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मंगलवार, 20 जून 2017

तीन सूचनाएं बल्कि चार घोषणाएँ

तीन सूचनाएं बल्कि चार घोषणाएँ जानने योग्य हैं। पहली..... लंदन में दो जगह मस्जिदों से निकलते हुए नमाज़ियों पर अंग्रेज़ चालकों ने गाड़ी चढ़ा दीं। यह उसी तरह हुआ जिस तरह अभी कुछ दिन पूर्व टेम्स नदी पर in the name allah कह कर इस्लामी आतंकवादियों ने अंग्रेज़ों को मारा था। यह लोग चिल्ला रहे थे कि वह सभी मुसलमानों को मार डालेंगे। दूसरी घटना..... अमरीका के वर्जीनिया क्षेत्र में नाबरा हुसैन नाम की लड़की अपने साथियों के साथ रोज़ा खोलने के बाद टहल रही थी। उसके गिरोह पर एक कार सवार ने भद्दी बातें कहीं। यह लोग भाग कर स्थानीय मस्जिद में छुप गये। नाबरा हुसैन पीछे रह गयी। बाद में ढूंढने पर उसकी लाश रिजटॉप के तालाब में पायी गयी। फ़ेयरफ़ैक्स काउंटी की पुलिस ने इस अपराध में इस हत्या के लिये डार्विन को गिरफ़्तार कर लिया है। तीसरी घटना..... महामहिम राज्यपाल तथागत राय का बयान है जिसमें उन्होंने कहा है कि बिना गृहयुद्ध के भारत में इस्लामी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। इन सूचनाओं को घोषणा कहने का कारण है। पहली दो घटनाओं के योद्धा अपना लक्ष्य घोषित ही कर रहे थे अतः यह सूचनाएं घोषणा का दर्जा रखती हैं। नाबरा हुसैन का वध किस लिये हुआ ? क्या यह 9-11 को इस्लामियों द्वारा ध्वस्त किये गए ट्विन टावर के ख़ाली स्थान जिसे ग्राउंड ज़ीरो कहा जाता है, पर मस्जिद स्थापित करने के भरसक प्रयासों का परिणाम है ? ज्ञातव्य है कि इसके बाद अमरीका में इस्लाम के ख़िलाफ़ के लहर चल निकली है। यह इस्लामी परम्परा के अनुसार ही है कि जहाँ-जहाँ इस्लाम ने काफ़िरों के मंदिर, चर्च, सिनेगॉग इत्यादि तोड़े हैं वहां इस्लाम की ताक़त दिखने के लिये मस्जिदें बनायीं जायें। दिल्ली में क़ुतुब मीनार के प्रांगण में स्थित क़ुव्वतुल इस्लाम मस्जिद प्रत्यक्ष प्रमाण है। इस मस्जिद में शिलालेख ही स्थापित है कि इस मस्जिद का निर्माण 27 हिन्दू व जैन मंदिरों को तोड़ कर उनके अवशेषों पर किया गया है। राम-जन्मभूमि, कृष्ण-जन्मभूमि, काशी-विश्वनाथ मंदिरों का विध्वंस स्वयं इस्लामी इतिहास से प्रमाणित है। त्रिपुरा के राज्यपाल महामहिम तथागत राय अपनी बेबाकी के लिये प्रसिद्द हैं। देशद्रोही याक़ूब मेनन के जनाज़े में सम्मिलित हज़ारों इस्लामियों के संदर्भ में उन्होंने कहा ही था कि पुलिस, प्रशासन को इन लोगों पर दृष्टि रखनी चाहिये। यह लोग संभावित आतंकवादी हैं। क़ुरआन में वर्णित आख़िर इस चिंतन को इस्लामी ही नहीं पढ़ते बल्कि अमुस्लिम भी पढते हैं। ओ मुसलमानों तुम ग़ैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { 9-123 } और तुम उनको जहां पाओ क़त्ल करो { २-191 } काफ़िरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { 8-39 } ऐ नबी ! काफ़िरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो. उनका ठिकाना जहन्नुम है { 9-73 और 66-9 } अल्लाह ने काफ़िरों के रहने के लिये नर्क की आग तय कर रखी है { 9-68 } उनसे लड़ो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं, न आख़िरत पर; जो उसे हराम नहीं समझते जिसे अल्लाह ने अपने नबी के द्वारा हराम ठहराया है. उनसे तब तक जंग करो जब तक कि वे ज़लील हो कर जज़िया न देने लगें { 9-29 } मूर्ति पूजक लोग नापाक होते हैं { 9-28 } जो कोई अल्लाह के साथ किसी को शरीक करेगा, उसके लिये अल्लाह ने जन्नत हराम कर दी है. उसका ठिकाना जहन्नुम है { 5-72 } तुम मनुष्य जाति में सबसे अच्छे समुदाय हो, और तुम्हें सबको सही राह पर लाने और ग़लत को रोकने के काम पर नियुक्त किया गया है { 3-110 } चौथी सूचना बल्कि घोषणा यानी इन तीनों पर अब मेरा आंकलन यह है कि " इस्लाम की सच्चाई को लोग समझने लगे हैं और उससे निबटने के प्रयास करने लगे हैं" अब जज़िया लौटाने, नबी की हराम-हलाल की छानफटक के दिन हैं। मनुष्य जाति का सबसे अच्छा समुदाय कौन सा है इसे मनुष्य समाज स्वयं तय करना चाहता है। ईमान और आख़िरत प्रारंभ में ही मानवता की कसौटी पर कसा जाना चाहिए था। देर आयद दुरुस्त आयद। तुफ़ैल चतुर्वेदी

रविवार, 11 जून 2017

****अल्लाह के लिये****

****अल्लाह के लिये**** शनिवार यानी परसों रात लंदन में टेम्स नदी पर स्थित लंदन ब्रिज पर एक वैन में सवार आतंकियों ने पहले तो यथासंभव कुचल कर लोगों को मारा। जब वैन रेलिंग से टकरा कर रुक गयी तो सवार लोग लम्बे-लम्बे चाक़ू निकाल कर बोरो स्ट्रीट मार्किट की ओर दौड़ गए। वहां पर जो उनके सामने आया, उस पर उन्होंने चाक़ू से घातक वार किये। चाक़ू लहराते हमलावर चिल्ला रहे थे 'दिस इस फ़ॉर अल्लाह'। घटना की ज़िम्मेदारी अभी तक किसी ने नहीं ली है मगर आई.एस. ने शनिवार को अपने समर्थकों को ऑनलाइन संदेश भेज कर ट्रक, चाक़ू और बंदूक़ों से हमले करने की अपील की थी। कोई सामान्य व्यक्ति जो अपनी रोज़ी-रोटी के लिए रोज़ अपने बच्चे को चूम कर, अपनी पत्नी को गले लगा कर घर से निकलता है, अचानक वहशी दरिंदा कैसे बन सकता है ? एक ऑनलाइन मेसेज पढ़ते ही लोगों में एक पल में इतना बड़ा बदलाव कैसे आ सकता है ? मनुष्य से राक्षस बनने की यात्रा एक क्षण में कैसे हो सकती है ? अब मानव सभ्यता को बच्चे के मानसिक विकास के लिए विकसित की गयीं विभिन्न प्रणालियों की परिपक्वता पर फिर से विचार करना ही पड़ेगा। आख़िर मानव सभ्यता ने विकास की यात्रा में ऐसे आदेशों को पढ़ने-मानने की छूट कैसे दे रखी है ? क्या मनुष्यता इसके ख़तरे समझने की क्षमता खो बैठी है ? ओ मुसलमानों तुम गैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { 9-123 } और तुम उनको जहां पाओ कत्ल करो { २-191 } काफिरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { 8-39 } ऐ नबी ! काफिरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो. उनका ठिकाना जहन्नुम है { 9-73 और 66-9 } यह हत्यारे जिस पुस्तक क़ुरआन को ईश्वरीय पुस्तक मानते हैं और उससे प्रभावित हैं यह उसकी पंक्तियाँ हैं। उसके अनुकरणीय माने जाने वाले लोगों ने इन हत्यारों की तरह ही शताब्दियों से ऐसे हत्याकांड किये हैं बल्कि वही इन हत्यारों के प्रेरणा स्रोत हैं। प्रथम विश्व युद्ध के समय तुर्की ने 15 लाख से अधिक आर्मेनियन ईसाइयों को इस्लाम की दृष्टि में काफ़िर होने के कारण मार डाला। 1890 में अफ़ग़ानिस्तान के क्षेत्र काफ़िरिस्तान के काफ़िरों को जबरन मुसलमान बनाया गया और उसका नाम नूरिस्तान रख दिया गया। विश्व भर में 1400 वर्षों से की जा रहीं ऐसी अनंत घटनाओं के प्रकाश में स्पष्ट है कि इस्लाम उन सबसे, जो मुसलमान नहीं है, नफ़रत करता है और उन्हें मिटाना चाहता है। इसके बावजूद इंग्लैंड के राष्ट्र-राज्य ने लंदन में शरिया ज़ोन बनाने की अनुमति दी। शरिया ज़ोन क्या होते हैं ? शरिया ज़ोन वह क्षेत्र ही नहीं है जहाँ सुअर का मांस नहीं बेचा जा सकता या जहाँ केवल हलाल मांस ही बेचा जा सकता है बल्कि जहाँ इस चिंतन के अनुसार जीवनयापन करना क़ानूनी और अनिवार्य है। जहाँ इस चिंतन की विषबेल को फैलने के लिये क़ानूनी संरक्षण दे दिया गया है। इस क्षेत्र में कोई मुसलमान अपनी पत्नी को पीटता है तो पुलिस हस्तक्षेप नहीं कर सकती चूँकि पत्नी को पीटने के आदेश क़ुरआन में हैं। वहां इस्लामी अगर किसी काफ़िर लड़की को घेर कर उसके साथ तहर्रूश { इस्लामियों द्वारा काफ़िर लड़कियों पर सामूहिक और सार्वजानिक बलात्कार, इसका स्वाद कुछ समय पूर्व जर्मनी ने भी चखा था } करेंगे तो यह उनका इस्लामी अधिकार होगा। ब्रिटेन की कांग्रेस जैसे ही चिंतन की कंजर्वेटिव पार्टी के नेता डेविड कैमरून ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि उन लोगों ने अपने निश्चित वोट बैंक बनाने के लिये पाकिस्तान, बांग्लादेश से इस्लामी शांतिपुरूष इम्पोर्ट किये थे। जो बेल बोई थी अब उसके फूल आने लगे। यहाँ स्वयं से भी एक सवाल पूछना है। अंग्रेज़ों को कोसने से क्या होगा। यही तो 1947 में भारत के विभाजन के बाद हुआ था। भारत इस्लाम के कारण बांटा गया था। इस्लाम प्रजातान्त्रिक भारत में नहीं रहना चाहता था चूँकि अब हर व्यक्ति के वोट की बराबर क़ीमत होती। इससे उसके वर्चस्व की सम्भावनायें कम हो जानी थीं। अब उसके बाक़ी काफ़िरों को रौंदने, उनकी औरतों को लौंडी बनाने, उन्हें ग़ुलाम बनाने, जज़िया वसूलने का ऐतिहासिक इस्लामी अधिकार समाप्त हो रहा था। इस्लामियों ने बड़े पैमाने पर दंगे किये। कांग्रेसी नेतृत्व ने इस्लामी गुंडागर्दी का मुक़ाबला करने और हिन्दू पौरुष को संरक्षण देने की जगह देश का विभाजन स्वीकार कर लिया। इस्लाम के जबड़ों में देश का बड़ा हिस्सा फेंक दिया गया मगर अपने लिये सिक्काबंद वोटबैंक बनाने की नियत से गाँधी और नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने विभाजन के समर्थकों को भारत में ही रोक लिया। हमने भी कश्मीर में इसका परिणाम देख लिया है। यही कश्मीर में हुआ है। हज़ारों हिन्दू वहां मारे गए। हज़ारों के साथ बलात्कार हुआ मगर केवल एक पर भी मुक़दमा आज तक नहीं चला। बंगाल, असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, केरल, तमिलनाडु जैसे क्षेत्रों में भी विषबेल पर फूल आने लगे हैं। इस विषबेल को जड़ से उखाड़ने के लिये सन्नद्ध होने के अतिरिक्त सभ्य विश्व के पास कोई उपाय नहीं है और इसे तुरन्तता से उखाड़ा जाना चाहिए। यह वैचारिक विषबेल है। इसकी जड़, पत्ती, तना, डाली, छाल यहाँ तक सूखे पत्ते भी नष्ट दिए जाने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है। तुफ़ैल चतुर्वेदी

सऊदी अरब से जवान लड़कियां भारी संख्या में फ़रार

इस्लामी क़ानून के अनुसार निकाह से पहले लड़की की ज़िम्मेदारी उसके पिता, पिता न हो तो भाई और निकाह के बाद शौहर की होती है। किसी कारण से तलाक़ हो जाये तो यह ज़िम्मेदारी वापस पिता या उसकी अनुपस्थिति में भाई की हो जाती है। ज़िम्मेदारी से तात्पर्य अभिभावक होना होता है अर्थात उस महिला को अपने जीवन के सामन्य कार्यों के लिए इन अभिभावकों की अनुमति लेनी होती है। इस्लामी क़ानूनविदों की समझ में औरत की ज़िम्मेदारी हर स्थिति में पुरुष को उठानी चाहिये। एक सामान्य बुद्धि वाले व्यक्ति के मस्तिष्क में भी यह प्रश्न आ सकता है कि इस्लामी क़ानूनविदों की दृष्टि में कोई मुसलमान औरत अपनी ज़िम्मेदारी उठाने के लायक़ क्यों नहीं है ? क्या औरत बुद्धि नहीं रखती ? आइये इस दक़ियानूसी चिंतन के परिणामों का अवलोकन किया जाये। उर्दू के प्रमुख अख़बारों में से एक नई दुनिया के 16 अप्रैल के अंक का समाचार है कि सऊदी अरब से जवान लड़कियां भारी संख्या में फ़रार हो रही हैं। बताया जाता है कि यह लड़कियां विदेशों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने, और वहां पर नौकरी करने के लक्ष्य से अपने देश से भाग रही हैं। जो लड़कियां उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए विदेश जाती हैं वो वापस नहीं आतीं। ज्ञातव्य है कि सऊदी अरब में कोई महिला पुरुष के बिना घर से नहीं निकल सकती। उन्हें कार चलाने और पर्दा किये बिना घर से निकलने का अधिकार नहीं है। विदेश गई सऊदी महिलाएं वहाँ अपने लिये वर तलाश कर रही हैं ताकि वह वहाँ पर बस सकें। जानना उपयुक्त होगा कि सऊदी अरब की एक तलाक़शुदा औरत ने बताया कि मैं 45 वर्ष की हूँ मेरा अभिभावक 17 वर्ष का मेरा भाई है। मैं एक अस्पताल में काम कर रही हूँ। मेरा भाई मुझे अपनी निगरानी में अस्पताल लाता है और वापस ले जाता है। मुझे जो वेतन मिलता है वो छीन लेता है और उससे अय्याशी करता है, उससे नशीले मादक पदार्थों का सेवन करता है। सऊदी अरब के एक विश्वविद्यालय के एक उपकुलपति ने नाम न छपने की शर्त पर बताया कि प्रतिवर्ष डेढ़ लाख सऊदी लड़कियां उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए विदेश जाती हैं और वापस नहीं आतीं। 1400 वर्ष पहले मुकम्मल दीन भेजने का दावा करने वाले अल्लाह को मानवता और इस्लामियों का भविष्य नज़र नहीं आया ? इसी तरह से इस्लामी देशों में औरतों की कमी होती रही तो सरकार की उम्मत { प्रजा } क्या करेगी ? अंदाज़ा लगाइये ? ? ? तुफ़ैल चतुर्वेदी

शनिवार, 10 जून 2017

अगर आपका किसी उर्दू वाले से पाला पड़ा है तो आपने पाया होगा कि उर्दू वाले का उच्चारण कुछ अजीब सा होता है। वो आधी ध्वनियों को पूरा बोलता है। क्लब को किलब, प्रचार को परचार, सरस्वती को सरसुती.......ऐसे सैकड़ों उदाहरण दिए जा सकते हैं। कभी इस्लाम के वामपंथी मुखौटे जावेद अख़्तर को, घनघोर मुल्ला ओवैसी भाइयों को टी वी पर बोलते सुनिये। आपको उच्चारण का यह बहुत भौडा अंतर तुरन्त समझ आ जायेगा। इसका कारण उर्दू वालों से पूछिये तो जवाब मिलता है कि उर्दू में आधे हर्फ़ नहीं लिखे जाते हैं अतः पढ़े-बोले भी नहीं जाते हैं। यहाँ एक तार्किक बात सूझती है कि हर्फ़ को हरफ़ तो नहीं बोला जाता। उर्दू के दो अक्षर स्वाद, ज़्वाद सवाद या सुवाद और ज़वाद नहीं बोले जाते। यानी आधी ध्वनि लिख न पाने का बहाना झूठ है तो फिर क्या कारण है कि उर्दू वाले दूसरी भाषाओँ के उच्चारण बिगड़ कर बोलते हैं ? आपने कभी कुत्ता पाला है ? न पाला हो तो किसी पालने वाले से पूछियेगा। जब भी कुत्ते को घुमाने ले जाया जाता है तो कुत्ता सारे रास्ते इधर-उधर सूंघता हुआ और सूंघे हुए स्थानों पर पेशाब करता हुआ चलता है। स्वाभाविक है कि यह सूझे यदि कुत्ते को पेशाब आ रहा है तो एक बार में क्यों फ़ारिग़ नहीं होता, कहीं उसे पथरी तो हो नहीं गयी है ? फिर हर कुत्ते को पथरी तो नहीं हो सकती फिर उसका पल-पल धार मारने का क्या मतलब है ? मित्रो! कुत्ता वस्तुतः पेशाब करके अपना इलाक़ा चिन्हित करता है। यह उसका क्षेत्र पर अधिकार जताने का ढंग है। बताने का माध्यम है कि यह क्षेत्र मेरी सुरक्षा में है और इससे दूर रहो अन्यथा लड़ाई हो जाएगी। उर्दू वालों का अन्य भाषाओँ के शब्दों को उनकी मूल ध्वनियों की जगह बिगाड़ कर बोलना कहीं उन भाषाओँ, उनके बोलने वालों में अपना इलाक़ा चिन्हित करना तो नहीं है ? ईसाई विश्व का एक समय सबसे प्रभावी नगर कांस्टेंटिनोपल था। 1453 में इस्लाम ने इस नगर को जीता और इसका नाम इस्ताम्बूल कर दिया। स्वाभाविक ही मन में प्रश्न उठेगा कि कांस्टेंटिनोपल में क्या तकलीफ़ थी जो उसे इस्ताम्बूल बनाया गया ? बंधुओ, यही इस्लाम है। सारे संसार को, संसार भर के हर विचार को, संसार भर की हर सभ्यता को, संसार भर की हर आस्था को.......मार कर, तोड़ कर, फाड़ कर, छीन कर, जीत कर, नोच कर, खसोट कर.......येन-केन-प्रकारेण इस्लामी बनाना ही इस्लाम का लक्ष्य है। रामजन्भूमि, काशी विश्वनाथ के मंदिरों पर पर इसी कारण मस्जिद बनाई जाती है। कृष्ण जन्मभूमि का मंदिर तोड़ कर वहां पर इसी कारण ईदगाह बनाई जाती है। पटना को जहानाबाद इसी कारण किया जाता है। अलीगढ, शाहजहांपुर, मुरादाबाद, सहारनपुर और ऐसे ही सैकड़ों नगरों के नाम.......वाराणसी, मथुरा, दिल्ली, अजमेर चंदौसी, उज्जैन जैसे सैकड़ों नगरों में छीन कर भ्रष्ट किये गए मंदिर इन इस्लामी करतूतों के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। इस्लाम अपने अतिरिक्त हर विचार, जीवन शैली से इतनी घृणा करता है कि उसे नष्ट करता आ रहा है, नष्ट करना चाहता है। इसका इलाज ही यह है कि समय के पहिये को उल्टा घुमाया जाये। इन सारे चिन्हों को बीती बात कह कर नहीं छोड़ा जा सकता चूँकि इस्लामी लोग अभी भी उसी दिशा में काम कर रहे हैं। बामियान के बुद्ध, आई एस आई एस द्वारा सीरिया के प्राचीन स्मारकों को तोडा जाना आज भी चल रहा है। इस्लामियों के लिये उनका हत्यारा चिंतन अभी भी त्यागने योग्य नहीं हुआ है, अभी भी कालबाह्य नहीं हुआ है। अतः ऐसी हर वस्तु, मंदिर, नगर हमें वापस चाहिये। राष्ट्रबन्धुओ! इसका दबाव बनाना प्रारम्भ कीजिये। सोशल मीडिया पर, निजी बातचीत में, समाचारपत्रों में जहाँ बने जैसे बने इस बात को उठाते रहिये। यह दबाव लगातार बना रहना चाहिए। पेट तो रात-दिन सड़कों पर दुरदुराया जाते हुए पशु भी भर लेते हैं। मानव जीवन गौरव के साथ, सम्मान के साथ जीने का नाम है। हमारा सम्मान छीना गया था। समय आ रहा है, सम्मान वापस लेने की तैयारी कीजिये। तुफ़ैल चतुर्वेदी

****अल्लाह के लिये****

****अल्लाह के लिये**** शनिवार यानी परसों रात लंदन में टेम्स नदी पर स्थित लंदन ब्रिज पर एक वैन में सवार आतंकियों ने पहले तो यथासंभव कुचल कर लोगों को मारा। जब वैन रेलिंग से टकरा कर रुक गयी तो सवार लोग लम्बे-लम्बे चाक़ू निकाल कर बोरो स्ट्रीट मार्किट की ओर दौड़ गए। वहां पर जो उनके सामने आया, उस पर उन्होंने चाक़ू से घातक वार किये। चाक़ू लहराते हमलावर चिल्ला रहे थे 'दिस इस फ़ॉर अल्लाह'। घटना की ज़िम्मेदारी अभी तक किसी ने नहीं ली है मगर आई.एस. ने शनिवार को अपने समर्थकों को ऑनलाइन संदेश भेज कर ट्रक, चाक़ू और बंदूक़ों से हमले करने की अपील की थी। उसने यह वारदात रमज़ान में ख़ास तौर पर करने के लिये कहा था। आइये हमलावर की मनःस्थिति पर विचार करें। आख़िर कोई सामान्य व्यक्ति जो अपनी रोज़ी-रोटी के लिए रोज़ अपने बच्चे को चूम कर, अपनी पत्नी को गले लगा कर घर से निकलता है, अचानक वहशी दरिंदा कैसे बन सकता है ? एक ऑनलाइन मेसेज पढ़ते ही लोगों में एक पल में इतना बड़ा बदलाव कैसे आ सकता है ? मनुष्य से राक्षस बनने की यात्रा एक क्षण में कैसे हो सकती है ? अब मानव सभ्यता को बच्चे के मानसिक विकास के लिए विकसित की गयीं विभिन्न प्रणालियों की परिपक्वता पर फिर से विचार करना ही पड़ेगा। आख़िर मानव सभ्यता ने विकास की यात्रा में ऐसे आदेशों को पढ़ने-मानने की छूट कैसे दे रखी है ? क्या मनुष्यता इसके ख़तरे समझने की क्षमता खो बैठी है ? ओ मुसलमानों तुम गैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { 9-123 } और तुम उनको जहां पाओ कत्ल करो { २-191 } काफिरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { 8-39 } ऐ नबी ! काफिरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो. उनका ठिकाना जहन्नुम है { 9-73 और 66-9 } अल्लाह ने काफिरों के रहने के लिये नर्क की आग तय कर रखी है { 9-68 } तुम मनुष्य जाति में सबसे अच्छे समुदाय हो, और तुम्हें सबको सही राह पर लाने और गलत को रोकने के काम पर नियुक्त किया गया है { 3-110 } हम जानते हैं कि यह हत्यारे जिस पुस्तक क़ुरआन को ईश्वरीय पुस्तक मानते हैं और उससे प्रभावित हैं यह उसी की पंक्तियाँ हैं। उसके अनुकरणीय माने जाने वाले लोगों ने इन हत्यारों की तरह ही शताब्दियों से ऐसे हत्याकांड किये हैं। प्रथम विश्व युद्ध के समय तुर्की ने 15 लाख से अधिक आर्मेनियन ईसाइयों को इस्लाम की दृष्टि में काफ़िर होने के कारण मार डाला। 1890 में अफ़ग़ानिस्तान के एक क्षेत्र काफ़िरिस्तान के काफ़िरों को जबरन मुसलमान बनाया गया और उसका नाम नूरिस्तान रख दिया गया। विश्व भर में 1400 वर्षों से घटती आ रहीं ऐसी अनंत घटनाओं के प्रकाश में तय है कि इस्लाम उन सबसे, जो मुसलमान नहीं है, नफ़रत करता है और उन्हें मिटाना चाहता है। इसके बावजूद इंग्लैंड के राष्ट्र-राज्य ने लंदन में शरिया ज़ोन बनाने की अनुमति दी। उसने सादिक़ ख़ान को लंदन का मेयर मेयर बनाया। आइये जानें कि शरिया ज़ोन का अर्थ क्या है ? शरिया ज़ोन वह क्षेत्र ही नहीं है जहाँ सुअर का मांस नहीं बेचा जा सकता या जहाँ केवल हलाल मांस ही बेचा जा सकता है बल्कि जहाँ इस चिंतन के अनुसार जीवनयापन करना क़ानूनी और अनिवार्य है। जहाँ इस चिंतन की विषबेल को फैलने के लिये क़ानूनी संरक्षण दे दिया गया है। इस क्षेत्र में कोई मुसलमान अपनी पत्नी को पीटता है तो पुलिस हस्तक्षेप नहीं कर सकती चूँकि पत्नी को पीटने के आदेश क़ुरआन में हैं। वहां इस्लामी अगर किसी काफ़िर लड़की को घेर कर उसके साथ तहर्रूश { इस्लामियों द्वारा काफ़िर लड़कियों पर सामूहिक और सार्वजानिक बलात्कार, इसका स्वाद कुछ समय पूर्व जर्मनी ने भी चखा था } करेंगे तो यह उनका इस्लामी अधिकार होगा। ब्रिटेन की कांग्रेस जैसे ही चिंतन की कंजर्वेटिव पार्टी के नेता डेविड कैमरून ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि उन लोगों ने अपने निश्चित वोट बैंक बनाने के लिये पाकिस्तान, बांग्लादेश से इस्लामी शांतिपुरूष इम्पोर्ट किये थे। जो बेल बोई थी अब उसके फूल आने लगे। यहाँ स्वयं से भी एक सवाल पूछना है। अंग्रेज़ों को कोसने से क्या होगा। यही तो 1947 में भारत के विभाजन के बाद हुआ था। विभाजन इस्लाम के कारण हुआ था। इस्लाम हिन्दू बहुल प्रजातान्त्रिक भारत में नहीं रहना चाहता था चूँकि अब हर व्यक्ति के वोट की बराबर क़ीमत होती। इससे उसके वर्चस्व की सम्भावनायें कम हो जानी थीं। अब उसके बाक़ी काफ़िरों को ज़लील करने, रौंदने, उनकी औरतों को लौंडी बनाने, उन्हें ग़ुलाम बनाने, जज़िया वसूलने का ऐतिहासिक इस्लामी अधिकार समाप्त हो रहा था। इस्लामियों ने बड़े पैमाने पर दंगे किये। कांग्रेसी नेतृत्व ने इस्लामी गुंडागर्दी का मुक़ाबला करने और हिन्दू पौरुष को संरक्षण देने की जगह देश का विभाजन स्वीकार कर लिया। इस्लाम के जबड़ों में देश का बड़ा हिस्सा फेंक दिया गया मगर अपने लिये सिक्काबंद वोटबैंक बनाने की नियत से गाँधी और नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने विभाजन के समर्थकों को भारत में ही रोक लिया। हमने भी कश्मीर में इसका परिणाम देख लिया है। बंगाल, असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, केरल, तमिलनाडु जैसे क्षेत्रों में विषबेल के फूल आने लगे हैं। इस विषबेल को जड़ से उखाड़ने के लिये सन्नद्ध होने के अतिरिक्त सभ्य विश्व के पास कोई उपाय नहीं है और इसे तुरन्तता से उखाड़ा जाना चाहिए। यह वैचारिक विषबेल है। इसकी जड़, पत्ती, तना, डाली, छाल यहाँ तक सूखे पत्ते भी नष्ट दिए जाने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है। तुफ़ैल चतुर्वेदी

रविवार, 21 मई 2017

तीन तलाक़ पर बहस ख़ासी गर्म है।

तीन तलाक़ पर बहस ख़ासी गर्म है। देश की मुल्ला जमात इसके पक्ष में हैं। उनमें आंतरिक रूप से यह भय व्याप्त है कि एक बार अगर मुस्लिम परसनल लॉ को छूने दिया तो सिर पर आसमान बल्कि हिन्दू आसमान गिर जायेगा। तीन तलाक़ के विरोधी इसे स्त्री अधिकारों का हनन बता रहे हैं। सरकार जिसका कार्य स्वतंत्र मानवाधिकारों की स्थापना है इसके विरोध कर तो रही है मगर उसके वकील कोर्ट में लिजलिजी दलीलें दे रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ख़ुद बॉल अपने पक्ष से सरकार की तरफ़ यह कह कर फेंक रहा है कि सरकार ही इस पर क़ानून क्यों नहीं बना देती ? हमारे पास क्यों आयी है ? ज़ाहिर है यह मौक़ा सुप्रीम कोर्ट से पूछने का भी है कि जली कट्टू, दही हांड़ी जैसे न जाने कितने लुंजपुंज विषय आप स्वतः संज्ञान में ले लेते हैं। इनमें 5-7 लोगों के खरोंच लगने भर की संभावना होती है। यहाँ संभावित मुस्लिम आबादी 20 करोड़ का आधा भाग यानी 10 करोड़ लोग दबाव में हैं। इनके अधिकारों की रक्षा कौन करेगा ? मेरे देखे तीन तलाक़ को केंद्र में ले कर वाचाली की जा रही है। विषय यह नहीं है कि तीन तलाक़ सही है या ग़लत........ विषय है क्या कोई सभ्य देश उन नियमों-क़ानूनों, जिनके धारण करने-पालन करने के कारण उसे सभ्य कहा जाता है, अपने नियमों-क़ानूनों पर किसी का हाथ ऊपर रखने की अनुमति दे सकता है ? यह तो राष्ट्र, राज्य की पगड़ी से फ़ुटबाल खेलने की अनुमति देना नहीं होगा ? हमने 15 अगस्त 1947 को भारत के टुकड़े कर कटी-फटी आज़ादी स्वीकार की। 26 जनवरी 1952 को अपना संविधान अंगीकृत किया। संविधान की मूल आत्मा स्वतंत्र मानवाधिकार हैं। भारत का प्रत्येक नागरिक { स्त्री-पुरुष } बराबर के अधिकार रखता है। हम इसी कारण सभ्य राष्ट्र कहलाये जाने के लायक़ हुए हैं कि हमने नागरिकों के लिये नियम तय स्वीकृत हैं और उनका उल्लंघन करने पर नियमानुसार कार्यवाही की जाती है। एक समय में नरबलि देने वाले, नरमांसभक्षी भी होते थे। क़ानून के शासन ने उन सबका दमन कर भारत को सभ्य जीवन दिया। अब भी ठग, चोर, डाकू, लुटेरे क़ानून तोड़ते हैं और शासन इसका भरसक दमन करता है। तो ऐसी कोई जीवन प्रणाली राष्ट्र कैसे स्वीकार कर स्का है जो मानवाधिकारों का हनन करे ? क्या स्वतंत्र भारत राष्ट्र को 1400 वर्ष पहले के अमानवीय नियमों को स्वीकार करना चाहिए ? जिस शरिया, मुस्लिम पर्सनल लॉ अर्थात इस्लामी क़ानून को सभ्यता के नियमों से परे होने की दुहाई दी जा रही है उसमें तो इससे भी बड़े-बड़े विस्फोटक छुपे हुए हैं। आइये तिरछी नज़र बल्कि सीधी और तीखी नज़र डाली जाये। ........और जो स्त्रियां ऐसी हों जिनकी सरकशी का तुम्हें भय हो, उन्हें समझाओ, बिस्तरों में उन्हें तन्हा छोड़ दो और उन्हें मारो..... आयत 34/4 सूरा अन-निसा।........यह क़ुरआन की आयत है। क़ुरआन पति को सरकश बीबी को बिस्तर पर तन्हा छोड़ने और पीटने के आदेश दे रही है। अब कोई मुसलमान अगर अपनी बीबी की धुनाई करे तो पुलिस को इस लिये हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए कि यह स्वघोषित अल्लाह का फ़रमान है ? ........हाँ पुरुषों को उन पर एक एक दर्जा प्राप्त है और अल्लाह प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी है। आयत 228 चैप्टर 2 सूरा अल-बक़रा........क्या सभ्य समाज इस लिये स्त्री का दर्जा पुरुष से नीचा स्वीकार कर ले कि यह प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी अल्लाह का फ़रमान है ? तो यदि उसे 'तलाक़' दे दे, तो फिर उस के लिए यह स्त्री जायज़ नहीं है जब तक कि किसी दूसरे पति से विवाह न कर ले। फिर यदि वह उसे तलाक़ दे दे, तो फिर इन दोनों के लिए एक-दूसरे की ओर पलट आने में कोई दोष न होगा। यदि उन्हें आशा हो कि वे अल्लाह की सीमाओं को क़ायम रख सकेंगे। वे अल्लाह की सीमायें हैं ,उन्हें वह ज्ञान रखने वाले लोगों के लिए स्पष्ट कर रहा है। आयत 230 चैप्टर 2 सूरा अल-बक़रा........यह अल्लाह की तरफ़ से हलाला का आदेश है। कोई मुसलमान अगर अपनी बीबी को तलाक़ दे दे और फिर बाद में पुनर्विवाह करना चाहे तो अल्लाही आदेश है कि पहले पुरानी बीबी किसी के साथ निकाह करे। उसके साथ रात बिताये। अगले दिन यदि नया पति तलाक़ दे तो फिर पुनर्विवाह हो सकता है। ये करे कोई भरे कोई का इंसाफ़ है। तलाक़ तो शौहर ही दे सकता है तो उसके किये को बीबी क्यों भरे ? यह तो न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। आपको जान कर आश्चर्य होगा कि ब्रिटिश दबाव में सऊदी अरब तथा यमन में 1962 में, ओमान में 1970 में दास प्रथा समाप्त की गयी। उससे पहले अरब देशों में ग़ुलाम बनाने, लौंडियाँ { sex salave } रखना क़ानूनी रूप से स्वीकार्य था। आप स्वयं बताएं, चूँकि तथाकथित प्रभुत्वशाली और तत्वदर्शी अल्लाह की किताब में लौंडियाँ रखने के संदेश हैं, स्वयं अल्लाह के दूत मुहम्मद जी ने ग़ुलाम और लौंडियाँ रक्खीं अतः सभ्य समाज मुसलमानों को ग़ुलाम और लौंडियाँ रखने की छूट दे दे ? शिया लोगों के एक उपसमूह ज़ैदी में हरीरा की रस्म है। इसके अनुसार महरम यानी माँ, बहन, बेटी, फूफी, ख़ाला वग़ैरा के साथ लिंग पर रेशम लपेट कर कुछ शर्तों के साथ निकाह/सैक्स करने की इजाज़त है। जिन साहब को ये ग़लत काम पाप लगता हो मगर यह बात झूट लगती हो वो इन किताबों को चैक कर सकते हैं।........अल मुग़नी बानी इमाम इब्ने-क़दामा वॉल्यूम 7 पेज नम्बर 485, जवादे-मुग़निया बानी इमाम जाफ़र अल सादिक़ वॉल्यूम 5 पेज नम्बर 222, फिक़हे-इस्लामी बानी मुहम्मद तक़ी अल मुदर्रिसी वॉल्यूम 2 पेज 383........इस कारण कि यह शियों के 12 इमामों में से एक जाफ़र अल सादिक़ की व्यवस्था है, सभ्य समाज इसे स्वीकार कर ले ? देशवासियो ! क़ानून बनाना और उसे लागू करना पूरी तरह किसी भी स्वतंत्र और सभ्य राष्ट्र का अधिकार है। इसे कोई चुनौती नहीं दे सकता। मुद्दा तीन तलाक़ सही या ग़लत का नहीं है। मुद्दा राष्ट्र पर बाहरी क़ानून थोपे जाने की छूट देना है। अंग्रेज़ी की एक कहावत है 'Catch bull by horns'. इसका मिलता-जुलता हिंदी मुहावरा 'पहली रात को बिल्ली मारो' होगा। बिल्ली पहली ही रात को मारी जानी चाहिये। तुफ़ैल चतुर्वेदी

शनिवार, 11 मार्च 2017

अल्लाह की बेज़बान बकरियां

ध्वस्त विरोधी शिविर, खंडित छत्र, अपने ही रक्त-स्वेद में सने धरती पर लोटते हुए महारथी, श्लथ-क्लांत कराहते हुए असंख्य पदातिक, भरतपुर लुट गयो रात मोरी अम्मा की रुदाली, भग्न रथ, दुम दबा कर भागती शत्रु सेना, लहराती विजय पताकाएँ, दमादम गूंजते हुए नगाड़े, बजती हुई विजय दुंदुभी, पाञ्चजन्य का गौरव-घोष, ...... अभी कुछ ही समय बीता है कि इन घटनाओं का कच्चा-पक्का सा भी अनुमान न लगा पाने के कारण सब कुछ जानने, जनाने और जनने का दावा करने वाला मीडिया मनमाना बोलने-कोसने-हाहाकार मचाने में लगा था। 11 मार्च की प्रातः 8 बजे तक इसकी कल्पना भी नहीं की जा रही थी। अगर कोई इस स्थिति का दावा कर रहा था तो माइकधारी सर्वज्ञ एंकर, न जाने किस कसौटी पर कस कर चुने गए विशेषज्ञ, दावा करने वालों की खिल्ली उड़ा रहे थे। अचानक हू-हू की सियार-ध्वनि करती उच्छ्वासें छोड़ती जमात फूल बरसाने लगी। यह प्रचण्ड चमत्कार कैसे हो गया ? जिस बाल्मीक, क्षत्रिय, ब्राह्मण, जाट, वैश्य, कुर्मी, कहार आदि के बूते चौपड़ बिछायी गयी थी, उसने ही बिसात उलट दी। जिस यादव वर्ग को अपनी पालकी ढोने के लिये बपौती मान कर चला जा रहा था, उसी ने पालकी खड्ड में दे मारी। जिस जाटव वर्ग को 'देश की मज़बूरी है भैंन जी जरूरी हैं' का अखण्ड कीर्तनिया माना गया था, उसी ने 'मंगल भवन अमंगल हारी, इस बारी भाजपा हमारी' का कीर्तन करना शुरू कर दिया। राष्ट्र के संस्थानों पर पहला हक़ मुसलमानों का है.....हम 100 सीटें मुसलमान को दे रहे हैं...... हम डेढ़ सौ सीटें अल्पसंख्यकों को दे रहे हैं...... जैसी बातें करने वालों की हिमायत छोड़ कर मुसलमानों की आधी जनसँख्या भी बड़े पैमाने पर इसी जमात में सम्मिलित हो गयी। तीन तलाक़ पर बरेलवी, देवबंदी आलिम भौंहे चढ़ाये, ज़बान लपलपाते, हाथ नचाते मुस्लिम पर्सनल लॉ को अस्पृश्य बताते हुए कथकली कर रहे थे। अब पता चला कि बुर्क़े में बंद अल्लाह की बेज़बान बकरियां भी ख़ामोश गुर्राहट रखती हैं। ढेर सारे विशेषज्ञ, विद्वान इस परमगौरवशाली विजय का विश्लेषण करेंगे। तरह तरह से इसे विकास की जीत बताएँगे अतः इस प्रचण्ड विजय का सत्य बताना, समाज तक पहुंचना आवश्यक है। विकास का सच्चा दावा, कृपया ध्यान रखें सच्चा दावा अखिलेश यादव का भी था, वह कैसे हवा हो गया ? चाचा, सौतेली माता, सौतेले भाई पर कालिख पोत कर अपनी क़मीज़ सबसे उजली बताने के चरखा दांव के दांत अखाड़े में क्यों बिखर गये ? हरिजनों की एक छत्र साम्राज्ञी की माया अंतर्ध्यान कैसे हो गयी ? बाल्मीक, क्षत्रिय, ब्राह्मण, जाट, जाटव, यादव, वैश्य, कुर्मी, कहार.....हर वर्ग ने अपने वर्ग के हित-अहित से ऊपर उठा कर भाजपा का कमल क्यों खिलाया ? इसका वास्तविक कारण केवल और केवल राष्ट्र के मूल स्वरुप की चिंता है। इस तेजस्वी व्यक्ति का नेतृत्व धर्मरक्षा करेगा, का अखण्ड विश्वास है। धर्मध्वजा उठाने वाले हाथों के लिए उत्तर प्रदेश में 5 साल के लिए अखण्ड राज्य प्रसन्नता का विषय है। राज्य सभा के बदलने जा रहे समीकरण आश्वस्त करते हैं, मगर यह पर्याप्त नहीं है। भाजपा के वरिष्ठ अधिकारियो! अल्लाह की जिन बेज़बान बकरियों ने घर के फाड़खाऊं शेरों की हुक्मउदूली कर तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ ख़ामोश गुर्राहट दिखाई है, उनके सरों पर लटकती तीन तलाक़ की तलवार हटानी आवश्यक है। अब समान नागरिक संहिता स्थापित करने का समय आ गया। आपको समाज ने इन वैचारिक भेड़ियों के दांत, नाख़ून तोड़ने के लिए आश्वस्तकारी बहुमत दिया है और यह आपको मुज़फ़्फ़रनगर, मेरठ, कैराना की नागफनी को जड़ से उखाड़ने के लिये मिला है। तुफ़ैल चतुर्वेदी

बुधवार, 8 मार्च 2017

तारिक़ फ़तेह के ख़िलाफ़ मुस्लिम समाज में ज़बरदस्त आक्रोश

8 मार्च के दैनिक जागरण में बहुत छोटी सी एक कालम की ख़बर है। पाकिस्तानी मूल के लेखक तारिक़ फ़तेह के ख़िलाफ़ मुस्लिम समाज में ज़बरदस्त आक्रोश है। विरोध प्रदर्शनों के बाद उनके ख़िलाफ़ मंगलवार को कोतवाली देवबंद में मुक़दमा दर्ज कराया गया है। पुलिस ने धार्मिक भावनाओं को भड़काने के आरोप में तारिक़ फ़तेह पर मामला दर्ज किया है। दूसरी घटना ....... अभी कोई 10-12 दिन पहले दिल्ली में जश्ने-रेख़्ता के प्रोग्राम में तारिक़ फ़तह साहब गए थे। वहां उनके साथ बदतमीज़ी हुई थी। तारिक़ फ़तह साहब पाकिस्तानी मूल के कैनेडा के नागरिक हैं। कट्टर राष्ट्रवादी हैं और भारत के तगड़े पक्षधर और पाकिस्तान के घोर विरोधी हैं। इस्लाम की कुरीतियों पर तगड़े मुखर हैं। सावधानीपूर्वक क़ुरआन, मुहम्मद जी को सहेज कर बाद के इस्लामी नेतृत्व को आतंक के लिये ज़िम्मेदार बताते हैं। इस्लामी इतिहास की शिया धारा को लगभग मानते हैं। तीन तलाक़, उसके उपजात हलाला जैसी बातों के विरोधी हैं। संक्षेप में कहा जाये तो वहाबी, बरेलवी विचारधारा के विरोध में हैं। उनके विरोधी जताते तो हैं मगर ऐसा होना पाप नहीं है। इस्लाम के ही शिया जैसे प्रमुख समूह के अतिरिक्त लगभग सभी हिंदू विचार समूह वहाबी, बरेलवी विचारधारा के विरोध में हैं। भारतीय संविधान भी इन बातों के विरोध में है। रेख़्ता दिल्ली के एक ग़ैरमुस्लिम व्यवसायी संजीव सर्राफ़ की आर्थिक सहायता से प्रारम्भ हुआ सिलसिला है जो उर्दू की विभिन्न विधाओं मुशायरा, बैतबाज़ी, ड्रामा इत्यादि पर काम करता है। उर्दू जिसके हिमायती इसे गंगा-जमनी संस्कृति बताते हैं, वाले इन घटनाओं पर मौन हैं। मुनव्वर राना जैसे घोर कलुषित सोच वाले अलबत्ता तारिक़ फ़तेह साहब के बारे में वाहियात बयान दे रहे हैं। मैं उर्दू संसार में शरीक अपने जैसे असंख्य ग़ैरमुस्लिम लोगों से पूछना चाहता हूँ कि गंगा-जमनी संस्कृति की यात्रा गंगा-जमुना की जगह दजला-फ़ुरात की यात्रा कैसे बन गयी है ? हमारी आर्थिक सहायता पर पलने-चलने वाले संस्कृतिक एकता के संस्थान घोर मुस्लिम कट्टरता के संस्थान कैसे बन जाते हैं ? हम अपनी मेहनत की कमाई के संस्थानों को राष्ट्रद्रोही गतिविधियों का अड्डा क्यों बनने दे रहे हैं ? हमारी उपस्थिति, वर्चस्वी स्थिति के बावजूद उर्दू के संस्थान घोर कलुषित विचारों को कैसे उपजा रहे हैं ? उर्दू के प्रमुख नामों में दिल्ली में सर्व श्री मुज़फ्फर हनफ़ी, शमीम हनफ़ी, ख़ालिद जावेद, शहपर रसूल जैसे लोग मौजूद हैं। रेख़्ता में ही फ़रहत अहसास, सालिम सलीम, कुमैल रिज़वी जैसे ढेरों लोग मौजूद हैं। सारे के सारे ऐसे चुप बैठे हैं जैसे गोद में साँप रक्खा हुआ हो। तारिक़ फ़तह साहब के पक्ष में किसी का एक भी बयान नहीं आया। क्या साम्प्रदायिक एकता का ठेका ग़ैरमुस्लिमों ने ही लिया हुआ है ? आप दबाव क्यों नहीं बनाते ? भारत भर की उर्दू गतिविधियों को सजाना, बनाना, फ़ंडिंग हम करते हैं और परिणाम राष्ट्रद्रोहियों का क़ब्ज़ा ? ? ? मुझे दिल्ली उर्दू एकेडमी का मख़मूर सईदी का काल याद आता है। मैं उर्दू एकेडमी के घटा मस्जिद वाले पुराने कार्यालय में उनके सामने बैठा हुआ था कि उनके स्टाफ़ के लगभग सभी लोग आये और छुट्टी माँगी। पता चला कि बाबरी मस्जिद के पक्ष में कोई प्रदर्शन हो रहा है। जिसमें सम्मिलित होने के लिये दिल्ली सरकार से वेतन पाने वाले उर्दू एकेडमी के कर्मचारी बाबरी मस्जिद ज़िंदाबाद करने चले गए। यह स्थिति बदली नहीं जानी चाहिये ? आज 79 वर्ष पहले हुए देश के विभाजन का विरोध करने वाली पाकिस्तान में जन्मी 67 वर्ष की प्रखर आवाज़ दबाई जा रही है। कभी सोचिये कि आख़िर तारिक़ फ़तह लड़ किससे रहे हैं ? उससे लाभ क्या राष्ट्रवादियों को नहीं हो रहा ? राष्ट्रवादियो! उनके पक्ष में कोई धरना-प्रदर्शन क्यों नहीं करते ? भाजपा, संघ विहिप, हिन्दू जागरण मंच के अधिकारियो, कार्यकर्ताओ! औरंगज़ेब से लड़ने वाले हर दारा शिकोह का भाग्य अकेले पड़ जाना तय है ? तुफ़ैल चतुर्वेदी

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

कभी-कभी न चाहते हुए भी अनायास मुंह से सच ही निकल जाता है। मस्तिष्क में उभरे विचार को कोई सायास दबा तो देता है मगर वो चुभी हुई फांस की तरह तब तक तकलीफ़ देता रहता है जब तक उसे निकाल नहीं दिया जाता। संसार के सबसे भयानक नरसंहारों में सबसे बड़े नरसंहार ईसाइयों और इस्लामियों द्वारा हम मूर्तिपूजकों के हैं। जिन्हें उन्होंने चतुर भाषा में पैगन कहा है। इसके बाद ईसाइयों और मुसलमानों द्वारा ही यहूदियों के नरसंहार आते हैं। जैसा चिंतन आज इस्लाम का है वैसा ही हत्यारी सोच शताब्दियों तक ईसाईयत की भी रही है। सारा यूरोप, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, अफ़्रीक़ा, भारत इनके शिकार करने के क्षेत्र रहे हैं। विश्व के ईसाईकरण और इस्लामीकरण का इतिहास भयानक रक्तपात से सना हुआ है। इस बात से विश्व-इतिहास के सभी जानकर परिचित हैं मगर प्रजातंत्र में वोटों के लिए कहीं सांप्रदायिक एकता का ड्रामा, कहीं मल्टी-कल्टी की नौटंकी के कारण लोग चुप लगा लेते हैं। इस लेख का आधार स्पेनिश लेखक सैबेस्टियन वीलर रोड्रिग्ज़ का 15 जनवरी 2008 का लेख है मगर वह भारत के सन्दर्भ में भी बहुत सटीक है। आइये तथ्यों का अवगाहन किया जाये। "मैं बार्सिलोना में सड़क पर जा रहा था। अचानक मुझे एक भयानक सत्य का अहसास हुआ कि यूरोप की ऑश्वित्ज़ में मृत्यु हो गई है। { पाठकों के लिए जानना उपयुक्त होगा कि ऑश्वित्ज़ दक्षिण-पश्चिम पोलैंड में नात्सियों द्वारा यहूदियों को यातना दे कर मार डालने के लिये बनाये गए कैम्प थे। जहाँ द्वितीय विश्वयुद्ध के समय 60 लाख यहूदियों को भयानक मृत्यु के घाट उतार दिया गया। } हमने साठ लाख यहूदियों की हत्या कर दी और उन्हें 2 करोड़ मुसलमानों के साथ बदल दिया। ऑश्वित्ज़ में हमने एक पूरी संस्कृति, विचार, रचनात्मकता, प्रतिभा को जला दिया। हमने चयनित लोगों को सही मायने में चुन-चुन कर नष्ट कर दिया। { यहूदी स्वयं को ईश्वर द्वारा चुने गए लोग मानते हैं } हमने उन लोगों को नष्ट किया जो वस्तुतः महान और अद्भुत लोग हैं। जिन्होंने संसार को उन्नत बनाया। इन लोगों के योगदान को विज्ञान, कला, अंतरराष्ट्रीय व्यापार जैसे जीवन के सभी क्षेत्रों में और सबसे बढ़ कर संसार की अंतश्चेतना के रूप में महसूस किया जाता है। हम ने इन लोगों को जला दिया। इसके बाद सहिष्णुता का ढोंग करते हुए हमने नस्लवाद के रोग के इलाज का दिखावा किया और अपने फाटकों को 2 करोड़ मुस्लिमों के लिये खोल दिया। जो हमारे यहाँ मूर्खता, अज्ञानता, धार्मिक उग्रवाद और असहिष्णुता, अपराध की बढ़वार ले कर आये। ये काम करने में अनिच्छुक हैं और अपने परिवार का स्वाभिमान से पोषण नहीं करना चाहते। उन्होंने हमारी ट्रेनों को उड़ा दिया और अब हमारे सुंदर स्पेनिश शहर तीसरी दुनिया के गंदगी और अपराध में डूबे शहर बन चुके हैं। स्वयं हमने अपने दुखों को बढ़ावा देते हुए संस्कृति का कट्टर घृणा से, रचनात्मक कौशल का विनाशकारी कौशल से, योग्यता का पिछड़ेपन और अंधविश्वास से परावर्तन कर दिया । वह अपार्टमेंट जो सरकार की ओर से उन्हें नि:शुल्क दिए गए हैं बंद कर दिए जाने चाहिए। वे अपने सरल पड़ौसियों की हत्या और विनाश की योजना बनाते हैं। हमने यूरोप के यहूदियों की प्रतिभा, उनमें अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य की ललक, उसके लिए स्वाभाविक शांति की तलाश की उन लोगों से अदला-बदली कर ली जो मृत्यु को लक्ष्य मानते हैं। जो हमारे बच्चों के लिए मृत्यु की कामना करते हैं। योरोप ने कितनी भयानक ग़लती कर ली। इस्लाम की विश्व भर में आबादी लगभग एक सौ बीस करोड़ है अर्थात मुसलमान दुनिया की आबादी का 20% है। उन्हें अब तक निम्नलिखित नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। साहित्य के लिए एक मात्र 1978 में नगीब महफूज़ को , शांति के लिये 1978 में अनवर सादात को, 1990 में इलियास जेम्स कोरी को, 1994 में यासर अराफ़ात को, 1999 में अहमद जीवाई को, अर्थशास्त्र में किसी मुसलमान को कुछ नहीं मिला, भौतिक शास्त्र के लिए किसी मुसलमान को कुछ नहीं मिला, औषधि शास्त्र के लिए 1960 में पीटर ब्रायन को, 1998 में फ़रीद मुराद को, इस तरह कुल हुए 7 विश्व भर में यहूदियों की कुल जनसँख्या 1 करोड़ 40 लाख है और यह वैश्विक जनसँख्या का 0.02% होता है। इन्हें साहित्य के लिए 10, शांति के लिए 8, भौतिक शास्त्र के लिए 53, अर्थशास्त्र के लिए 13, औषधि शास्त्र के लिए 45 यानी कुल 129 नोबल पुरुस्कार प्राप्त हुए हैं। यहूदी; सैन्य प्रशिक्षण शिविरों में बच्चों के भेजे की धुलाई करके खुद को उड़ाने, अधिकतम यहूदियों और अन्य गैर मुसलमानों को मारने का प्रशिक्षण नहीं देते। यहूदी विमानों का अपहरण नहीं करते, न ही ओलंपिक में एथलीटों को मारते हैं। न जर्मन रेस्तरां में खुद को उड़ाते हैं । एक भी यहूदी चर्च को नष्ट करता हुआ नहीं पाया गया है। संसार में एक भी यहूदी लोगों को मारने के पक्ष में नहीं है। यहूदियों गुलामों का व्यापार नहीं करते, न ही उनके नेता काफिरों के लिए जिहाद और मूर्तिपूजकों के लिए मौत का आह्वान करते हैं। दुनिया के मुसलमानों को अपनी सभी समस्याओं के लिए यहूदियों को दोष देने की जगह शिक्षा के क्षेत्र में अधिक निवेश करना चाहिए। मुसलमानों को, इससे पहले वे मानव जाति से आदर की मांग करें ख़ुद से पूछना चाहिए कि वे मानव जाति के लिए क्या कर सकते हैं। इजरायल और फिलीस्तीन तथा अरब देशों के बीच संकट के बारे में अपनी भावनाओं को एक तरफ कीजिये। यहां तक ​​कि अगर आपको लगता है इजरायल का दोष अधिक है तो भी बेंजामिन नेतन्याहू के दो वाक्यों से सच समझ जा सकता है। "अगर अरब शस्त्र रख देते हैं तो और अधिक हिंसा नहीं होगी मगर अगर यहूदी आज अपने हथियार देते हैं तो इसराइल ही नहीं होगा। " द्वितीय विश्वयुद्ध के समय मित्र देशों की सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर, जनरल ड्वाइट आइजनहावर ने जब मौत के शिविरों में हत्याओं के शिकारियों की करतूतों को देखा तो उन्होंने यथासंभव तस्वीरें लिये जाने के आदेश दिए। उन्होंने आसपास के गांवों से जर्मन लोगों को मृतकों को देखने यहाँ तक कि दफ़नाने के लिए भी बुलाया। उन्होंने ऐसा क्यों किया ? उनका आशय उन्हीं के इन शब्दों में मिलता है: 'सब कुछ रिकॉर्ड पर लाओ। फ़िल्में बनाओ। गवाहियां दर्ज करो। ऐसा न हो कि इतिहास की लंबी सड़क के किसी मोड़ पर कोई कमीना यह कहे कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था।' मगर इस्लाम के सन्दर्भ में ऐसा होने लगा है। हाल ही में, ब्रिटेन में स्कूली पाठ्यक्रम से इस्लामी नरसंहारों को हटाने की बहस छिड़ी थी। हटाने के पक्ष वाले यह कारण दे रहे थे कि इससे मुलमानों की भावनाएं आहत होती हैं। उनका कहना है कि ऐसे नरसंहार हुए ही नहीं हैं। इसी तरह यहाँ यह जानना भयावह रूप से स्तब्ध कर देने वाला है कि द्वितीय विश्वयुद्ध जिसमें 60 लाख यहूदी, 2 करोड़ रूसी, 1 करोड़ ईसाई, 1900 ईसाई पादरी जला कर, पीट-पीट कर, भूखा रख कर, बलात्कार करके, अपमानजनक प्रयोग कर-कर के मार डाला गया, उनके बारे में जर्मन समाज का कुछ हिस्सा सामान्य विश्व से भिन्न सोच रखता है। इसी तरह इन इस्लामी नरसंहारों को ईरान झुटलाने लगा है। संसार को भूलना नहीं चाहिये, भूलने देना देना नहीं चाहिये कि इतिहास में क्या हुआ था। इसका ध्यान रखने से हम इससे लड़ेंगे। परिणामतः इससे हमारी दुनिया हमारे लिये हमारे बच्चों और उनके बच्चों के लिए एक सुरक्षित जगह हो जायेगी। यह तो हुई स्पेनिश लेखक सैबेस्टियन वीलर रोड्रिग्ज़ के 2008 में छापे लेख की बात अब हम वृहत्तर भारत का सन्दर्भ लेते हैं। हमने सदैव से ही बाहर से आने वाले किसी भी समूह का स्वागत किया है। बिना इसका ध्यान किये कि वो समूह हमारी धरती पर किस लिए आया है ? इस्लाम के प्रारम्भिक जत्थे स्थल मार्ग से हमारी ओर बग़दाद के इस्लामी साम्राज्य के ध्वस्त होने के बाद आये थे। क़ज़ज़ाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, आज़रबाइज़ान, ईरान, ईराक़, अफ़ग़ानिस्तान इत्यादि क्षेत्रों में इस्लामी आक्रमणकारियों ने समूची हिंदू, बौद्ध आबादी को नष्ट करने का कार्य शुरू किया। इस क्रम में सम्पूर्ण इस्लामी ख़िलाफ़त में मंदिरों, बौद्ध विहारों का ध्वंस होने लगा। इस से कुपित हिंदू सेनापति चंगेज खान के पौत्र हलाकू खान बग़दाद पर चढ़ दौड़े। उनकी प्रचंड मार से मुस्लिम समाज त्राहि माम् त्राहि माम् करता हुआ भाग-भाग कर शांत क्षेत्र यानी भारत की केंद्रीय भूमि की ओर आया। संभव है किसी मित्र को इन महान योद्धाओं के हिन्दू होने में संदेह हो अतः ऐसे मित्रों से निवेदन करूँगा कि किसी भी प्रतिष्ठित प्रकाशक की इन योद्धाओं पर पुस्तक खरीद लीजिये। पहले ही पृष्ठ पर भगवान महाकाल का चित्र दिखाई देगा। ये वही महाकाल की मूर्ति है जो नेपाल के हनुमान ढोका मंदिर के प्रांगण में लगी हुई है। भगवती दुर्गा के चित्र भी इन्हीं पुस्तकों में मिलेंगे। उनकी सेनाओं के ध्वज देखिये। उनके ध्वजों को त्रिशूल में पिरोया जाना ही वास्तविकता बता देगा। अंग्रेज़ी फ़िल्म मंगोल्स देखिये। इन्हीं तथ्यों से साक्षात्कार होगा। प्रतापी भरतवंशी योद्धा पूज्य हलाकू खान की मार से त्रस्त बग़दाद की इस्लामी ख़िलाफ़त के बचे इस्लामियों को हमारे पूर्वजों ने शरण दे दी। दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि मंदिरों, बौद्ध विहारों के ध्वंस के कारण कुटे-पिटे इस्लामियों को मंदिरों, बौद्ध विहारों के मूल देश भारत भर में ही स्थान दिया गया। सामान्य राजनैतिक चतुराई तो कहती है कि किसी भी भिन्न सांस्कृतिक समूह पर दृष्टि रखो। ध्यान रखो कि वो क्या कर रहा है ? उसका चिन्तन, खान-पान, शिक्षा क्या है मगर मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना मानने वाले समाज ने इसका ध्यान नहीं किया। परिणामस्वरूप काफ़िर वाजिबुल क़त्ल { अपने से भिन्न विश्वासी हत्या के पात्र हैं } क़िताल फ़ी सबीलिल्लाह, जिहाद फ़ी सबीलिल्लाह { अल्लाह की राह में क़त्ल करो, अल्लाह के लिए जिहाद करो }, बुतपरस्ती कुफ़्र है और कुफ्र को मिटाना प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है, मानने वाले इस्लामी गिरोह भारत भर में फ़ैल गये। स्वयं को स्थापित, सबल करने के बाद इन्होंने बाहर से मदद जुटाई, शक्ति बढ़ाई और शरण देने वाला राष्ट्र, शरण मांगने वालों के लम्बे समय तक अनाचार, व्यभिचार, जज़िया, बलात्कार, ग़ुलाम बनाये जाने का शिकार हुआ। वृहत्तर भारत इस्लाम के आतंक का सबसे अधिक शिकार हुआ है। इसी धरती पर इस्लाम ने जला-जला के, पीट-पीट के, आरे से चीर के, दीवार में ज़िंदा चुनवा कर, टुकड़े-टुकड़े कर के, भूखा रख के, जघन्य बलात्कार करके, अपमानित कर के करोड़ों लोग शताब्दियों तक लगातार मारे हैं। किसी भी सभ्य मनुष्य को इन हत्याकांडों पर जुगुप्सित आश्चर्य होगा। स्वाभाविक है कि कोई सामान्य मनुष्य विश्व भर में जहाँ जहाँ भी इस्लामी गए, ऐसे अनाचार को न समझ पाए। इसका कारण मुसलमानों को इस्लाम के आधार ग्रन्थ क़ुरआन के अमुस्लिमों के लिए दिए गए आदेश हैं। ओ मुसलमानों तुम ग़ैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { 9-123 } और तुम उनको जहां पाओ क़त्ल करो { २-191 } काफ़िरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { 8-39 } ऐ नबी ! काफ़िरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो. उनका ठिकाना जहन्नुम है { 9-73 और 66-9 } अल्लाह ने काफ़िरों के रहने के लिये नर्क की आग तय कर रखी है { 9-68 } उनसे लड़ो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं, न आख़िरत पर; जो उसे हराम नहीं समझते जिसे अल्लाह ने अपने नबी के द्वारा हराम ठहराया है. उनसे तब तक जंग करो जब तक कि वे ज़लील हो कर जज़िया न देने लगें { 9-29 } मूर्ति पूजक लोग नापाक होते हैं { 9-28 } जो कोई अल्लाह के साथ किसी को शरीक करेगा, उसके लिये अल्लाह ने जन्नत हराम कर दी है. उसका ठिकाना जहन्नुम है { 5-72 } ऐसा भयानक चिंतन प्रारंभ में ही थाम लिया जाना चाहिए था। इसके नाख़ून काट लिये जाने चाहिए थे, तीखे दांत तोड़ दिये जाने चाहिए थे मगर ऐसा नहीं हुआ। हमारी शांतिपूर्ण, ध्यान को जीवन समझने वाली भुजा बौद्ध धर्म को मानने वाले देश भी इसका शिकार हुए। यह देखना बहुत अजीब लगता है कि संसार में सबसे अधिक शांतिप्रिय बौद्ध मूल के देशों में इस्लाम के ख़िलाफ़ आवाज़ें उठाने लगी हैं। पड़ोसी देश श्रीलंका में बौद्ध भिक्षुओं ने मुख्यत: मुसलमानों के ख़िलाफ़ ‘बोडु बाला सेना’ नाम का संगठन बना लिया है। ‘बोडु बाला सेना’ का मुख्यालय कोलंबो के बुद्धिस्ट कल्चरल सेंटर में है। इसका उद्घाटन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे किया था। इस संगठन के लाखों समर्थक हैं, जो मानते हैं कि श्रीलंका को मुसलमानों से खतरा है। हज़ारों लोग उनकी रैलियों में शामिल होते हैं। सोशल मीडिया पर भी उनकी अच्छी-ख़ासी पहुँच है। वे अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक विश्वासों, पूजा-पाठ के तरीकों और विशेषकर मस्जिदों को निशाना बना रहे हैं। म्यामांर में मांडले के बौद्ध भिक्षु पूज्यचरण अशीन विराथु चट्टान की तरह दृढ क़दम जमाये खड़े हैं। अशीन विराथु अपने प्रभावशाली भाषणों से जनता को समझा रहे हैं कि यदि अब भी वो नहीं जागे तो उनका अस्तित्व ही मिट जाएगा। जनता का धैर्य टूट चुका है और लोग इस हद तक भड़क उठे हैं कि दुनिया में सबसे शान्तिप्रिय माने जाने वाले बौद्ध भिक्षुओं ने भी हथियार उठा लिये हैं। अब बर्मा की तस्वीर बदलने लगी है। इस्लामी आतंकवाद की पैदावार हिंसक झड़पों एवं उनके भड़काऊ भाषणों पर पूज्य अशीन विराथु के तेजस्वी उद्बोधनों से बर्मा की सरकार ने सेकुलरिज्म दिखाते हुए विराथु को 25 वर्ष की सजा सुनायी थी। लेकिन देश जाग चुका है और जनता के जबरदस्त दबाव में सरकार को उन्हें उनकी सजा घटाकर केवल सात साल बाद 2011 में ही जेल से रिहा करना पड़ा। रिहा होने के पश्चात भी विराथु की कट्टर राष्ट्रवादी सोच में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। और वे अनवरत रूप से अपने अभियान में लगे हैं। म्यांमार में हुई हिंसक घटनाओं के बाद से अब प्राय: पूरी दुनिया में बौद्धों और मुस्लिमों में भारी तनातनी पैदा हो गई है। केवल म्यांमार और श्रीलंका के बौद्ध ही नहीं..चीन में भी बौद्धों और मुस्लिमों में टकराव जारी है। चीन ने भी इस्लामी उद्दंडों पर चाबुक़ फटकारना शुरू कर दिया है। बौद्ध देश चीन के मुस्लिम बहुल प्रांत शिनजियांग के मुसलमान देश के इस क्षेत्र को इस्लामी राष्ट्र बनाने के लिए वर्षों से जेहाद कर रहे हैं। ये लोग चीन में केवल एक बच्चा पैदा करने के क़ानून का भी हिंसक विरोध करते रहे हैं। यहाँ तुर्क मूल के उईंगर मुसलमान पाकिस्तान के क़बायली इलाकों में आतंक की ट्रेनिंग लेकर चीनी नागरिकों का खून बहाने की साज़िश रचते हैं। चीनी सरकार ने पूरी दुनिया को इस्लामी आग में जलता देखकर सबक़ लिया है और यहाँ के मुसलमानों मनमानी बातें न मानने की नीति अपना ली है। यहाँ मुसलमानों को दाढ़ी रखने, बुर्क़ा पहनने यहाँ तक कि रोज़ा रखने पर भी पाबंदी लगा दी गयी है। चीन में उइगर दुकानदारों को शराब बेचने के लिए बाध्य कर दिया गया है। 25 वर्ष से कम उम्र के लड़के रोज़ा नहीं रख सकते हैं. मस्जिदों में नहीं जा सकते। इसके बावजूद चीन में आतंकवादी गतिविधियां एवं जेहादी भावना भी लगातार बढ़ रही हैं जिसके कारण यहाँ भी बौद्धों और मुसलमानों में घमासान मचा हुआ है। हम यह वैश्विक ध्रुव सत्य "शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्र चिंताम प्रवर्तते" कब समझेंगे ? तुफ़ैल चतुर्वेदी

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

............. अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे 

डॉनल्ड ट्रम्प ने 7 मुस्लिम देशों के नागरिकों पर अमरीकी वीज़ा बंद क्या कर दिया कि संसार भर के लोगों के पेट में पानी होने लगा। दस्त लग गये मगर उन्हें बंद करने की दवा नहीं सूझ रही। अमरीका तक में मरोड़ें शुरू हो गयीं। प्रेस का ख़ासा बड़ा हिस्सा कुकरहाव कर रहा है। बराक हुसैन ओबामा सहित हज़ारों अमरीकी सड़कों के किनारे नालियों पर बैठे हैं मगर पानी या काग़ज़ नहीं है। सम्भवतः आपने बराक हुसैन ओबामा द्वारा नए राष्ट्रपति के लिये सार्वजनिक प्रेम-प्रदर्शन का वीडियो तो देखा होगा जिसमें नये राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प और उनकी पत्नी, बराक हुसैन ओबामा और उनकी पत्नी को व्हाइट हॉउस में भेंट के समय भेंट में पैकेट में देते हैं और बराक हुसैन ओबामा नए राष्ट्रपति के पलटते ही उस पैकेट को दूर फेंक देते हैं।

बंधुओ, 'भरतपुर लुट गयो रात मोरी अम्मा' की नौटंकी राजनैतिक चतुराई से भरी कुटिल तकनीक है। भारत में भी बहुत समय से वामपंथी और इस्लामी ढकोसलेबाज़ राष्ट्रवादियों को दबोचने की मुहिम चलाने के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल करते आये हैं। मुझे अपनी पत्रिका लफ़्ज़ के प्रकाशन के समय अपने साथी और नाम के सम्पादक इक़बाल अशहर के साथ एक विवाद का ध्यान आता है। लफ़्ज़ हास्यव्यंग्य और शायरी पर काम कर रही थी मगर उसका सम्पादकीय सामयिक विषयों को भी घेरता था। एक सम्पादकीय में मनोहर श्याम जोशी जी के लेख "चड्ढी-चोली का विरोध और बुर्क़े की हिमायत" की प्रशंसा थी। जिस पर इक़बाल अशहर ने मुझसे सम्प्रेषण के लिये फ़ोन की जगह sms का माध्यम चुना और मुझ पर साम्प्रदायिक होने और अपने ग़ैरतअस्सुबी होने का हवाला देते हुए मुझसे सम्पादकीय में माफ़ी की मांग की।

जवाबी sms में अकिंचन ने पूछा क्या आपने इस्लाम त्याग दिया है ? आख़िर संसार को किस चिंतन धारा ने दारुल-हरब, दारुल-इस्लाम के ख़ानों में बांटा है। किसने काफ़िर वाजिबुल-क़त्ल कह कर मनुष्य के मौलिक जीवन के अधिकार की अवहेलना की है ? कौन कहता है "ईमान वालों को चाहिए कि ईमान वालों के विरुद्ध काफ़िरों को अपना संरक्षक-मित्र न बनायें। और जो ऐसा करेगा उसका अल्लाह से कोई नाता नहीं।" क़ुरआन 3-28 । वो हकबका गए और आज तक जवाब नहीं आया। 

कृपया सोचिये कि क़ौमी यकजहती अर्थात सांप्रदायिक एकता का सार्वजनिक प्रदर्शन, भाषणों का दिखावा भारत ही नहीं बल्कि विश्व भर में सबसे अधिक कौन सा समाज करता है ? अब सोचिये कि क्यों करता है ? आख़िर सारे संसार में स्थानीय समाज में समरस न होने के लिये अलग पहनावा, अलग खान-पान, अलग शैक्षणिक व्यवस्था, अलग न्यायव्यवस्था कौन मांगता है ? यानी सबके लिये तय व्यवस्था से अलग नियमों की मांग अर्थात अलग पहचान के लिए कौन सा समाज सक्रिय रहता है ? कौन सा समाज दूसरे समाज की लड़कियां तो लेना चाहता है मगर अपने समाज की लड़की किसी दूसरे समाज के लड़के से विवाह करना चाहे तो बलवे, हंगामे, हत्या की धमकी पर उतर आता है ? ज़ाहिर है उत्तर इस्लामी समाज अर्थात मुसलमान है। 
यह ढकोसला इतना बड़ा, मज़बूत और परफ़ेक्ट बनाया गया है कि विश्व भर में इसको ढोंग की जगह सच समझ जाता है। ईरान, ईराक़,लीबिया, सोमालिया, सूडान, सीरिया और यमन 7 देश जो न केवल अपने यहाँ भयानक संघर्ष छेड़े हुए हैं बल्कि दूसरे देशों में अपने वैचारिक एड्स के विषाणु भेज रहे हैं, को अमरीका वीज़ा बंद करता है तो पापी हो जाता है और अल्जीरिया, बंगला देश, ब्रूनेई, ईरान, ईराक़, क़ुवैत, लेबनान, लीबिया, मलेशिया, ओमान, पाकिस्तान, सऊदी अरब, सूडान, सीरिया, संयुक्त अरब अमीरात, यमन जैसे 16 इस्लामी देश दशकों से इज़राइली पासपोर्ट वाले नागरिकों को अपने देश का वीज़ा नहीं देते वो सब पुण्यात्मा हैं। 
सम्भवतः इस बात से आपकी जानकारी में वृद्धि हो कि इस्लाम ने अपने पुण्य केंद्र मक्का-मदीना की धरती ही नहीं अपितु आकाश भी प्रतिबंधित कर रखा है। उनके ऊपर से कोई हवाईजहाज़ भी काफ़िरों { ग़ैर-मुस्लिमों } को ले कर नहीं उड़ सकता। काफ़िर से इस सीमा की घृणा इस्लाम की मूल पुस्तक इस्लाम में जगह-जगह मिलती है। 
जब तुम्हारा रब फ़िरिश्तों की ओर वह्य कर रहा था कि मैं तुम्हारे साथ हूँ। तो तुम उन लोगों को ईमान ला चुके हैं जमाये रखो। मैं अभी काफ़िरों के दिल में रौब डाले देता हूँ। और तुम उनकी गर्दनों पर मारो और उनके हर जोड़ पर चोट लगाओ { 8-12 }
यह इस लिए कि इन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल का विरोध किया। और जो जो कोई अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करे तो निस्संदेह अल्लाह भी कड़ी सज़ा देने वाला है। { 8-13 }
यह है { तुम्हारी सज़ा } इसका मज़ा चखो, और यह भी { जान लो } कि काफ़िरों के लिए आग { जहन्नम } की यातना है { 8-13 }
तुमने उन्हें क़त्ल नहीं किया बल्कि अल्लाह ने उन्हें क़त्ल किया.............  { 17-13 }

इस्लामी चिंतन दारुल इस्लाम के ही नहीं दारुल-हरब के नियम भी तय करना चाहता है। इस्लामी देश में मुसलमान कैसे जियें ? क्या करें ? ग़ैरमुस्लिमों के साथ कैसा इस्लामी राज्य कैसा व्यवहार करे ये तो उसका स्वाभाविक अधिकार है ही, ग़ैरमुस्लिम देशों के नियम भी उसके अनुसार बनने चाहिये। हलाल मांस, हिजाब, इस्लामी शिक्षा, शरिया, मस्जिदें, उनमें ग़ैरमुस्लिमों के लिये घृणापूर्ण ख़ुत्बे सभी कुछ इस्लाम के अनुसार बनना चाहिये। ऐसा करवाने के लिये उसे विश्वव्यापी इस्लामी-टैक्स ज़कात की लाखों करोड़ कीअथाह राशि उपलब्द्ध रहती है। इसी राशि से बराक हुसैन ओबामा, हिलेरी क्लिंटन के चुनावी बजट के लिये सैकड़ों करोड़ डॉलर की सहायता की ज़ोरदार चर्चा अमरीकी मिडिया में भी थी। नरेन्द्र मोदी जी के विरोधियों को भी इसी से करोड़ों रुपये भेजे जाने की सूचनायें मिलती रही हैं। 
विश्व राजनीति के इतिहास में किसी ने इसका पंजा पकड़ने का कार्य प्रारम्भ किया है और इस्लामियों को उसी भाषा में जवाब देना शुरू किया है जिसमें वो 1400 साल से संसार से सवाल पूछते आ रहे थे। यानी अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे। यह काम तो ठीक बल्कि बढ़िया है मगर यह ध्यान रहे यह ऊंट भारत में भी है मगर पहाड़ अभी अमरीकी में ही है। भारतीय ऊँट के लिये भारतीय पहाड़ खड़ा करना, उसे भारतीय पहाड़ के नीचे धकेल कर हमें ही लाना होगा। 1200 वर्ष से रिसते आ रहे नासूरों को साफ़ करने, घाव सिलने, राष्ट्र के पूर्ण स्वस्थ होने का काल आ रहा है। सशक्त होइये, सन्नद्ध होइये, भारत माता के कटी भुजाओं को वापस लाने का, पुनः गौरव पाने का समय निकट आ रहा है। एक बड़ी छलांग और पूरा गन्दा नाला पार.......
तुफ़ैल चतुर्वेदी 


बुधवार, 25 जनवरी 2017

सामान्य व्यक्ति और महापुरुष में जो बड़े अंतर होते हैं उनमें से प्रमुख यह है कि महापुरुष की दृष्टि उस कालखंड पर जिसमें वह हमारे बीच उपस्थित होता है, के साथ-साथ अतीत और भविष्य पर भी भरपूर सजगता के साथ होती है। वस्तुतः अतीत की घटनाओं की सामूहिक परिणति ही तो वर्तमान है और वर्तमान के कार्यकलाप ही तो भविष्य तय करते हैं। अतः अतीत का तार्किक विवेचन किये बिना वर्तमान की घटनाओं की प्रवृत्ति को कैसे समझा जा सकता है और वर्तमान का निर्धारण किये बग़ैर भविष्य का निर्माण कैसे किया जा सकता है ? भारत के वास्तविक और मूल राष्ट्र अर्थात हिंदुओं पर बढ़ते चले जा रहे भयावह ख़तरों को सामान्य व्यक्ति भी पहचानता है तो कोई महापुरुष उसे समझने में कैसे चूक सकता है ? ऐसे अनेकों महापुरुषों ने समय-समय पर राष्ट्र रक्षा के लिये अपने स्वभाव के अनुरूप व्यवस्था की है।

इन महापुरुषों में 22 दिसम्बर 1666 पटना में एक जन्मा एक बालक सर्वप्रमुख है। जी हाँ अभिप्राय गुरु गोविन्द सिंह जी से है। धर्म-रक्षा के लिये जूझने वाले अन्य महापुरुषों ने जहाँ आजीवन संघर्ष किया वहां गुरु गोविन्द सिंह जी ने आजीवन संघर्ष के साथ साथ का इस संकट के मूल स्वरूप को पहचाना और समझा कि यह संघर्ष केवल तात्कालिक नहीं है। इसे इस्लाम की ऐसी चिंतन-धारा पुष्ट कर रही है जो अपने अतिरिक्त प्रत्येक विचार को हर प्रकार से दूषित और भ्रष्ट मानती है। इस विचारप्रणाली की दृष्टि में उसके अतिरिक्त हर विचार को नष्ट करना अनिवार्य है अतः इसे समाप्त करने के लिये इसके प्रत्यक्ष आतताइयों को ही दण्डित करना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि इसकी कोई स्थाई व्यवस्था बनानी आवश्यक है। इसका अहर्निश पीछा करना, इसे खदेड़ना, इसको हर प्रकार से नष्ट करना मानवता के सुरक्षित रखने के लिए ज़ुरूरी है।

वह देख सकते थे कि इस विचारधारा की आतंकी कार्यवाहियों को उसके धर्मग्रंथ से इस प्रकार अनवरत प्रश्रय मिल रहा है और यह शताब्दियों से लगातार उपद्रव करती आ रही है तो उसके वर्तमान को ही नष्ट करना पर्याप्त नहीं है। उसकी हिंसक कार्यवाहियाँ भविष्य में न हों, आगामी पीढ़ी का जीवन सुरक्षित रहे, वह चैन से जीवन व्यतीत कर सके इस हेतु वर्तमान से भविष्य तक का इंतज़ाम करना होगा। आख़िर पाशविक मनोविकारों को मानवीय गुण मानने वालों से और कैसे निबटा जा सकता है ? इस के स्थाई समाधान के लिए उन्होंने सन 1699 में बैसाखी के दिन खालसा पन्थ की स्थापना की। इस हत्यारी विचारधारा से विभिन्न राष्ट्रों के बहुत से लोग जूझे मगर इससे जूझते रहने, लगातार लड़ते रहने की व्यवस्था भारत में ही बनी। यह घटना सम्पूर्ण विश्व में इस्लामी आतंक से जूझने के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में भी प्रमुखतम है। इसी के बाद एक के बाद दूसरे जन-समूह, एक देश के बाद दूसरे देश को लीलते जा रहे इस्लामी दावानल के पाँव भारत की धरती पर थमे।

9 वर्ष की आयु में अपने पिता गुरू तेग़ बहादुर जी को धर्म के लिए बलिदान के लिए प्रेरित करने वाले पूज्य गुरु गोविन्द सिंह जी का सम्पूर्ण जीवन पल-पल राष्ट्र चिंता में रत रहा। घटना यह थी कि उनके पिता गुरू तेग़ बहादुर जी के पास कश्मीरी हिंदुओं का एक समूह आया और उनसे औरंगज़ेब के आदेश पर कश्मीर के मुग़ल सूबेदार इफ़्तिख़ार ख़ान के हिंदुओं को यातना दे कर मुसलमान बनाने के लिये बाध्य करने की शिकायत की। गुरु तेग़ बहादुर जी के मुंह से निकला "धर्म किसी महापुरुष का बलिदान मांग रहा है" बालक गोविन्द राय जी तुरन्त बोले "आपसे बड़ा महापुरुष कौन है ?" गुरू तेग़ बहादुर जी ने कश्मीरी हिंदुओं से कहा। औरंगज़ेब से कहो अगर गुरु तेग़ बहादुर मुसलमान बन जायेंगे तो हम भी बन जायेंगे। इस घोषणा के बाद गुरू तेग़ बहादुर जी भ्रमण करते हुए दिल्ली पहुंचे, जहाँ उन्हें औरंगज़ेब द्वारा मुसलमान बनने के लिये कहा गया और न मानने पर शिष्यों सहित क़ैद कर लिया गया। उनके शिष्य भाई मति दास को आरे से चीरे जाने, भाई दयाल दास को खौलते हुए पानी में उबाले जाने जैसी कई सप्ताह तक भयानक यातना देने के बाद गुरू तेग़ बहादुर जी का 11 नवम्बर 1675 को इस्लामी मुफ़्ती के आदेश पर सर काट दिया गया।

धर्म के लिये अपने अपने पिता के बलिदान होने के बाद 10 वर्ष की अवस्था में गुरु पद पर विराजे पूज्य गुरु गोविन्द सिंह जी आध्यात्मिक नेता, दूरदर्शी चिंतक, बृजभाषा के अद्भुत कवि, उद्भट योद्धा थे। 1699 ईसवीं में 33 वर्ष की आयु में बैसाखी के अवसर पर आनंदपुर साहब में आपने ख़ालसा पंथ की स्थापना की। धर्मरक्षा को ही जीवन मानने वाले पूज्य गुरु गोविन्द सिंह जी की रचना उग्रदंती में लिखित यह पंक्तियाँ ख़ालसा पंथ की स्थापना का उद्देश्य स्पष्ट करती हैं।

सकल जगत में खालसा पंथ गाजे
जगे धर्म हिन्दू तुरक धुंध भाजे

इस्लामी आतंक के कारण बलिदान होने वाले वीरों की अटूट श्रंखला में आपके पुत्रों के बलिदान भी अतुलनीय हैं। शस्त्रों की छाँव में पाले गये 17 और 13 वर्ष की आयु के उनके दो पुत्र साहिबज़ादा अजीत सिंह, जुझार सिंह 1704 ईसवीं में चमकौर दुर्ग में लड़ते हुए बलिदान हुए। 8 और 5 वर्ष के जोरावर सिंह और फतेह सिंह मुसलमान न बनने के कारण दीवार में चुन दिए गए। इतिहास में बहुत ही काम उदाहरण मिलते हैं जब किसी पिता ने एक सप्ताह में अपने 4–4 बेटे बलिदान दे दिए हों। इसी कारण गुरु गोविन्द सिह जी को सरबस दानी भी कहा जाता है। जब गुरु साहब को इसकी सूचना मिली तो उनके मुंह से बस इतना निकला

इन पुत्रन के कारने, वार दिए सुत चार
चार मुए तो क्या हुआ, जीवें कई हज़ार

उनके व्यक्तित्व में इतने आयाम हैं कि उनके गुणों की चर्चा करने के लिये एक लेख कम पड़ेगा अतः उनके जीवन के योद्धा पक्ष और उसके प्रमाण स्वरूप उनकी पौरुषपूर्ण रचना ज़फ़रनामा का उपयोग ही करना समीचीन होगा। गुरु गोविन्द सिंह जी ने हत्यारी विचारधारा के केंद्र औरंगज़ेब को 1705 ईसवीं में फ़ारसी में एक पत्र लिखा जिसे ज़फ़रनामा कहा जाता है। ज़फ़रनामा को भाई दयासिंह जी से औरंगज़ेब के पास अहमदनगर भिजवाया गया। उसमें वर्णित मंतव्य को स्पष्ट करने के लिए उनके कुछ प्रमुख पदों का यहां भावार्थ देना उपयुक्त होगा। गुरु गोविंद सिंह ने जफरनामा का प्रारंभ ईश्वर के स्मरण से किया है। उन्होंने अपने बारे में लिखा है कि 'मैंने ईश्वर की शपथ ली है, जो तलवार, तीर-कमान, बरछी और कटार का ईश्वर है और युद्धस्थल में तूफान जैसे तेज दौड़ने वाले घोड़ों का ईश्वर है।' वह औरंगज़ेब को सम्बोधित करते हुए कहते हैं, 'जिसने तुझे बादशाहत दी उसी ने मुझे धर्म की रक्षा की दौलत दी है। मुझे वह शक्ति दी है कि मैं धर्म की रक्षा करूं और सत्य का ध्वज ऊंचा हो।' आप इस पत्र में औरंगज़ेब को 'धूर्त', 'फरेबी' और 'मक्कार' बताते हैं। उसकी इबादत को 'ढोंग' कहते हैं।

मुस्लिम साम्राज्य के सबसे क्रूर आततायी को अपने पिता तथा भाइयों का हत्यारा बताना उनकी वीरता का प्रमाण है। आज भी धमनियों में रक्त का संचार प्रबल कर देने वाले अपने पत्र ज़फ़रनामे में गुरु गोविंद सिंह स्वाभिमान तथा पौरुष का परिचय देते हुए आगे लिखते हैं मैं तेरे पांव के नीचे ऐसी आग रखूंगा कि पंजाब में उसे बुझाने तथा तुझे पीने को पानी तक नहीं मिलेगा। वह औरंगजेब को चुनौती देते हुए लिखते हैं, 'मैं इस युद्ध के मैदान में अकेला आऊंगा। तू दो घुड़सवारों को अपने साथ लेकर आना।' क्या हुआ अगर मेरे चार बच्चे मारे गये, पर कुंडली मारे डंसने वाला नाग अभी बाकी है।'

गुरु गोविंद सिंह ने औरंगज़ेब को इतिहास से सीख लेने की सलाह देते हुए लिखते हैं। 'सिकंदर और शेरशाह कहां हैं ? आज तैमूर कहां है ? बाबर कहां है ? हुमायूं कहां है ? अकबर कहां है ?' अपने तीखे सम्बोधन से औरंगज़ेब को ललकारते हुए कहते हैं, 'तू कमजोरों पर जुल्म करता है, उन्हें सताता है। कसम है कि एक दिन तुझे आरे से चिरवा दूंगा।' इसके साथ ही गुरु गोविंद सिंह ने युद्ध तथा शांति के बारे में अपनी नीति को स्पष्ट करते हैं, 'जब सभी प्रयास करने के बाद भी न्याय का मार्ग अवरुद्ध हो, तब तलवार उठाना सही है और युद्ध करना उचित है।' ज़फ़रनामे के अंत के पद में ईश्वर के प्रति पूर्ण आस्था व्यक्त करते हुए फ़रमाते हैं, 'शत्रु भले हमसे हजार तरह से शत्रुता करे, पर जिनका विश्वास ईश्वर पर है, उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता।' वस्तुत: गुरु गोविंद सिंह का ज़फ़रनामा केवल एक पत्र नहीं बल्कि एक वीर-काव्य है, जो भारतीय जनमानस की भावनाओं को प्रकट करता है। उनका यह पत्र युद्ध का घोष तो है ही, साथ ही शांति, धर्मरक्षा, आस्था तथा आत्मविश्वास का परिचायक है।

यह पत्र पीड़ित, दुखी, हताश, निराश, खिन्न हिन्दू समाज में नवजीवन तथा गौरवानुभूति का संचार करने वाला साबित हुआ। समाज में औरंगज़ेब के कुकृत्यों के प्रति आक्रोश बढ़ा और विदेशी आक्रमणकारी साम्राज्य औरंगज़ेब के साथ ही अपने पतन की ढलान पर बढ़ गया। गुरु गोविन्द सिह जी का अवतरण सोये हुए समाज को झकझोर गया और भारत भर को ग्रसे हुए मुग़ल साम्राज्य के खण्ड-खण्ड हो गये।

तुफ़ैल चतुर्वेदी

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

बंधुओ, सम्भवतः आपने अमरीका के नये राष्ट्रपति महामहिम डोनाल्ड ट्रम्प का राष्ट्रपति बनने के बाद का पहला भाषण सुना होगा। न सुना हो तो कृपया अवश्य सुनें। इसे कहते हैं तेजस्वी नेता। आज के भ्रष्ट और घटिया राजनैतिक परिदृश्य में अपने पहले भाषण से ही ट्रम्प आशा और विश्वास की किरण बन कर उभरे हैं। हमारे टी वी चैनलों पर बैठे हुए प्रोफ़ेसर आनंद कुमार जैसे वाचाल इस भाषण से पहले कह रहे थे "चुनाव के लिये वोटों का ध्रुवीकरण आपसे कुछ भी कहलवा लेता है मगर शासन की वास्तविकता कुछ और होती है"। मनहूस वामपंथ, अल्पसंख्यकवाद की लम्पट, झूटी राजनीति को प्रेरित करती वाचालता मानती नहीं मगर पौरुष तो पौरुष ही होता है। महामहिम राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने स्पष्ट सन्देश दिया।
सम्पूर्ण विश्व शताब्दियों से आतंकवाद, गुंडागर्दी, अनाचार से पीड़ित है। 1400 वर्षों से सारे योरोप, एशिया, अफ़्रीक़ा में मंदिर, चर्च, सिनेगॉग, बौद्ध विहार, विश्वविद्यालय, पुस्तकालय ध्वस्त किये, तोड़े गए हैं। लाखों लोगों को ग़ुलाम बनाया जाता रहा है। अपमानित कर जज़िया वसूला जाता रहा है। जिस चिंतन ने यह किया था वो आज भी उसी रास्ते पर चल रहा है। वही क़त्ताल फ़ी सबीलिल्लाह { अल्लाह की राह में क़त्ल करो } जिहाद फ़ी सबीलिल्लाह { अल्लाह की राह में जिहाद करो } काफ़िर वाजिबुल क़त्ल { अमुस्लिम वधयोग्य है } का हत्यारा चिंतन आज भी विश्व के जीवन को संकट में डाले हुए है। विश्वास न हो तो कृपया क़ुरआन के सन्दर्भ देखिये
ओ मुसलमानों तुम गैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { 9-123 }
और तुम उनको जहां पाओ कत्ल करो { 2-191 }
काफिरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { 8-39 }
ऐ नबी ! काफिरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो. उनका ठिकाना जहन्नुम है { 9-73 और 66-9 }
अल्लाह ने काफिरों के रहने के लिये नर्क की आग तय कर रखी है { 9-68 }
उनसे लड़ो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं, न आखिरत पर; जो उसे हराम नहीं जानते जिसे अल्लाह ने अपने नबी के द्वारा हराम ठहराया है. उनसे तब तक जंग करो जब तक कि वे जलील हो कर जजिया न देने लगें { 9-29 }
तुम मनुष्य जाति में सबसे अच्छे समुदाय हो, और तुम्हें सबको सही राह पर लाने और गलत को रोकने के काम पर नियुक्त किया गया है { 3-110 }
अमरीका के नये राष्ट्रपति महामहिम डोनाल्ड ट्रम्प के इस भाषण से स्पष्ट है कि अब ग़ज़वा-ए-हिन्द का सपना देखती हुई आँखों को ग़ज़वा-ए-सलफ़ियत, ग़ज़वा-ए-वहाबियत देखने के दिन आ रहे हैं। शताब्दियों से विश्व को ऐसे पौरुषवान नेतृत्व की प्रतीक्षा थी। डोनाल्ड ट्रम्प राजनेता नहीं है वरन विश्व को त्रास से उबारने वाले चमत्कारी राष्ट्रभक्त हैं। उन्हें इसी कार्य के लिये अमरीकी जनता ने जनादेश दिया था। यहाँ स्मरण करता चलूँ कि नरेन्द्र मोदी जी और उनके प्रत्याशियों का भी भारत की जनता ने इसी आशा में ही विजय तिलक किया था। बंधुओ, यह हमारा भी क्षण है। सैकड़ों वर्षों से रिसते आ रहे घावों को साफ़ करने, उन पर मरहम लगाने का यही समय है। भगवान महाकाल से प्रार्थना कीजिये कि विश्व को आतंकमुक्त करने के महती उद्देश्य को सफल करें। इसमें भरतवंशियों का योगदान अनिवार्य है। सबसे बड़ा हिसाब तो हमारा ही शेष है। पूज्य डॉ हेडगेवार ने भारत माता के उत्कर्ष के लिए याचि देही याचि डोला { इसी देह से इन्हीं आँखों से } शब्दों का प्रयोग इतिहास के इसी मोड़ के लिये किया था।
तुफ़ैल चतुर्वेदी

गुरुवार, 19 जनवरी 2017

दोस्तो सार्वजनिक जीवन के स्थापित लोग बेचैन कर सकने वाले विषयों पर सामान्यतः चुप रहते हैं या बहुत नपा-तुला बोलते हैं। उनकी कोशिश ये रहती है कि ऐसा कुछ भी जो विवादास्पद बन सकता है न कहा जाये। इसकी तह में ये भय रहता है कि स्थिर और स्थापित जीवन विचलित न हो जाये मगर साहिबो एक मर्द निकल आया और याक़ूब मेनन जैसे दुर्दांत हत्यारे और उसके हिमायतियों के बारे में सच कह दिया। जी हाँ मैं त्रिपुरा के राज्यपाल महामहिम तथागत राय की बात कर रहा हूँ।

याक़ूब मेनन जैसे देशद्रोही को ही नहीं किसी भी भारतीय को जीवन का अधिकार संविधान से मिला मौलिक अधिकार है। इसका अर्थ यह नहीं है कि किसी भी स्थिति में किसी भारतीय नागरिक के प्राण नहीं लिये जा सकते। इसका अर्थ यह है कि किसी भारतीय नागरिक के प्राण लेने का अधिकार केवल राज्य को है और वो भी नागरिक के प्राण लेने के लिए अभियोग ही चला सकता है और मृत्युदंड का निर्णय उससे निरपेक्ष, तटस्थ न्यायपालिका करेगी। न्यायपालिका भी प्राणदंड स्वयं अपनी व्यवस्था के अनुसार दुर्लभतम में भी दुर्लभ मामलों में देती है।

सेशन, हाई कोर्ट में अपील, सुप्रीम कोर्ट में अपील, राष्ट्रपति से क्षमादान की याचिका और उसे निरस्त कर देने के बाद फिर से पुनरीक्षण याचिका यानी हर तरह से सिक्काबंद, ठोस व्यवस्था कि कोई निर्दोष न मर जाये। ये सावधानी इस हद तक है कि भारतीय भूमि पर किसी विदेशी आतंकी को भी बिना अभियोग चलाये मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता । अजमल कसाब पर भी इस धरती के कानूनों के हिसाब से अभियोग चला कर नियमानुसार मृत्युदंड दिया गया।

याक़ूब मेनन अपने पापी ख़ानदान सहित मुंबई के सीरियल बम धमाकों जिनमें 270 लोग मारे गए और हज़ारों लोग बुरी तरह घायल हुए, में सम्मिलित था। याक़ूब मेनन का अपराध हताहतों की संख्या की दृष्टि से ही बहुत बड़ा नहीं है बल्कि देशद्रोह भी है। उसने, उसके बाप, माँ, भाई, भाभी अन्य परिवारीय लोगों ने अपनी तरफ से यथासंभव भारत को चोट पहुँचाने का भरसक प्रयास किया। इसके परिवार में कइयों को सज़ाएं हुईं और इसे फांसी पर लटकाया गया। ऐसे दुष्ट प्राणी को मिटटी में दबाने के समय लाखों लोगों का उपस्थित होना क्या कह रहा है ?

आख़िर एक देशद्रोही के जनाज़े में सम्मिलित होने वाले लोग कुछ सोच कर तो अपने काम पर न जा कर क़ब्रिस्तान पहुंचे होंगे ? उनके मानस में कोई तो अंतर्धारा बह रही होगी ? उस अंतर्धारा की पहचान और वो देश, राष्ट्र के लिए हानिकर है तो उसकी रोकथाम राजनेता नहीं करेंगे तो और कौन करेगा ?
आख़िर लालू प्रसाद यादव, नितीश कुमार, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, आज़म खान, अबू आज़मी, कांग्रेस के सचिन पायलेट, शकील अहमद, मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन के अकबरुद्दीन ओवैसी-असदुद्दीन ओवैसी, साम्यवादी पार्टी के प्रकाश करात, वृंदा करात, आप के अरविन्द केजरीवाल, आप से निष्काशित प्रशांत भूषण, ममता बनर्जी जैसे मुस्लिम वोटों के लिये जीभ लपलपाते राजनेता उसके पक्ष में अकारण तो बक्चो…नहीं करने लगे।

फांसी लगने के बाद याक़ूब मेनन का शरीर पूरा उसके घर वालों को सौंप दिया गया। जिसके दफ़नाते समय लाखों मुसलमान एकत्र हुए। यहाँ ये ध्यान में आना आवश्यक है कि इन हत्यारों के किये विस्फोटों के बाद सैकड़ों लोगों के छिन्न-भिन्न शव मिले। जिनके टुकड़े इकट्ठे कर के अंतिम संस्कार किया गया। सैकड़ों घायल हुए लोग आज भी विकलांग का जीवन जी रहे हैं। देवबंदी मुल्लाओं ने तो कहा था आतंकवादियों की नमाज़े-जनाज़ा जायज़ नहीं है।

वो सारे कहाँ हैं ?बोलते क्यों नहीं ? मुंह में दही जमा हुआ है या ज़बान बिल्ली ले गयी ? आज ये सब तो ऐसे चुप बैठे हैं जैसे गोद में सांप बैठा हो और हिलना मना हो।

बंधुओ, तो जो बोल रहे हैं उनके पक्ष आवाज़ नहीं उठानी चाहिये। क्या ये समय त्रिपुरा के राज्यपाल महामहिम तथागत राय का आभार प्रकट करने, उनकी स्तुति गान का नहीं है ? और कुछ नहीं तो महामहिम तथागत राय के चरणों में हम प्रणाम तो कर ही सकते हैं। महामहिम प्रणाम स्वीकारिये

तुफ़ैल चतुर्वेदी

सोमवार, 16 जनवरी 2017


महाराष्ट्र सरकार ने उन मदरसों के, जो आधुनिक विषय नहीं पढ़ा रहे हैं, को स्कूल न मानने और उनका अनुदान बंद करने का निर्णय लिया है। इस पर कई मुस्लिम और कांग्रेसी राजनेता, पत्रकार, मीडिया चैनल चिल्ल-पौं मचा रहे हैं। लगभग "भरतपुर लुट गयो रात मोरी अम्मा' वाली नौटंकी चल रही है। ये अनुकूल समय है कि इसी बहाने शिक्षा के उद्देश्य, उसको प्राप्त करने की दिशा में मदरसा प्रणाली की सफलता और उन राजनेताओं, पत्रकारों की भी छान-फटक कर ली जाये। आख़िर किसी योजना के शुरू करने, वर्षों चलाने के बाद उसको लक्ष्य प्राप्ति की कसौटी पर खरा-खोटा जांचा जायेगा कि नहीं ? ये पैसा महाराष्ट्र में लम्बे समय तक शासन करने वाले कॉंग्रेसी मुख्यमंत्रियों, शिक्षा मंत्रियों के घर का पैसा नहीं था। ये धन समाज का है और समाज का धन नष्ट करने के लिये निश्चित ही नहीं होता।  

सदैव से शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को अर्थोपार्जन की धारा में डालना होता है। इसी से जुड़ा या अन्तर्निहित लक्ष्य ये भी होता है कि धन की प्राप्ति का मार्ग संवैधानिक ही होना चाहिये यानी व्यक्ति के संस्कार का विषय भी धन कमाने से जुड़ा होता है। ज़ाहिर है ऐसे लोग भी होते हैं जो जेब काटने, ठगी करने, चोरी करने, डाका डालने, अपहरण करके फिरौती वसूलने को भी घन प्राप्ति का माध्यम मानते हैं और ऐसा करते हैं। मध्य काल के अनेक योद्धा समूह इसी तरह से जीवन जीते रहे हैं। ब्रिटिश शासन के भारत में भी कंजर, हबोड़े, सांसी, नट इत्यादि अनेकों जातियों के समूह इसी प्रकार से जीवन यापन करते रहे हैं। प्रशासन, पुलिस के दबाव और सभ्यता के विकास के साथ उनका इस प्रकार का जीवन भी बदला और वो सब सभ्य समाज के साथ समरस होने लगे हैं। यहाँ एक प्रश्न टी वी चैनलों पर अंतहीन बहस करने-करवाने वाले ऐंकरों और उनसे सीखे-तैयार किये भेजों में कुलबुलायेगा कि सभ्य होने की सबकी अपनी-अपनी परिभाषा हैं। ऐसा कलुषित जीवन जीने वाले भी अपने को सर्वाधिक सभ्य मान सकते हैं। 

इसलिये इसकी बिल्कुल सतही, बेसिक परिभाषा से काम चलाते हैं। प्रत्येक मनुष्य के सामान अधिकार, स्त्रियों तथा पुरुषों के बराबर के अधिकार, रजस्वला हो जाने के बाद ही लड़की का विवाह, दास-प्रथा का विरोध, जीवन का अधिकार मूल अधिकार { इसका अर्थ ये है कि राज्य ही अत्यंत-विशेष परिस्थिति में किसी व्यक्ति के प्राण ले सकता है और ऐसा करने के लिये भी अभयोग लगाने, सुनवाई करने की ठोस-सिक्काबंद न्याय व्यवस्था आवश्यक है। यानी शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को संवैधानिक मार्गों से ही धन अर्जन करने का माध्यम सुझाना है। 

यहाँ से मैं मदरसा की शिक्षण प्रणाली पर बात करना चाहता हूँ। भारत में मदरसों का प्रारम्भ बाबर ने किया था। हम सब जानते हैं बाबर मुग़ल आक्रमणकारी था। भारत में उस समय पचासों आक्रमणकारियों के नृशंस कार्यों, विद्धवंस के बाद भी गांव-गांव में अपनी गुरुकुल प्रणाली चल रही थी। हमें उस समय किसी नए शिक्षण की आवश्यकता नहीं थी। आइये विचार करें बाबर के भारत की भूमि में इस प्रणाली के बीज रोपने का क्या उद्देश्य रहा होगा ? इसे जानने के लिए उपयुक्त है कि मदरसों का सामान्य पाठ्यक्रम क्या है, वहां क्या पढ़ाया जाता है, इस पर विचार किया जाये। 

मदरसा इस्लामी शिक्षा का माध्यम है। अब यहाँ क़ुरआन { अज़बर-उसे कंठस्थ करना, क़िरअत-उसे लय से पढ़ना, तफ़सीर-उसका विवेचन करना }, हदीस { मुहम्मद जी के जीवन की घटनाओं का लिपिबद्ध स्वरूप}, फ़िक़ा { इस्लामी क़ानून }, सर्फ़ उन्नव { अरबी व्याकरण } दीनियात { इस्लाम के बारे में अध्ययन }, मंतिक़ और फ़लसफ़ा { तर्क और दर्शन } पढ़ाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त इस्लाम के विषय में अन्य सभी प्रकार का शिक्षण दिया जाता है। कुछ मदरसों में कंप्यूटर, अंग्रेजी, तारीख़ { मूलतः इस्लाम का इतिहास और कुछ भारत का भी इतिहास } पढ़ाया जाता है।

मैं आग्रह करूँगा कि मिडिया, प्रेस, सभाओं में हाय-हत्या करने वाले कोई भी सज्जन-दुर्जन-कुज्जन देवबंद, सहारनपुर, लखनऊ, बरेली, बनारस, सूरत, पटना, दरभंगा, कलकत्ता, थाणे कहीं के भी मदरसों में जा कर केवल एक किनारे चुपचाप खड़े हो कर वहां की चहलपहल देखें। वहां पूरा वातावरण मध्य युगीन होता है। ढीले-ढाले कपड़े पहने, प्रचलित व्यवहार से बिलकुल भिन्न टोपियां लगाये इन छात्रों की आँखों में झांकें। आप पायेंगे इनकी आँखों में विकास करने, आगे बढ़ने, समाज के हित में कुछ करने की ललक, सपने हैं ही नहीं। आप वहां इतिहास की अजीब सी व्याख्या, उसके कुछ हिस्सों का मनमाना पाठ, अरबी सीखने के नाम पर कुछ अपरिचित आवाज़ें रटते लोगों को पाते हैं। ऐसे लोग जो मानते हैं औरत आदमी की पसली से बनायी गयी है। उसमें बुद्धि नहीं होती और वो नाक़िस उल अक़्ल है। उसे परदे में रहना चाहिये। उसका काम मुस्लिम बच्चे पैदा करना, घर की अंदरूनी देखभाल है। जो आज भी समझते हैं कि धरती गोल नहीं चपटी है। सूरज शाम को कीचड़ भरे तालाब में डूब जाता है। Till, when he reached the setting-place of the sun, he found it setting in muddy spring, and found a people thereabout: We said: O Dhu'l-Qarneyn! Either punish him or show them kindness { Quraan Ayat 86 chapter 18 Al-Kahaf }

ऐसे छात्र जो समझते हैं कि केवल वो जिस सिमित जीवन-शैली  के बारे में जानते हैं, वही सही है और शेष दुनिया शैतानी है। प्रकृति के प्रत्येक कण के प्रति आभारी-आस्थावान प्रकृति पूजक, मूर्ति-पूजक, ईसाई, यहूदी, पारसी, बौद्ध, शिन्तो, नास्तिक अर्थात उसके अतिरिक्त सारे ही लोग वाजिबुल-क़त्ल हैं। इन सबको मारे अथवा मुसलमान बनाये संसार में चैन नहीं आ सकता। संसार एक ईश्वर बल्कि अरबी अल्लाह की उसकी सीखी-पढ़ाई व्यवस्था से इबादत करने के लिये अभिशप्त है। आज नहीं तो कल सारी दुनिया इस्लाम क़ुबूल कर लेगी और क़ुरआन के रास्ते पर आ जाएगी। उन के जीवन का उद्देश्य इसी दावानल का ईंधन बनना है। संसार के बारे में ऐसी अटपटी, अजीब दृष्टि बनाना केवल इसी लिये संभव होता है चूँकि ये लोग असीम आकाश को चालाक लोगों की बनायी गयी बहुत छोटी सी खिड़की से देखते हैं। ये काफ़ी कुछ कुएँ के मेढक द्वारा समुद्र से आये मेंढक के बताने पर समुद्र की लम्बाई-चौड़ाई का अनुमान लगाने की तरह है। कुएँ में लगायी गयी कितनी भी छलाँगें, ढेरों उछल-कूद समुद्र के विस्तार को कैसे बता सकती है ? कुँए में रहने वाला समुद्र की कल्पना ही कैसे कर सकता है ? उसे समझ ही कैसे सकता है ?

मदरसा मूलतः इस्लामी चिंतन के संसार पर दृष्टिपात का उपकरण है। स्वाभाविक है ऐसी आँखें फोड़ने वाली विचित्र शिक्षा के बाद निकले छात्र जीवनयापन की दौड़ से स्वयं को बाहर पाते हैं। उन्हें मदरसे से बाहर की दुनिया पराई लगती है। इन तथ्यों की उपस्थिति में निस्संकोच ये निष्पत्ति हाथ आती है कि मदरसा दुनिया को देखने का ऐसा टेलिस्कोप है जिसके दोनों तरफ़ के शीशे पहले दिन से ही कोलतार से पुते हुए थे। इसका प्रयोग देखने वाले को कुछ उपलब्ध नहीं कराता बल्कि उसे समाज से काट देता है। वो कुछ न दिखाई देने के लिये अपनी बौड़म बुद्धि, ग़लत टेलिस्कोप को ज़िम्मेदार नहीं ठहराता बल्कि इसके लिए बेतुके तर्क ढूंढता है और उसे मंतिक़-फ़िक़ा का नाम देता है। मदरसे की जड़ में इस्लामी जीवन पद्धति है और ये पद्धति सारे समाज से स्वयं को काट कर रखती है। आप सारे विश्व में मुस्लिम बस्तियां अन्य समाजों से अलग पाते हैं। स्वयं सोचिये आपके मुस्लिम दोस्त कितने हैं ? वो आपको कितना अपने घर बुलाते हैं ? वो अपने समाज के अतिरिक्त अन्य समाज के लोगों में कितना समरस होते हैं ? 

साहिबो यही बाबर का उद्देश्य था। भारत में भारत के पूरी तरह ख़िलाफ़, अटपटी तरह से सोचने-जीने वाला, आतंरिक विदेशी मानस पैदा करना। इसी तरह से भारत में इस मिटटी के लिये पराई सोच का पौधा जड़ें जमा सकता था। यही वो उपकरण है जिसने कश्मीर में आतंकवाद पनपाया है। वृहत्तर भारत की छोड़ें, इसी उपकरण के कारण अभी हमसे अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्ला देश अलग हुए थे। इसी उपकरण के उपयोग के कारण सारे संसार में वहाबियत फ़ैल रही है। यही वो अजीब से शिक्षण-प्रणाली है जो मनमाने ढंग से तर्क की कसौटी पर स्वयं को कसे बिना पूर्णरूपेण सही और दूसरों को घृणा-योग्य ग़लत समझती है। इसी वहाबी सोच के कारण वो संसार भर में नृशंस हत्याकांडों को आवश्यक समझती है। सबको मार डालने का ये दर्शन नरबलि देने वाले अघोरियों जैसा बल्कि उससे कहीं अधिक खतरनाक है चूँकि अघोरी विचार समूह का विचार नहीं है।  

आज नहीं तो कल इससे तो हम निबट ही लेंगे मगर इस संस्थान से उपजी खर-पतवार का क्या किया जाये ? ये बाजार में नहीं बिकती और फिर मंडी पर ही पक्षपात का आरोप लगाने लगती है। सच्चर महाशय जिस निष्कर्ष पर पहुंचे थे वो इसी संस्थान की शिक्षा प्रणाली का परिणाम है। इस प्रणाली के पक्ष में विधवा-विलाप करने वाले किसी भी व्यक्ति का बेटा-बेटी मदरसे में आखिर क्यों नहीं पढ़ता ? ये लोग मदरसे में पढ़ी लड़की को अपनी बहू क्यों नहीं बनाते ? मदरसे के छात्र को दामाद क्यों नहीं बनाते ? सच्चाई उन्हें भी पता है मगर उनको लगता है कि मुल्ला पार्टी इस हाय हाय मचने से उनके पक्ष में वोट डलवा देगी। आखिर बिहार और उत्तर प्रदेश के चुनाव सन्निकट हैं और मुल्ला टोलियां अपने पक्ष में घुमानी हैं या नहीं ? मित्रो ! ये बन्दर नाच इसी लिए हो रहा है 

तुफैल चतुर्वेदी                


शनिवार, 14 जनवरी 2017

.......................भविष्यवाणी
..............{ काश गलत हो मगर होगी नहीं }

फारसी का एक मुहावरा है खाकम-ब-दहन यानी मेरे मुंह में खाक. लेख के शुरू में ही ये वाक्य अपने लिए प्रयोग कर रहा हूँ कि जिस भविष्यगत बात को ले कर कोई और आशंकित होगा मैं निश्चिन्त हूँ कि वही होगी. विषय कश्मीर का है. इसके लिए इतिहास में संक्षिप्त रूप से जाना आवश्यक है. आइये आपको थोड़ा अतीत में ले चलूँ.

भारतीयों के स्थान-स्थान पर यथा-संभव विरोध, 1945 में समाप्त हुए द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इंग्लैंड की भग्न दशा, भारतीय उपमहाद्वीप पर होने वाले व्यय की अधिकता और आय में अनुपातिक कमी, द्वितीय विश्व युद्ध के लिए ब्रिटेन द्वारा अधीन भारत से लिए गए करोड़ों-करोड़ पौंड का ऋण { जिसे आज तक लौटाया नहीं गया है और वो आज भी हमारी बेलेंस शीट में दिखाया जाता है }, आज़ाद हिन्द फ़ौज के सैनिकों पर चलाये गए मुकदमों के कारण ब्रिटिश भारतीय सेना में गहरी बेचैनी, हिन्दुओं-मुसलमानों को लगातार लड़ाते जाने की ब्रिटिश नीति के विस्फोट के क्षण का निकट आते जाना, अमरीका का दबाव जैसे ढेरों कारण थे कि अंग्रेज भारत छोड़ने के लिए विवश हो गए. देश का शासन मूलतः आई. सी. एस. अधिकारी चलाते थे. गांधीवादियों के मनमाने दावे ' दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल' के विपरीत अँगरेज़ 1935 से ही स्वयं को भारत को स्वतंत्र करने के बारे में तय कर चुके थे. बिना खड्ग या खड्ग के साथ स्वतंत्रता मिलनी ही थी. अंग्रेज़ों की मनस्थिति और उनकी तत्कालीन विवश परिस्थितियों की जानकारी इस तथ्य से ही लगती है कि अंग्रेज़ों ने 1939 से ही आई. सी. एस. की भर्ती बंद कर दी थी. वो येन केन प्रकारेण देश चला रहे थे और अधिकतम ब्रिटिश हित सुरक्षित रखते हुए भारत से निकलने का रास्ता ढूंढ रहे थे.

द्वितीय महायुद्ध समाप्त होते-होते इंग्लैंड में भारतीय स्वतंत्रता के विरोधी चर्चिल की जगह एटली की सरकार आ गयी. ये पार्टी लड़ी ही इस आश्वासन पर थी कि अगर वो सरकार में आएगी तो ब्रिटेन पर अब बोझ बन गए उपनिवेशों को स्वतंत्र कर देगी. अपने चुनावी वादे के अनुसार उसने भारत को उसके हाल पर छोड़ कर जाने का निर्णय ले लिया. ब्रिटिश हित सुरक्षित रखने के लिए देश का खून-खराबे वाला अधीर विभाजन और भारत के विभाजित हिस्सों का कॉमन वेल्थ में होना सुनिश्चित कराया गया. ब्रिटिश सेना के गुप्त दस्तों चर्च के स्कूलों, संस्थानों की संपत्ति भारतीय संघ में सुरक्षित रहना निश्चित किया गया. इस विभाजन के लिए अंग्रेजों ने अपने सीधे अधीन क्षेत्रों में हिन्दू भारत और मुस्लिम पाकिस्तान के लिए जनमत संग्रह कराया. इन क्षेत्रों के निवासियों ने निर्णय ले लिया. इसके अतिरिक्त भारत में रजवाड़े थे. उनको नरेशों की स्वतंत्र इच्छा पर छोड़ा गया कि वो अपने राज्य का भारत अथवा पाकिस्तान में विलय का निर्णय ले लें. यह निर्णय सशर्त था. इस निर्णय को लेते समय नरेश को ध्यान रखना था कि उसके राज्य की सीमा विलय के निर्णय वाले देश की सीमा से लगती हो. अर्थात भोपाल या रामपुर रियासत अपना विलय पाकिस्तान में नहीं कर सकती थी और सिंध की बहावलपुर रियासत का राजा स्वयं को हिन्दुस्तान में विलीन नहीं कर सकता था.

एक एक कर सभी राजाओं ने आगे-पीछे अपने-अपने राज्यों का भारत या पाकिस्तान में विभिन्न संधियों के अनुरूप विलय कर दिया. इस विलय के लिए एक मात्र नरेश ही अधिकारी थे. सभी अन्य नरेशों की तरह कश्मीर के महाराजा हरी सिंह जी ने भी अपने राज्य का 26 अक्टूबर 1947 को भारत में विलय कर दिया. ये उनकी पैतृक संपत्ति-अपने राज्य का, अपने राज्य से टैक्स इकठ्ठा करने के अधिकार, न्याय, सुरक्षा इत्यादि का भारत में उसी तरह विलय था जैसे अन्य राजाओं ने भारत या पाकिस्तान में अपने राज्य का विलय किया था. यह विलय अपरिवर्तनीय थे यानी विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने के बाद नरेश स्वयं उस विलय पर पुनर्विचार नहीं कर सकते थे.

तत्कालीन प्रधान-मंत्री जवाहर लाल नेहरू महाराजा हरि सिंह तथा डोगरों को घृणा की हद तक नापसंद करते थे. उन्होंने महाराजा और डोगरों को नीचा दिखाने के लिए विलय के 3 वर्ष बाद 26 जनवरी 1950 में धारा 370 लागू की. ये धारा अपने प्रावधानों के अनुसार भी अस्थाई है. इस धारा का जम्मू कश्मीर रियासत के भारत में विलय से कुछ भी लेना-देना नहीं है. ये विलय अपरिवर्तनीय है. धारा 370 एक सामान्य अस्थाई उपबंध है और इस धारा को कश्मीरी राजनेताओं के बड़बोले दावों के विपरीत भारत के महामहिम राष्ट्रपति के केवल एक आदेश से निरस्त किया जा सकता है.

ये कोई बड़ी बात नहीं थी मगर शेख अब्दुल्ला और उसके साथियों को नेहरू जी सहायता के कारण भारत को ब्लैक मेल करने का उपकरण मिल गया. परिणामतः कुछ लाख कश्मीरी न केवल पूरे जम्मू और लद्दाख के लोगों की असह्य उपेक्षा करते हैं वरन करोड़ों भारतीयों के परिश्रम से अर्जित संसाधनों पर अपना मनमाना अधिकार समझते हैं. सारा देश तब से ही कश्मीरी मुसलमानों की सुरक्षा, उनकी दैनंदिन आवश्यकताओं, उनकी विकास परियोजनाओं, उनके कर्मचारियों के वेतन, उनके ठाठ-बाट का खर्च उठता है. बदले में तरह-तरह की धौंस-पट्टी, उद्दंडता, आँखें दिखाना सहता है. जम्मू-कश्मीर के अपने संसाधन तो इतने भी नहीं हैं कि वो राज्य के कर्मचारियों का वेतन भी दे सके. भारतीयों की गाढ़ी कमाई के करोड़ों-करोड़ रुपये कश्मीरियों के तुष्टिकरण के लिए शुरू से मुफ्तखोरी की भट्टी में झोंके जाते रहे हैं. ये एकतरफा बदमाशी है. जम्मू-कश्मीर में जम्मू और लद्दाख की जनसँख्या कश्मीर घाटी से अधिक है मगर विधयक कश्मीर घाटी से अधिक चुने जाते हैं अतः वो जम्मू और लद्दाख के अधिकारों को मनमाने ढंग से हड़प लेते हैं.

उनके अक्षमता का अंदाज़ा इस बात से लगाइये कि वर्तमान में आई बाढ़ में जम्मू-कश्मीर का प्रशासन एक पानी के एक थपेड़े ने ध्वस्त कर दिया. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अपने निवास से 3 दिन तक बाहर नहीं निकल सके. भारतीय सेना तुरंत आगे बढ़ी और कश्मीर के निवासियों को खाना-पानी, दवाएं पहुंचाईं. भारत के संसाधन फिर एक बार कश्मीरियों के लिए लगा दिए गए हैं. करोड़ों के बजट स्वीकृत किये जा रहे हैं, हमारे वीर सैनिक जान पर खेल कर, ध्यान रहे उन दुष्टों को बचा रहे हैं जो इन पर पत्थर फेंकते रहे हैं. आतंकवादियों को सूचनाएं, खाना-पानी, दवा-दारू, सुरक्षित पनाहें उपलब्ध करते रहे हैं. ये वही दुष्ट लोग हैं जिन्होंने अपने ही क्षेत्र से अपने ही रक्त के बंधु 4 लाख हिन्दुओं के क्रूर निष्काशन पर मौन सम्मति दी. कभी उनके निकाले जाने का विरोध नहीं किया बल्कि उनकी छोड़ी हुई जमीनों, मकानों पर कब्जा कर लिया.

भारतीय राज्य की ये विवशता है भी कि अपने समाज पर आई विपदा के समय उसकी चिंता, सहायता करे. फिर इस समय नरेंद्र मोदी जी प्रधानमंत्री हैं जिनका सेवा कार्यों में अचूक व्यवस्था का रेकॉर्ड है. कच्छ भुज के भूकम्प के समय उनके कार्यों की विश्व भर में भूरि-भूरि प्रशंसा हुई थी. अब पानी उतर रहा है और देखिएगा ये कश्मीरी लोग अपनी करनी पर फिर उतरेंगे. कितनी भी सेवा कर ली जाये ये बदलने वाले नहीं है. फिर सहायता के नाम पर मुफ्तखोरी का कटोरा ले कर खड़े हो जायेंगे, आँखें दिखाएंगे, गुर्रायेंगे, पत्थर फेंकेंगे. सेना और भारत को बदनाम करेंगे.

सदियों से चली आई एक कहावत है अव्वल अफगान, दोयम कम्बोह, सोयम बदजात कश्मीरी. पहले नंबर के धूर्त अफगान होते हैं दूसरे नंबर के कम्बोह { एक भारतीय मुस्लिम जाति } तीसरे नंबर के धूर्त कश्मीरी होते हैं. ये कहावत हैदराबाद राज्य के शब्दकोष फरहंगे-आसिफिया में दर्ज थी. इसको तरक्की उर्दू बोर्ड ने सत्तर के दशक में छापा. कश्मीरियों ने बहुत बवाल किया, ऊधम मचाया और उर्दू बोर्ड ने शब्दकोष वापस लिए. पन्ने बदले गए. बंधुओ ! कहावतें समय बनाता है और समय का देखा-कहा अचूक और बिलकुल ठीक होता है. मेरे मुंह में खाक..काश मेरा कहा झूठा साबित हो और कश्मीरी अच्छे देश वासी बन कर दिखाएँ

तुफैल चतुर्वेदी

बुधवार, 11 जनवरी 2017

मैं स्वयं और अन्य बहुत से मानवतावादी खिन्न हैं कि हमारे मुस्लिम भाई खुश नहीं हैं। मैं इनके लिए मनुष्यता में प्रबल विश्वास रखने के नाते दुखी हूँ और आंसुओं में डूबा हुआ हूँ। वो तो नगर के सौभाग्य से मेरी आँखों के ग्लैंड्स ख़राब हैं इसलिये आंसू अंदर-अंदर बह रहे हैं अन्यथा शहर में बाढ़ आ जाती।
वो मिस्र में दुखी हैं, वो लीबिया में दुखी हैं. वो मोरक़्क़ो में दुखी हैं. वो ईरान में दुखी हैं. वो ईराक़ में दुखी हैं. वो यमन में दुखी हैं. वो अफगानिस्तान में दुखी हैं. वो पाकिस्तान में दुखी हैं। वो बंग्लादेश में दुखी हैं, वो सीरिया में दुखी हैं. वो हर मुस्लिम देश में दुखी हैं। बस दुख ही उनकी नियति हो गया है। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के आंकड़े इस कारण उपलब्ध नहीं दे पा रहा हूँ कि वहां भयानक तानाशाही है। केवल पानी की लाइन की शिकायत करने सम्बंधित विभाग में 5 लोग चले जाएँ तो देश में विप्लव फ़ैलाने की आशंका में गिरफ्तार कर लिए जाते हैं।
आइये इसका कारण ढूँढा जाये और देखा जाये कि वो कहाँ सुखी हैं. वो ऑस्ट्रेलिया में खुश हैं. वो इंग्लैंड में खुश हैं. वो फ़्रांस में खुश हैं. वो भारत में खुश हैं. वो इटली में खुश हैं. वो जर्मनी में खुश हैं. वो स्वीडन में खुश हैं. वो अमरीका में खुश हैं. वो कैनेडा में खुश हैं. वो हर उस देश में खुश हैं जो इस्लामी नहीं है. विचार कीजिये कि अपने दुखी होने के लिए वो किसको आरोपित करते हैं ? स्वयं को नहीं, अपने नेतृत्व को नहीं, अपने जीवन दर्शन को नहीं को नहीं. वो उन देशों, जहाँ वो खुश हैं की व्यवस्थाओं, उनके प्रजातंत्र को आरोपित करते हैं और चाहते हैं कि इन सब देशों को अपनी व्यवस्था बदल लेनी चाहिए. वो इन देशों से चाहते हैं कि वो स्वयं को उन देशों जैसा बना लें जिन्हें ये छोड़ कर आये हैं। 
इसी अध्ययन को आगे बढ़ाते हुए ये देखना रोचक रहेगा कि विश्व के भिन्न-भिन्न समाज एक दूसरे के साथ रहते हुए किस तरह की प्रतिक्रिया करते हैं. हिन्दू बौद्धों, मुसलमानों, ईसाइयों, शिन्तो मतानुयाइयों, कन्फ्यूशियस मतानुयाइयों, यहूदियों, अनीश्वरवादियों के साथ सामान्य रूप से शांति से रहते हैं. बौद्ध हिन्दुओं, मुसलमानों, ईसाइयों, शिन्तो मतानुयाइयों, कन्फ्यूशियस मतानुयाइयों, यहूदियों, अनीश्वरवादियों के साथ सामान्य रूप से शांति से रहते हैं. ईसाई मुसलमानों, बौद्धों, हिन्दुओं, शिन्तो मतानुयाइयों, कन्फ्यूशियस मतानुयाइयों, यहूदियों, अनीश्वरवादियों के साथ सामान्य रूप से शांति से रहते हैं. यहूदी ईसाइयों, मुसलमानों, बौद्धों, हिन्दुओं, शिन्तो मतानुयाइयों, कन्फ्यूशियस मतानुयाइयों, अनीश्वरवादियों के साथ सामान्य रूप से शांति से रहते हैं. इसी तरह शिन्तो मतानुयाइयों, कन्फ्यूशियस मतानुयाइयों, अनीश्वरवादियों को किसी के साथ शांतिपूर्ण जीवनयापन में कहीं कोई समस्या नहीं है। 
आइये अब इस्लाम की स्थिति देखें. मुसलमान बौद्धों, हिन्दुओं, ईसाईयों, यहूदियों, शिन्तो मतानुयाइयों, कन्फ्यूशियस मतानुयाइयों, अनीश्वरवादियों के साथ कहीं शांति से नहीं रहते. यहाँ तक कि अपने ही मज़हब के तनिक भी भिन्नता रखने वाले किसी भी मुसलमान के साथ चैन से बैठने को तैयार नहीं हैं. अपने से तनिक भी अलग सोच रखने वाले मुसलमान एक दूसरे के लिए खबीस, मलऊन, काफिर, वाजिबुल-क़त्ल माने, कहे और बरते जाते हैं। एक दूसरे की मस्जिदों में जाना हराम है। एक दूसरे के इमामों के पीछे नमाज पढ़ना कुफ्र है। एक दूसरे से रोटी-बेटी के सम्बन्ध वर्जित हैं। सुन्नी शिया मुसलमानों को खटमल कहते हैं और उनके हाथ का पानी भी नहीं पीते। सुन्नी मानते हैं कि शिया उन्हें पानी थूक कर पिलाते हैं। 
ये सामान्य तथ्यात्मक विश्लेषण तो यहीं समाप्त हो जाता है मगर अपने पीछे चौदह सौ वर्षों का हाहाकार, मज़हब के नाम पर सताए गए, मारे गए, धर्मपरिवर्तन के लिए विवश किये गए करोड़ों लोगों का आर्तनाद, आगजनी, वैमनस्य, आहें, कराहें, आंसुओं की भयानक महागाथा छोड़ जाता है. इस्लाम विश्व में किस तरह फैला इस विषय पर किन्हीं 4-5 इस्लामी इतिहासकारों की किताब देख लीजिये. काफिरों के सरों की मीनारें, खौलते तेल में उबाले जाते लोग, आरे से चिरवाये जाते काफ़िर, जीवित ही खाल उतार कर नमक-नौसादर लगा कर तड़पते काफ़िर, ग़ैर-मुस्लिमों के बच्चों-औरतों को ग़ुलाम बना कर बाज़ारों में बेचा जाना, काफ़िरों को मारने के बाद उनकी औरतों के साथ हत्यारों की ज़बरदस्ती शादियां, उनके मंदिर, चर्च, सिनेगॉग को ध्वस्त किया जाना......इनके भयानक वर्णनों को पढ़ कर आपके रोंगटे खड़े हो जायेंगे, ख़ून खौलने लगेगा। 
ये सब कुछ अतीत हो गया होता तो पछतावे के अतिरिक्त कुछ शेष न रहता. भोर की सुन्दर किरणें, चहचहाते पंछी, अंगड़ाई ले कर उठती धरा आते दिन का स्वागत करती और जीवन आगे बढ़ता. मगर विद्वानो ! ये घृणा, वैमनस्य, हत्याकांड, हाहाकार, पैशाचिक कृत्य अभी भी उसी तरह चल रहे हैं और इनकी जननी सर्वभक्षी विचारधारा अभी भी मज़हब के नाम पर पवित्र और अस्पर्शी है. कोई भी विचारधारा, वस्तु, व्यक्ति काल के परिप्रेक्ष्य में ही सही या गलत साबित होता है. इस्लाम की ताक़त ही ये है कि वो न केवल जीवन के सर्वोत्तम ढंग होने का मनमाना दावा करता है अपितु इस दावे को परखने भी नहीं देता. कोई परखना चाहे तो बहस की जगह उग्रता पर उतर आता है. उसकी ताकत उसका अपनी उद्दंड और कालबाह्य विचारधारा पर पक्का विश्वास है। 
9-11 के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में घुस कर तालिबान को ढेर कर दिया. उसके अड्डे समाप्त कर दिए. उसके नेता मार दिए मगर क्या इससे अमेरिका और सभ्य विश्व सुरक्षित हो गया ? आज भी अमरीका के रक्षा बजट का बहुत मोटा हिस्सा इस्लामी आतंकवाद से सुरक्षा की योजनाएं बनाने में खर्च हो रहा है.
अमेरिका ने सीरिया और इराक में आई एस आई एस द्वारा स्थापित की गयी ख़िलाफ़त से निबटने के लिए सीमित बमबारी तो शुरू की है मगर पूरी प्रखरता के साथ स्वयं को युद्ध में झोंकने की जगह झरोखे में बैठ कर मुजरा लेने की मुद्रा में है. यानी अमेरिका ने अपनी भूमिका केवल हवाई हमले करने और ज़मीनी युद्ध स्थानीय बलों, कुर्दों के हवाले किये जाने की योजना बनाई है. यही चूक अमेरिका ने अफगानिस्तान में की थी। 
अब जिन लोगों को सशस्त्र करने की योजना है वो भी इसी कुफ्र और ईमान के दर्शन में विश्वास करने वाले लोग हैं. वो भी काफ़िरों को वाजिबुल-क़त्ल मानते हैं. इसकी क्या गारंटी है कि कल वो भी ऐसा नहीं करेंगे. ये बन्दर के हाथ से उस्तरा छीन कर भालू को उस्तरा थमाना हो सकता है और इतिहास बताता है कि हो सकता नहीं होगा ही होगा. आज नहीं कल इस युद्ध के लिए सम्पूर्ण विश्व को आसमान से धरती पर उतरना होगा. आज तो युद्ध उनके क्षेत्रों में लड़ा जा रहा है. कल ये युद्ध अपनी धरती पर लड़ना पड़ेगा. इस लिए इन विश्वासियों को लगातार वैचारिक चुनौती दे कर बदलाव के लिए तैयार करना और सशस्त्र संघर्ष से वैचारिक बदलाव के लिए बाध्य करना अनिवार्य है। 
आई एस आई एस संसार का सबसे धनी आतंकवादी संगठन है. इसे सीरिया के खिलाफ प्रारंभिक ट्रेनिंग भी अमेरिका ने दी है. इसके पास अरबों-खरबों डॉलर हैं. हथियार भी आधुनिकतम अमरीकी हैं. इसके पोषण में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात द्वारा दिया जा रहा बेहिसाब धन भी है. ये देश भी इतना धन इसी लिए लगा रहे हैं चूँकि इन देशों को भी कुफ्र और ईमान के दर्शन पर अटूट विश्वास है. सभ्य विश्व को इस समस्या के मूल तक जाना होगा. इसके लिए आतंकवादियों के प्रेरणा स्रोतों की वामपंथियों, सेक्युलरों की मनमानी व्याख्या नहीं वरन उनकी अपनी व्याख्या देखनी होगी.

कुफ्र के खिलाफ जिहाद और दारुल-हरब का दारुल-इस्लाम में परिवर्तन का दर्शन इन हत्याकांडों की जड़ है. इस मूल विषय, इसकी व्याख्या और इसके लिए की जा रही कार्यवाहियां वैचारिक उपक्रम को कार्य रूप में परिणत करने के उपकरण हैं. इनको विचारधारा के स्तर पर ही निबटना पड़ेगा. बातचीत की मेज पर बैठाने के लिए प्रभावी बल-प्रयोग की आवश्यकता निश्चित रूप से है और रहेगी मगर ये विचारधारा का संघर्ष है. ये कोई राजनैतिक या क्षेत्रीय लड़ाई नहीं है। 

ये घात लगाये दबे पैर बढे आ रहे हत्यारे नहीं हैं. ये अपने वैचारिक कलुष, अपनी मानसिक कुरूपता को नगाड़े बजा कर उद्घाटित करते, प्रचारित करते बर्बर लोगों के समूह हैं. जब तक इनके दिमाग में जड़ें जमाये इस विचारधारा के बीज नष्ट नहीं कर दिए जायेंगे, तब तक संसार में शांति नहीं आ सकेगी. इसके लिए अनिवार्य रूप से इस विचार प्रणाली को प्रत्येक मनुष्य के समान अधिकार, स्त्रियों के बराबरी के अधिकार यानी सभ्यता के आधारभूत नियमों को मानना होगा. इन मूलभूत मान्यताओं का विरोध करने वाले समूहों को लगातार वैचारिक चुनौती देते रहनी होगी. न सुनने, मानने वालों का प्रभावशाली दमन करना होगा। 
इसके लिए इस्लाम पर शोध संस्थान, शोधपरक विचार-पत्र, जर्नल, शोधपरक टेलीविजन चैनल, चिंतन प्रणाली में बदलाव के तरीके की प्रभावशाली योजनायें बनानी होंगी. इस तरह के शोध संस्थान आज भी अमेरिका में चल रहे हैं, नए खुल रहे हैं मगर वो सब अरब के पेट्रो डॉलर से हो रहा है. ये संस्थान शुद्ध शोध करने की जगह इस्लाम की स्थानीय परिस्थिति के अनुरूप तात्कालिक व्याख्या करते हैं और परिस्थितियों के अपने पक्ष में हो जाने यानी जनसँख्या के मुस्लिम हो जाने का इंतज़ार करते हैं. ये तकनीक इस्लाम योरोप में इस्तेमाल कर रहा है. भारत में सफलतापूर्वक प्रयोग कर चुका है और हमारा आधे से अधिक भाग हड़प चुका है, शेष की योजना बनाने में लगा है.
जब मुसलमानों में से ही लोग सवाल उठाने लगेंगे और समाज पर दबाव बनाने के उपकरण मुल्ला समूह के शिकंजे से मुसलमान समाज आजाद हो जायेगा, तभी संसार शांति से बैठ सकेगा. कभी इसी संसार में मानव बलि में विश्वास करने वाले लोग थे मगर अब उनका अस्तित्व समाप्तप्राय है. मानव सभ्यता ने ऐसी सारी विचार-योजनाओं को त्यागा है, न मानने वालों को त्यागने पर बाध्य किया है, तभी सभ्यता का विकास हुआ है. सभ्य विश्व का नेतृत्व अब फिर इसकी योजना बनाने के लिए कृतसंकल्प होना चाहिए. कई 9-11 नहीं झेलने हैं तो स्वयं भी सन्नद्ध होइए और ऐसी हर विचारधारा को दबाइए. मनुष्यता के पक्ष में सोचने को बाध्य कीजिये. बदलने पर बाध्य कीजिये। 
तुफैल चतुर्वेदी

शनिवार, 7 जनवरी 2017

सामान्य व्यक्ति और महापुरुष में जो बड़े अंतर होते हैं उनमें से प्रमुख यह है कि महापुरुष की दृष्टि उस कालखंड पर जिसमें वह हमारे बीच उपस्थित होता है, के साथ-साथ अतीत और भविष्य पर भी भरपूर सजगता के साथ होती है। वस्तुतः अतीत की घटनाओं की सामूहिक परिणति ही तो वर्तमान है और वर्तमान के कार्यकलाप ही तो भविष्य तय करते हैं। अतः अतीत का तार्किक विवेचन किये बिना वर्तमान की घटनाओं की प्रवृत्ति को कैसे समझा जा सकता है और वर्तमान का निर्धारण किये बग़ैर भविष्य का निर्माण कैसे किया जा सकता है ? भारत के वास्तविक और मूल राष्ट्र अर्थात हिंदुओं पर बढ़ते चले जा रहे भयावह ख़तरों को सामान्य व्यक्ति भी पहचानता है तो कोई महापुरुष उसे समझने में कैसे चूक सकता है ? ऐसे अनेकों महापुरुषों ने समय-समय पर राष्ट्र रक्षा के लिये अपने स्वभाव के अनुरूप व्यवस्था की है।

इन महापुरुषों में  22 दिसम्बर 1966 पटना में एक जन्मा एक बालक सर्वप्रमुख है। जी हाँ अभिप्राय गुरु गोविन्द सिंह जी से है। धर्म-रक्षा के लिये जूझने वाले अन्य महापुरुषों ने जहाँ आजीवन संघर्ष किया वहां गुरु गोविन्द सिंह जी ने आजीवन संघर्ष के साथ साथ का इस संकट के मूल स्वरूप को पहचाना और समझा कि यह संघर्ष केवल तात्कालिक नहीं है। इसे इस्लाम की ऐसी चिंतन-धारा पुष्ट कर रही है जो अपने अतिरिक्त प्रत्येक विचार को हर प्रकार से दूषित और भ्रष्ट मानती है। इस विचारप्रणाली की दृष्टि में उसके अतिरिक्त हर विचार को नष्ट करना अनिवार्य है अतः इसे समाप्त करने के लिये इसके प्रत्यक्ष आतताइयों को ही दण्डित करना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि इसकी कोई स्थायी व्यवस्था बनानी आवश्यक है। वह देख सकते थे कि इस विचारधारा की आतंकी कार्यवाहियों को उसके धर्मग्रंथ से इस प्रकार अनवरत प्रश्रय मिल रहा है और यह शताब्दियों से लगातार उपद्रव करती आ रही है तो उसके वर्तमान को ही नष्ट करना पर्याप्त नहीं है। उसकी हिंसक कार्यवाहियाँ भविष्य में न हों, आगामी पीढ़ी का जीवन सुरक्षित रहे, वह चैन से जीवन व्यतीत कर सके इस हेतु वर्तमान से भविष्य तक का इंतज़ाम करना होगा। आख़िर पाशविक मनोविकारों को मानवीय गुण मानने वालों से और कैसे निबटा जा सकता है ? इस के स्थायी समाधान के लिए उन्होंने सन 1699 में बैसाखी के दिन खालसा पन्थ की स्थापना की। इस हत्यारी विचारधारा से विभिन्न राष्ट्रों के बहुत से लोग जूझे मगर इससे जूझते रहने, लगातार लड़ते रहने की व्यवस्था भारत में ही बनी। यह घटना सम्पूर्ण विश्व में इस्लामी आतंक से जूझने के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में भी प्रमुखतम है। इसी के बाद एक के बाद दूसरे जन-समूह, एक देश के बाद दूसरे देश को लीलते जा रहे इस्लामी दावानल के पाँव भारत की धरती पर थमे। 

9 वर्ष की आयु में अपने पिता गुरू तेग़ बहादुर जी को धर्म के लिए बलिदान के लिए प्रेरित करने वाले पूज्य गुरु गोविन्द सिंह जी का सम्पूर्ण जीवन पल-पल राष्ट्र चिंता में रत रहा। घटना यह थी कि उनके पिता गुरू तेग़ बहादुर जी के पास कश्मीरी हिंदुओं का एक समूह आया और उनसे औरंगज़ेब के आदेश पर कश्मीर के मुग़ल सूबेदार इफ़्तिख़ार ख़ान के हिंदुओं को यातना दे कर मुसलमान बनाने के लिये बाध्य करने की शिकायत की। गुरु तेग़ बहादुर जी के मुंह से निकला "धर्म किसी महापुरुष का बलिदान मांग रहा है" बालक गोविन्द राय जी तुरन्त बोले "आपसे बड़ा महापुरुष कौन है ?" गुरू तेग़ बहादुर जी ने कश्मीरी हिंदुओं से कहा। औरंगज़ेब से कहो अगर गुरु तेग़ बहादुर मुसलमान बन जायेंगे तो हम भी बन जायेंगे। इस घोषणा के बाद गुरू तेग़ बहादुर जी भ्रमण करते हुए दिल्ली पहुंचे, जहाँ उन्हें औरंगज़ेब द्वारा मुसलमान बनने के लिये कहा गया और न मानने पर  शिष्यों सहित क़ैद कर लिया गया। उनके शिष्य भाई मति दास को आरे से चीरे जाने, भाई दयाल दास को खौलते हुए पानी में उबाले जाने जैसी कई सप्ताह तक भयानक यातना देने के बाद गुरू तेग़ बहादुर जी का 11 नवम्बर 1675 को इस्लामी मुफ़्ती के आदेश पर सर काट दिया गया। 

धर्म के लिये अपने अपने पिता के बलिदान होने के बाद 10 वर्ष की अवस्था में गुरु पद पर विराजे पूज्य गुरु गोविन्द सिंह जी आध्यात्मिक नेता, दूरदर्शी चिंतक, बृजभाषा के अद्भुत कवि, उद्भट योद्धा थे। 1699 ईसवीं में 33 वर्ष की आयु में बैसाखी के अवसर पर आनंदपुर साहब में  आपने ख़ालसा पंथ की स्थापना की। धर्मरक्षा को ही जीवन मानने वाले पूज्य गुरु गोविन्द सिंह जी की रचना उग्रदंती में लिखित यह पंक्तियाँ ख़ालसा पंथ की स्थापना का उद्देश्य स्पष्ट करती हैं। 

सकल जगत में खालसा पंथ गाजे 
जगे धर्म हिन्दू तुरक धुंध भाजे


इस्लामी आतंक के कारण बलिदान होने वाले वीरों की अटूट श्रंखला में आपके पुत्रों के बलिदान भी अतुलनीय हैं। शस्त्रों की छाँव में पाले गये 17 और 13 वर्ष की आयु के उनके दो पुत्र साहिबज़ादा अजीत सिंह, जुझार सिंह 1704 ईसवीं में चमकौर में लड़ते हुए बलिदान हुए। 8 और 5 वर्ष के जोरावर सिंह और फतेह सिंह मुसलमान न बनने के कारण दीवार में चुन दिए गए। इतिहास में बहुत ही काम उदाहरण मिलते हैं जब किसी पिता ने एक सप्ताह में अपने 4–4 बेटे बलिदान दे दिए हों। इसी कारण गुरु गोविन्द सिह जी को सरबस दानी भी कहा जाता है। जब गुरु साहब को इसकी सूचना मिली तो उनके मुंह से बस इतना निकला 

इन पुत्रन के कारने, वार दिए सुत चार 
चार मुए तो क्या हुआ, जीवें कई हज़ार  

उनके व्यक्तित्व में इतने आयाम हैं कि उनके गुणों की चर्चा करने के लिये एक लेख कम पड़ेगा अतः उनके जीवन के योद्धा पक्ष और उसके प्रमाण स्वरूप उनकी पौरुषपूर्ण रचना ज़फ़रनामा का उपयोग ही करना समीचीन होगा। गुरु गोविन्द सिंह जी ने हत्यारी विचारधारा के केंद्र औरंगज़ेब को 1705 ईसवीं में फ़ारसी में एक पत्र लिखा जिसे ज़फ़रनामा कहा जाता है। ज़फ़रनामा को भाई दयासिंह जी से औरंगज़ेब के पास अहमदनगर भिजवाया गया। उसमें वर्णित मंतव्य को स्पष्ट करने के लिए उनके कुछ प्रमुख पदों का यहां भावार्थ देना उपयुक्त होगा। गुरु गोविंद सिंह ने जफरनामा का प्रारंभ ईश्वर के स्मरण से किया है। उन्होंने अपने बारे में लिखा है कि 'मैंने ईश्वर की शपथ ली है, जो तलवार, तीर-कमान, बरछी और कटार का ईश्वर है और युद्धस्थल में तूफान जैसे तेज दौड़ने वाले घोड़ों का ईश्वर है।' वह औरंगज़ेब को सम्बोधित करते हुए कहते हैं, 'जिसने तुझे बादशाहत दी उसी ने मुझे धर्म की रक्षा की दौलत दी है। मुझे वह शक्ति दी है कि मैं धर्म की रक्षा करूं और सत्य का ध्वज ऊंचा हो।' आप इस पत्र में औरंगज़ेब को 'धूर्त', 'फरेबी' और 'मक्कार' बताते हैं। उसकी इबादत को 'ढोंग' कहते हैं। 

मुस्लिम साम्राज्य के सबसे क्रूर आततायी को अपने पिता तथा भाइयों का हत्यारा बताना उनकी वीरता का प्रमाण है। आज भी धमनियों में रक्त का संचार प्रबल कर देने वाले अपने पत्र ज़फ़रनामे में गुरु गोविंद सिंह स्वाभिमान तथा पौरुष का परिचय देते हुए आगे लिखते हैं मैं तेरे पांव के नीचे ऐसी आग रखूंगा कि पंजाब में उसे बुझाने तथा तुझे पीने को पानी तक नहीं मिलेगा। वह औरंगजेब को चुनौती देते हुए लिखते हैं, 'मैं इस युद्ध के मैदान में अकेला आऊंगा। तू दो घुड़सवारों को अपने साथ लेकर आना।' क्या हुआ अगर मेरे चार बच्चे मारे गये, पर कुंडली मारे डंसने वाला नाग अभी बाकी है।'

गुरु गोविंद सिंह ने औरंगज़ेब को इतिहास से सीख लेने की सलाह देते हुए लिखते हैं। 'सिकंदर और शेरशाह कहां हैं? आज तैमूर कहां है ?बाबर कहां है ? हुमायूं कहां है ?अकबर कहां है?' अपने तीखे सम्बोधन से औरंगज़ेब को ललकारते हुए कहते हैं, 'तू कमजोरों पर जुल्म करता है, उन्हें सताता है। कसम है कि एक दिन तुझे आरे से चिरवा दूंगा।' इसके साथ ही गुरु गोविंद सिंह ने युद्ध तथा शांति के बारे में अपनी नीति को स्पष्ट करते हैं, 'जब सभी प्रयास करने के बाद भी न्याय का मार्ग अवरुद्ध हो, तब तलवार उठाना सही है और युद्ध करना उचित है।' ज़फ़रनामे के अंत के पद में ईश्वर के प्रति पूर्ण आस्था व्यक्त करते हुए फ़रमाते हैं, 'शत्रु भले हमसे हजार तरह से शत्रुता करे, पर जिनका विश्वास ईश्वर पर है, उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता।' वस्तुत: गुरु गोविंद सिंह का ज़फ़रनामा केवल एक पत्र नहीं बल्कि एक वीर-काव्य है, जो भारतीय जनमानस की भावनाओं को प्रकट करता है। उनका यह पत्र युद्ध का घोष तो है ही, साथ ही शांति, धर्मरक्षा, आस्था तथा आत्मविश्वास का परिचायक है।

यह पत्र पीड़ित, दुखी, हताश, निराश, खिन्न हिन्दू समाज में नवजीवन तथा गौरवानुभूति का संचार करने वाला साबित हुआ। समाज में औरंगज़ेब के कुकृत्यों के प्रति आक्रोश बढ़ा और विदेशी आक्रमणकारी साम्राज्य औरंगज़ेब के साथ ही अपने पतन की ढलान पर बढ़ गया। गुरु गोविन्द सिह जी अवतरण सोये हुए समाज को झकझोर गया और भारत भर को ग्रसे हुए मुग़ल साम्राज्य के खण्ड-खण्ड हो गये। 

तुफ़ैल चतुर्वेदी