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शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

जावेद अख़्तर की काइयाँ वाचाली

आजकल whatsapp पर एक वीडिओ बहुत वायरल हो रहा है। इसमें मुंबई फ़िल्म जगत के लेखक-शायर जावेद अख़्तर, कुख्यात पत्रकार राजदीप सरदेसाई और उसी थैली के चट्टे-बट्टे बात करते दिखाई दे रहे हैं। हाल में कई जालीदार टोपियाँ भी मय मुसम्मात दिखाई दे रही हैं। जावेद अख़्तर इस विडिओ में क्लेम कर रहे हैं कि वो " एथीस्ट (नास्तिक) हैं। मैं यह छुप कर नहीं हूँ। मैं यह टीवी पर भी बोलता हूँ। अपने इंटरव्यू में भी बोलता हूँ। मैंने लिखा भी है. मेरा कोई रिलिजियस बिलीव नहीं है। नॉट एट ऑल. आई डोंट बिलीव इन दि एग्ज़िस्टेंस ऑफ़ गॉड. आई डोंट बिलीव एनी वॉइस कम्स फ्रॉम एनी वेयर, बिकॉज़ देयर इज़ नो वेयर नो वन. देट इस आई बिलीव. फिर वो आगे कहते हैं। उसके बारे में यहाँ से ख़त्म कर बात शुरू करता हूँ। इससे आप बात सही प्रोस्पेक्टिव में समझ पायेंगे। यहाँ से एक बात कही। कैनेडा से आप आये हैं। मैंने नोट किया है कि इस मामले में एन.आर.आई. अधिक सेंसटिव होते हैं।" ".... हिन्दू भगवानों की मोकरी की गयी। मुझे लगता है जो लोग रिलिजन का धंधा करते हैं उनकी मोकरी की गयी। एक..... दूसरे मैंने एक इंटरव्यू में ये बात कही थी और बहुत दुःख के साथ कही थी कि शोले में एक सीन था। जिसमें धर्मेंदर जो है जा के शिव जी की मूर्ति के पीछे छुप जाता है और हेमा मालिनी आती है तो धर्मेंदर कहता है। सुनो हम तुमसे... और वो समझती है शिवजी बोल रहे हैं। और वो हाथ जोड़ती है ये करती है..... आज अगर पिक्चर बने तो शायद मैं वो सीन नहीं लिख पाऊँगा। बिकॉज़ इट विल क्रिएट प्रॉब्लम। 1975 में इसका प्रॉब्लम नहीं हुआ था।" "उनके अनुसार यह इतनी क़ीमती चीज़ है जो उसे आप हाथ से मत जाने दीजिये। व्हाट इस सो ब्यूटीफुल अबाउट हिन्दू कम्युनिटी, हिन्दू कल्चर ? वो ये इजाज़त देता है कि कुछ भी कहो, कुछ भी सुनो और कुछ भी मानो। इस पर हॉल के कुछ लोग ताली पीटते हैं। आगे वो कहते हैं यही वैल्यू, यही ट्रेडिशन है जिसकी वज्ह से इस मुल्क में डेमोक्रेसी है इस मुल्क से निकलेंगे तो मेडिटेरियन कोस्ट तक डेमोक्रेसी नहीं मिलती। मगर मुझे हैरत होती है। आई मीट पीपल जो मुझे कहते हैं साहब पीके में तो आपने हिन्दू धर्म के बारे में तो इतनी लिबर्टी ले ली, क्या मुसलमानों के साथ लेते ? तो क्या मुसलमानों जैसे बनना चाहते हो" आप वैसे मत बनिए बरबाद हो जायेंगे। उन्हें ठीक कीजिये, ख़ुद वैसे मत बनिए। इसी तरह की कई बातों की चर्चा करते हुए यह 4 मिनिट 12 सैकिंड का यह विडिओ समाप्त होता है। जावेद साहब की घनीभूत पीड़ा है कि शायद वो भगवान शंकर की खिल्ली उड़ाने वाले सीन को आइंदा वैसा लिखने की हिम्मत नहीं कर पाएंगे। वह एक किसी पुरानी पिक्चर के बारे में कह रहे हैं कि दिलीप कुमार जिनका उनके अनुसार अस्ली नाम यूसुफ़ ख़ान है, ने एक फ़िल्म में भगवान की मूर्ति को उठा कर कहा है कि.... मैं इसे नाले में फेंक दूंगा। पूरे विडियो में उनका यह दर्द हिलोरें मार रहा है कि अब ऐसे डायलॉग नहीं लिखे जा सकते। उनका सुझाव है कि हमें तालिबान नहीं बनना चाहिए। मैं यहाँ यह समझने में अक्षम हूँ कि वो इस वाक्य में " हमें " शब्द का प्रयोग कैसे और क्यों कर रहे हैं ? इस क्षण तक की मेरी जानकारी के अनुसार वो हिन्दू तो नहीं बने हैं। मेरी दृष्टि में वह स्वयं को एथीस्ट बताने भर से इस महान देश की संस्कृति के आधारभूत समाज हिन्दुओं से ख़ुद को जोड़ने का अधिकार तब तक नहीं है जब तक वो अपनी शुद्धि नहीं करवा लेते। घर वापस नहीं लौट आते। उनकी जानकारी के लिये निवेदन है कि एथीस्ट होना और हिन्दू होना साथ-साथ चल सकता है। यह पूरा वीडियो, हमारी संस्कृति महान है, सहिष्णु है आदि आदि से सना-पुता हुआ है। जावेद अख़्तर की यह बातें जितनी गंभीर और पवित्र हैं उससे अधिक गंभीर चर्चा, तार्किक चिंतन की मांग करती हैं। बंधुओ, मैं पवित्र भाव से ऐसा ही करने नहा-धो कर, आसन बिछा कर, अगरबत्ती जला कर बैठा मगर क्या किया जाए कि उनके इस जूनियर शायर को उनकी हर बात झूट, बेईमानी, फ़रेब, दग़ा और काफ़िरों के लिये ख़ास सामयिक इस्लामी दाँव तक़ैया नज़र आयी। बंधुओ, वह वीडियो में ख़ुद को एथीस्ट बता रहे हैं, गॉड से इंकार करते हैं मगर उनके पवित्र मुख से उनका अपना शब्द अल्लाह कुछ नहीं है, नहीं निकला। क्या जालीदार टोपियाँ मय मुसम्मात पर्दादारान की मौजूदगी ज़बान पकड़ कर बैठ गयी ? जावेद अख़्तर ईसाई मूल के नहीं हैं तो फिर यह क्यों कह रहे हैं ? आई डोंट बिलीव एनी वॉइस कम्स फ्रॉम एनी वेयर, बिकॉज़ देयर इज़ नो वेयर नो वन। जावेद आप अपने कुल की परम्परा के अनुसार साफ़ क्यों नहीं बोलते कि कहीं कोई अल्लाह नहीं है। उसका आख़िरी क्या कोई पैग़म्बर नहीं है। उनके मुँह से, जब अल्लाह ही नहीं तो पैग़ाम कैसा, उसका पैग़म्बर कौन क्यों नहीं निकलता ? उन्हें वीडियो में अपनी लिखी फ़िल्म शोले का भगवान शंकर की खिल्ली उड़ाने वाली बेहूदगी वाला सीन याद आता है मगर उसी शोले की कहानी में पैबन्द की तरह ख़ामख़ा जोड़ा गया पात्र अंधा रहीम चाचा याद नहीं आता। जिसमें अज़ान सुन कर बेटे की लाश पड़ी रहने पर भी "मैं चलता हूँ नमाज़ का टाइम हो गया" वाली नमाज़ की पाबंदी यानी नमाज़ की अत्यंत महान आवश्यकता और उसकी समय पर पढ़े जाने की याद दिलाई जाती है। इससे वो अल्लाह और उसके दीन की पवित्रता कुटिल चालाकी के साथ चुपके से स्थापित कर गए। वो बला की ऐबदारी बरतते हुए कहते हैं कि भारत के बाद प्रजातंत्र दूर मेडिटरेनियन पर मिलता है। यहाँ वो इस बात को बिल्कुल गोल कर जाते हैं कि भारत के बाद प्रजातंत्र इज़राइल में है और बीच में सब मुसलमान देश हैं। वो इस तथ्य पर चर्चा करने की आवश्यकता ही अनुभव नहीं करते कि क्यों किसी भी इस्लामी देश में प्रजातंत्र यानी सबके समान अधिकार वाली व्यवस्था नहीं है ? वो बराबर के देश की हालत को संकेत में ख़राब कहते हैं मगर बर्बादी के कगार पर पहुँचे पाकिस्तान ही नहीं विश्व में आतंकवाद की स्थिति का कारण इस्लाम है, बताने जगह मुँह में दही जमा लेते हैं। ज़ाहिर है ऐसा कुछ बोलते ही दही बिगड़ जाने का ख़तरा तो होगा ही ना...... बंधुओ, आपको 'शोले' और इसी तरह की फ़िल्मों के क्रम की 'ग़दर एक प्रेम कथा' ध्यान होगी। इसमें सनी दियोल एक सिख बने हैं जो 1947 के दंगों के समय एक मुस्लिम लड़की किसका चरित्र अमीषा पटेल ने निभाया है से विवाह कर लेते हैं। आगे कहानी इस विवाह को इस तरह ठंडा करती है कि उसमें सनी दियोल का पाकिस्तान जाना और वहां मुसलमान बनना दिखा दिया जाता है। संभवतः डाइरेक्टर, प्रोड्यूसर के ध्यान में था कि फ़िल्म में भी किसी सिख लड़के की मुसलमान लड़की की शादी दर्शकों के एक बड़े वर्ग को कुपित कर सकती है और फ़िल्म ठप हो सकती है। अभी कुछ दिनों पहले आयी एक और फ़िल्म गोलमाल-4 ध्यान कीजिये। उसमें एक ऐसे पात्र को जिसे भूत दिखाई पड़ते हैं, एक प्रेत अपनी समस्या बताता है। मैं हिंदू था और मेरी बेटी ने एक मुसलमान से शादी कर ली। मैं उससे बहुत नाराज़ था। बाद में मेरी नाराज़गी दूर हुई और मैंने उसे पत्र लिखे मगर भेज नहीं पाया और मेरी मृत्यु हो गयी। वह पत्र मेरी बेटी को भिजवा दो तो मेरी आत्मा को शांति मिल जाएगी। लड़की को पत्र मिल जाते हैं। वो पत्र पढ़ लेती है और प्रेतात्मा की मुक्ति हो जाती है। यहाँ स्वयं से एक बहुत गंभीर प्रश्न पूछिए कि हिंदु लड़कियों के मन में इस्लामियों से विवाह सामान्य बात है, कैसे बैठा ? इस्लाम के प्रति यह बिना जाने कि इस्लाम क्या है, अनायास सहज भाव कैसे बैठ गया ? सर्वधर्म समभाव हमारी कुछ लड़कियों के चिंतन का अंग कैसे बना ? यह बहुत सोच-विचार कर बनायी गयी योजना है। लगातार मस्तिष्क पर जाने-अनजाने छोड़ी गयीं काल्पनिक मगर धूर्त बातें सबकॉन्शस ब्रेन का हिस्सा बन गयीं। अब जावेद अख़्तर और ऐसे हर व्यक्ति से थोड़ी सी खरी-खरी बातें कहने का उपयुक्त समय है। आपके पिता की पीढ़ी के मुसलमानों ने 1947 में भारत माता का विभाजन कांग्रेस के हाथों करवाया। उसके तुरंत बाद खंडित भारत में पहला चुनाव 1952 में हुआ। स्वाभाविक था कि इस चुनाव में मतों ध्रुवीकरण हिंदूवादी दलों के पक्ष में होता। आपको जानना चाहिए लुटे-पिटे, आहत-कराहते, झुलसे-सुलगे हुए हिन्दुओं ने उस आम चुनाव में केवल 2 सीटें तथाकथित हिंदूवादी पार्टी जनसंघ को जिताईं थीं। जनसंघ की पहली सीट श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी कोलकाता से जीते थे। आप उस काल की राजनीति के शीर्ष पुरुष थे। स्वयं नेहरू के मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री रह चुके थे। दूसरी सीट जम्मू से प्रेम नाथ डोगरा जी की थी। वह भी जम्मू-कश्मीर के निर्विवाद सबसे बड़े नेता थे। महाराज हरिसिंह जी के परम विरोधी और जनता के चहेते नेता थे। इन दोनों की जीत हिंदूवादी दल के प्रत्याशी होने के कारण नहीं हुई बल्कि यह अपने व्यक्तित्व के कारण जीते थे। सोचिये आज ऐसा क्या हो गया कि केंद्र में तथाकथित हिंदूवादी दल भाजपा की प्रबल सरकार है ? क्यों इस्लामियों का साथ चाहने-मांगने वाली हर पार्टी चुनावी राजनीति से बाहर खदेड़ी जा रही है ? क्यों भाजपा को हिंदूवादी लोग एक जुट हो कर वोट दे रहे हैं ? क्यों एक एक कर प्रदेशों से भी मुसलमानों के वोटों के लिए जीभ लपलपाने, कमर नचाने वाली पार्टियों के हाथों सरकारें निकलती जा रही हैं ? वह कौन सा तत्व है जिसके कारण लाखों-करोड़ों लोग अपनी जेब से मोबाइल रिचार्ज करा-करा कर प्रिंट और इलेक्ट्रिक मिडिया के समानांतर सोशल मीडिया खड़ा कर रहे हैं ? उन्हें मोदी जी अथवा योगी जी की जीत से निजी रूप से कुछ नहीं मिलने वाला, न इन्हें कुछ लेना है मगर यह सब अपनी जान क्यों झोंक रहे हैं ? मेरी समझ से आपको इस बदलाव को बहुत गंभीरता से लेना चाहिए। जावेद साहब, इसके लिये इस्लाम के उद्दंड और वाचाल लोग ज़िम्मेदार हैं। आपको ध्यान होगा इस्लामी नेताओं द्वारा "पी ए सी मस्ट बी स्टोनड" { पी ए सी के लोगों को पत्थर मार मर कर कुचल दो } जैसे बयान दिए गए हैं। "भारत माता डायन है" जैसी बातें कही गयी हैं। "5 मिनिट के लिए पुलिस हटा लीजिये फिर दिखा देंगे किसमें कितना दम है" जैसी बातें सार्वजनिक मंचों से बोली गयी हैं। हर उत्पाती इस्लामी नेता का प्रत्येक बेहूदा बयान कानों में खौलते तेल की तरह जाता है और एक एक दग्ध ह्रदय को जोड़ता चला जाता है। इस्लाम की गुप्त वैश्विक योजनायें इंटरनेट और सोशल मीडिया के कारण गुप्त नहीं रहीं। इसी कारण अब आपके जैसे चतुर चालाक लोगों की सत्यता भी छिपी नहीं है। लोग इस्लामी जनसंख्या के अनुपात बढ़ने और उसके कारण उसकी बदलने वाली चालों को समझने लगे हैं। वो जानते हैं कि क्यों मुसलमान स्वयं को कम्युनिस्ट, एथीस्ट, एग्नॉस्टिक कहते-बताते हैं मगर उनके किसी हमले का निशाना इस्लाम नहीं होता। लोग यह भी जानते हैं इस्लाम वह मज़हब है जिसमें 1500 वर्ष से आज तक कोई बदलाव नहीं आया बल्कि बदलाव सोचा तक नहीं गया। तीन तलाक़, हलाला जैसे विषयों पर आपकी चुप्पी उन्हें जाना-सोचा दाँव लगती है। जो कि वस्तुतः सच भी है। राष्ट्रबन्धुओ ! जावेद अख़्तर और ऐसा हर चालाक हमें बेवक़ूफ़ समझता है, बनाना चाहता। इस्लाम को प्रजातांत्रिक साबित करने से ले कर स्वयं को सर्वधर्म समभाव मानने वाला, नास्तिक कुछ भी इसी चाल और चिन्तन के कारण बताता है। उसका लक्ष्य केवल यह है कि इस्लाम के प्रभावी, वर्चस्वी होने तक आप ग़फ़लत की नींद सोये रहें और भारत के टुकड़े तोड़े जाते रहें। देश से अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश नोचा जा सके। जगह-जगह कश्मीर बनाये जा सकें। राष्ट्र को समाप्त किया जा सके। तुफ़ैल चतुर्वेदी

बुधवार, 1 नवंबर 2017

सभ्य सँसार के इस्लामी दुनिया को ले कर दायित्व

सभ्य सँसार और इस्लामी दुनिया के चिंतन-जीवन में इतनी दूरी है कि सभ्य सँसार इस्लामी दुनिया को समझ ही नहीं सकता। सभ्य समाज में स्त्रियों के बाज़ार जाने, रेस्टोरेंट जाने, स्टेडियम जाने को ले कर कोई सनसनी जन्मती ही नहीं। यह कोई समाचार ही नहीं है मगर इस्लामी सँसार के लिए यह बड़ा समाचार है कि सऊदी अरब अब अपने देश में होने वाली खेल प्रतियोगिताएं को देखने के लिए महिलाओं को स्टेडियम में जाने की अनुमति देगा। यह अनुमति 2018 में लागू होगी। अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि महिलाएं स्टेडियम में जा कर खुद भी खेल सकेंगी कि नहीं। यह फ़ैसला युवराज मुहम्मद बिन सलमान ने समाज को आधुनिक बनाने और अर्थ व्यवस्था को बढ़ाने के तहत किया है। प्रारम्भ में इसे तीन बड़े नगरों रियाद, जद्दा और दम्माम में बने स्टेडियमों में लागू किया जायेगा। अब उन्हें पुरुषों के खेल देखने की अनुमति भी होगी। सऊदी अरब खेल प्राधिकरण के अनुसार नई व्यवस्था के लिये स्टेडियम परिसर में रैस्टोरेंट, कैफ़े, सी.सी.टी.वी. कैमरे, स्क्रीन और ज़रूरी व्यवस्थाएं की जायेंगी। 32 वर्षीय युवराज के विज़न 2030 के तहत जल्द ही देश में म्युज़िक कंसर्ट और सिनेमा देखने का सिलसिला प्रारंभ होने की उम्मीद है। इसमें अभी भी पेच है। किसी भी सामान्य मस्तिष्क में भी प्रश्न आयेगा कि आख़िर औरतों को स्टेडियम में खेल देखने की यह अनुमति 2018 में लागू क्यों होगी ? आज ही लागू करने में क्या परेशानी है ? इसमें पेच यह है कि सऊदी व्यवस्था को स्टेडियम परिसर में रैस्टोरेंट, कैफ़े, सी.सी.टी.वी. कैमरे, स्क्रीन और ज़रूरी व्यवस्थाएं बनानी हैं। इसका मतलब यह है कि औरतों के लिये यह सारी व्यवस्था स्टेडियम में अलग से बने हिस्से में होगी। जिसमें बैठी महिलायें न दायें-बायें देख सकेंगी, न उनके बॉक्स में कोई बाहर से देख सकेगा। यह एक बक्सा सा होगा जो तीन तरफ़ से बंद और केवल सामने से खुला होगा। आपने यदि ताँगे के घोड़े को देखा हो तो आप पायेंगे कि उसकी आँखों के दोनों ओर चमड़े का बनी खिड़की की झावट सी होती है। जिसके होने से वो केवल सीधा ही देख सकता है। सभ्य समाज के अपने लिए ही नहीं बल्कि मुल्ला समाज के लिए जानना और जनवाना उपयुक्त होगा कि सऊदी अरब ही नहीं अपितु पूरे अरब जगत में औरतें भारी बंदिशें झेल रही हैं। उनके पहनावे के कड़े नियम हैं। सार्वजनिक गतिविधियों, ग़ैरमर्द से बात करने पर प्रतिबंध हैं। पुरुषों के साथ काम करने पर रोक है। घर से अकेले निकलने पर रोक है। इससे उस घोर-घुटन, संत्रास, पीड़ादायक जीवन का अनुमान लगाइये जो क़ुरआन और हदीसों के पालन के नियम ने मुसलमानों के आधे हिस्से को सौंपा है। पुरुष अभिभावक के बिना स्त्री कहीं और जाना तो दूर डॉक्टर के पास भी नहीं जा सकती। कल्पना कीजिये कि सऊदी अरब में कोई लड़की या औरत घर पर अकेली हो और उसके चोट लग गयी हो। साहब जी, इस्लामी क़ानून के अनुसार उसकी विवशता है कि उसका कोई पुरुष अभिभावक आये और उसे डाक्टर के पास ले जाये अन्यथा वह घायल बाध्य है कि तड़प-तड़प कर, रो-रो कर मर जाये। बंधुओ! यह सभ्य समाज की मानवीय ज़िम्मेदारी { moral duty } है कि आप और हम इस्लाम के शिकंजे से मुसलमान समाज को मुक्ति दिलायें। इसके लिये अनिवार्य शर्त इस्लाम से मुसलमानों को परिचित कराना, उसकी सत्यता का मुसलमानों को अहसास कराना है। एक बार मुसलमान स्थिति को समझ गये तो इस्लाम में बदलाव ले आयेंगे। तुफ़ैल चतुर्वेदी

शनिवार, 21 अक्तूबर 2017

अनंत कुमार हेगड़े जी का टीपू सुल्तान की जयंती का बहिष्कार

तीन-चार सूचनाएं जानने, मनन करने और चिंतन की दिशा तय करने में सहायक होंगी। पहली यह कि केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने टीपू सुल्तान को बर्बर हत्यारा बताते हुए उसकी जयंती पर कर्नाटक सरकार द्वारा 10 नवंबर को किये जाने वाले कार्यक्रम से किनारा कर लिया है। उन्होंने कहा है कि कर्नाटक सरकार बर्बर हत्यारे, घृणित कट्टरपंथी और सामूहिक दुष्कर्म करने वाले को गौरवान्वित करने के शर्मनाक कार्यक्रम में मुझे आमंत्रित न करे। जिस पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री श्री सिद्धरमैया ने कहा है कि हेगड़े को ऐसा नहीं करना चाहिए था। उन्होंने मामले का राजनीतिकरण करने की निंदा की। साथ ही 18 वीं सदी के मैसूर के शासक टीपू सुल्तान को स्वतंत्रता सेनानी बताया। कहा कि टीपू ने अंग्रेज़ों के साथ चार लड़ाइयाँ लड़ीं। जिस पर भाजपा संसद प्रह्लाद जोशी ने टीपू को हिन्दू विरोधी, कन्नड़ विरोधी बताया। दूसरी यह कि कुछ दिन पहले मीडिया पर हिन्दू-मुस्लिम एकता की महान प्रतीक बताई जा रहीं वाराणसी की मुस्लिम महिलाओं, जिन्होंने दीपावली की पूर्व संध्या पर भगवान राम की आरती उतारी, को ईमान से ख़ारिज कर दिया गया है। दारुल-उलूम ज़करिया, सहारनपुर { दारुल उलूम की ढेरों शाखाएं हैं। इसे रक्तबीज ही जानिए और वैसा ही व्यवहार करने की व्यवस्था कीजिये } के उस्ताद और फ़तवा ऑन लाइन के चेयरमैन अरशद फ़ारूक़ी ने फ़तवा दिया है कि वह औरतें अपनी ग़लती मान कर कर दुबारा ईमान लायें। वह कलमा पढ़ कर लोगों को बतायें कि उन्होंने अपनी ग़लती की तौबा कर ली है। जिस पर श्री राम की आरती उतारने वाली नाज़नीन अंसारी जी ने दारुल उलूम के ख़िलाफ़ एफ़ आई आर करवाने की बात कही है। उन्होंने कहा है कि दारुल उलूम का कहना है कि जो महिलाएं श्री राम की आरती करती हैं उन्हें इस्लाम स्वीकार नहीं करता। दारुल उलूम कोई ठेकेदार नहीं, न ही उनके पास कोई अधिकार है इस तरह का आदेश देने का। उन्होंने सरकार से माँग की है कि दारुल उलूम की फंडिंग आदि की जाँच की जाये और इस संगठन पर ताला लगाया जाये, क्योंकि 2014 में जब सुप्रीम कोर्ट ने फ़तवे पर रोक लगा दी थी तो दारुल उलूम कैसे किसी के ख़िलाफ़ फ़तवा दे सकता है ? उनके अनुसार सवाल उठता है कि जब हिन्दू मज़ार पर जा कर चादर चढ़ा सकता है तो मुस्लिम श्री राम की आराधना क्यों नहीं कर सकते ? तीसरी यह कि अवैध खनन को ले कर चर्चित पूर्व एम एल सी हाजी इक़बाल ईमान से ख़ारिज कर दिए गए हैं। ग्लोबल विश्वविद्यालय के कैम्पस में स्थित आयुर्वेदिक कॉलिज में धन्वंतरि जयंती पर हवन-पूजन का आयोजन किया गया था। जिसमें हाजी इक़बाल ने भी आहुति डाली थी, जिसका वीडिओ सार्वजनिक हो गया। फ़तवा ऑन लाइन के चेयरमैन अरशद फ़ारूक़ी ने इन पर भी फ़तवा दिया है कि हाजी इक़बाल भी इस्लाम से ख़ारिज हैं और उन्हें भी तौबा करनी चाहिए और दुबारा कलमा पढ़ना चाहिए। चौथी और इनमें सबसे पुरानी मगर महत्वपूर्ण बात अटल बिहारी बाजपेयी जी का बौद्धिक है। कृपया YouTube खोलिये और Atal Bihari Speech About Battle Of Plasi डालिये। अद्भुत वक्ता अटल जी 6 मिनिट 51 सेकिंड के विडिओ में अपने पूरे फ़ॉर्म में हैं। इस बौद्धिक का प्रारंभ इस वाक्य से होता है। "प्लासी की लड़ाई में जितने लोग मैदान में लड़ रहे थे थे उससे ज़ियादा लोग मैदान के बाहर खड़े हो कर तमाशा देख रहे थे। लड़ाई का परिणाम सुनने की प्रतीक्षा कर रह थे। देश के भाग्य का निर्णय होने जा रहा था मगर उस निर्णय में सारा देश शामिल नहीं था........" इन घटनाओं की छानफटक की जाये तो तथ्य यह हाथ लगते हैं कि टीपू सुल्तान, अनंत कुमार हेगड़े, नाज़नीन अंसारी, अरशद फ़ारूक़ी, हाजी इक़बाल, अटल बिहारी बाजपेयी और ........को भी ले लीजिये, की दृष्टि देश और राष्ट्र पर अलग-अलग है। इसे इस तरह देखिये कि टीपू सुल्तान, अरशद फ़ारूक़ी, हाजी इक़बाल और ऐसे न जाने कितने लोगों के लिए महमूद ग़ज़नवी हीरो है। पाकिस्तान के कोर्स की किताबों में उसकी गौरव-गाथा पढ़ाई जाती है मगर अनंत कुमार हेगड़े, ........ और संभवतः अटल बिहारी बाजपेयी की दृष्टि में भी बर्बर हत्यारा, लुटेरा, घृणित है। टीपू सुल्तान अनंत कुमार हेगड़े जैसे बहुतों के लिये बर्बर हत्यारा, घृणित कट्टरपंथी, सामूहिक दुष्कर्म करने वाला पापी है मगर कर्नाटक सरकार उसकी जयंती मना रही है। प्लासी की लड़ाई पर विकीपीडिया पर जानकारी देखिये........ "प्लासी का युद्ध 23 जून 1757 को मुर्शिदाबाद के दक्षिण में 22 मील दूर नदिया जिले में गंगा नदी के किनारे 'प्लासी' नामक स्थान में हुआ था। इस युद्ध में एक ओर ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना थी तो दूसरी ओर थी बंगाल के नवाब की सेना। कंपनी की सेना ने रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में नबाव सिराज़ुद्दौला को हरा दिया था। किंतु इस युद्ध को कम्पनी की जीत नहीं मान सकते क्योंकि युद्ध से पूर्व ही नवाब के तीन सेनानायक, उसके दरबारी तथा राज्य के अमीर सेठ जगत सेठ आदि से क्लाइव ने षडंयत्र कर लिया था। नवाब की तो पूरी सेना ने युद्ध में भाग भी नहीं लिया था। युद्ध के फ़ौरन बाद मीर जाफ़र के पुत्र मीरन ने नवाब की हत्या कर दी थी। युद्ध को भारत के लिए बहुत दुर्भाग्यपूर्ण माना जाता है इस युद्ध से ही भारत की दासता की कहानी शुरू होती है।"........इसमें अटल जी वाली ही लाइन ली गयी है कि भारत में मुग़ल सत्ता और उसके अवशेष भारत के अस्ली शासक थे। यहाँ यह जानना उपयोगी होगा कि प्लासी की लड़ाई में अंग्रेज़ों के हाथों इस्लाम की हार के उपरांत सैकड़ों वर्षों बाद कोलकाता में सार्वजनिक दुर्गा-पूजा हो सकी थी जिसमें क्लाइव भी सम्मिलित हुआ। वर्तमान भौगोलिक दृष्टि से देखें तो उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल........ में हिंदु राजाओं की पराजय के बाद से ही हमारे पूर्वज पूजा नहीं कर सकते थे। इस्लामी सत्ता ने मंदिर बनाने, भग्न होते मंदिरों की मरम्मत पर रोक लगा दी थी। चैतन्य महाप्रभु जैसे अनेकों के सार्वजनिक कीर्तन करने पर कोड़ों से पीटे जाने के उल्लेख मिलते ही हैं। इस्लामियों द्वारा उन पर ही नहीं सामान्य हिन्दुओं पर गौ माँस के टुकड़े फेंके जाते थे। हिंदु तिलक नहीं लगा सकते थे। जनेऊ नहीं पहन सकते थे। इस्लाम हमें अपमानित कर जज़िया वसूलता था। हमारे विश्वविद्यालय नष्ट कर दिए गए थे। हमारी लड़कियों पर इस्लामियों द्वारा सार्वजनिक बलात्कार सामान्य बात थी। हमें इस्लामियों ग़ुलाम बना कर बाज़ारों में बेचा जाना सामान्य बात थी। चूँकि हिन्दू पीपल, वट वृक्ष की पूजा करते थे अतः शिर्क़, कुफ़्र होने के कारण इस्लामियों ने उन्हें यथासंभव काट डाला था। यहाँ प्रश्न उठता है कि राष्ट्रवादी शक्तियों के प्रमुख सार्वजनिक स्तम्भ को नवाब सिराजुद्दौला का अंग्रेज़ों द्वारा हराया जाना देश की पराजय क्यों लगा ? स्पष्ट है कि उस चिंतन धारा के लोगों और अनंत कुमार हेगड़े जैसे लोगों की राष्ट्र की समझ में मूल और बहुत बड़ा अंतर है। उस चिंतन धारा के लोग वही हैं जो मानते हैं कि यह राष्ट्र दुनिया भर से इकट्ठे हुए लोगों का कुनबा है। उनके लिए यह भांति-भांति के लोगों का मेला भर है। विषय यह नहीं है कि ऐसा मानने वाले वामपंथी हैं या राष्टवादी, विषय राष्ट्र और देश की ग़लत समझ का है। चूँकि निकटतम शासन अंग्रेज़ों का रहा है, 1947 में मिली कँटी-फटी स्वतंत्रता की यादें ताज़ा हैं अतः स्वभाविक रूप से अंग्रेज़ राष्ट्र के शत्रु थे। जिसने अंग्रेज़ों से लड़ाई लड़ी, जिसको अंग्रेज़ों ने प्रताड़ित किया वो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी है। चाहे वो टीपू जैसा बर्बर हत्यारा, घृणित कट्टरपंथी, सामूहिक दुष्कर्म करने वाला पापी हो। यहाँ यह गंभीर निवेदन करता चलूँ कि 1857 को भी इसी कसौटी के कारण स्वतंत्रता संग्राम कहा गया है कि वह अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ था। यह बात सिरे से ग़ायब कर दी गयी है कि अगर वो देश छोड़ कर चले जाते तो सत्ता कौन संभालता.......बर्बर हत्यारे मुगल बर्बर और उनके बग़ल -बच्चे ? टीपू जैसा इस्लामी घृणित कट्टरपंथी ? वह सारे लोग और उनकी मूल चिंतन धारा जिसने, जितनी बुराई सोची जा सकती है, तक हमें अपमानित, प्रताड़ित किया को भूला जा सकता है, भुला दिया जाना चाहिए। यहाँ यह सोचने की बात है कि जो चिंतन प्रणाली हिन्दुस्थान में कुफ़्र-शिर्क़ मिटाने, काफ़िरों-मुशरिक़ों की इबादतगाहों को ढाने {रामजन्मभूमि, कृष्णजन्म भूमि, काशीविश्वनाथ जैसे हज़ारों मंदिरों के तोड़ने के संदर्भ लीजिये}, काफ़िरों को ख़त्म करने, उनको ग़ुलाम बनाने आई थी, वह तो आज भी वैसी की वैसी है। 1947 में उसकी शक्ति बँट गयी अतः गाँधी-नेहरू के षड्यंत्र से हमारे हाथ आयी कँटी-फटी मातृभूमि में वो यह सब उतने बड़े पैमाने पर तो नहीं कर पा रही है मगर मुसलमानों को काफ़िरों-मुशरिक़ों के साथ जाने में रोक रही है। अनंत हेगड़े जी के साहस ने अवसर दिया है कि राष्ट्र को परिभाषित कीजिये। इतिहास की किताबों में आज भी सम्मान से पढ़ाये जाते सिद्धांत "गू खा तसले में" के गुलाम, ख़िलजी, तुग़लक़, सैयद, लोदी, मुग़ल वंश को भारत का शासक बताने की जगह आक्रमणकारी घुसपैठिये, बर्बर हत्यारे, घृणित कट्टरपंथी लिखिए, जो वो वस्तुतः थे। दारुल-उलूम ज़करिया के उस्ताद और फ़तवा ऑन लाइन के चेयरमैन अरशद फ़ारूक़ी उन हत्यारों के प्रशंसक इसी कारण हैं कि उन्होंने कुफ़्र, शिर्क़ मिटाया था और इस्लाम का बोलबाला किया था। वह नाज़नीन अंसारी, हाजी इक़बाल के ख़िलाफ़ इसी चिंतन के कारण फ़तवा देते हैं। अरशद फ़ारूक़ी और इस तरह के लोग इसी तर्क और कसौटी के कारण राष्ट्र के शत्रु हैं। उनको अंतिम परिणिति तक पहुंचाइये। तुफ़ैल चतुर्वेदी

बुधवार, 27 सितंबर 2017

सँसार की सबसे बड़ी ख़बर

हो सकता है आप इस छोटे से लेख पर सबसे बड़ी ख़बर का शीर्षक पढ़ कर हँसने लगें। सँसार की सबसे बड़ी ख़बर, इस्लामी उम्मा के आधे नाक़िस उल अक़्ल हिस्से, न न मैं नहीं कह रहा ये पोपट सरकार बल्कि चौपट सरकार और उनकी किताब का फ़रमान है, को सऊदी अरब में गाड़ी चलने की अनुमति मिल गयी है। दुनिया के लिये आख़िरी मुकम्मल दीन के दावा करने वालों की जमात के संरक्षक, वित्त-पोषक, प्रेरक { यहाँ भड़काऊ अर्थ लें } सऊदी अरब के शाह ने औरतों को गाड़ी चलाने की अनुमति दे दी है। सऊदी अरब में यह ख़बर सुन कर औरतें गाड़ी ले कर रात में ही सड़कों पर निकल आईं। 'आई एम माय ओन गार्जियन' जैसे हैश टैग सऊदी सोशल मिडिया पर छा गये। गाड़ी चलाना भर इन बदनसीबों को अपना गार्जियन बनने की ओर बढ़ता हुआ क़दम लग रहा है ? इससे उस घोर-घुटन, संत्रास, पीड़ादायक जीवन का अनुमान लगाइये जो क़ुरआन और हदीसों के पालन के नियम ने मुसलमानों के आधे हिस्से को सौंपा है। आज भी सऊदी अरब में लड़की अपने अभिभावक की अनुमति के बिना शादी नहीं कर सकती। काले रंग के पूरे शरीर को ढकने वाले अबाया नाम के वस्त्र को ढंके बिना किसी सार्वजनिक स्थान पर नहीं जा सकती। पुरुष अभिभावक के बिना स्त्री डॉक्टर के पास भी नहीं जा सकती। पुरुष अभिभावक की लिखित अनुमति के बिना पासपोर्ट नहीं बनवा सकती। पुरुष अभिभावक की अनुमति के बिना पहचान-पत्र नहीं बनवा सकती। किस रेस्त्रां के परिवारी सैक्शन में ही खाना खा सकती है। पुरुष गारंटर के बिना बिज़नेस नहीं कर सकती। पैतृक सम्पत्ति में लड़की को भाई से आधे भाग का ही अधिकार है। तलाक़ हो जाये तो लड़के के 7 साल और लड़की के 9 साल के होने से पहले उसे अपनी संतान को अपने पास रखने का अधिकार नहीं है। कोर्ट में दो औरतों की गवाही एक पुरुष के बराबर मानी जाती है { यह क़ुरआन का आदेश है } गाड़ी चलने की अनुमति देना कितना बड़ा साहसी क़दम है। स्त्री अभी तक ड्राइविंग लाइसेंस नहीं बनवा सकती थी। सऊदी अरब के शाह को अपने सीने पर पत्थर बल्कि पहाड़ रख कर यह निर्णय लेना पड़ा होगा। सँसार भर में मुल्ला जमात औरतों के गाड़ी चलाने को सामाजिक मान्यताओं का उल्लंघन मानती है। इस वाक्य का ख़ुलासा करें तो यह मुल्ला सोच बरामद होती है कि औरतें अगर मर्द की पहरेदारी के बिना गाड़ी चलायेंगी वो घर का सौदा-सुल्फ़........सब्ज़ी-गोश्त लेने, बच्चे को डॉक्टर के पास या ऐसे ही किसी आवश्यक काम से नहीं जाएँगी वो बदचलनी करने जाएँगी। यह वाक़ई तकलीफ़ देने वाली बात है। मुल्ला जिन मदरसों में पढ़े हुए हैं वहां का वातावरण स्त्री-विरोधी और पुरुष-प्रेमी होता है। स्पष्ट है यह उनके अधिकारों का हनन है और अपने अधिकार छिनवाना कौन चाहेगा ? यह जानना ठीक होगा कि सँसार में ग़ुलामी और लौंडियाँ रखने को ग़ैरक़ानूनी क़रार देने वाला आख़िरी देश कौन सा है ? साहब जी, सऊदी अरब जी हाँ सऊदी अरब मानवता का अंतिम कैंसर था। सँसार भर के दबाव के बाद इस देश के शासकों ने ग़ुलामों और लौंडियाँ रखने को ग़ैरक़ानूनी क़रार दिया था। यह निर्णय आसान नहीं था कि यह मुहम्मद की सुन्नत थी और इस्लामी दृष्टि में मुहम्मद का किया-धरा अपने जीवन में उतारना सवाब का काम है। उसका उल्लंघन कौन करे ? सऊदी अरब के शाह ने यही कर दिखाया है। साहब जी मैं तो यह ख़बर पढ़ते ही फूट-फूट कर रोने लगा। इतना भावुक हो गया हूँ........पता नहीं आज यह आँसू रुकेंगे कि नहीं। सऊदी अरब के बादशाह आपकी जय हो। इस चिंतन की जड़ ही काट डालिये, पत्ते नोचने से कुछ नहीं होगा। वरना सभ्य समाज आपकी काट डालेगा तुफ़ैल चतुर्वेदी

रविवार, 24 सितंबर 2017

विजयदशमी पर व्यक्तिशः शस्त्र-पूजन

बंधुओ, नवरात्र चल रहे हैं और विजयदशमी आने ही वाली है। क्या आपने विजयदशमी पर व्यक्तिशः शस्त्र-पूजन की तैयारी कर ली है ? नम्र निवेदन है कि इस बार हम सब व्यक्तिशः अर्थात परिवार के सभी अंग माता, पिता, भाई, बहन, बेटा, बेटी, नौकर, चाकर सहित अपने-अपने निजी शस्त्र का पूजन करें। परिवार 10 लोगों का हो तो 10 शस्त्र पूजे जायें। सरकार से आग्नेयास्त्र के लाइसेंस ले कर विजयदशमी पूजन की असरकार व्यवस्था कीजिये। धारदार शस्त्र के लिये बड़े गुरुद्वारों में तलवारें मिलती हैं। सर्वलौह नाम की ख़ासी मुड़ी हुई बिना धार की खड्ग 1200-1300 की मिल जाती है। धार स्वयं लगवानी होगी। शस्त्र का पूजन हम पर अनिवार्य है। महाकाल अवसर दे ने ही वाले हैं। सन्नद्ध होइये। प्रतापी पूर्वजों के पगचिन्हों पर चलिये। पुण्य-पंथ प्रशस्त अवश्य होगा। महाकाल कृपा करेंगे। तुफ़ैल चतुर्वेदी

मंगलवार, 20 जून 2017

तीन सूचनाएं बल्कि चार घोषणाएँ

तीन सूचनाएं बल्कि चार घोषणाएँ जानने योग्य हैं। पहली..... लंदन में दो जगह मस्जिदों से निकलते हुए नमाज़ियों पर अंग्रेज़ चालकों ने गाड़ी चढ़ा दीं। यह उसी तरह हुआ जिस तरह अभी कुछ दिन पूर्व टेम्स नदी पर in the name allah कह कर इस्लामी आतंकवादियों ने अंग्रेज़ों को मारा था। यह लोग चिल्ला रहे थे कि वह सभी मुसलमानों को मार डालेंगे। दूसरी घटना..... अमरीका के वर्जीनिया क्षेत्र में नाबरा हुसैन नाम की लड़की अपने साथियों के साथ रोज़ा खोलने के बाद टहल रही थी। उसके गिरोह पर एक कार सवार ने भद्दी बातें कहीं। यह लोग भाग कर स्थानीय मस्जिद में छुप गये। नाबरा हुसैन पीछे रह गयी। बाद में ढूंढने पर उसकी लाश रिजटॉप के तालाब में पायी गयी। फ़ेयरफ़ैक्स काउंटी की पुलिस ने इस अपराध में इस हत्या के लिये डार्विन को गिरफ़्तार कर लिया है। तीसरी घटना..... महामहिम राज्यपाल तथागत राय का बयान है जिसमें उन्होंने कहा है कि बिना गृहयुद्ध के भारत में इस्लामी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। इन सूचनाओं को घोषणा कहने का कारण है। पहली दो घटनाओं के योद्धा अपना लक्ष्य घोषित ही कर रहे थे अतः यह सूचनाएं घोषणा का दर्जा रखती हैं। नाबरा हुसैन का वध किस लिये हुआ ? क्या यह 9-11 को इस्लामियों द्वारा ध्वस्त किये गए ट्विन टावर के ख़ाली स्थान जिसे ग्राउंड ज़ीरो कहा जाता है, पर मस्जिद स्थापित करने के भरसक प्रयासों का परिणाम है ? ज्ञातव्य है कि इसके बाद अमरीका में इस्लाम के ख़िलाफ़ के लहर चल निकली है। यह इस्लामी परम्परा के अनुसार ही है कि जहाँ-जहाँ इस्लाम ने काफ़िरों के मंदिर, चर्च, सिनेगॉग इत्यादि तोड़े हैं वहां इस्लाम की ताक़त दिखने के लिये मस्जिदें बनायीं जायें। दिल्ली में क़ुतुब मीनार के प्रांगण में स्थित क़ुव्वतुल इस्लाम मस्जिद प्रत्यक्ष प्रमाण है। इस मस्जिद में शिलालेख ही स्थापित है कि इस मस्जिद का निर्माण 27 हिन्दू व जैन मंदिरों को तोड़ कर उनके अवशेषों पर किया गया है। राम-जन्मभूमि, कृष्ण-जन्मभूमि, काशी-विश्वनाथ मंदिरों का विध्वंस स्वयं इस्लामी इतिहास से प्रमाणित है। त्रिपुरा के राज्यपाल महामहिम तथागत राय अपनी बेबाकी के लिये प्रसिद्द हैं। देशद्रोही याक़ूब मेनन के जनाज़े में सम्मिलित हज़ारों इस्लामियों के संदर्भ में उन्होंने कहा ही था कि पुलिस, प्रशासन को इन लोगों पर दृष्टि रखनी चाहिये। यह लोग संभावित आतंकवादी हैं। क़ुरआन में वर्णित आख़िर इस चिंतन को इस्लामी ही नहीं पढ़ते बल्कि अमुस्लिम भी पढते हैं। ओ मुसलमानों तुम ग़ैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { 9-123 } और तुम उनको जहां पाओ क़त्ल करो { २-191 } काफ़िरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { 8-39 } ऐ नबी ! काफ़िरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो. उनका ठिकाना जहन्नुम है { 9-73 और 66-9 } अल्लाह ने काफ़िरों के रहने के लिये नर्क की आग तय कर रखी है { 9-68 } उनसे लड़ो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं, न आख़िरत पर; जो उसे हराम नहीं समझते जिसे अल्लाह ने अपने नबी के द्वारा हराम ठहराया है. उनसे तब तक जंग करो जब तक कि वे ज़लील हो कर जज़िया न देने लगें { 9-29 } मूर्ति पूजक लोग नापाक होते हैं { 9-28 } जो कोई अल्लाह के साथ किसी को शरीक करेगा, उसके लिये अल्लाह ने जन्नत हराम कर दी है. उसका ठिकाना जहन्नुम है { 5-72 } तुम मनुष्य जाति में सबसे अच्छे समुदाय हो, और तुम्हें सबको सही राह पर लाने और ग़लत को रोकने के काम पर नियुक्त किया गया है { 3-110 } चौथी सूचना बल्कि घोषणा यानी इन तीनों पर अब मेरा आंकलन यह है कि " इस्लाम की सच्चाई को लोग समझने लगे हैं और उससे निबटने के प्रयास करने लगे हैं" अब जज़िया लौटाने, नबी की हराम-हलाल की छानफटक के दिन हैं। मनुष्य जाति का सबसे अच्छा समुदाय कौन सा है इसे मनुष्य समाज स्वयं तय करना चाहता है। ईमान और आख़िरत प्रारंभ में ही मानवता की कसौटी पर कसा जाना चाहिए था। देर आयद दुरुस्त आयद। तुफ़ैल चतुर्वेदी

रविवार, 11 जून 2017

****अल्लाह के लिये****

****अल्लाह के लिये**** शनिवार यानी परसों रात लंदन में टेम्स नदी पर स्थित लंदन ब्रिज पर एक वैन में सवार आतंकियों ने पहले तो यथासंभव कुचल कर लोगों को मारा। जब वैन रेलिंग से टकरा कर रुक गयी तो सवार लोग लम्बे-लम्बे चाक़ू निकाल कर बोरो स्ट्रीट मार्किट की ओर दौड़ गए। वहां पर जो उनके सामने आया, उस पर उन्होंने चाक़ू से घातक वार किये। चाक़ू लहराते हमलावर चिल्ला रहे थे 'दिस इस फ़ॉर अल्लाह'। घटना की ज़िम्मेदारी अभी तक किसी ने नहीं ली है मगर आई.एस. ने शनिवार को अपने समर्थकों को ऑनलाइन संदेश भेज कर ट्रक, चाक़ू और बंदूक़ों से हमले करने की अपील की थी। कोई सामान्य व्यक्ति जो अपनी रोज़ी-रोटी के लिए रोज़ अपने बच्चे को चूम कर, अपनी पत्नी को गले लगा कर घर से निकलता है, अचानक वहशी दरिंदा कैसे बन सकता है ? एक ऑनलाइन मेसेज पढ़ते ही लोगों में एक पल में इतना बड़ा बदलाव कैसे आ सकता है ? मनुष्य से राक्षस बनने की यात्रा एक क्षण में कैसे हो सकती है ? अब मानव सभ्यता को बच्चे के मानसिक विकास के लिए विकसित की गयीं विभिन्न प्रणालियों की परिपक्वता पर फिर से विचार करना ही पड़ेगा। आख़िर मानव सभ्यता ने विकास की यात्रा में ऐसे आदेशों को पढ़ने-मानने की छूट कैसे दे रखी है ? क्या मनुष्यता इसके ख़तरे समझने की क्षमता खो बैठी है ? ओ मुसलमानों तुम गैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { 9-123 } और तुम उनको जहां पाओ कत्ल करो { २-191 } काफिरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { 8-39 } ऐ नबी ! काफिरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो. उनका ठिकाना जहन्नुम है { 9-73 और 66-9 } यह हत्यारे जिस पुस्तक क़ुरआन को ईश्वरीय पुस्तक मानते हैं और उससे प्रभावित हैं यह उसकी पंक्तियाँ हैं। उसके अनुकरणीय माने जाने वाले लोगों ने इन हत्यारों की तरह ही शताब्दियों से ऐसे हत्याकांड किये हैं बल्कि वही इन हत्यारों के प्रेरणा स्रोत हैं। प्रथम विश्व युद्ध के समय तुर्की ने 15 लाख से अधिक आर्मेनियन ईसाइयों को इस्लाम की दृष्टि में काफ़िर होने के कारण मार डाला। 1890 में अफ़ग़ानिस्तान के क्षेत्र काफ़िरिस्तान के काफ़िरों को जबरन मुसलमान बनाया गया और उसका नाम नूरिस्तान रख दिया गया। विश्व भर में 1400 वर्षों से की जा रहीं ऐसी अनंत घटनाओं के प्रकाश में स्पष्ट है कि इस्लाम उन सबसे, जो मुसलमान नहीं है, नफ़रत करता है और उन्हें मिटाना चाहता है। इसके बावजूद इंग्लैंड के राष्ट्र-राज्य ने लंदन में शरिया ज़ोन बनाने की अनुमति दी। शरिया ज़ोन क्या होते हैं ? शरिया ज़ोन वह क्षेत्र ही नहीं है जहाँ सुअर का मांस नहीं बेचा जा सकता या जहाँ केवल हलाल मांस ही बेचा जा सकता है बल्कि जहाँ इस चिंतन के अनुसार जीवनयापन करना क़ानूनी और अनिवार्य है। जहाँ इस चिंतन की विषबेल को फैलने के लिये क़ानूनी संरक्षण दे दिया गया है। इस क्षेत्र में कोई मुसलमान अपनी पत्नी को पीटता है तो पुलिस हस्तक्षेप नहीं कर सकती चूँकि पत्नी को पीटने के आदेश क़ुरआन में हैं। वहां इस्लामी अगर किसी काफ़िर लड़की को घेर कर उसके साथ तहर्रूश { इस्लामियों द्वारा काफ़िर लड़कियों पर सामूहिक और सार्वजानिक बलात्कार, इसका स्वाद कुछ समय पूर्व जर्मनी ने भी चखा था } करेंगे तो यह उनका इस्लामी अधिकार होगा। ब्रिटेन की कांग्रेस जैसे ही चिंतन की कंजर्वेटिव पार्टी के नेता डेविड कैमरून ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि उन लोगों ने अपने निश्चित वोट बैंक बनाने के लिये पाकिस्तान, बांग्लादेश से इस्लामी शांतिपुरूष इम्पोर्ट किये थे। जो बेल बोई थी अब उसके फूल आने लगे। यहाँ स्वयं से भी एक सवाल पूछना है। अंग्रेज़ों को कोसने से क्या होगा। यही तो 1947 में भारत के विभाजन के बाद हुआ था। भारत इस्लाम के कारण बांटा गया था। इस्लाम प्रजातान्त्रिक भारत में नहीं रहना चाहता था चूँकि अब हर व्यक्ति के वोट की बराबर क़ीमत होती। इससे उसके वर्चस्व की सम्भावनायें कम हो जानी थीं। अब उसके बाक़ी काफ़िरों को रौंदने, उनकी औरतों को लौंडी बनाने, उन्हें ग़ुलाम बनाने, जज़िया वसूलने का ऐतिहासिक इस्लामी अधिकार समाप्त हो रहा था। इस्लामियों ने बड़े पैमाने पर दंगे किये। कांग्रेसी नेतृत्व ने इस्लामी गुंडागर्दी का मुक़ाबला करने और हिन्दू पौरुष को संरक्षण देने की जगह देश का विभाजन स्वीकार कर लिया। इस्लाम के जबड़ों में देश का बड़ा हिस्सा फेंक दिया गया मगर अपने लिये सिक्काबंद वोटबैंक बनाने की नियत से गाँधी और नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने विभाजन के समर्थकों को भारत में ही रोक लिया। हमने भी कश्मीर में इसका परिणाम देख लिया है। यही कश्मीर में हुआ है। हज़ारों हिन्दू वहां मारे गए। हज़ारों के साथ बलात्कार हुआ मगर केवल एक पर भी मुक़दमा आज तक नहीं चला। बंगाल, असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, केरल, तमिलनाडु जैसे क्षेत्रों में भी विषबेल पर फूल आने लगे हैं। इस विषबेल को जड़ से उखाड़ने के लिये सन्नद्ध होने के अतिरिक्त सभ्य विश्व के पास कोई उपाय नहीं है और इसे तुरन्तता से उखाड़ा जाना चाहिए। यह वैचारिक विषबेल है। इसकी जड़, पत्ती, तना, डाली, छाल यहाँ तक सूखे पत्ते भी नष्ट दिए जाने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है। तुफ़ैल चतुर्वेदी