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शुक्रवार, 31 जुलाई 2015

याक़ूब मेनन की फांसी


क्या सौ करोड़ के राष्ट्र के लिये अपने एक व्यक्ति का जीवन-मरण गंभीर प्रश्न होना चाहिए ? मेरी दृष्टि में निश्चित रूप से होना चाहिए। राष्ट्र आपस में सघन रूप से गुंथा हुआ समाज नहीं है तो उसे बनना -बनाना राष्ट्र की संस्थाओं अर्थात विधायिका, कार्य-पालिका, न्याय-पालिका और सबसे बड़ी संस्था धर्म का लक्ष्य होना चाहिए। राष्ट्र के हर घटक के ध्यान में अपनी तथा अपने परिवार की उन्नति के साथ-साथ राष्ट्र की उन्नति का विचार निश्चित रूप से होना ही चाहिए। कोई राष्ट्र अपने घटक व्यक्ति का ही तो महान-विराट समुच्चय है। आज दो घटनायें चर्चा का विषय हैं। पहली मिसाइल-मैन भूतपूर्व राष्ट्रपति अबुल पाकिर ज़ैनुलआब्दीन अब्दुल कलाम का रामेश्वरम में अंतिम संस्कार तथा याक़ूब मेनन की प्रातः काल नागपुर जेल में फांसी। महामहिम अब्दुल कलाम साहब को कल दिन भर श्रद्धांजलि देने के लिये मीलों लम्बी लाइनें लगी रहीं। चिलचिलाती धूप में लोग तपते रहे। उनके स्वर्गवास का समाचार मिलते ही हर राष्ट्रीय-भारतीय का दिल भरा आया, करोड़ों की आँखें ऐसे डबडबा आयीं जैसे परिवार के मुखिया की मृत्यु हो गयी हो उधर याक़ूब मेनन की फांसी होने की सूचना से हर राष्ट्रीय-भारतीय का दिल प्रसन्नता से झूम उठा।

महामहिम अब्दुल कलाम साहब उसी भारतीय मुस्लिम वर्ग के प्रतिनिधि थे जिसे अरबी मानसिकता का मुसलमान बनाने, जिस पर अरबी दासता लादने के लिये इस्लामी जमातें, देवबंदी समूह लगे हुए हैं। जो भारतीय इस्लामी आतंक, भय, दबाव, लालच जैसे किसी भी कारण से कभी मुसलमान बन गए मगर जिनके नाम और नमाज़ के अलावा जिनका दिल-दिमाग़ आज भी भारतीय है। जिन्हें मंदिर की छाँव में बैठने से संकोच नहीं होता। जो अपने हिंदू दोस्त के साथ उसी उल्लास से होली खेलते हैं, जिस उत्साह से वो ईद की सिंवईयां खाने उनके घर आता है। लगभग हर इस्लामी चिंतक ने जिनको देख कर अपनी छाती कूटी है। कुफ़्र-कुफ़्र कह के जिसे अस्ली इस्लाम के पाले में खेंचने के लिये हर प्रकार से ज़ोर लगाया है। भारत में रह कर अराष्ट्रीय सोच से भरे, बाबर जैसे हत्यारे से अपना रिश्ता जोड़ने के लिये उत्सुक-आतुर ऐसे लोगों को देखना चाहिए कि राष्ट्र अपने लाड़लों के लिये कितना विह्वल होता है। दूसरी तरफ याक़ूब मेनन की फांसी है। उसे फांसी किसी आईएसआईएस या तालिबान के हत्यारे ने नहीं अपितु स्वतंत्र न्यायपालिका ने दी है। सावधान और चौकन्नी भारतीय न्यायपालिका प्राणदंड दुर्लभतम में भी दुर्लभ मामलों में देती है। सेशन, हाई कोर्ट में अपील, सुप्रीम कोर्ट में अपील, राष्ट्रपति से क्षमादान की याचिका और उसे निरस्त कर देने के बाद फिर से पुनरीक्षण याचिका यानी हर तरह से सिक्काबंद, ठोस व्यवस्था कि कोई निर्दोष न मर जाये।

फिर भी याक़ूब मेनन के मृत्युदंड के फ़ैसले पर कुछ लोग मीडिया में हाय-हाय कर रहे हैं। इस फ़ैसले की इस दृष्टि से भी आलोचना की जा रही है कि जब भारत के भूतपूर्व प्रधानमंत्री के हत्यारों को क्षमादान दिया जा सकता है तो याक़ूब मेनन को क्यों नहीं ? क्या उसे इस लिये प्राणदंड दिया गया है कि वो मुसलमान था ? आइये इस चीख़-पुकार की छान-फटक की जाये।

मुंबई के सीरियल बम धमाकों 270 लोग मारे गए, 1400 बुरी तरह घायल हुए। किसी देश के नागरिकों पर ऐसा हमला जिसमें 270 लोग मारे जायें और हज़ारों बुरी तरह घायल हो जायें, किसी भी नियम-क़ानून के अनुसार राष्ट्र पर हमला है। किसी राजनेता, सांसद पर प्राणघातक हमला व्यक्ति पर हमला है और उसके हत्यारे पर इसी दृष्टि से अभियोग चलाया जायेगा। पंजाब में फैले पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित उग्रवाद के दौरान राजनेताओं सहित हज़ारों लोगों की हत्याएं हुईं और उन सब के हत्यारों पर व्यक्तिगत हत्याओं के अभियोग चलाये गए। याक़ूब मेनन का अपराध परिमाण यानी हताहतों की संख्या की दृष्टि से ही बहुत बड़ा नहीं है अपितु देशद्रोह भी है।

ये भावावेश में आ कर की गयी हत्या नहीं है। इसके षड्यंत्रकारी हत्यारों ने महीनों बहुत ठन्डे दिमाग़ से विदेशी शत्रुओं से मिल कर विध्वंस की योजना बनायी। ट्रेनिंग के लिये लोगों को विदेश भेजने के लिये षड्यंत्र रचा। नक़ली पासपोर्ट बनाये। विदेश से स्मगल कर शस्त्र एकत्र किये। इस अभियुक्त ने तो अपने घर में बमों का निर्माण भी किया, विभिन्न जगहों पर हथगोले और अन्य शस्त्रों का वितरण किया। अपनी तरफ से यथासंभव भारत को चोट पहुँचाने का भरसक काम किया। ये व्यक्ति न केवल जघन्य हत्याओं का अपराधी था बल्कि देश का गद्दार भी था । इसका देशद्रोह की श्रेणी का अपराध, जघन्य हत्याओं में सक्रिय संलिप्तता न्यायपालिका के सामने स्थापित है। क्या इस व्यक्ति के अपराध करने के बाद पुलिस और अन्य जाँच एजेंसियों का सहयोग करने से उसके अपराध की जघन्यता काम हो जाती है ? स्वयं याक़ूब मेनन ने न्यायालय में स्वीकार किया था कि इस अपराध में पाकिस्तानी एजेंसियां, उसका भाई टाइगर मेनन, दाऊद इब्राहिम इत्यादि सम्मिलित थे। इसकी इस अपराध में संलिप्तता स्वयं उसी के बयानों से कोर्ट के सामने स्थापित हुई है। माना कि ये उसने क्षमादान के लालच में किया था मगर क्या इससे ये अपराध संज्ञेय नहीं रहते ?

पिछले दिनों चर्चा में था कि भारत के अनेक दलों में घूम आये क्षणे-तुष्टा क्षणे-रुष्टा लालबुझक्कड़ राजनेता के माध्यम से दाऊद ने भारत में शरण का प्रस्ताव रखा था। कल्पना कीजिये कि दाऊद भी इसी तरह का प्रस्ताव दे कर भारत आ जाता है। कोर्ट से अन्य अपराधों के अलावा इन अपराधों में मृत्युदंड पाता है। क्या लालू प्रसाद यादव, नितीश कुमार, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, आज़म खान, अबू आज़मी, कांग्रेस के सचिन पायलेट, शकील अहमद, मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन के अकबरुद्दीन ओवैसी-असदुद्दीन ओवैसी, साम्यवादी पार्टी के प्रकाश करात, वृंदा करात, आप के अरविन्द केजरीवाल, आप से निष्काशित प्रशांत भूषण, ममता बनर्जी जैसे मुस्लिम वोटों के लिये लालायित राजनेता उसके पक्ष में इसी तरह खड़े हो जाते ? भारतीय जनता पार्टी के अतिरिक्त देश के प्रमुख राजनैतिक दल मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति में इस हद तक जाने के लिये तैयार हैं ? उन्हें बहुसंख्यक समाज के वोटों की बिल्कुल आवश्यकता नहीं रह गयी है ? उन्हें इस बात की बिल्कुल चिंता नहीं है कि भारत का बहुसंख्यक वोटर उन्हें दुत्कार भी सकता है। क्या राष्ट्र रक्षा का दायित्व केवल भारतीय जनता पार्टी का है ? देशबन्धुओ इन राजनेताओ के किये गए इस प्रश्न का उत्तर आपको देना है।

यहाँ एक प्रश्न मेरे मन में भी उठ रहा है। आतंकवादियों के अनुसार जिहाद करने वाले ग़ाज़ियों और जिहाद के रास्ते पर शहीद हो जाने वालों को मरने के बाद जन्नत, उसमें भव्य हीरे-माणिक-पन्ने-मोती जड़े भवन, शराब की नहरें, 72 हूरें, 70 गिल्मां { विभिन्न और विशिष्ट सेवाओं के लिए कमउम्र के सुन्दर लड़के } और अन्य सभी भोग के साधन मिलते हैं। तो जब ये श्रेष्ठ स्थान पाने का समय आ जाता है तो विभिन्न न्यायालयों में अपीलें, उसे रोकने की बार-बार कोशिशें, मीडिया के सामने हाय-हाय क्यों की जाती है ? क्या ये लोग क़ुरआन के दावे, 'क़ुरआन अल्लाह की ओर से मनुष्य के लिये भेजा गया अंतिम सत्य है' पर पुनर्विचार कर रहे हैं ? क्या इनका विश्वास विचलन के मार्ग पर है ? शेयर बाजार में पैसा लगाने-न लगाने, इनश्योरेन्स पॉलिसी लेने-न लेने, मोबाइल पर निकाह करने-न करने , T.V. देखने-न देखने पर भी इस्लामी फ़तवा देने वाले देवबंदी मुल्ला कहाँ हैं ? वो इन पथभ्रष्टता का शिकार हो रहे मुसलमानों को ईमान ताज़ा करने यानी ख़ुद को दुबारा मुसलमान बनाने, अपनी बीबी से दुबारा निकाह पढ़वाने का फ़तवा क्यों नहीं दे रहे ?