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शनिवार, 11 मार्च 2017

अल्लाह की बेज़बान बकरियां

ध्वस्त विरोधी शिविर, खंडित छत्र, अपने ही रक्त-स्वेद में सने धरती पर लोटते हुए महारथी, श्लथ-क्लांत कराहते हुए असंख्य पदातिक, भरतपुर लुट गयो रात मोरी अम्मा की रुदाली, भग्न रथ, दुम दबा कर भागती शत्रु सेना, लहराती विजय पताकाएँ, दमादम गूंजते हुए नगाड़े, बजती हुई विजय दुंदुभी, पाञ्चजन्य का गौरव-घोष, ...... अभी कुछ ही समय बीता है कि इन घटनाओं का कच्चा-पक्का सा भी अनुमान न लगा पाने के कारण सब कुछ जानने, जनाने और जनने का दावा करने वाला मीडिया मनमाना बोलने-कोसने-हाहाकार मचाने में लगा था। 11 मार्च की प्रातः 8 बजे तक इसकी कल्पना भी नहीं की जा रही थी। अगर कोई इस स्थिति का दावा कर रहा था तो माइकधारी सर्वज्ञ एंकर, न जाने किस कसौटी पर कस कर चुने गए विशेषज्ञ, दावा करने वालों की खिल्ली उड़ा रहे थे। अचानक हू-हू की सियार-ध्वनि करती उच्छ्वासें छोड़ती जमात फूल बरसाने लगी। यह प्रचण्ड चमत्कार कैसे हो गया ? जिस बाल्मीक, क्षत्रिय, ब्राह्मण, जाट, वैश्य, कुर्मी, कहार आदि के बूते चौपड़ बिछायी गयी थी, उसने ही बिसात उलट दी। जिस यादव वर्ग को अपनी पालकी ढोने के लिये बपौती मान कर चला जा रहा था, उसी ने पालकी खड्ड में दे मारी। जिस जाटव वर्ग को 'देश की मज़बूरी है भैंन जी जरूरी हैं' का अखण्ड कीर्तनिया माना गया था, उसी ने 'मंगल भवन अमंगल हारी, इस बारी भाजपा हमारी' का कीर्तन करना शुरू कर दिया। राष्ट्र के संस्थानों पर पहला हक़ मुसलमानों का है.....हम 100 सीटें मुसलमान को दे रहे हैं...... हम डेढ़ सौ सीटें अल्पसंख्यकों को दे रहे हैं...... जैसी बातें करने वालों की हिमायत छोड़ कर मुसलमानों की आधी जनसँख्या भी बड़े पैमाने पर इसी जमात में सम्मिलित हो गयी। तीन तलाक़ पर बरेलवी, देवबंदी आलिम भौंहे चढ़ाये, ज़बान लपलपाते, हाथ नचाते मुस्लिम पर्सनल लॉ को अस्पृश्य बताते हुए कथकली कर रहे थे। अब पता चला कि बुर्क़े में बंद अल्लाह की बेज़बान बकरियां भी ख़ामोश गुर्राहट रखती हैं। ढेर सारे विशेषज्ञ, विद्वान इस परमगौरवशाली विजय का विश्लेषण करेंगे। तरह तरह से इसे विकास की जीत बताएँगे अतः इस प्रचण्ड विजय का सत्य बताना, समाज तक पहुंचना आवश्यक है। विकास का सच्चा दावा, कृपया ध्यान रखें सच्चा दावा अखिलेश यादव का भी था, वह कैसे हवा हो गया ? चाचा, सौतेली माता, सौतेले भाई पर कालिख पोत कर अपनी क़मीज़ सबसे उजली बताने के चरखा दांव के दांत अखाड़े में क्यों बिखर गये ? हरिजनों की एक छत्र साम्राज्ञी की माया अंतर्ध्यान कैसे हो गयी ? बाल्मीक, क्षत्रिय, ब्राह्मण, जाट, जाटव, यादव, वैश्य, कुर्मी, कहार.....हर वर्ग ने अपने वर्ग के हित-अहित से ऊपर उठा कर भाजपा का कमल क्यों खिलाया ? इसका वास्तविक कारण केवल और केवल राष्ट्र के मूल स्वरुप की चिंता है। इस तेजस्वी व्यक्ति का नेतृत्व धर्मरक्षा करेगा, का अखण्ड विश्वास है। धर्मध्वजा उठाने वाले हाथों के लिए उत्तर प्रदेश में 5 साल के लिए अखण्ड राज्य प्रसन्नता का विषय है। राज्य सभा के बदलने जा रहे समीकरण आश्वस्त करते हैं, मगर यह पर्याप्त नहीं है। भाजपा के वरिष्ठ अधिकारियो! अल्लाह की जिन बेज़बान बकरियों ने घर के फाड़खाऊं शेरों की हुक्मउदूली कर तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ ख़ामोश गुर्राहट दिखाई है, उनके सरों पर लटकती तीन तलाक़ की तलवार हटानी आवश्यक है। अब समान नागरिक संहिता स्थापित करने का समय आ गया। आपको समाज ने इन वैचारिक भेड़ियों के दांत, नाख़ून तोड़ने के लिए आश्वस्तकारी बहुमत दिया है और यह आपको मुज़फ़्फ़रनगर, मेरठ, कैराना की नागफनी को जड़ से उखाड़ने के लिये मिला है। तुफ़ैल चतुर्वेदी

बुधवार, 8 मार्च 2017

तारिक़ फ़तेह के ख़िलाफ़ मुस्लिम समाज में ज़बरदस्त आक्रोश

8 मार्च के दैनिक जागरण में बहुत छोटी सी एक कालम की ख़बर है। पाकिस्तानी मूल के लेखक तारिक़ फ़तेह के ख़िलाफ़ मुस्लिम समाज में ज़बरदस्त आक्रोश है। विरोध प्रदर्शनों के बाद उनके ख़िलाफ़ मंगलवार को कोतवाली देवबंद में मुक़दमा दर्ज कराया गया है। पुलिस ने धार्मिक भावनाओं को भड़काने के आरोप में तारिक़ फ़तेह पर मामला दर्ज किया है। दूसरी घटना ....... अभी कोई 10-12 दिन पहले दिल्ली में जश्ने-रेख़्ता के प्रोग्राम में तारिक़ फ़तह साहब गए थे। वहां उनके साथ बदतमीज़ी हुई थी। तारिक़ फ़तह साहब पाकिस्तानी मूल के कैनेडा के नागरिक हैं। कट्टर राष्ट्रवादी हैं और भारत के तगड़े पक्षधर और पाकिस्तान के घोर विरोधी हैं। इस्लाम की कुरीतियों पर तगड़े मुखर हैं। सावधानीपूर्वक क़ुरआन, मुहम्मद जी को सहेज कर बाद के इस्लामी नेतृत्व को आतंक के लिये ज़िम्मेदार बताते हैं। इस्लामी इतिहास की शिया धारा को लगभग मानते हैं। तीन तलाक़, उसके उपजात हलाला जैसी बातों के विरोधी हैं। संक्षेप में कहा जाये तो वहाबी, बरेलवी विचारधारा के विरोध में हैं। उनके विरोधी जताते तो हैं मगर ऐसा होना पाप नहीं है। इस्लाम के ही शिया जैसे प्रमुख समूह के अतिरिक्त लगभग सभी हिंदू विचार समूह वहाबी, बरेलवी विचारधारा के विरोध में हैं। भारतीय संविधान भी इन बातों के विरोध में है। रेख़्ता दिल्ली के एक ग़ैरमुस्लिम व्यवसायी संजीव सर्राफ़ की आर्थिक सहायता से प्रारम्भ हुआ सिलसिला है जो उर्दू की विभिन्न विधाओं मुशायरा, बैतबाज़ी, ड्रामा इत्यादि पर काम करता है। उर्दू जिसके हिमायती इसे गंगा-जमनी संस्कृति बताते हैं, वाले इन घटनाओं पर मौन हैं। मुनव्वर राना जैसे घोर कलुषित सोच वाले अलबत्ता तारिक़ फ़तेह साहब के बारे में वाहियात बयान दे रहे हैं। मैं उर्दू संसार में शरीक अपने जैसे असंख्य ग़ैरमुस्लिम लोगों से पूछना चाहता हूँ कि गंगा-जमनी संस्कृति की यात्रा गंगा-जमुना की जगह दजला-फ़ुरात की यात्रा कैसे बन गयी है ? हमारी आर्थिक सहायता पर पलने-चलने वाले संस्कृतिक एकता के संस्थान घोर मुस्लिम कट्टरता के संस्थान कैसे बन जाते हैं ? हम अपनी मेहनत की कमाई के संस्थानों को राष्ट्रद्रोही गतिविधियों का अड्डा क्यों बनने दे रहे हैं ? हमारी उपस्थिति, वर्चस्वी स्थिति के बावजूद उर्दू के संस्थान घोर कलुषित विचारों को कैसे उपजा रहे हैं ? उर्दू के प्रमुख नामों में दिल्ली में सर्व श्री मुज़फ्फर हनफ़ी, शमीम हनफ़ी, ख़ालिद जावेद, शहपर रसूल जैसे लोग मौजूद हैं। रेख़्ता में ही फ़रहत अहसास, सालिम सलीम, कुमैल रिज़वी जैसे ढेरों लोग मौजूद हैं। सारे के सारे ऐसे चुप बैठे हैं जैसे गोद में साँप रक्खा हुआ हो। तारिक़ फ़तह साहब के पक्ष में किसी का एक भी बयान नहीं आया। क्या साम्प्रदायिक एकता का ठेका ग़ैरमुस्लिमों ने ही लिया हुआ है ? आप दबाव क्यों नहीं बनाते ? भारत भर की उर्दू गतिविधियों को सजाना, बनाना, फ़ंडिंग हम करते हैं और परिणाम राष्ट्रद्रोहियों का क़ब्ज़ा ? ? ? मुझे दिल्ली उर्दू एकेडमी का मख़मूर सईदी का काल याद आता है। मैं उर्दू एकेडमी के घटा मस्जिद वाले पुराने कार्यालय में उनके सामने बैठा हुआ था कि उनके स्टाफ़ के लगभग सभी लोग आये और छुट्टी माँगी। पता चला कि बाबरी मस्जिद के पक्ष में कोई प्रदर्शन हो रहा है। जिसमें सम्मिलित होने के लिये दिल्ली सरकार से वेतन पाने वाले उर्दू एकेडमी के कर्मचारी बाबरी मस्जिद ज़िंदाबाद करने चले गए। यह स्थिति बदली नहीं जानी चाहिये ? आज 79 वर्ष पहले हुए देश के विभाजन का विरोध करने वाली पाकिस्तान में जन्मी 67 वर्ष की प्रखर आवाज़ दबाई जा रही है। कभी सोचिये कि आख़िर तारिक़ फ़तह लड़ किससे रहे हैं ? उससे लाभ क्या राष्ट्रवादियों को नहीं हो रहा ? राष्ट्रवादियो! उनके पक्ष में कोई धरना-प्रदर्शन क्यों नहीं करते ? भाजपा, संघ विहिप, हिन्दू जागरण मंच के अधिकारियो, कार्यकर्ताओ! औरंगज़ेब से लड़ने वाले हर दारा शिकोह का भाग्य अकेले पड़ जाना तय है ? तुफ़ैल चतुर्वेदी

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

कभी-कभी न चाहते हुए भी अनायास मुंह से सच ही निकल जाता है। मस्तिष्क में उभरे विचार को कोई सायास दबा तो देता है मगर वो चुभी हुई फांस की तरह तब तक तकलीफ़ देता रहता है जब तक उसे निकाल नहीं दिया जाता। संसार के सबसे भयानक नरसंहारों में सबसे बड़े नरसंहार ईसाइयों और इस्लामियों द्वारा हम मूर्तिपूजकों के हैं। जिन्हें उन्होंने चतुर भाषा में पैगन कहा है। इसके बाद ईसाइयों और मुसलमानों द्वारा ही यहूदियों के नरसंहार आते हैं। जैसा चिंतन आज इस्लाम का है वैसा ही हत्यारी सोच शताब्दियों तक ईसाईयत की भी रही है। सारा यूरोप, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया, अफ़्रीक़ा, भारत इनके शिकार करने के क्षेत्र रहे हैं। विश्व के ईसाईकरण और इस्लामीकरण का इतिहास भयानक रक्तपात से सना हुआ है। इस बात से विश्व-इतिहास के सभी जानकर परिचित हैं मगर प्रजातंत्र में वोटों के लिए कहीं सांप्रदायिक एकता का ड्रामा, कहीं मल्टी-कल्टी की नौटंकी के कारण लोग चुप लगा लेते हैं। इस लेख का आधार स्पेनिश लेखक सैबेस्टियन वीलर रोड्रिग्ज़ का 15 जनवरी 2008 का लेख है मगर वह भारत के सन्दर्भ में भी बहुत सटीक है। आइये तथ्यों का अवगाहन किया जाये। "मैं बार्सिलोना में सड़क पर जा रहा था। अचानक मुझे एक भयानक सत्य का अहसास हुआ कि यूरोप की ऑश्वित्ज़ में मृत्यु हो गई है। { पाठकों के लिए जानना उपयुक्त होगा कि ऑश्वित्ज़ दक्षिण-पश्चिम पोलैंड में नात्सियों द्वारा यहूदियों को यातना दे कर मार डालने के लिये बनाये गए कैम्प थे। जहाँ द्वितीय विश्वयुद्ध के समय 60 लाख यहूदियों को भयानक मृत्यु के घाट उतार दिया गया। } हमने साठ लाख यहूदियों की हत्या कर दी और उन्हें 2 करोड़ मुसलमानों के साथ बदल दिया। ऑश्वित्ज़ में हमने एक पूरी संस्कृति, विचार, रचनात्मकता, प्रतिभा को जला दिया। हमने चयनित लोगों को सही मायने में चुन-चुन कर नष्ट कर दिया। { यहूदी स्वयं को ईश्वर द्वारा चुने गए लोग मानते हैं } हमने उन लोगों को नष्ट किया जो वस्तुतः महान और अद्भुत लोग हैं। जिन्होंने संसार को उन्नत बनाया। इन लोगों के योगदान को विज्ञान, कला, अंतरराष्ट्रीय व्यापार जैसे जीवन के सभी क्षेत्रों में और सबसे बढ़ कर संसार की अंतश्चेतना के रूप में महसूस किया जाता है। हम ने इन लोगों को जला दिया। इसके बाद सहिष्णुता का ढोंग करते हुए हमने नस्लवाद के रोग के इलाज का दिखावा किया और अपने फाटकों को 2 करोड़ मुस्लिमों के लिये खोल दिया। जो हमारे यहाँ मूर्खता, अज्ञानता, धार्मिक उग्रवाद और असहिष्णुता, अपराध की बढ़वार ले कर आये। ये काम करने में अनिच्छुक हैं और अपने परिवार का स्वाभिमान से पोषण नहीं करना चाहते। उन्होंने हमारी ट्रेनों को उड़ा दिया और अब हमारे सुंदर स्पेनिश शहर तीसरी दुनिया के गंदगी और अपराध में डूबे शहर बन चुके हैं। स्वयं हमने अपने दुखों को बढ़ावा देते हुए संस्कृति का कट्टर घृणा से, रचनात्मक कौशल का विनाशकारी कौशल से, योग्यता का पिछड़ेपन और अंधविश्वास से परावर्तन कर दिया । वह अपार्टमेंट जो सरकार की ओर से उन्हें नि:शुल्क दिए गए हैं बंद कर दिए जाने चाहिए। वे अपने सरल पड़ौसियों की हत्या और विनाश की योजना बनाते हैं। हमने यूरोप के यहूदियों की प्रतिभा, उनमें अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य की ललक, उसके लिए स्वाभाविक शांति की तलाश की उन लोगों से अदला-बदली कर ली जो मृत्यु को लक्ष्य मानते हैं। जो हमारे बच्चों के लिए मृत्यु की कामना करते हैं। योरोप ने कितनी भयानक ग़लती कर ली। इस्लाम की विश्व भर में आबादी लगभग एक सौ बीस करोड़ है अर्थात मुसलमान दुनिया की आबादी का 20% है। उन्हें अब तक निम्नलिखित नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। साहित्य के लिए एक मात्र 1978 में नगीब महफूज़ को , शांति के लिये 1978 में अनवर सादात को, 1990 में इलियास जेम्स कोरी को, 1994 में यासर अराफ़ात को, 1999 में अहमद जीवाई को, अर्थशास्त्र में किसी मुसलमान को कुछ नहीं मिला, भौतिक शास्त्र के लिए किसी मुसलमान को कुछ नहीं मिला, औषधि शास्त्र के लिए 1960 में पीटर ब्रायन को, 1998 में फ़रीद मुराद को, इस तरह कुल हुए 7 विश्व भर में यहूदियों की कुल जनसँख्या 1 करोड़ 40 लाख है और यह वैश्विक जनसँख्या का 0.02% होता है। इन्हें साहित्य के लिए 10, शांति के लिए 8, भौतिक शास्त्र के लिए 53, अर्थशास्त्र के लिए 13, औषधि शास्त्र के लिए 45 यानी कुल 129 नोबल पुरुस्कार प्राप्त हुए हैं। यहूदी; सैन्य प्रशिक्षण शिविरों में बच्चों के भेजे की धुलाई करके खुद को उड़ाने, अधिकतम यहूदियों और अन्य गैर मुसलमानों को मारने का प्रशिक्षण नहीं देते। यहूदी विमानों का अपहरण नहीं करते, न ही ओलंपिक में एथलीटों को मारते हैं। न जर्मन रेस्तरां में खुद को उड़ाते हैं । एक भी यहूदी चर्च को नष्ट करता हुआ नहीं पाया गया है। संसार में एक भी यहूदी लोगों को मारने के पक्ष में नहीं है। यहूदियों गुलामों का व्यापार नहीं करते, न ही उनके नेता काफिरों के लिए जिहाद और मूर्तिपूजकों के लिए मौत का आह्वान करते हैं। दुनिया के मुसलमानों को अपनी सभी समस्याओं के लिए यहूदियों को दोष देने की जगह शिक्षा के क्षेत्र में अधिक निवेश करना चाहिए। मुसलमानों को, इससे पहले वे मानव जाति से आदर की मांग करें ख़ुद से पूछना चाहिए कि वे मानव जाति के लिए क्या कर सकते हैं। इजरायल और फिलीस्तीन तथा अरब देशों के बीच संकट के बारे में अपनी भावनाओं को एक तरफ कीजिये। यहां तक ​​कि अगर आपको लगता है इजरायल का दोष अधिक है तो भी बेंजामिन नेतन्याहू के दो वाक्यों से सच समझ जा सकता है। "अगर अरब शस्त्र रख देते हैं तो और अधिक हिंसा नहीं होगी मगर अगर यहूदी आज अपने हथियार देते हैं तो इसराइल ही नहीं होगा। " द्वितीय विश्वयुद्ध के समय मित्र देशों की सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर, जनरल ड्वाइट आइजनहावर ने जब मौत के शिविरों में हत्याओं के शिकारियों की करतूतों को देखा तो उन्होंने यथासंभव तस्वीरें लिये जाने के आदेश दिए। उन्होंने आसपास के गांवों से जर्मन लोगों को मृतकों को देखने यहाँ तक कि दफ़नाने के लिए भी बुलाया। उन्होंने ऐसा क्यों किया ? उनका आशय उन्हीं के इन शब्दों में मिलता है: 'सब कुछ रिकॉर्ड पर लाओ। फ़िल्में बनाओ। गवाहियां दर्ज करो। ऐसा न हो कि इतिहास की लंबी सड़क के किसी मोड़ पर कोई कमीना यह कहे कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था।' मगर इस्लाम के सन्दर्भ में ऐसा होने लगा है। हाल ही में, ब्रिटेन में स्कूली पाठ्यक्रम से इस्लामी नरसंहारों को हटाने की बहस छिड़ी थी। हटाने के पक्ष वाले यह कारण दे रहे थे कि इससे मुलमानों की भावनाएं आहत होती हैं। उनका कहना है कि ऐसे नरसंहार हुए ही नहीं हैं। इसी तरह यहाँ यह जानना भयावह रूप से स्तब्ध कर देने वाला है कि द्वितीय विश्वयुद्ध जिसमें 60 लाख यहूदी, 2 करोड़ रूसी, 1 करोड़ ईसाई, 1900 ईसाई पादरी जला कर, पीट-पीट कर, भूखा रख कर, बलात्कार करके, अपमानजनक प्रयोग कर-कर के मार डाला गया, उनके बारे में जर्मन समाज का कुछ हिस्सा सामान्य विश्व से भिन्न सोच रखता है। इसी तरह इन इस्लामी नरसंहारों को ईरान झुटलाने लगा है। संसार को भूलना नहीं चाहिये, भूलने देना देना नहीं चाहिये कि इतिहास में क्या हुआ था। इसका ध्यान रखने से हम इससे लड़ेंगे। परिणामतः इससे हमारी दुनिया हमारे लिये हमारे बच्चों और उनके बच्चों के लिए एक सुरक्षित जगह हो जायेगी। यह तो हुई स्पेनिश लेखक सैबेस्टियन वीलर रोड्रिग्ज़ के 2008 में छापे लेख की बात अब हम वृहत्तर भारत का सन्दर्भ लेते हैं। हमने सदैव से ही बाहर से आने वाले किसी भी समूह का स्वागत किया है। बिना इसका ध्यान किये कि वो समूह हमारी धरती पर किस लिए आया है ? इस्लाम के प्रारम्भिक जत्थे स्थल मार्ग से हमारी ओर बग़दाद के इस्लामी साम्राज्य के ध्वस्त होने के बाद आये थे। क़ज़ज़ाकिस्तान, उज़्बेकिस्तान, आज़रबाइज़ान, ईरान, ईराक़, अफ़ग़ानिस्तान इत्यादि क्षेत्रों में इस्लामी आक्रमणकारियों ने समूची हिंदू, बौद्ध आबादी को नष्ट करने का कार्य शुरू किया। इस क्रम में सम्पूर्ण इस्लामी ख़िलाफ़त में मंदिरों, बौद्ध विहारों का ध्वंस होने लगा। इस से कुपित हिंदू सेनापति चंगेज खान के पौत्र हलाकू खान बग़दाद पर चढ़ दौड़े। उनकी प्रचंड मार से मुस्लिम समाज त्राहि माम् त्राहि माम् करता हुआ भाग-भाग कर शांत क्षेत्र यानी भारत की केंद्रीय भूमि की ओर आया। संभव है किसी मित्र को इन महान योद्धाओं के हिन्दू होने में संदेह हो अतः ऐसे मित्रों से निवेदन करूँगा कि किसी भी प्रतिष्ठित प्रकाशक की इन योद्धाओं पर पुस्तक खरीद लीजिये। पहले ही पृष्ठ पर भगवान महाकाल का चित्र दिखाई देगा। ये वही महाकाल की मूर्ति है जो नेपाल के हनुमान ढोका मंदिर के प्रांगण में लगी हुई है। भगवती दुर्गा के चित्र भी इन्हीं पुस्तकों में मिलेंगे। उनकी सेनाओं के ध्वज देखिये। उनके ध्वजों को त्रिशूल में पिरोया जाना ही वास्तविकता बता देगा। अंग्रेज़ी फ़िल्म मंगोल्स देखिये। इन्हीं तथ्यों से साक्षात्कार होगा। प्रतापी भरतवंशी योद्धा पूज्य हलाकू खान की मार से त्रस्त बग़दाद की इस्लामी ख़िलाफ़त के बचे इस्लामियों को हमारे पूर्वजों ने शरण दे दी। दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि मंदिरों, बौद्ध विहारों के ध्वंस के कारण कुटे-पिटे इस्लामियों को मंदिरों, बौद्ध विहारों के मूल देश भारत भर में ही स्थान दिया गया। सामान्य राजनैतिक चतुराई तो कहती है कि किसी भी भिन्न सांस्कृतिक समूह पर दृष्टि रखो। ध्यान रखो कि वो क्या कर रहा है ? उसका चिन्तन, खान-पान, शिक्षा क्या है मगर मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना मानने वाले समाज ने इसका ध्यान नहीं किया। परिणामस्वरूप काफ़िर वाजिबुल क़त्ल { अपने से भिन्न विश्वासी हत्या के पात्र हैं } क़िताल फ़ी सबीलिल्लाह, जिहाद फ़ी सबीलिल्लाह { अल्लाह की राह में क़त्ल करो, अल्लाह के लिए जिहाद करो }, बुतपरस्ती कुफ़्र है और कुफ्र को मिटाना प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है, मानने वाले इस्लामी गिरोह भारत भर में फ़ैल गये। स्वयं को स्थापित, सबल करने के बाद इन्होंने बाहर से मदद जुटाई, शक्ति बढ़ाई और शरण देने वाला राष्ट्र, शरण मांगने वालों के लम्बे समय तक अनाचार, व्यभिचार, जज़िया, बलात्कार, ग़ुलाम बनाये जाने का शिकार हुआ। वृहत्तर भारत इस्लाम के आतंक का सबसे अधिक शिकार हुआ है। इसी धरती पर इस्लाम ने जला-जला के, पीट-पीट के, आरे से चीर के, दीवार में ज़िंदा चुनवा कर, टुकड़े-टुकड़े कर के, भूखा रख के, जघन्य बलात्कार करके, अपमानित कर के करोड़ों लोग शताब्दियों तक लगातार मारे हैं। किसी भी सभ्य मनुष्य को इन हत्याकांडों पर जुगुप्सित आश्चर्य होगा। स्वाभाविक है कि कोई सामान्य मनुष्य विश्व भर में जहाँ जहाँ भी इस्लामी गए, ऐसे अनाचार को न समझ पाए। इसका कारण मुसलमानों को इस्लाम के आधार ग्रन्थ क़ुरआन के अमुस्लिमों के लिए दिए गए आदेश हैं। ओ मुसलमानों तुम ग़ैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { 9-123 } और तुम उनको जहां पाओ क़त्ल करो { २-191 } काफ़िरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { 8-39 } ऐ नबी ! काफ़िरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो. उनका ठिकाना जहन्नुम है { 9-73 और 66-9 } अल्लाह ने काफ़िरों के रहने के लिये नर्क की आग तय कर रखी है { 9-68 } उनसे लड़ो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं, न आख़िरत पर; जो उसे हराम नहीं समझते जिसे अल्लाह ने अपने नबी के द्वारा हराम ठहराया है. उनसे तब तक जंग करो जब तक कि वे ज़लील हो कर जज़िया न देने लगें { 9-29 } मूर्ति पूजक लोग नापाक होते हैं { 9-28 } जो कोई अल्लाह के साथ किसी को शरीक करेगा, उसके लिये अल्लाह ने जन्नत हराम कर दी है. उसका ठिकाना जहन्नुम है { 5-72 } ऐसा भयानक चिंतन प्रारंभ में ही थाम लिया जाना चाहिए था। इसके नाख़ून काट लिये जाने चाहिए थे, तीखे दांत तोड़ दिये जाने चाहिए थे मगर ऐसा नहीं हुआ। हमारी शांतिपूर्ण, ध्यान को जीवन समझने वाली भुजा बौद्ध धर्म को मानने वाले देश भी इसका शिकार हुए। यह देखना बहुत अजीब लगता है कि संसार में सबसे अधिक शांतिप्रिय बौद्ध मूल के देशों में इस्लाम के ख़िलाफ़ आवाज़ें उठाने लगी हैं। पड़ोसी देश श्रीलंका में बौद्ध भिक्षुओं ने मुख्यत: मुसलमानों के ख़िलाफ़ ‘बोडु बाला सेना’ नाम का संगठन बना लिया है। ‘बोडु बाला सेना’ का मुख्यालय कोलंबो के बुद्धिस्ट कल्चरल सेंटर में है। इसका उद्घाटन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे किया था। इस संगठन के लाखों समर्थक हैं, जो मानते हैं कि श्रीलंका को मुसलमानों से खतरा है। हज़ारों लोग उनकी रैलियों में शामिल होते हैं। सोशल मीडिया पर भी उनकी अच्छी-ख़ासी पहुँच है। वे अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक विश्वासों, पूजा-पाठ के तरीकों और विशेषकर मस्जिदों को निशाना बना रहे हैं। म्यामांर में मांडले के बौद्ध भिक्षु पूज्यचरण अशीन विराथु चट्टान की तरह दृढ क़दम जमाये खड़े हैं। अशीन विराथु अपने प्रभावशाली भाषणों से जनता को समझा रहे हैं कि यदि अब भी वो नहीं जागे तो उनका अस्तित्व ही मिट जाएगा। जनता का धैर्य टूट चुका है और लोग इस हद तक भड़क उठे हैं कि दुनिया में सबसे शान्तिप्रिय माने जाने वाले बौद्ध भिक्षुओं ने भी हथियार उठा लिये हैं। अब बर्मा की तस्वीर बदलने लगी है। इस्लामी आतंकवाद की पैदावार हिंसक झड़पों एवं उनके भड़काऊ भाषणों पर पूज्य अशीन विराथु के तेजस्वी उद्बोधनों से बर्मा की सरकार ने सेकुलरिज्म दिखाते हुए विराथु को 25 वर्ष की सजा सुनायी थी। लेकिन देश जाग चुका है और जनता के जबरदस्त दबाव में सरकार को उन्हें उनकी सजा घटाकर केवल सात साल बाद 2011 में ही जेल से रिहा करना पड़ा। रिहा होने के पश्चात भी विराथु की कट्टर राष्ट्रवादी सोच में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। और वे अनवरत रूप से अपने अभियान में लगे हैं। म्यांमार में हुई हिंसक घटनाओं के बाद से अब प्राय: पूरी दुनिया में बौद्धों और मुस्लिमों में भारी तनातनी पैदा हो गई है। केवल म्यांमार और श्रीलंका के बौद्ध ही नहीं..चीन में भी बौद्धों और मुस्लिमों में टकराव जारी है। चीन ने भी इस्लामी उद्दंडों पर चाबुक़ फटकारना शुरू कर दिया है। बौद्ध देश चीन के मुस्लिम बहुल प्रांत शिनजियांग के मुसलमान देश के इस क्षेत्र को इस्लामी राष्ट्र बनाने के लिए वर्षों से जेहाद कर रहे हैं। ये लोग चीन में केवल एक बच्चा पैदा करने के क़ानून का भी हिंसक विरोध करते रहे हैं। यहाँ तुर्क मूल के उईंगर मुसलमान पाकिस्तान के क़बायली इलाकों में आतंक की ट्रेनिंग लेकर चीनी नागरिकों का खून बहाने की साज़िश रचते हैं। चीनी सरकार ने पूरी दुनिया को इस्लामी आग में जलता देखकर सबक़ लिया है और यहाँ के मुसलमानों मनमानी बातें न मानने की नीति अपना ली है। यहाँ मुसलमानों को दाढ़ी रखने, बुर्क़ा पहनने यहाँ तक कि रोज़ा रखने पर भी पाबंदी लगा दी गयी है। चीन में उइगर दुकानदारों को शराब बेचने के लिए बाध्य कर दिया गया है। 25 वर्ष से कम उम्र के लड़के रोज़ा नहीं रख सकते हैं. मस्जिदों में नहीं जा सकते। इसके बावजूद चीन में आतंकवादी गतिविधियां एवं जेहादी भावना भी लगातार बढ़ रही हैं जिसके कारण यहाँ भी बौद्धों और मुसलमानों में घमासान मचा हुआ है। हम यह वैश्विक ध्रुव सत्य "शस्त्रेण रक्षिते राष्ट्रे शास्त्र चिंताम प्रवर्तते" कब समझेंगे ? तुफ़ैल चतुर्वेदी

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

............. अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे 

डॉनल्ड ट्रम्प ने 7 मुस्लिम देशों के नागरिकों पर अमरीकी वीज़ा बंद क्या कर दिया कि संसार भर के लोगों के पेट में पानी होने लगा। दस्त लग गये मगर उन्हें बंद करने की दवा नहीं सूझ रही। अमरीका तक में मरोड़ें शुरू हो गयीं। प्रेस का ख़ासा बड़ा हिस्सा कुकरहाव कर रहा है। बराक हुसैन ओबामा सहित हज़ारों अमरीकी सड़कों के किनारे नालियों पर बैठे हैं मगर पानी या काग़ज़ नहीं है। सम्भवतः आपने बराक हुसैन ओबामा द्वारा नए राष्ट्रपति के लिये सार्वजनिक प्रेम-प्रदर्शन का वीडियो तो देखा होगा जिसमें नये राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प और उनकी पत्नी, बराक हुसैन ओबामा और उनकी पत्नी को व्हाइट हॉउस में भेंट के समय भेंट में पैकेट में देते हैं और बराक हुसैन ओबामा नए राष्ट्रपति के पलटते ही उस पैकेट को दूर फेंक देते हैं।

बंधुओ, 'भरतपुर लुट गयो रात मोरी अम्मा' की नौटंकी राजनैतिक चतुराई से भरी कुटिल तकनीक है। भारत में भी बहुत समय से वामपंथी और इस्लामी ढकोसलेबाज़ राष्ट्रवादियों को दबोचने की मुहिम चलाने के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल करते आये हैं। मुझे अपनी पत्रिका लफ़्ज़ के प्रकाशन के समय अपने साथी और नाम के सम्पादक इक़बाल अशहर के साथ एक विवाद का ध्यान आता है। लफ़्ज़ हास्यव्यंग्य और शायरी पर काम कर रही थी मगर उसका सम्पादकीय सामयिक विषयों को भी घेरता था। एक सम्पादकीय में मनोहर श्याम जोशी जी के लेख "चड्ढी-चोली का विरोध और बुर्क़े की हिमायत" की प्रशंसा थी। जिस पर इक़बाल अशहर ने मुझसे सम्प्रेषण के लिये फ़ोन की जगह sms का माध्यम चुना और मुझ पर साम्प्रदायिक होने और अपने ग़ैरतअस्सुबी होने का हवाला देते हुए मुझसे सम्पादकीय में माफ़ी की मांग की।

जवाबी sms में अकिंचन ने पूछा क्या आपने इस्लाम त्याग दिया है ? आख़िर संसार को किस चिंतन धारा ने दारुल-हरब, दारुल-इस्लाम के ख़ानों में बांटा है। किसने काफ़िर वाजिबुल-क़त्ल कह कर मनुष्य के मौलिक जीवन के अधिकार की अवहेलना की है ? कौन कहता है "ईमान वालों को चाहिए कि ईमान वालों के विरुद्ध काफ़िरों को अपना संरक्षक-मित्र न बनायें। और जो ऐसा करेगा उसका अल्लाह से कोई नाता नहीं।" क़ुरआन 3-28 । वो हकबका गए और आज तक जवाब नहीं आया। 

कृपया सोचिये कि क़ौमी यकजहती अर्थात सांप्रदायिक एकता का सार्वजनिक प्रदर्शन, भाषणों का दिखावा भारत ही नहीं बल्कि विश्व भर में सबसे अधिक कौन सा समाज करता है ? अब सोचिये कि क्यों करता है ? आख़िर सारे संसार में स्थानीय समाज में समरस न होने के लिये अलग पहनावा, अलग खान-पान, अलग शैक्षणिक व्यवस्था, अलग न्यायव्यवस्था कौन मांगता है ? यानी सबके लिये तय व्यवस्था से अलग नियमों की मांग अर्थात अलग पहचान के लिए कौन सा समाज सक्रिय रहता है ? कौन सा समाज दूसरे समाज की लड़कियां तो लेना चाहता है मगर अपने समाज की लड़की किसी दूसरे समाज के लड़के से विवाह करना चाहे तो बलवे, हंगामे, हत्या की धमकी पर उतर आता है ? ज़ाहिर है उत्तर इस्लामी समाज अर्थात मुसलमान है। 
यह ढकोसला इतना बड़ा, मज़बूत और परफ़ेक्ट बनाया गया है कि विश्व भर में इसको ढोंग की जगह सच समझ जाता है। ईरान, ईराक़,लीबिया, सोमालिया, सूडान, सीरिया और यमन 7 देश जो न केवल अपने यहाँ भयानक संघर्ष छेड़े हुए हैं बल्कि दूसरे देशों में अपने वैचारिक एड्स के विषाणु भेज रहे हैं, को अमरीका वीज़ा बंद करता है तो पापी हो जाता है और अल्जीरिया, बंगला देश, ब्रूनेई, ईरान, ईराक़, क़ुवैत, लेबनान, लीबिया, मलेशिया, ओमान, पाकिस्तान, सऊदी अरब, सूडान, सीरिया, संयुक्त अरब अमीरात, यमन जैसे 16 इस्लामी देश दशकों से इज़राइली पासपोर्ट वाले नागरिकों को अपने देश का वीज़ा नहीं देते वो सब पुण्यात्मा हैं। 
सम्भवतः इस बात से आपकी जानकारी में वृद्धि हो कि इस्लाम ने अपने पुण्य केंद्र मक्का-मदीना की धरती ही नहीं अपितु आकाश भी प्रतिबंधित कर रखा है। उनके ऊपर से कोई हवाईजहाज़ भी काफ़िरों { ग़ैर-मुस्लिमों } को ले कर नहीं उड़ सकता। काफ़िर से इस सीमा की घृणा इस्लाम की मूल पुस्तक इस्लाम में जगह-जगह मिलती है। 
जब तुम्हारा रब फ़िरिश्तों की ओर वह्य कर रहा था कि मैं तुम्हारे साथ हूँ। तो तुम उन लोगों को ईमान ला चुके हैं जमाये रखो। मैं अभी काफ़िरों के दिल में रौब डाले देता हूँ। और तुम उनकी गर्दनों पर मारो और उनके हर जोड़ पर चोट लगाओ { 8-12 }
यह इस लिए कि इन लोगों ने अल्लाह और उसके रसूल का विरोध किया। और जो जो कोई अल्लाह और उसके रसूल का विरोध करे तो निस्संदेह अल्लाह भी कड़ी सज़ा देने वाला है। { 8-13 }
यह है { तुम्हारी सज़ा } इसका मज़ा चखो, और यह भी { जान लो } कि काफ़िरों के लिए आग { जहन्नम } की यातना है { 8-13 }
तुमने उन्हें क़त्ल नहीं किया बल्कि अल्लाह ने उन्हें क़त्ल किया.............  { 17-13 }

इस्लामी चिंतन दारुल इस्लाम के ही नहीं दारुल-हरब के नियम भी तय करना चाहता है। इस्लामी देश में मुसलमान कैसे जियें ? क्या करें ? ग़ैरमुस्लिमों के साथ कैसा इस्लामी राज्य कैसा व्यवहार करे ये तो उसका स्वाभाविक अधिकार है ही, ग़ैरमुस्लिम देशों के नियम भी उसके अनुसार बनने चाहिये। हलाल मांस, हिजाब, इस्लामी शिक्षा, शरिया, मस्जिदें, उनमें ग़ैरमुस्लिमों के लिये घृणापूर्ण ख़ुत्बे सभी कुछ इस्लाम के अनुसार बनना चाहिये। ऐसा करवाने के लिये उसे विश्वव्यापी इस्लामी-टैक्स ज़कात की लाखों करोड़ कीअथाह राशि उपलब्द्ध रहती है। इसी राशि से बराक हुसैन ओबामा, हिलेरी क्लिंटन के चुनावी बजट के लिये सैकड़ों करोड़ डॉलर की सहायता की ज़ोरदार चर्चा अमरीकी मिडिया में भी थी। नरेन्द्र मोदी जी के विरोधियों को भी इसी से करोड़ों रुपये भेजे जाने की सूचनायें मिलती रही हैं। 
विश्व राजनीति के इतिहास में किसी ने इसका पंजा पकड़ने का कार्य प्रारम्भ किया है और इस्लामियों को उसी भाषा में जवाब देना शुरू किया है जिसमें वो 1400 साल से संसार से सवाल पूछते आ रहे थे। यानी अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे। यह काम तो ठीक बल्कि बढ़िया है मगर यह ध्यान रहे यह ऊंट भारत में भी है मगर पहाड़ अभी अमरीकी में ही है। भारतीय ऊँट के लिये भारतीय पहाड़ खड़ा करना, उसे भारतीय पहाड़ के नीचे धकेल कर हमें ही लाना होगा। 1200 वर्ष से रिसते आ रहे नासूरों को साफ़ करने, घाव सिलने, राष्ट्र के पूर्ण स्वस्थ होने का काल आ रहा है। सशक्त होइये, सन्नद्ध होइये, भारत माता के कटी भुजाओं को वापस लाने का, पुनः गौरव पाने का समय निकट आ रहा है। एक बड़ी छलांग और पूरा गन्दा नाला पार.......
तुफ़ैल चतुर्वेदी 


बुधवार, 25 जनवरी 2017

सामान्य व्यक्ति और महापुरुष में जो बड़े अंतर होते हैं उनमें से प्रमुख यह है कि महापुरुष की दृष्टि उस कालखंड पर जिसमें वह हमारे बीच उपस्थित होता है, के साथ-साथ अतीत और भविष्य पर भी भरपूर सजगता के साथ होती है। वस्तुतः अतीत की घटनाओं की सामूहिक परिणति ही तो वर्तमान है और वर्तमान के कार्यकलाप ही तो भविष्य तय करते हैं। अतः अतीत का तार्किक विवेचन किये बिना वर्तमान की घटनाओं की प्रवृत्ति को कैसे समझा जा सकता है और वर्तमान का निर्धारण किये बग़ैर भविष्य का निर्माण कैसे किया जा सकता है ? भारत के वास्तविक और मूल राष्ट्र अर्थात हिंदुओं पर बढ़ते चले जा रहे भयावह ख़तरों को सामान्य व्यक्ति भी पहचानता है तो कोई महापुरुष उसे समझने में कैसे चूक सकता है ? ऐसे अनेकों महापुरुषों ने समय-समय पर राष्ट्र रक्षा के लिये अपने स्वभाव के अनुरूप व्यवस्था की है।

इन महापुरुषों में 22 दिसम्बर 1666 पटना में एक जन्मा एक बालक सर्वप्रमुख है। जी हाँ अभिप्राय गुरु गोविन्द सिंह जी से है। धर्म-रक्षा के लिये जूझने वाले अन्य महापुरुषों ने जहाँ आजीवन संघर्ष किया वहां गुरु गोविन्द सिंह जी ने आजीवन संघर्ष के साथ साथ का इस संकट के मूल स्वरूप को पहचाना और समझा कि यह संघर्ष केवल तात्कालिक नहीं है। इसे इस्लाम की ऐसी चिंतन-धारा पुष्ट कर रही है जो अपने अतिरिक्त प्रत्येक विचार को हर प्रकार से दूषित और भ्रष्ट मानती है। इस विचारप्रणाली की दृष्टि में उसके अतिरिक्त हर विचार को नष्ट करना अनिवार्य है अतः इसे समाप्त करने के लिये इसके प्रत्यक्ष आतताइयों को ही दण्डित करना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि इसकी कोई स्थाई व्यवस्था बनानी आवश्यक है। इसका अहर्निश पीछा करना, इसे खदेड़ना, इसको हर प्रकार से नष्ट करना मानवता के सुरक्षित रखने के लिए ज़ुरूरी है।

वह देख सकते थे कि इस विचारधारा की आतंकी कार्यवाहियों को उसके धर्मग्रंथ से इस प्रकार अनवरत प्रश्रय मिल रहा है और यह शताब्दियों से लगातार उपद्रव करती आ रही है तो उसके वर्तमान को ही नष्ट करना पर्याप्त नहीं है। उसकी हिंसक कार्यवाहियाँ भविष्य में न हों, आगामी पीढ़ी का जीवन सुरक्षित रहे, वह चैन से जीवन व्यतीत कर सके इस हेतु वर्तमान से भविष्य तक का इंतज़ाम करना होगा। आख़िर पाशविक मनोविकारों को मानवीय गुण मानने वालों से और कैसे निबटा जा सकता है ? इस के स्थाई समाधान के लिए उन्होंने सन 1699 में बैसाखी के दिन खालसा पन्थ की स्थापना की। इस हत्यारी विचारधारा से विभिन्न राष्ट्रों के बहुत से लोग जूझे मगर इससे जूझते रहने, लगातार लड़ते रहने की व्यवस्था भारत में ही बनी। यह घटना सम्पूर्ण विश्व में इस्लामी आतंक से जूझने के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में भी प्रमुखतम है। इसी के बाद एक के बाद दूसरे जन-समूह, एक देश के बाद दूसरे देश को लीलते जा रहे इस्लामी दावानल के पाँव भारत की धरती पर थमे।

9 वर्ष की आयु में अपने पिता गुरू तेग़ बहादुर जी को धर्म के लिए बलिदान के लिए प्रेरित करने वाले पूज्य गुरु गोविन्द सिंह जी का सम्पूर्ण जीवन पल-पल राष्ट्र चिंता में रत रहा। घटना यह थी कि उनके पिता गुरू तेग़ बहादुर जी के पास कश्मीरी हिंदुओं का एक समूह आया और उनसे औरंगज़ेब के आदेश पर कश्मीर के मुग़ल सूबेदार इफ़्तिख़ार ख़ान के हिंदुओं को यातना दे कर मुसलमान बनाने के लिये बाध्य करने की शिकायत की। गुरु तेग़ बहादुर जी के मुंह से निकला "धर्म किसी महापुरुष का बलिदान मांग रहा है" बालक गोविन्द राय जी तुरन्त बोले "आपसे बड़ा महापुरुष कौन है ?" गुरू तेग़ बहादुर जी ने कश्मीरी हिंदुओं से कहा। औरंगज़ेब से कहो अगर गुरु तेग़ बहादुर मुसलमान बन जायेंगे तो हम भी बन जायेंगे। इस घोषणा के बाद गुरू तेग़ बहादुर जी भ्रमण करते हुए दिल्ली पहुंचे, जहाँ उन्हें औरंगज़ेब द्वारा मुसलमान बनने के लिये कहा गया और न मानने पर शिष्यों सहित क़ैद कर लिया गया। उनके शिष्य भाई मति दास को आरे से चीरे जाने, भाई दयाल दास को खौलते हुए पानी में उबाले जाने जैसी कई सप्ताह तक भयानक यातना देने के बाद गुरू तेग़ बहादुर जी का 11 नवम्बर 1675 को इस्लामी मुफ़्ती के आदेश पर सर काट दिया गया।

धर्म के लिये अपने अपने पिता के बलिदान होने के बाद 10 वर्ष की अवस्था में गुरु पद पर विराजे पूज्य गुरु गोविन्द सिंह जी आध्यात्मिक नेता, दूरदर्शी चिंतक, बृजभाषा के अद्भुत कवि, उद्भट योद्धा थे। 1699 ईसवीं में 33 वर्ष की आयु में बैसाखी के अवसर पर आनंदपुर साहब में आपने ख़ालसा पंथ की स्थापना की। धर्मरक्षा को ही जीवन मानने वाले पूज्य गुरु गोविन्द सिंह जी की रचना उग्रदंती में लिखित यह पंक्तियाँ ख़ालसा पंथ की स्थापना का उद्देश्य स्पष्ट करती हैं।

सकल जगत में खालसा पंथ गाजे
जगे धर्म हिन्दू तुरक धुंध भाजे

इस्लामी आतंक के कारण बलिदान होने वाले वीरों की अटूट श्रंखला में आपके पुत्रों के बलिदान भी अतुलनीय हैं। शस्त्रों की छाँव में पाले गये 17 और 13 वर्ष की आयु के उनके दो पुत्र साहिबज़ादा अजीत सिंह, जुझार सिंह 1704 ईसवीं में चमकौर दुर्ग में लड़ते हुए बलिदान हुए। 8 और 5 वर्ष के जोरावर सिंह और फतेह सिंह मुसलमान न बनने के कारण दीवार में चुन दिए गए। इतिहास में बहुत ही काम उदाहरण मिलते हैं जब किसी पिता ने एक सप्ताह में अपने 4–4 बेटे बलिदान दे दिए हों। इसी कारण गुरु गोविन्द सिह जी को सरबस दानी भी कहा जाता है। जब गुरु साहब को इसकी सूचना मिली तो उनके मुंह से बस इतना निकला

इन पुत्रन के कारने, वार दिए सुत चार
चार मुए तो क्या हुआ, जीवें कई हज़ार

उनके व्यक्तित्व में इतने आयाम हैं कि उनके गुणों की चर्चा करने के लिये एक लेख कम पड़ेगा अतः उनके जीवन के योद्धा पक्ष और उसके प्रमाण स्वरूप उनकी पौरुषपूर्ण रचना ज़फ़रनामा का उपयोग ही करना समीचीन होगा। गुरु गोविन्द सिंह जी ने हत्यारी विचारधारा के केंद्र औरंगज़ेब को 1705 ईसवीं में फ़ारसी में एक पत्र लिखा जिसे ज़फ़रनामा कहा जाता है। ज़फ़रनामा को भाई दयासिंह जी से औरंगज़ेब के पास अहमदनगर भिजवाया गया। उसमें वर्णित मंतव्य को स्पष्ट करने के लिए उनके कुछ प्रमुख पदों का यहां भावार्थ देना उपयुक्त होगा। गुरु गोविंद सिंह ने जफरनामा का प्रारंभ ईश्वर के स्मरण से किया है। उन्होंने अपने बारे में लिखा है कि 'मैंने ईश्वर की शपथ ली है, जो तलवार, तीर-कमान, बरछी और कटार का ईश्वर है और युद्धस्थल में तूफान जैसे तेज दौड़ने वाले घोड़ों का ईश्वर है।' वह औरंगज़ेब को सम्बोधित करते हुए कहते हैं, 'जिसने तुझे बादशाहत दी उसी ने मुझे धर्म की रक्षा की दौलत दी है। मुझे वह शक्ति दी है कि मैं धर्म की रक्षा करूं और सत्य का ध्वज ऊंचा हो।' आप इस पत्र में औरंगज़ेब को 'धूर्त', 'फरेबी' और 'मक्कार' बताते हैं। उसकी इबादत को 'ढोंग' कहते हैं।

मुस्लिम साम्राज्य के सबसे क्रूर आततायी को अपने पिता तथा भाइयों का हत्यारा बताना उनकी वीरता का प्रमाण है। आज भी धमनियों में रक्त का संचार प्रबल कर देने वाले अपने पत्र ज़फ़रनामे में गुरु गोविंद सिंह स्वाभिमान तथा पौरुष का परिचय देते हुए आगे लिखते हैं मैं तेरे पांव के नीचे ऐसी आग रखूंगा कि पंजाब में उसे बुझाने तथा तुझे पीने को पानी तक नहीं मिलेगा। वह औरंगजेब को चुनौती देते हुए लिखते हैं, 'मैं इस युद्ध के मैदान में अकेला आऊंगा। तू दो घुड़सवारों को अपने साथ लेकर आना।' क्या हुआ अगर मेरे चार बच्चे मारे गये, पर कुंडली मारे डंसने वाला नाग अभी बाकी है।'

गुरु गोविंद सिंह ने औरंगज़ेब को इतिहास से सीख लेने की सलाह देते हुए लिखते हैं। 'सिकंदर और शेरशाह कहां हैं ? आज तैमूर कहां है ? बाबर कहां है ? हुमायूं कहां है ? अकबर कहां है ?' अपने तीखे सम्बोधन से औरंगज़ेब को ललकारते हुए कहते हैं, 'तू कमजोरों पर जुल्म करता है, उन्हें सताता है। कसम है कि एक दिन तुझे आरे से चिरवा दूंगा।' इसके साथ ही गुरु गोविंद सिंह ने युद्ध तथा शांति के बारे में अपनी नीति को स्पष्ट करते हैं, 'जब सभी प्रयास करने के बाद भी न्याय का मार्ग अवरुद्ध हो, तब तलवार उठाना सही है और युद्ध करना उचित है।' ज़फ़रनामे के अंत के पद में ईश्वर के प्रति पूर्ण आस्था व्यक्त करते हुए फ़रमाते हैं, 'शत्रु भले हमसे हजार तरह से शत्रुता करे, पर जिनका विश्वास ईश्वर पर है, उनका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता।' वस्तुत: गुरु गोविंद सिंह का ज़फ़रनामा केवल एक पत्र नहीं बल्कि एक वीर-काव्य है, जो भारतीय जनमानस की भावनाओं को प्रकट करता है। उनका यह पत्र युद्ध का घोष तो है ही, साथ ही शांति, धर्मरक्षा, आस्था तथा आत्मविश्वास का परिचायक है।

यह पत्र पीड़ित, दुखी, हताश, निराश, खिन्न हिन्दू समाज में नवजीवन तथा गौरवानुभूति का संचार करने वाला साबित हुआ। समाज में औरंगज़ेब के कुकृत्यों के प्रति आक्रोश बढ़ा और विदेशी आक्रमणकारी साम्राज्य औरंगज़ेब के साथ ही अपने पतन की ढलान पर बढ़ गया। गुरु गोविन्द सिह जी का अवतरण सोये हुए समाज को झकझोर गया और भारत भर को ग्रसे हुए मुग़ल साम्राज्य के खण्ड-खण्ड हो गये।

तुफ़ैल चतुर्वेदी

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

बंधुओ, सम्भवतः आपने अमरीका के नये राष्ट्रपति महामहिम डोनाल्ड ट्रम्प का राष्ट्रपति बनने के बाद का पहला भाषण सुना होगा। न सुना हो तो कृपया अवश्य सुनें। इसे कहते हैं तेजस्वी नेता। आज के भ्रष्ट और घटिया राजनैतिक परिदृश्य में अपने पहले भाषण से ही ट्रम्प आशा और विश्वास की किरण बन कर उभरे हैं। हमारे टी वी चैनलों पर बैठे हुए प्रोफ़ेसर आनंद कुमार जैसे वाचाल इस भाषण से पहले कह रहे थे "चुनाव के लिये वोटों का ध्रुवीकरण आपसे कुछ भी कहलवा लेता है मगर शासन की वास्तविकता कुछ और होती है"। मनहूस वामपंथ, अल्पसंख्यकवाद की लम्पट, झूटी राजनीति को प्रेरित करती वाचालता मानती नहीं मगर पौरुष तो पौरुष ही होता है। महामहिम राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने स्पष्ट सन्देश दिया।
सम्पूर्ण विश्व शताब्दियों से आतंकवाद, गुंडागर्दी, अनाचार से पीड़ित है। 1400 वर्षों से सारे योरोप, एशिया, अफ़्रीक़ा में मंदिर, चर्च, सिनेगॉग, बौद्ध विहार, विश्वविद्यालय, पुस्तकालय ध्वस्त किये, तोड़े गए हैं। लाखों लोगों को ग़ुलाम बनाया जाता रहा है। अपमानित कर जज़िया वसूला जाता रहा है। जिस चिंतन ने यह किया था वो आज भी उसी रास्ते पर चल रहा है। वही क़त्ताल फ़ी सबीलिल्लाह { अल्लाह की राह में क़त्ल करो } जिहाद फ़ी सबीलिल्लाह { अल्लाह की राह में जिहाद करो } काफ़िर वाजिबुल क़त्ल { अमुस्लिम वधयोग्य है } का हत्यारा चिंतन आज भी विश्व के जीवन को संकट में डाले हुए है। विश्वास न हो तो कृपया क़ुरआन के सन्दर्भ देखिये
ओ मुसलमानों तुम गैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { 9-123 }
और तुम उनको जहां पाओ कत्ल करो { 2-191 }
काफिरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { 8-39 }
ऐ नबी ! काफिरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो. उनका ठिकाना जहन्नुम है { 9-73 और 66-9 }
अल्लाह ने काफिरों के रहने के लिये नर्क की आग तय कर रखी है { 9-68 }
उनसे लड़ो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं, न आखिरत पर; जो उसे हराम नहीं जानते जिसे अल्लाह ने अपने नबी के द्वारा हराम ठहराया है. उनसे तब तक जंग करो जब तक कि वे जलील हो कर जजिया न देने लगें { 9-29 }
तुम मनुष्य जाति में सबसे अच्छे समुदाय हो, और तुम्हें सबको सही राह पर लाने और गलत को रोकने के काम पर नियुक्त किया गया है { 3-110 }
अमरीका के नये राष्ट्रपति महामहिम डोनाल्ड ट्रम्प के इस भाषण से स्पष्ट है कि अब ग़ज़वा-ए-हिन्द का सपना देखती हुई आँखों को ग़ज़वा-ए-सलफ़ियत, ग़ज़वा-ए-वहाबियत देखने के दिन आ रहे हैं। शताब्दियों से विश्व को ऐसे पौरुषवान नेतृत्व की प्रतीक्षा थी। डोनाल्ड ट्रम्प राजनेता नहीं है वरन विश्व को त्रास से उबारने वाले चमत्कारी राष्ट्रभक्त हैं। उन्हें इसी कार्य के लिये अमरीकी जनता ने जनादेश दिया था। यहाँ स्मरण करता चलूँ कि नरेन्द्र मोदी जी और उनके प्रत्याशियों का भी भारत की जनता ने इसी आशा में ही विजय तिलक किया था। बंधुओ, यह हमारा भी क्षण है। सैकड़ों वर्षों से रिसते आ रहे घावों को साफ़ करने, उन पर मरहम लगाने का यही समय है। भगवान महाकाल से प्रार्थना कीजिये कि विश्व को आतंकमुक्त करने के महती उद्देश्य को सफल करें। इसमें भरतवंशियों का योगदान अनिवार्य है। सबसे बड़ा हिसाब तो हमारा ही शेष है। पूज्य डॉ हेडगेवार ने भारत माता के उत्कर्ष के लिए याचि देही याचि डोला { इसी देह से इन्हीं आँखों से } शब्दों का प्रयोग इतिहास के इसी मोड़ के लिये किया था।
तुफ़ैल चतुर्वेदी