रहमान अब्बास, कृष्णा सोबती, सारा जोज़फ़, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, गुरुबचन भुल्लर, अजमेर सिंह औलख जैसे कई लोग चल निकले हैं। कश्मीर के 25 साहित्यिक संगठनों की संस्था अदबी मरकज़ के अध्यक्ष शुजाअत बुख़ारी भी इसमें कूद पड़े और उन्होंने भी कालबेलिया नृत्य किया । अतः अब आवश्यक है कि साहित्य अकादमी के कार्यों, इन प्रगतिशीलों लेखकों, कश्मीरी लेखकों की प्रगतिशीलता, इनके लिखे हुए साहित्य की पठनीयता और देश में बढ़ रही तथाकथित असहिषुणता की निष्पक्ष छानफटक की जाये। 


साहित्य अकादमी केंद्र सरकार की साहित्य के उत्थान के लिये बनी संस्था है। ये वार्षिक पुरस्कार देती है और अपने पुरस्कृत व्यक्ति की कृति का देश की चौबीस भाषा में अनुवाद कर, देश भर में फैले अपने केन्द्रों से बिक्री कराती है। पुरस्कार के लिये इन कृतियों को अकादमी के विद्वान चुनते हैं। अकादमी के विद्वानों को साहित्य अकादमी के सदस्य चुनते हैं। अकादमी के सदस्य चुने जाने का नियम है कि प्रदेशों से नाम भेजे जाते हैं और अकादमी के वर्तमान सदस्य { कृपया ध्यान रखियेगा } उनको अनुमोदित करते हैं तो ही वह सदस्य बन पाते हैं। अर्थात अकादमी में बैठे सदस्य ही नए सदस्य बना सकते हैं।

 
जवाहर लाल नेहरू तथा उनकी पुत्री इंदिरा गांधी के काल में इस तरह की सारी संस्थाओं में तथाकथित प्रगतिशील यानी कम्युनिस्ट भर दिए गये थे। अतः इन सदस्यों के चले आ रहे कॉकस को तोड़ना असंभव ही था चूँकि ये वामपंथियों को ही लाते थे। ये एक जेब से पैसा निकाल कर दूसरी जेब में रख लेने जैसा काम था और दशकों चलता रहा। काल ने अंततः सहायता की और आयु अधिक हो जाने के कारण इसके सदस्य रिटायर होने शुरू हुए। तब तक नेहरूवादी प्रगतिशीलता का मुलम्मा भी उतरने लगा था। इंदिरा गांधी भी कम्युनिस्टों के वानरी-उत्पातों से तंग आ गयी थीं इसलिये धीरे-धीरे कम्युनिस्टों का वर्चस्व कम होने लगा। रही-सही क़सर साम्यवाद के गढ़ रूस के ध्वस्त हो जाने से पूरी हो गयी मगर पुराने क़ब्ज़े अब भी कुछ हद तक थे ही। सरकार में बैठे आत्मीय लोगों की कृपा से फ़ैलोशिप, अपनी या अपनी बेटी-बेटों की संस्थाओं की आर्थिक सहायता, सेमिनारों के नाम पर अपने लोगों को महिमामंडन और उनकी पांच-तारा व्यवस्था का भुगतान सरकार के मत्थे मारना चलता रहा। 

त्यागपत्र देने वाले ये लेखक तथाकथित प्रगतिशील यानी कम्युनिस्ट हैं। कम्युनिस्ट वो लोग हैं जिन्होंने भारत के विभाजन के लिए पाकिस्तान के पक्ष में अधिकारिक थीसिस लिखी। 1962 के भारत-चीन युद्ध के समय भारत को आक्रमणकारी और चीन को सही ठहराया। भारत की व्यवस्था ठप्प हो जाये इसके लिये मज़दूर यूनियनों के माध्यम से हड़ताल करवाने की कोशिश की। अंतर्मन से घोर देशद्रोही, कभी रूस के लेनिन-स्टालिन तो कभी चीन के माओ की ढपली बजने वाले लोग अपने को प्रगतिशील कैसे कह सकते हैं ? लेनिन, स्टालिन, माओ जैसे अपने ही देश के करोड़ों लोगों को मार डालने वाले हत्यारों का महिमामण्डन एक हत्यारी सोच का विषैला मानस ही कर सकता है। ये कुछ-कुछ किसी दुश्चरित्र महिला का अपने को समाज की विशिष्ट सेवा करने वाला समाजसेवी बताने जैसा है। 

आइये कुछ पैने प्रश्न पूछे जाएँ। अंग्रेज़ी की बिलकुल अज्ञात लेखिका नयनतारा सहगल को अंग्रेज़ी नॉवल के लिये साहित्य अकादमी का पुरस्कार 1986 में मिला। एम एम कलबुर्गी की हत्या पर पुरस्कार वापस करने की घोषणा करने वाली अंग्रेज़ी लेखिका इसी हत्या पर क्यों बोलीं ?  इन्हें अपकी ममेरी बहन के लगाये आपात्काल का विरोध करना क्यों नहीं सूझा ? 1975 से 1977 तक आपात्काल में दमन की जो भयानक चक्की भारत भर में चली तब ये मौन क्यों थीं ? क्यों इन्हें 1984 में भारत के विभिन्न नगरों में हुए सिख विरोधी दंगों ने आहत नहीं किया ? जिसके बारे में इनके भांजे राजीव गांधी ने कहा था "जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है"।  इन्हें स्वर्ण मंदिर के बाहर डी आई जी अटवाल सहित हज़ारों निर्दोषों के मार दिए जाने के बारे में कुछ कहना क्यों नहीं सूझा ? इन्हें 1992 में कश्मीर घाटी से मार कर भगा दिए गए हिन्दुओं का करुण क्रंदन क्यों सुनाई नहीं दिया ? क्यों इन्हें मुंबई की लोकल में ट्रेनों में हुए धमाके सुनाई नहीं दिये ? कश्मीर के साहित्यिक संगठनों की संस्था अदबी मरकज़ के अध्यक्ष शुजाअत की शुजाअत तब कहाँ थी जब नंदी-मर्ग में, चट्टीसिंहपुरा में निहत्थे हिंदू मार दिए गए। इन्हें 26-11 का मुंबई पर हमला नहीं दिखाई दिया ? इनमें से कोई भी ऐसी हज़ारों आतंकी घटनाओं पर क्यों नहीं बोला ? क्या सबके मुंह में दही जम रहा था ? मुंह खोलते ही जिसके बिगड़ जाने का ख़तरा था ? उदय प्रकाश, गणेश देवी, गुलाम नबी ख़याल, रहमान अब्बास, कृष्णा सोबती, सारा जोज़फ़, मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, गुरुबचन भुल्लर, अजमेर सिंह औलख जैसे लोगों की वाणी की तब स्वतंत्रता कहाँ चली गयी थी ?

अशोक वाजपेयी की कथा तो और अधिक अद्भुत है। ये मध्य प्रदेश काडर के आई ए एस अधिकारी थे। मध्य प्रदेश में कार्यरत रहते हुए इन्होंने सरकारी संसाधनों से स्वयं को साहित्यकार के रूप में स्थापित किया। भारत भवन को लगभग अशोक वाजपेयी भवन में बदला। इनके मध्य प्रदेश कार्यकाल का साहित्यिक दृष्टि से जो सबसे बड़ा पाप है वो स्वर्गीय शरद जोशी जी को भोपाल छोड़ने पर विवश करना है। क्षुद्र शत्रुतावश इन्होंने इस पातक के लिये सरकारी पद का दुरुपयोग किया। उस महान व्यंग्यकार की रचनायें कहीं न छप सकें, उन्हें कहीं से पारिश्रमिक न मिल सके, उन्हें किसी आयोजन में बुलाया न जा सके, की व्यवस्था की। लेखनी से जीविका कमाने वाले शरद जोशी जी के भूखा मरने की नौबत आ गयी थी। अशोक वाजपेयी के शत्रुता निभाने के कारण अंततः शरद जोशी जी को भोपाल छोड़ कर मुंबई जाना पड़ा। एक निहत्थे निर्धन लेखक पर अपने गिद्ध जैसे पैने पंजे गड़ाने वाले ये सूरमा भोपाल गैस कांड पर बिलकुल मौन साधे रहे। जब राजीव गांधी के संकेत पर मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री अर्जुन सिंह बीस हज़ार निरपराध लोगों की मृत्यु के दोषी एंडरसन को  देश से भगाने का षड्यंत्र रच रहे थे, तब ये अकादमी पुरस्कार प्राप्त लेखक उनका महामस्तकाभिषेक कर रहे थे। जानकारी के लिए दर्ज करता चलूँ कि अशोक वाजपेयी सांस्कृतिक मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहे हैं और साहित्य अकादमी सांस्कृतिक मंत्रालय के ही अधीन है। आपको जान कर अपार आनंद मिलेगा कि महामहिम को अपनी किताब पर अकादमी पुरस्कार सांस्कृतिक मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहते हुए ही मिला है। इस पद पर रहते हुए इन्होंने अपनी क़तई अपठनीय बल्कि अझेल नई कविता की किताब पर पुरस्कार का जुगाड़ लगाया। इनकी ख़ुराफ़ातों के कारण ही सांस्कृतिक मंत्रालय के तत्कालीन सचिव सीताकांत महापात्र ने इनकी चरित्र पंजिका में विपरीत टिप्पणी की। जिसके कारण ये संयुक्त सचिव नहीं बन पाये और इन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। ये बरसों जनसत्ता में साप्ताहिक कॉलम लिखते रहे हैं। इनके कॉलम का गद्य भी इनकी नई कविता की तरह उबाऊ, नीरस और अझेल होता था। किसी माई के लाल में साहस नहीं हुआ कि इनका कोई लेख पूरा पढ़ ले। इन्हें भी भारत में घटित किसी भी भयानक घटना की जानकारी कभी नहीं मिली। इन्हें इस्लामी आतंकवादियों के सैकड़ों हमले कभी नहीं दिखाई दिए। इन्हें आतंकवादियों के हाथों मारे गये नागरिकों, सैन्य बल के जवानों की विधवाओं का करूण क्रंदन नहीं सुनाई दिया। इन्हें केवल तथाकथित तार्किक कालबुर्गी की अतार्किक हत्या दिखाई दी। 

सारा जोज़फ़ अपनी हैं और आप पार्टी के टिकिट पर इन्होने 2014 के लोकसभा का त्रिशूर से चुनाव लड़ा था। वाणी स्वतंत्रता की इस मुँहबोली नेत्री की आवाज़ समाज ने इतनी उपयुक्त पाई कि इन्हें कुल पड़े वोटों का 4.48 % ही उपलब्ध हुआ। ये किसी को मुंह दिखने के लायक भी नहीं रहीं और ज़मानत ज़ब्त करवाने वालों में भी 6 नंबर पर आयीं। 

इन लेखकों के रोष के दूसरे कारण अख़लाक़ के गौहत्या  कारण हुई पीट-पीट कर मार डाले जाने तथा गौहत्या की गंभीरता पर भी चर्चा करनी आवश्यक है। गौ-हत्या हमारे लिये इतनी बड़ी घटना है कि भारत भर में हमारे पूर्वज इसको रोकने के लिये सैकड़ों वर्षों से अपनी जान पर और हत्यारों की जान से खेलते आये हैं। बहुसंख्य बादशाहों, सुल्तानों ने हिन्दुओं को अपमानित, प्रताड़ित करने के लिये गौ-हत्या करने के आदेश दिये थे। इतिहास में सैकड़ों जगह दर्ज है कि हिन्दूओं को मुसलमान बनाने के लिये मुस्लिम आतताइयों ने हमारे मुंह में गौ मांस ठूसा था। कूका पंथ के हज़ारों लोग गौरक्षा के लिये तोप के गोलों से भून दिये गये हैं। कुछ मुस्लिम बादशाहों ने हिन्दुओं को अपने पक्ष में करने के लिये गौ-हत्या रोकने के आदेश दिए थे।1857 का दावानल गाय की चर्बी लगे कारतूसों को मुंह से खोलने के आदेश के कारण ही भड़का था। जिसकी भयानक ज्वाला में हज़ारों अँगरेज़, लाखों भारतीय, अंतिम मुग़ल शासक बहादुर शाह ज़फ़र का नाम मात्र का शासन, ईस्ट इण्डिया कंपनी के निज़ाम सहित भस्म हो गया। वेद का आदेश है कि गौ-हत्या करने वाले पातकी के प्राण ले लो। हिन्दू समाज के लिये ये बहुत बड़ी बात है। हम में से बहुत से लोगों के लिये तो ये जीवन-मरण का प्रश्न है।

आपको इख़लाक़ द्वारा गौहत्या नहीं दिखाई दी। ये आपके लिये खानपान का ही मामला है तो बहुत से हिन्दुओं के लिये ये मार-मिटाने का मामला है। आपको ये तक न सूझा कि अखलाक़ के वध की किसी भी रिपोर्टिंग में अख़लाक़ की गांव के लोगों से जानी-दुश्मनी का ज़िक्र नहीं है। गांव में सांप्रदायिक तनाव की भी कहीं चर्चा नहीं है। अख़लाक़ सामाजिक दृष्टि से भी इतना बड़ा, महत्वपूर्ण नहीं था कि साम्प्रदायिकता से भरे हुए हिन्दुओं की भीड़ मुसलमानों को सबक़ सीखने के लिये अकारण उसका वध कर दे। अख़लाक़ के वध को झक मार कर अकारण हत्या ही माना जाना सकता था मगर ''क्रिया की स्वाभाविक प्रतिक्रिया का सिद्धांत'' तो न्यूटन 1687 में ही प्रतिपादित कर गए थे। बरसों से शांत चले आ रहे गांव में सहसा प्राण लेने जैसी घटना अकारण नहीं हो सकती।

आप ये तक नहीं देख पाये कि ऐसी सोच के समाज में रहने वाला अख़लाक़ इतने भयानक परिणाम देने वाले पाप के लिये उत्सुक कैसे हो गया ? ये बहुत गंभीर बात है और इसकी छानफटक होनी चाहिए ? किसने धर्मान्तरित भारतीयों को अपने ही मूल से नफ़रत करना, अपने सदियों के संस्कारों को नकारना, अपने स्रोत-अपने उत्स पर थूकना सिखाया है ? आखिर अख़लाक़ सहित सभी भारतीय मुसलमान कुछ पीढ़ी पहले हिंदू ही थे। इसके पूर्वज भी उसी तरह गौ-रक्षक थे जैसे गौ-हत्यारों का वध करने वाले असंख्य वीर हैं। इन धर्मान्तरित लोगों में अपने मूल संस्कारों से इतनी घृणा कैसे आ गयी कि वो गौ-रक्षक से गौ-हत्यारे बन गये ? मुस्लिम नेतृत्व के चर्चित नाम दारुल उलूम नदवा के अली मियां और ऐसे अनेकों मुस्लिम नेता गाय की क़ुरबानी इस लिये उपयुक्त और आवश्यक बताते हैं कि ये उनके हिसाब से कुफ़्र मिटने के लिये अनिवार्य है। आप कभी भी इन दुष्टों की निंदा का प्रस्ताव तक नहीं तैयार कर पाये। अपने कभी एक बयान तक अभारतीयता उपजाने के विरोध में नहीं दिया। 

निश्चित रूप से भारत में न्याय-प्रणाली है और किसी को क़ानून अपने हाथ में लेने की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए मगर इसे क्या कहिये कि देश के अस्सी प्रतिशत लोगों के बीच में रहने वाले लोगों के नेतृत्व और उनके निर्देश पर चलने वालों को बहुसंख्यक समाज की मनोदशा की चिंता नहीं है। तो ऐसी प्रतिक्रिया को कैसे रोका जा सकता है ? ध्यान रहे कि गौहत्या करने वाले पातकी के प्राण लेने वाले को तो समाज पूजता है। टोहना-हरियाणा के पूज्य हरफूल जाट के बारे में आज भी लोकगीत गाये जाते हैं। इन्हें अंग्रेज़ों ने कसाईखाने नष्ट करने के आरोप में फांसी दी थी। वो गौहत्या रोकने के लिये बलिदान हो गए मगर इतिहास में अमर हो गए।

वैचारिक परिवर्तन एक पल में नहीं होते। शताब्दियों से धर्मान्तरित मुसलमानों को कट्टर बनाने के लिये तब्लीग़ी जमातें इस घृणा को फ़ैलाने में लगी हैं। मदरसे, भारतीय का मुस्लिम नेतृत्व भारत के मुसलमानों को अपनी हर परम्परा से नफ़रत करना सिखाता है। इन्हीं करतूतों के फलस्वरूप इख़लाक़ गाय की क़ुरबानी कर बैठा। ज्ञातव्य है कि उत्तर प्रदेश में गौ-हत्या पर प्रतिबन्ध है। क़ानून तोड़ने वाले को उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार ने 45 लाख रुपये का पुरस्कार दे दिया है। मायावती भी अख़लाक़ के परिवार का 11 लाख का तिलक करवा चुकी हैं। त्यागपत्र देने वाले महान लेखकों आप अगर अपने लिखे के अलावा भी कुछ पढ़ते होंगे तो  ये सब बातें आपने समाचारपत्रों में पढ़ी ही होंगी ? साहब जी, आप इतने मौन क्यों रह गए जैसे गोद में सांप रक्खा है और हिलना मना है। आप क्यों भारत तोड़ने पर उतारू समाज, संस्थाओं, लोगों के एजेंट बन गए हैं ? आख़िर आपको क्या हो गया है जो अपने ही थप्पड़ मार कर गाल लाल कर रहे हैं ? आपका पुरस्कार राशि लेने, राष्ट्रीय समाचारपत्रों में चर्चित होने, अपनी पुस्तकों का 24 भाषाओं करा कर अपने आप को स्थापित कराने के बाद पुरस्कार लौटने की घोषणा करना कैसे समझा जाये ? ये किसी धूर्त के दावत पेट भर कर खाने के बाद अगली सुबह ये घोषणा करने के बराबर है कि मैं तुम्हारी दावत नहीं रखूँगा और शौचालय में खाया-पिया निकाले दे रहा हूँ 

तुफ़ैल चतुर्वेदी                              

                

जम्मू से पकडे गये नावेद के बारे में कुछ बातचीत

ख़ासा स्मार्ट, परिवार या पास-पड़ौस के ही शरारती लड़के जैसा किशोर, अभी मसें भी नहीं भीगीं, मीठी मुस्कराहट बिखेरता चेहरा और उदगार " मैं यहाँ हिन्दुओं को मारने आया हूं, मुझे ऐसा करने में मज़ा आता है " ये वर्णन जम्मू के नरसू  क्षेत्र में बीएसएफ की एक बस पर ताबड़तोड़ फायरिंग के बाद गांव वालों की साहसिक सूझ-बूझ से दबोचे गये एक आतंकवादी का है। उसके जैसा ही एक हत्यारा मारा भी गया। इस पाकिस्तानी आतंकी की कई स्वीकारोक्तियों के अनुसार उसका नाम क़ासिम ख़ान या उस्मान या नावेद...ऐसा कुछ है और उसकी आयु भी 16 वर्ष से 20 वर्ष के बीच कहीं है। ये शायद वो भारतीय न्यायव्यवस्था के समक्ष अपने को नाबालिग़ बताने के लिए कर रहा है। 

भारत आकर ऐसी स्वीकारोक्ति करने वाले इस पाकिस्तानी आतंकवादी के मानस को समझना इस लिये भी आवश्यक है कि उसने कहा है " मैं यहाँ हिन्दुओं को मारने आया हूं, मुझे ऐसा करने में मज़ा आता है "। उसके कथन के दो भाग हैं। पहला " मैं यहाँ हिन्दुओं को मारने आया हूँ " यानी आप होंगे जाटव, कुर्मी, राजपूत, यादव, जाट, बाल्मीक, ब्राह्मण, बनिये इत्यादि कोई भी मगर आपको मारने आने वाले दुश्मन को आपकी वो असली पहचान पता है जिसे आप जान कर भी नहीं जानना चाहते। आप अपनी नज़र में पिछड़े, अन्त्यज, अनुसूचित, सवर्ण कोई तीसमारखां हों मगर उसके और उसकी सोच वालों के लिये आप सब एक हैं। वो यहाँ जम्मू के डोगरे, पंजाबी, गुजरती, मराठी, तमिल, तेलगू, मलयाली, कन्नड़, बिहारी, असमी, नगा, मणिपुरी, बंगाली इत्यादि प्रान्त के किसी निवासी को मारने नहीं आया। न ही वो बाल्मीक, यादव, जाटव, ब्राह्मण, गूजर, राजपूत,  जाट, वैश्य,  तेली इत्यादि किसी जाति के व्यक्ति को मारने आया है। वो हिन्दुओं को मारने आया है। यहाँ क्या ये सवाल अपने आप से पूछना उचित और आवश्यक नहीं है कि दुश्मन के लिये आप सब एक हैं तो आप सब आपस में एक क्यों नहीं हैं ? एक इस्लामी आतंकी की दृष्टि में हम सब जातियों में बंटे समाज नहीं है बल्कि हिन्दू हैं तो हम इससे निबटने के लिये केवल और केवल हिन्दू क्यों नहीं हैं ?

दूसरे उसने कहा है " मुझे ऐसा करने में मज़ा आता है " अर्थात ये एक विक्षिप्त उन्मादी का ही किया एक काम भर नहीं है अपितु लगातार की जा रही घटनाओं की एक अटूट श्रंखला है। वो पाकिस्तान से आया है। भारत का विभाजन कर बनाये गये देश पाकिस्तान में करोड़ों हिन्दुओं ने वहीँ रहने को प्राथमिकता दी थी। इस नरपिशाच के "मुझे ऐसा करने में मज़ा आता है" से मतलब ये है कि ये और उसके जैसे राक्षसों को पाकिस्तान में ऐसा करते रहने का अभ्यास है। आख़िर " मज़ा आता है " कथन इस बात का द्योतक है कि उसके लिये ये एक अनवरत प्रक्रिया है। बंधुओ ! पाकिस्तान में करोड़ों हिन्दू छूटे थे। विभाजन के बाद पाकिस्तानी जनसँख्या में हिन्दुओं का प्रतिशत दहाई के आंकड़ों में था।  अब पाकिस्तान अपनी जनसंख्या में हिन्दू 1 प्रतिशत से भी कम क्यों दिखता है ? हमारे वो सारे भाई कहाँ गये ? उनका क्या हाल हुआ ? इस और इस जैसे इसके साथी लोगों ने पाकिस्तान में बचे हिन्दुओं की क्या दुर्दशा की ? आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का बहुत प्रसिद्द कथन है "साहित्य समाज का दर्पण है" आइये इस दर्पण को देखते हैं। पाकिस्तान के शाइर रफ़ी रज़ा साहब का एक शेर देखिये। 

तलवार तो हटा मुझे कुछ सोचने तो दे 
ईमान तुझ पे लाऊँ कि जज़िया अदा करूँ 

कोई सामान्य घटना शेर में नहीं ढलती। ये करोड़ों लोगों के साथ हुआ व्यवहार है जिसे रफ़ी रज़ा साहब ने बयान किया है। यही वो व्यवहार है जिसके कारण विश्व भर में इस्लाम का प्रसार हुआ है। आतंक एक उपकरण है और इसका प्रयोग इस्लाम में अरुचि रखने वालों को डराने और इस्लाम की धाक जमाने के लिये किया जाता है। बंधुओ ये जम्मू में हुई एक घटना भर नहीं है बल्कि सैकड़ों वर्षों से अनवरत चली आ रही घटनाओं की अटूट श्रंखला है। अफ़ग़ानिस्तान की सीमा पर एक पहाड़ का नाम ही हिन्दू-कुश है। इस शब्द का अर्थ है वो स्थान जहाँ हिन्दू काटे गये। अफ़ग़ानिस्तान हिन्दू क्षेत्र था और उसका इस्लामी स्वरूप अपने आप नहीं आया है। ऐसे ही हत्यारे वहां भी कार्यरत रहे हैं और उनके लगातार प्रहार करते रहने, राज्य के इन बातों पर ध्यान न देने, इन दुष्टों पर भरपूर प्रहार करके इन्हें नष्ट न करने का परिणाम अफ़ग़ानिस्तान का वर्तमान स्वरुप है। पाकिस्तान के ख़ैबर-पख्तूनख्वा क्षेत्र के चित्राल जनपद में कलश जनजाति समूह रहता है। ये बहुदेव-पूजक दरद समूह के लोग हैं। दरद योद्धाओं का वर्णन महाभारत में मिलता है। दुर्योद्धन के लिये कर्ण ने जो विजय यात्रा की है उसमें दरद लोगों से कर लेने का उल्लेख है। इस क्षत्रिय जाति के लोग महाभारत में कौरवों के गुरु कृपाचार्य के नेतृत्व में लड़े थे। महाराज युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में भी इनका उल्लेख है। अर्जुन की सेना में ये लोग साथ थे। ईरान सहित ये सारा क्षेत्र महाराज चन्द्र गुप्त मौर्य के शासन क्षेत्र के किनारे का नहीं अपितु मध्य का भाग रहा है। ये लोग भारत-ईरानी मिश्रित मूल की भाषा कलश बोलते हैं। पड़ौस के देश अफ़ग़ानिस्तान के पूर्वी प्रदेश नूरिस्तान जिसे पहले काफ़िरिस्तान कहा जाता था, के निवासी भी इसी भाषा को बोलते थे। उनकी भी संस्कृति हमारी तरह बहुदेव पूजक थी। 1895 में यहाँ के निवासियों को ऐसे ही नृशंस हत्यारों ने मुसलमान बनाया और यहाँ की भाषा, संस्कृति, मान्यताओं को बलात बदला। ज्ञान-शौर्य से चमचमाते माथों वाला यह समाज-क्षेत्र, आज मुसलमान हो चुका है और तालिबान की ख़ुराक बन कर विश्व को जिहाद, आतंक, अशांति का संदेश दे रहा है। 

 बंधुओ ! ये बदलाव एक दिन में नहीं आये। ये सब कुछ सायास सोची-समझी गयी कट्टरता का परिणाम है। आख़िर आत्मघाती दुःसाहस अनायास नहीं हो सकता, निरंतर नहीं हो सकता, सदियों नहीं हो सकता। इसकी तह में जाना, इससे जूझने, निबटने की योजना बनाना सुख-चैन से रहने के लिये आवश्यक है। ये आतंकी स्पष्ट रुप से यहां आने का कारण बता रहा है कि " मै यहाँ हिन्दुओं को मारने आया हूं " । कोई बुरे से बुरा हत्यारा भी अकारण हत्याएं नहीं करता। उनकी हत्या नहीं करता जिन्हें वो जानता ही नहीं है। अनदेखे व्यक्तियों पर हमला कौन सी मानसिकता का व्यक्ति कर सकता है ? ऐसे हमले भारत, भारतवासियों पर ही नहीं विश्व भर में सैकड़ों वर्षों से हो रहे हैं। इसका प्रारम्भ इस्लाम की इस मनमानी सोच से हुआ है कि ख़ुदा एक है, उसमें कोई शरीक नहीं है, मुहम्मद उसका अंतिम पैग़म्बर है। जो इसको नहीं मानता वो काफ़िर है और काफ़िर वाजिब-उल-क़त्ल हैं।

इस विचारधारा का जन्म मक्का में हुआ था और मुहम्मद जी ने अपनी ये सोच मक्का वासियों को मनवाने की कोशिश की। उन्होंने नहीं मानी और मुहम्मद जी के प्रति कड़े हो गए तो मुहम्मद जी भाग कर मदीना चले गए। वहां शक्ति जुटा कर सैन्य बल बनाया और फिर इस्लाम के प्रारंभिक लोगों से ही इन संघर्षों का बीज पड़ा। प्रारम्भिक इस्लामी विश्वासियों ने ही ये हत्याकांड मक्का-मदीना से प्रारम्भ करते हुए इसका दायरा लगातार बड़ा किया था, बढ़ाया था। मुहम्मद और उनके बाद के चार ख़लीफ़ाओं ने इसकी व्यवस्था की कि ऐसा अनवरत चलता रहे और इस्लाम का तलवार से प्रसार होता रहे। परिणामतः कुछ लाख की आबादी के तत्कालीन अरब में चालीस साल में हज़ारों अमुस्लिमों का नरसंहार हुआ और चार में से तीन खलीफा की हत्या हुई । इस्लाम का प्रारंभिक खिलाफत का दौर, तथाकथित स्वर्णिम काल मनुष्यता  का काला युग था। उन लोगों ने आतंक का उपयोग कर लोगों को धर्मान्तरित किया। उसी दौर को विश्व भर में लाने के प्रयास फिर से चल रहे हैं। 
 
इस हत्यारी सोच के बीज मूल इस्लामी ग्रंथों में हैं। क़ुरआन, हदीसों में अमुस्लिम लोगों की हत्या करने, उन्हें लूटने के अनेकों आदेश हैं। ऐसे हत्यारों को मारे जाने पर जन्नत मिलने और वहां ऐश्वर्यपूर्ण जीवन  आश्वासन भी इन्हीं ग्रंथों में हैं। कुछ उल्लेख दृष्टव्य हैं। 

काफिरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { 8-39 }
ओ मुसलमानों तुम गैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { 9-123 }
और तुम उनको जहां पाओ कत्ल करो { 2-191 }
ऐ नबी !  काफिरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो. उनका ठिकाना जहन्नुम है { 9-73 और 66-9 }
अल्लाह ने काफिरों के रहने के लिये नर्क की आग तय कर रखी है { 9-68 }
उनसे लड़ो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं, न आखिरत पर; जो उसे हराम नहीं जानते जिसे अल्लाह ने अपने नबी के द्वारा हराम ठहराया है. उनसे तब तक जंग करो जब तक कि वे जलील हो कर जजिया न देने लगें { 9-29 }
तुम मनुष्य जाति में सबसे अच्छे समुदाय हो, और तुम्हें सबको सही राह पर लाने और गलत को रोकने के काम पर नियुक्त किया गया है { 3-110  }
जो कोई अल्लाह के साथ किसी को शरीक करेगा, उसके लिये ने जन्नत हराम कर दी है. उसका ठिकाना जहन्नुम है { 5-72 }
मुझे लोगों के खिलाफ तब तक लड़ते रहने का आदेश मिला है, जब तक ये गवाही न दें कि अल्लाह के सिवा कोई दूसरा काबिले-इबादत नहीं है और मुहम्मद अल्लाह का रसूल है और जब तक वे नमाज न अपनायें और जकात न अदा करें [ सहीह मुस्लिम, हदीस संख्या 33 }

अफ़ज़ल गुरू, अजमल कसाब, याक़ूब मेमन, नावेद, बोको हराम और आई एस आई एस के आतंकी  सब एक ही श्रंखला के राक्षस हैं। ये उसी हत्यारे दर्शन   में विश्वास रखते हैं और वही कर रहे है जो इनके प्रारम्भिक लोगों ने किया था और भारत में जिसकी शुरुआत हिन्द-पाक के मुसलमानों के चहेते हीरो मुहम्मद बिन कासिम ने की थी। इस हत्यारे आक्रमणकारी ने इस्लामी इतिहासकार के ही अनुसार 60 हज़ार लोगो (महिलाओं सहित) बंदी बनाया।  मुहम्मद बिन कासिम ने इस्लामी कानून के मुताबिक़ लूट का 1/5 हिस्सा दमिश्क में खिलाफत निजाम को भेजा और बाकी मुस्लिम फौज में बांटा { reference- al-Baladhuri in his book The Origins of the Islamic State }। आज अफ़ज़ल गुरू, अजमल कसाब, याक़ूब मेमन, नावेद जो कर रहे हैं वो उनकी ही नहीं इस्लाम की दृष्टि में भी जन्नत का मार्ग खोलने का काम है। कई मुसलमान बड़े आराम से यह कह देते है ये या बोको हराम, आई एस आई एस के लोग जो कर रहे हैं वह इस्लाम नहीं है। बंधुओ ये केवल तब तक सायास बोला जाने वाला झूट है जब तक खुल कर कहने और सारे अमुस्लिम समाज को समाप्त करने का अवसर नहीं आ जाता। 

ऐसी हत्यारी सोच ज्ञान के प्रकाश से समाप्त हो सकती थी अतः सावधान इस्लामी आचार्यों ने ज्ञान-विज्ञान को इसी लिये वर्जित घोषित कर दिया। 900 साल पहले मौलाना गजाली ने गणित को शैतानी ज्ञान बता कर वर्जित कर दिया था। अब उसी पथ पर आगे बढ़ते हुए अल-बग़दादी के ख़िलाफ़त निज़ाम ने PHILOSOPHY और CHEMISTRY पढने पर प्रतिबंध लगा दिया है। कोढ़ में खाज ये है कि पाकिस्तान की उजड़ी-बिखरी राजनैतिक स्थितियां, देश में आयी मदरसों की बाढ़, सऊदी अरब-क़तर से उँडेले जाते खरबों पेट्रो डॉलर ऐसे संगठनों के लिये अबाध भर्ती की परिस्थितियां बनाते हैं। इस या इस जैसी विचारधारा को चुनौती न देने के परिणाम व्यक्ति, देश और सम्पूर्ण मानवता हर स्तर पर भयानक होते हैं। अभी कुछ दिन पहले दुबई की एक घटना के बारे में जानना उपयुक्त होगा। एक पाकिस्तानी मूल का परिवार समुद्र में नहाने के लिये गया। 20 वर्ष की बेटी गहरे पानी में फंस गयी। रक्षा-कर्मी दल के लोग बचाव के लिये बढे तो उसके पिता ने उन्हें यह कह कर रोक दिया। ग़ैर मर्द बेटी को छुएं इससे तो बेहतर है कि वो डूब कर मर जाये। वो लड़की मर गयी। ये मृत्यु उसके पिता के कारण नहीं हुई है। ये मृत्यु इस्लाम की सोच के कारण हुई है। इसका पाप इस्लाम के सर है। 

अंत में प्रेस के वाचालों, कोंग्रेसियों, सैक्यूलरवाद की खाल ओढ़े वामपंथियों भेड़ियों का एक सामान्य दावा भी परखना चाहूंगा। इन ढपोरशँखोँ के अनुसार आतंकियों का कोई मज़हब नहीं होता ? चलिये मान लेते हैं, वाक़ई नहीं होता होगा मगर क्या कीजिये कि हम सबने अमरनाथ यात्रा पर घात लगा कर आतंकी हमले देखे-सुने हैं, मंदिरों पर हमले देखे-जाने हैं। क्या कभी किसी ने कभी हजयात्रियों पर आतंकी हमला सुना है ? क्या वाक़ई आतंकियों का कोई मज़हब नहीं होता ? वो सारे शरीर के बाल उतरवा कर अपनी समझ से ग़ुस्ल, नमाज़ अदा कर नास्तिकता के पथ पर जाने के लिये या इस्लाम छोड़ने के लिये निकलते हैं ? 

ये सारे काम हमारे पड़ौसी देश पाकिस्तान से संचालित हो रहे हैं।  ज़ाहिर है पाकिस्तान हमारा पड़ौसी देश है और हम पड़ौसी बदल नहीं सकते। हम पड़ौसी को गाँधीवादी मार्ग पर चलते हुए उसकी चौखट पर फूल तो रख सकते हैं और बंधुओ ऐसी स्थितियों में फूल भेंट करने की सर्वोत्तम जगह क़ब्र है। ये भयानक, लोमहर्षक बदला लेने, उसकी योजना बनाने का क्षण है। यहाँ एक सवाल नावेद को पकड़ने वाले लोगों से भी करना है। क्या आपके घर में कोई चाक़ू, पेंचकस, हथौड़ा नहीं था। एक हत्यारा आतंकी समूचा-साबुत पुलिस को कैसे मिल गया ? आपसे उसके हाथ पैरों में 10-20 छेद नहीं किये गये ? उसके दोनों हाथ के अंगूठे नहीं काटे गये ? उसे पता तो चले चोट क्या होती है ? दर्द क्या होता है ? इस रास्ते पर अगले बढ़ने वाले को भी ये ध्यान रहे भारतीय केवल बिरयानी ही नहीं खिलते, ख़ून के आंसू भी रुलाते हैं।  

 तुफ़ैल चतुर्वेदी