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गुरुवार, 28 जुलाई 2016

:::::::::::::मिस्र के तहरीर चौक से देवबंद के रणखंडी मंदिर तक

मिस्र के तहरीर चौक से:----अभी कुछ वर्ष पहले ही मिस्र में तहरीर चौक से प्रारम्भ हुई क्रांति में उमड़े जनज्वार के परिणामस्वरूप मुस्लिम ब्रदरहुड सत्ता में आया। इसने ऐसे-ऐसे क़ानून लागू किये, ऐसा विकट मरकट-नृत्य { बंदर-नाच } किया कि जनता त्राहि-त्राहि कर उठी और सेना का दुबारा समर्थन कर सत्ता में बिठाया। इसके बाद जनरल फ़तह अल सीसी ने इस्लामी विश्व के सबसे प्रतिष्ठित केंद्र अल अजहर यूनिवर्सिटी गये। यहाँ यह जानकारी आवश्यक है कि अल अजहर यूनिवर्सिटी क्या है ? यहाँ से कैसे-कैसे फ़तवे आये हैं इसको जानने से इस केंद्र की मानसिकता बल्कि मानसिक सीमा-क्षमता का अनुमान लग सकेगा। अल अज़हर ने फ़तवे दिए हैं। 


मुसलमान औरतों का केला, खीरा ख़रीदना हराम है। इन फलों का आकार के लिंग जैसा होने के कारण उनमें मानसिक भ्रष्टता आती है। 

किसी औरत को समुद्र में स्नान नहीं करना चाहिये। समन्दर पुल्लिंग है और स्त्री के शरीर के स्पर्श से उसमें उत्तेजना आ सकती है। 

किसी भी आयु की बच्ची से शादी की जा सकती है बशर्ते वह मर्द के बदन का बोझ बर्दाश्त कर ले। 

इन मूढ़ लोगों का ऐसी चित्र-विचित्रताओं के साथ-साथ काफ़िर वाजिबुल क़त्ल, क़त्ताल फ़ी सबीलिल्लाह { अल्लाह की राह में क़त्ल करो } जिहाद फ़ी सबीलिल्लाह { अल्लाह की राह में जिहाद करो } में भी अटूट विश्वास है। इसी दर्शन को व्यवहार में फैलाने में मुस्लिम ब्रदरहुड लगा था। इस दर्शन की किताबों क़ुरआन, हदीस इत्यादि का यहाँ अध्ययन किया जाता है। 


जनरल फ़तह अल सीसी ने अल अज़हर यूनिवर्सिटी के छात्रों, उलमा के बीच कहा कि यह असम्भव है कि 160 करोड़ मुसलमान 600 करोड़ अमुस्लिमों को ख़त्म करने की इच्छा रखें। { यही अस्ली समस्या है और यही संसार भर में अशांति का कारण है } जनरल फ़तह अल सीसी ने इस जिहादी विचारधारा के प्रसार पर विभिन्न प्रतिबन्ध लगाये हैं। उलमा को आदेश दिये गए हैं कि वह सरकारी मस्जिदों में सरकार द्वारा अधिकृत उपदेश ही दें। यहाँ तर्क-बुद्धि तो यह कहती है कि सरकारी मस्जिदों में सरकारी उपदेश ही देने से यह समस्या समाप्त नहीं हो सकती। ये उलमा-मुल्ला निजी चर्चा में जो कुछ कहेंगे उसे कैसे रोका जायेगा ? 



यह समस्या मुल्ला-जनित नहीं है। देखना होगा यह हत्यारा दर्शन आ कहाँ से रहा है ? उसकी जड़ कहाँ है ? केवल पत्तियां नोचने से जड़ नष्ट नहीं हो पायेगी ? 160 करोड़ मुसलमानों का 600 करोड़ अमुस्लिमों को ख़त्म करने की इच्छा रखना ही यह समझने के लिये पर्याप्त है कि समस्या बहुत गंभीर है। इस पागलपन को उपजाने वाली विषबेल की जड़ काटने की जगह पत्तियों के नोचने से कुछ नहीं होगा। जैसे ज़ाकिर नायक के टीवी चैनल को बंद करना भी विषबेल की पत्तियां नोचना है। ऐसे हर ज़ाकिर की खाट खड़ी होना, उसकी ऐसी दुर्गति होना कि अगला ज़ाकिर बनने की इच्छा रखें वाले की रूह तक कांप उठे इसका हल है। 160 करोड़ मुसलमान 600 अमुस्लिमों को ख़त्म करने की इच्छा रखें यह असम्भव ही नहीं है बल्कि असहनीय है। ऐसी हर खोपड़ी को भेजे सहित भयावह रूप से दण्डित किये बिना विश्व के शांतिपूर्ण जीवन का मार्ग प्रशस्त नहीं होगा। मुल्ला-उलमा जब तक स्थानीय स्तर पर रगड़े नहीं जायेंगे कुछ बदलाव नहीं आने का। 


देवबंद के रणखंडी मंदिर तक:-----परसों देवबंद नगर के रणखंडी रोड पर शास्त्री चौक के पास बने मंदिर में मूर्तियां तोड़ दी गयीं। सादिक़ नाम का 21 वर्षीय युवक पकड़ लिया गया है और राहत ख़ान और ताहिर लुहार फ़रार हो गये। नई घटना नहीं है और पहले भी ऐसा होता रहा है। अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे देशों में यह कुकृत्य सैकड़ों वर्षों से होता आया है। नयापन केवल इसमें इतना है कि सादिक़ ने यह दुस्साहस अच्छी भरी-पूरी हिन्दू बस्ती में किया है। राक्षसी धावे अब अपने संख्या-बल की चिंता किये बिना होने लगे हैं। यह गंभीर चिंता का विषय है। कोई दूसरे पक्ष पर अंधाधुंध नहीं टूट पड़ता। ऐसा तभी सम्भव है जब आक्रमणकारी को अपनी विजय अथवा सुरक्षित लौट आने या शत्रु के घोर कायर होने की आश्वस्ति हो। कृपया सोचिये कि हमारे व्यवहार में क्या ऐसा है कि राक्षसी धावे बढ़ते जा रहे हैं। आक्रमण के लिये शत्रु की क्षमता से पहले हमारी अक्षमता-अकर्मण्यता ज़िम्मेदार है। 

तुफ़ैल चतुर्वेदी 





मंगलवार, 26 जुलाई 2016

:::::::::::::::: My name is khan and I am....... not or a terrorist ?
आज के दैनिक जागरण के अंतिम पृष्ठ पर हैडिंग है "ब्रिटिश पब में इस्लाम लिखा जैकेट उतरवाया" विस्तृत रिपोर्टिंग यह है "संसार में मुस्लिम समुदाय के साथ भेदभाव की घटनायें बढ़ती जा रही हैं। ताज़ा मामले में पब में एक स्कूल टीचर से इस्लाम लिखे जैकेट को उतारने को कहा गया। कुछ दिनों पहले न्यूज़ीलैंड में एक महिला को हिजाब के बिना नौकरी के लिये आवेदन करने को कहा गया। अंतिम पंक्तियाँ इस तरह हैं "पब के एक कर्मचारी ने उनसे { नूरुल से } कहा कि वहां मौजूद लोगों को इससे असुविधा हो रही है, लिहाज़ा इसे उतार लें या फिर यहाँ से जायें। नूरुल ने बताया कि इससे वो भौंचक्के रह गये। उन्होंने कहा, सरनेम के चलते मेरे साथ भेदभाव किया जा रहा था। इस घटना से मैं बहुत परेशान था। मेरे मुस्लिम होने से लोगों का इस तरह चिंतित होना मेरे लिये ख़ौफ़नाक है"। ध्यान रखिये कि यह ब्रिटेन में हुआ है जहाँ के लोगों ने इसी समस्या के कारण स्वयं को योरोपीय यूनियन से अलग कर लिया है।
मित्रो, ये कोई नई बात नहीं है। आपको कुछ माह पहले, ग ग ग गलती बोलने वाले हकले अभिनेता के तथाकथित बयान का उल्लेख ध्यान होगा। जिसमें इसके अनुसार भारत में असहिष्णुता बढ़ती जा रही है। उस ने इस विषय को पैसे कमाने का मौक़ा ताड़ कर My name is khan and I am not terrorist बना मारी। फिर भी मेरे लिये किसी के साथ भी ऐसा व्यवहार बहुत पीड़ादायक है। किसी को भी ख़ान, सिद्दीक़ी, अली, मुहम्मद, उस्मान, मुस्तफ़ा, अबू बकर, उमर फ़ारूक़, उस्मान....... होने के कारण भेदभाव का सामना करना पड़े यह सभ्य समाज के लिये बहुत बुरी बात है। हम निष्पक्ष-तटस्थ नियमों-क़ानून द्वारा संचालित होते हैं। सभ्य विश्व किसी बादशाह, अमीर या नवाब की मनमानी सनकों से नहीं चलता।
एक और समाचार; 6 जुलाई के हिंदुस्तान एक्सप्रेस के अनुसार मुस्लिमों के सबसे पवित्र महीने रमजान में इस्लामिक आतंकियों ने जम कर हमले किये। इस महीने में कम से कम 1671 जानें गयीं। एक महीने के अंदर दुनिया के 31 देशों में आतंकवादियों ने 308 हमले किये। इसके लिये ज़िम्मेदार मुस्लिम ब्रदरहुड, सलफ़ी, ज़िम्मा इस्लामिया, बोको हराम, जमात-उद-दावा, तालिबान, ईस्ट तुर्किस्तान इस्लामी मूवमेंट, इख़वानुल मुस्लिमीन, लश्करे-तैय्यबा, जागृत मुस्लिम जनमत-बांग्ला देश, इस्लामी स्टेट, जमातुल-मुजाहिदीन, अल मुहाजिरो, दौला इस्लामिया जैसे प्रकट और गुप्त सैकड़ों संगठनों के नाम ध्यान कीजिये। अब एक सवाल ख़ान, सिद्दीक़ी, अली, मुहम्मद, उस्मान, मुस्तफ़ा, अबू बकर, उमर फ़ारूक़, उस्मान जैसे नामों वाले देशवासियो !विश्ववासियो ! से करना चाहूंगा।
क्या कभी आपको सूझा है कि इसी रमज़ान के केवल एक महीने में मरने वाले 1671 लोगों के लिये कोई एक दुखप्रदर्शन, शांति सभा की जाये। अपने नामों वालों के अलावा आप जिस समाज में रहते हैं उस को यह अहसास कराया जाये कि आप इन संगठनों के साथ नहीं हैं। भारत, पाकिस्तान, बांग्ला देश, इंडोनेशिया, कंपूचिया, थाई लैंड, मलेशिया, चीन, अफ़ग़ानिस्तान, ईरान, ईराक़, सीरिया, लीबिया, नाइजीरिया, अल्जीरिया, मिस्र, तुर्की, स्पेन, रूस, इटली, फ़्रांस, इंग्लैंड, जर्मनी, डेनमार्क, हॉलैंड, यहाँ तक कि इस्लामी देशों से भौगोलिक रूप से कटे संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में भी आतंकवादी घटनाएँ हो रही हैं, होती आ रही हैं। ऐसे हजारों साल से होते चले आ रहे बर्बर हत्याकांडों के विरोध में आप कभी खड़े हुए हैं ? आपने कभी भी इन राक्षसों और इनकी प्रेरणास्रोत राक्षसी विचारधारा से स्वयं को अलग माना है ? आपने कभी ऐसा सोचा भी है ? या आप उस समय हकले अभिनेता की तरह ड ड ड ड ड डा डा डायलॉग भूल गया का बहाना करते हैं ?
जब आप संसार भर में किसी दूसरे मुसलमान से मिलते समय बिरादरे-इस्लाम से मुसाफ़ा { इस्लामी ढंग से हाथ मिलाना } करते हैं। उसके कारण आश्वस्ति पाते हैं तो इस्लाम से दुखी-खिन्न लोगों की बेचैनी भी तो आपकी होगी। आप मज़हब के कारण सारे विश्व में राष्ट्रीयता का विरोध करते हैं। आपके सारे प्रमुख मौलाना स्वयं कहते हैं कि इस्लाम उम्मा { इस्लामी बंधुत्व } की भावना रखता है। इस्लाम की दृष्टि में सारे मुसलमान भाई हैं, एक हैं। इस्लाम का राष्ट्रवाद में विश्वास नहीं है तो राष्ट्रवाद में विश्वास रखने वाले लोग आपको विदेशी एजेंट समझते हैं तो क्या ग़लत करते हैं ? ऐसे लोग आपको अपने देशों में नहीं देखना चाहते हैं तो इसमें ग़लत क्या है ? आपके जैसे नाम वाले जिस किताब, जिस विचारधारा के कारण इतने हिंसक हैं उसे सभ्य समाज समझता है। इंटरनैट के काल में सब कुछ उपलब्ध है। सभ्य समाज उसे पढ़ भी रहा है। आप और आप जैसे बहुतों के यह कहने "आतंकवादी मुसलमान नहीं हैं" लोग समझते हैं कि उनको कहाँ से प्रेरणा मिल रही है। लोग सच जानते हैं।
ओ मुसलमानों तुम गैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { 9-123 }
और तुम उनको जहां पाओ कत्ल करो { 2-191 }
काफिरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { 8-39 }
ऐ नबी ! काफिरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो. उनका ठिकाना जहन्नुम है { 9-73 और 66-9 }
अल्लाह ने काफिरों के रहने के लिये नर्क की आग तय कर रखी है { 9-68 }
उनसे लड़ो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं, न आखिरत पर; जो उसे हराम नहीं जानते जिसे अल्लाह ने अपने नबी के द्वारा हराम ठहराया है. उनसे तब तक जंग करो जब तक कि वे जलील हो कर जजिया न देने लगें { 9-29 }
तुम मनुष्य जाति में सबसे अच्छे समुदाय हो, और तुम्हें सबको सही राह पर लाने और गलत को रोकने के काम पर नियुक्त किया गया है { 3-110 }
जो कोई अल्लाह के साथ किसी को शरीक करेगा, उसके लिये ने जन्नत हराम कर दी है. उसका ठिकाना जहन्नुम है { 5-72 }
आप इससे पूरी तरह समझ लीजिये कि अब बात ग ग ग गलती हो गयी, ड ड ड ड ड डा डा डायलॉग भूल गया से बहुत आगे आ गयी है। विश्व भर का सभ्य समाज खौल रहा है। उसकी मुट्ठियां भिंची हुई हैं और वो तमतमाया हुआ है। आप काल की पदचाप सुन पा रहे होंगे। सारे संसार में आप जैसे नाम वालों के विरोध में ज़बरदस्त अंतर्धारा बह रही है। जगह-जगह ये दिखाई भी दे रही है। जर्मनी में नक़ाब पहने हुए मोटरसाइकिल सवार नवयुवकों ने सीरियाई, ईराक़ी शरणार्थियों के गोलियां मारनी शुरू कर दी हैं। इन हिंसक आक्रमणों के विरोध में विश्व भर में युद्ध के नगाड़े बज रहे हैं। सभ्य समाज इस किताब और किताब से निकली विचारधारा का उपाय जिस दिशा में तलाश कर रहा है उसे सम्भवतः देख पा रहे होंगे। समाचार की अंतिम पंक्ति पर ध्यान दीजिये। "मेरे मुस्लिम होने से लोगों का इस तरह चिंतित होना मेरे लिये ख़ौफ़नाक है "
अर्थात सभ्य संसार तय करने के कगार पर हैं कि ख़ौफ़ ही इस समस्या का इलाज है। आप पुरज़ोर और स्पष्ट दिखाई देने वाले प्रयास से इस समस्या से स्वयं को दूर नहीं करेंगे तो आप पायेंगे कि सभ्य समाज आपसे दूरी बरत रहा है। वो आपकी दुकान पर नहीं जायेगा। आपको काम नहीं देगा। शायद आपको माल बेच देगा मगर आपसे कुछ ख़रीदेगा नहीं यानी आपसे आर्थिक दूरी बरतेगा। सभ्य समाज आपके जैसे नाम वालों का भरपूर सैन्य प्रतिकार तो करेगा ही करेगा मगर ध्यान रखें एक जैसे नामों के कारण आप अभी इसकी चपेट में आ सकते हैं। आप अगर सभ्य समाज के साथ ताल ठोक कर इन राक्षसों के विरोध में आगे नहीं आये तो आप भी अपने जैसे नाम वालों के साथ ख़ौफ़ का शिकार बन जाने को अभिशप्त होंगे।
तुफ़ैल चतुर्वेदी

सोमवार, 18 जुलाई 2016

बुर्क़ा, हिजाब, नक़ाब

बुर्क़ा, हिजाब, नक़ाब ....... ये सारे अरबी मूल के शब्द हैं. ये 1400 वर्ष पुरानी इस्लामी परंपरा है। इन्हीं का समानार्थक एक और शब्द पर्दा है। ये फ़ारसी मूल का शब्द है और शब्दकोष में इनके अर्थ आड़, ओट, लज्जा, लाज, शर्म, संकोच, झिझक, हिचकिचाहट आदि हैं। सुनने में इन शब्दों से सामान्य लाज का भाव उभरता है
मगर इन शब्दों के सही अर्थ समझने हों तो स्वयं को पूरे क़द की एक बोरी में बंद कर लीजिये। इस बोरी के सर पर इस तरह गांठ लगी हुई होनी चाहिये कि गर्दन मोड़ना भी संभव न हो। कहीं दायें-बाएं देखना हो तो गर्दन मोड़ने की जगह पूरा घूमना पड़े। केवल आँखों का हिस्सा खुला होना चाहिये बल्कि आँखों के आगे भी जाली लगी हो तो सबसे अच्छा रहेगा। बाहर की हवा आने-जाने का कोई रास्ता नहीं होना चाहिए बल्कि अपनी अंदर की हवा के भी बाहर आने-जाने का रास्ता नहीं होना चाहिए।
बिलकुल ऋतिक रौशन की फिल्म 'कोई मिल गया' के अंतरिक्ष से उतरे, बोरी में बंद प्राणी 'जादू' की तरह। फिर भर्रायी हुई आवाज़ में 'जादू' की तरह धूप-धूप पुकारिये। जब ऐसा कर चुकें तो धूप-धूप बोलना भी बंद कर दीजिये और केवल तरसी हुई निगाहों से जाली के पार की दुनिया को देखिये। हो गए न रोंगटे खड़े ? सोचने भर से आप को सन्नाटा आ गया। अब उन औरतों की कल्पना कीजिये जिन्हें 10-12 बरस की आयु से इस घनघोर घुटन में फेंक दिया जाता है।
इसका तर्क ये दिया जाता है कि किसी लड़की या औरत को देख कर पुरुष में कुत्सित भाव जागृत हो सकता है। काम भाव केवल स्त्री को देख कर पुरुष के मन में ही जागृत होता है ? अगर ऐसा है तो अभियुक्त पुरुष पर कार्यवाही की जानी चाहिये। ये तो अभियुक्त को सजा देने की जगह पीड़ित की दुर्गति करना है। फिर काम का भाव सामान्य मानवीय प्रवृत्ति है। ये पुरुष को देख कर स्त्री के मन में भी जागृत हो सकता है। तो क्या पुरुष भी बुर्क़ा, हिजाब, नक़ाब, पर्दा करें ?
वैसे तो किसी सामान्य मदरसे में जा कर वातावरण देखिये तो आप पाएंगे कि वहां तो पुरुष को देख कर पुरुष के मन में जागृत होने का विचार भी चलता है। पाकिस्तान के कराची के मदरसे में एक बार आग लग गयी थी जिसमें किशोर आयु के बच्चे जल कर मर गए। कारण ये था कि उनको वरिष्ठ छात्रों से बचाव के लिए ताला-बंद करके रखा जाता था।
चिड़ियाघर में भी जानवर पिंजरों में रखे जाते हैं मगर ऐसी मनहूस घोर-घुटन उनके नसीब में भी नहीं होती। फिर ये भी है कि उन जानवरों को उनके साथी जानवरों ने इस घुटन पर मजबूर नहीं किया। उस मानसिक दबाव की कल्पना कीजिये जहाँ औरतें अपने ही परिवार, समाज के पुरुषों के दबाव में इस वीभत्सता की स्थिति को स्वीकार कर लेती हैं और चलती-फिरती जेलों की सी हालत में जीती हैं।

शनिवार, 9 जुलाई 2016

अटल बिहारी बाजपेयी जी की कविता के क्रम में मेरी कुछ पंक्तियाँ

हिन्दू जीवन हिन्दू तन-मन रग-रग हिन्दू मेरा परिचय

उपनिषद्-पुराण महाभारत वेदामृत पान किया मैंने 
अपने पग काल-कंठ पर रख गीता का ज्ञान दिया मैंने 
संसार नग्न जब फिरता था आदिम युग में हो कर अविज्ञ
उस कालखंड का उच्चभाल मैं आर्य भट्ट सा खगोलज्ञ 
पृथ्वी के अन्य भाग का मानव जब कहलाता था वनचर 
मैं कालिदास कहलाता तब मेघदूत की रचना कर
जब त्रस्त व्याधियों से हो कर अगणित जीवन मिट जाते थे
अश्वनि कुमार, धन्वन्तरि, सुश्रुत मेरे सुत कहलाते थे


कल्याण भाव हर मानव का मेरे अंतरमन का किसलय 
हिन्दू जीवन हिन्दू तन-मन रग-रग हिन्दू मेरा परिचय




मेरी भृकुटि यदि तन जाये तीसरा नेत्र मैं शंकर का 
ब्रह्माण्ड कांपता है जिससे वह तांडव हूँ प्रलयंकर का
मैं रक्तबीज शिरउच्छेदक काली की मुंडमाल हूँ मैं
मैं इंद्रदेव का तीक्ष्ण वज्र चंडी की खड्ग कराल हूँ मैं 
मैं चक्र सुदर्शन कान्हा का मैं कालक्रोध कल्याणी का
महिषासुर के समरांगण में मैं अट्टहास रुद्राणी का 
मैं भैरव का भीषण स्वभाव मैं वीरभद्र की क्रोध ज्वाल
असुरों को जीवित निगल गया मैं वह काली का अंतराल


देवों की श्वांसों से गूंजा करता है निश-दिन वह हूँ जय 
हिन्दू जीवन हिन्दू तन-मन रग-रग हिन्दू मेरा परिचय





मैं हूँ शिवि,बलि सा दानशील मैं हरिश्चंद्र सा दृढप्रतिज्ञ
मैं भीष्म-कर्ण सा शपथधार मैं धर्मराज सा धर्मविज्ञ
मैं चतुष्नीति में पारंगत मैं यदुनंदन, यदुकुलभूषण 
मैंने ही राघव बन मारे मारीच-ताड़का-खर-दूषण
मैं अजय-धनुर्धन अर्जुन हूँ मैं भीम प्रचंड गदाधारी 
अभिमन्यु व्यूहभेदक हूँ मैं भगदत्त समान शूलधारी 
मैं नागपंचमी के दिन यदि नागों को दूध पिलाता हूँ 
तो आवश्यकता पड़ने पर जनमेजय भी बन जाता हूँ 


अब भी अन्याय हुआ यदि तो कर दूंगा धरती शोणितमय 
हिन्दू जीवन हिन्दू तन-मन रग-रग हिन्दू मेरा परिचय





शत-प्रबल-खड्गरव वेगयुक्त आघातों को मैंने झेला
भीषण शूलों की छाया में मेरा जीवन पल-पल खेला
संसार-विजेता की आशा मेरे ही आगे धूल हुई 
यवनों की वह अजेय क्षमता मेरे ही पग पर फूल हुई
मेरी अजेय असि की गाथा संवत्सर का क्रम सुना रहा
यवनों पर मेरी विजयकथा बलिदानों का क्रम बता रहा
पर नहीं उठायी खड्ग कभी मैंने दुर्बल-पीड़ित तन पर
अपने भाले की धार न परखी मैंने आहत जीवन पर



इतिहास साक्षी दुर्ग नहीं, हैं बने ह्रदय मेरा आलय
हिन्दू जीवन हिन्दू तन-मन रग-रग हिन्दू मेरा परिचय





युग-युग से जिसे संजोये हूँ बाप्पा के उर की ज्वाल हूँ मैं
कासिम के सर पर बरसी वह दाहर की खड्ग विशाल हूँ मैं
अस्सी घावों को तन पर ले जो लड़ता है वह शौर्य हूँ मैं
सिल्यूकस को पददलित किया जिसने असि से वह मौर्य हूँ मैं
कौटिल्यह्रदय की अभिलाषा मैं चन्द्र गुप्त का चन्द्रहास
चमकौर दुर्ग पर चमका था उस वीर युगल का मैं विलास
रणमत्त शिवा ने किया कभी निश-दिन मेरा रक्ताभिषेक
गोविन्द, हकीकत राय सहित जिस पथ पर पग निकले अनेक


वो ज्वाल आज भी धधक रही है तो इसमें कैसा विस्मय
हिन्दू जीवन हिन्दू तन-मन रग-रग हिन्दू मेरा परिचय


बर्मा के बौद्ध भिक्षु पूज्य अशिन बिराथु के चरणों में 


मैं शुद्ध, बुद्ध, चैतन्य-आत्मा अंतर का वैज्ञानिक था 
जो व्योम-ज्वाल बन कर उड़ता जाये ऐसा वैमानिक था 
मैं शांति अहिंसा के कारण महलों को तज कर वन निकला 
मेरे पीछे-पीछे हिंसा से व्याकुल जन-जीवन निकला 
गांधार, चीन, ईरान, स्याम, बर्मा, श्रीलंका आलिंगित 
हर ओर शांति की ध्वजा, हर इक धरती पर मेरे पग चिन्हित 
धीरे-धीरे सारा भूमण्डल ही अनुगामी हो आया 
हर आहत पीड़ा से व्याकुल मानव ने मुझको अपनाया 


तुमने मेरी प्रतिमाओं से जड़वाए अपने शौचालय 
बदला लेने को आतुर हूँ तो है इसमें कैसा विस्मय 

हिंदू जीवन हिंदू तन-मन रगरग हिंदू मेरा परिचय 

तुफ़ैल चतुर्वेदी 

बुधवार, 6 जुलाई 2016

........ख़लीफ़ा अबू बकर अल बग़दादी का ख़लीफ़ा मुस्तअसिम के पथ पर गमन

मुहावरे भाषा के बढे हुए नाख़ून होते हैं। लम्बे समय तक एक तय शब्द समूह का प्रयोग कर समाज उसे विशिष्ट अर्थवत्ता, गुणवत्ता, मारकता प्रदान करता है। मुहावरों का प्रयोग घने अन्धकार में बिजली की कौंध की तरह होता है जिनसे दूर तक अर्थ स्पष्ट हो जाता है। इन्हीं मुहावरों में से एक बुरी मौत मरने के लिए '....... की मौत मरना' है। मौत सदैव ही अप्रिय अरुचिकर घटना है। उसे न तो महिमामण्डित करने का कुछ अर्थ होना चाहिए न उसे वीभत्स बनाने का कोई कारण, फिर भी समाज में इस सिलसिले के शहीद, हुतात्मा, बलिदानी और ....... की मौत मरना जैसे शब्द और मुहावरे चलन में हैं तो इसका कोई गंभीर कारण अवश्य होना चाहिये।


बंधुओ ! इसका कारण समाज के हित-अहित यानी समष्टि के हित-अहित का विचार है। भयानक बर्फीली दुर्गम चोटियों पर.…… भीषण गर्मी से झुलसते हुए बीहड़ रेगिस्तान में.……अथाह-अगाध समुद्र में .…… देश की रक्षा करते हुए शत्रु की गोली खा कर मरने वाला सैनिक कोई बहुत शांत, सहज मौत नहीं मरता। उसे भी वही पीड़ा होती है जो संभवतः आई एस आई एस के सरगना अबू बकर अल बगदादी को हुई होगी मगर हर मृतक सैनिक को प्रत्येक राष्ट्र इसी कारण शहीद कहता है, समाज उसकी अंत्येष्टि में इसी लिए उमड़ पड़ता है कि उसके प्राण देश की रक्षा में गए हैं। ये मृत्यु को आरामदेह तो नहीं बनता मगर देश के लिये प्राण देने की प्रेरणा देता है। इसी तरह एड़ियां रगड़-रगड़ कर एकाकी मरना आई. सिस. के सरगना अबू बकर अल बगदादी जैसे लोगों का भाग्य होता है।


अबू बकर अल बगदादी का मरना कोई बहुत बड़ी या प्रमुख घटना नहीं है। ऐसे लोग ऐसी ही मौत मरते हैं। अफगानिस्तान की पहाड़ियों में दुर-दुर करते जीवन से भाग कर पाकिस्तान में बीबियों और पोर्नोग्राफी की सी.डी. के ढेर में छिप कर रह रहे ओसामा को मछलियों की चीर-फाड़ नसीब हुई। इस या इसके जैसे लोग इसी मृत्यु को प्राप्त होते हैं। विशेष बात उसकी दुर्गति होने के पीछे छिपे कारण हैं। आइये उन पर विचार किया जाये।



ईराक में टिगरिस नदी के किनारे बसा समारा नगर एक समय में अब्बासी खिलाफत का केंद्र रह चुका है। इसी नगर के देहाती क्षेत्र में बगदादी पैदा हुआ। शांत स्वभाव का बगदादी अपने अध्ययन के समय एकाकी रहने वाला था। अल बगदादी में अपने शुरुआती जीवन में फुटबॉल के लिए एक जुनून था। 2003 तक वह बगदाद के पश्चिमी किनारे पर एक निर्धन बस्ती में स्थानीय मस्जिद से जुड़े एक छोटे से कमरे में रहता था। वहां उसे शांत, कम बोलने, कम मिलने-जुलने वाला माना जाता था। अपने काम से काम रखने वाला अबू बकर अल बगदादी अकेले समय बिताता था।



यहाँ रहते हुए उसके जीवन में एक बदलाव का क्षण आया और उसने बगदाद के इस्लामी विश्वविद्यालय में प्रवेश ले लिया। इस्लामी विश्वविद्यालय से उसने बी.ए., एम.ए.और इस्लामी अध्ययन में पी.एच.डी. प्राप्त की। यही शिक्षण वो कारण था जिसने अबू बकर अल बगदादी के जीवन में इतना बड़ा परिवर्तन ला दिया। सामान्य शांत रहने वाला व्यक्ति, फुटबॉल के लिए दीवाना जिहाद का दीवाना बन गया। उसकी चिंत्तन-प्रणाली बदल गयी और वो पेले, मैरिडोना, बैकम, लोथार मथायस जैसे विश्व प्रसिद्ध फुटबॉल खिलाडियों की जगह अबू बकर, उमर फारूक जैसे इस्लामी खलीफाओं के लिए दीवाना हो गया। उसके जीवन के अन्य सारे रस सूख गए। क़त्ताल फी सबीलिल्लाह……जिहाद फी सबीलिल्लाह उसका जीवन दर्शन हो गया। अमुस्लिमों के लिए घृणा से भरी बातें, जीवन शैली उसका ध्येय बन गयी। क़ुरआन और हदीसों का ये दर्शन उसका जीवन दर्शन बन गया।


ओ मुसलमानों तुम ग़ैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { 9-123 }
और तुम उनको जहां पाओ क़त्ल करो { २-191 }
काफ़िरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { 8-39 }
ऐ नबी ! काफ़िरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो. उनका ठिकाना जहन्नुम है { 9-73 और 66-9 }
अल्लाह ने काफ़िरों के रहने के लिये नर्क की आग तय कर रखी है { 9-68 }
उनसे लड़ो जो न अल्लाह पर ईमान लाते हैं, न आख़िरत पर; जो उसे हराम नहीं समझते जिसे अल्लाह ने अपने नबी के द्वारा हराम ठहराया है. उनसे तब तक जंग करो जब तक कि वे ज़लील हो कर जज़िया न देने लगें { 9-29 }
मूर्ति पूजक लोग नापाक होते हैं { 9-28 }
जो कोई अल्लाह के साथ किसी को शरीक करेगा, उसके लिये अल्लाह ने जन्नत हराम कर दी है. उसका ठिकाना जहन्नुम है { 5-72 }
तुम मनुष्य जाति में सबसे अच्छे समुदाय हो, और तुम्हें सबको सही राह पर लाने और ग़लत को रोकने के काम पर नियुक्त किया गया है { 3-110 }



इस चिंतन को कार्यान्वित करने के लिए उसने 2003 में ईराक में अमेरिकी हस्तक्षेप के बाद सुन्नी लड़ाकों का समूह बनाया और उसकी शरीयत समिति के प्रमुख के रूप में कार्य किया। 2006 में उसने अपने सुन्नी लड़ाकों के समूह को मुजाहिदीन शूरा परिषद (एम.एस.सी.) में मिला दिया। 2006 में इराक के इस्लामी राज्य {आई.सिस.} के रूप में एम.एस.सी. के नाम बदलने के बाद, अल बगदादी आई.सिस. की शरीयत समिति का पर्यवेक्षक और समूह के वरिष्ठ सलाहकार परिषद क एक सदस्य बन गया। ईराक के इस्लामी राज्य {आई.सिस.} को ईराक में अल-कायदा के रूप में जाना जाता है। अल बगदादी को इस्लामी राज्य { आई.सिस. } के नेता अबू उमर अल बगदादी की मृत्यु के बाद 16 मई 2010 को आई.सिस. का नेता बनाया गया। अबू बकर अल बगदादी ने खुद को मुसलमानों की दुनिया के नेता घोषित कर दिया और उसके हिमायतियों ने संसार भर के मुसलमानों को उसका आदेश मानने, उसका समर्थन करने के लिए के लिए कहा। अपनी मृत्यु तक के इस काल में अबू बकर अल बगदादी ने योरोप में इस्लामी खिलाफत स्थापित करने के इरादे जताये। स्पेन को दुबारा मुसलमानों की आधीनता में लाने की बड़ मारी। रोम को इस्लामी केंद्र बनाने की लम्बी हाँकी।


अबू बकर अल बगदादी अक्टूबर 2014 में गठबंधन बलों द्वारा शुरू की तीव्र बमबारी अभियान के कारण गंभीर रूप से घायल हुआ और अब उसकी मौत की सूचना मिली है। इसकी पुष्टि केवल ईरान कर रहा है मगर इसे झूठा मानने का कोई कारण नहीं है, चूँकि आगे-पीछे ये होना ही था। तलवार को जीवन दर्शन मानने वाले तलवार के द्वारा ही मारे जाने के लिए अभिशप्त होते हैं। इसकी पक्की पुष्टि तो तभी संभव है जब खांटी इस्लामी लड़ाकों के प्रिय तरीके से उसका सर काट कर भाले पर घुमाया जाये अन्यथा ऐसे समाचारों की प्रामाणिक पुष्टि कभी संभव नहीं है। 'मर गया और दफना दिया गया' ही ऐसे लोगों का भाग्य है। किसी विश्व-विख्यात नेता के देहावसान की तरह से लाखों लोगों के सम्मिलित होने, लाखों लोगों की शोक-वेदना के साथ उसका अंतिम संस्कार तो होने से रहा बल्कि दफनाते समय भी उसके गिने-चुने हिमायतियों को इसकी आशंका सता रही होगी कि कहीं फिर विमान बम न बरसाने लगें और उनकी हड्डियों का भी कीर्तन न हो जाये।


अबू बकर अल बगदादी ही यजदी समूहों के नरसंहार का आधार था। सोशल मिडिया में इसी के हत्यारों द्वारा शिया समूहों, ईसाइयों, यजदियों की गर्दनें काटने , मरते हुए लोगों के सरों पर ठोकरें मारते लोगों के पैशाचिक वीडियो बनाये-भेजे गए। ऐसी जघन्य हत्याओं के समय अल्लाहो-अकबर के नारे लगाते लोगों के उन्मादी whatsapp इसी के समूह की करतूतें हैं। शिया, ईसाई, यजदी लड़कियों के जंजीरों में बांध कर बेचने की मंडियां इसी ने लगवायी थीं। जिहाद के विस्तृत दर्शन के रूप में शत्रु पक्ष की स्त्रियों को लौडी { sex slave } बनाया जाना वैसे तो मूल इस्लामी ग्रंथों में ही है मगर इस शताब्दी में इस घोर निंदनीय इस्लामी व्यवस्था का दुबारा चलन इसी की प्रेरणा से हुआ था। मुंबई का आरिब अपने तीन दोस्तों अमन, फहद और साहिम के साथ आई.सिस. के लड़ाकों की यौन-सेवा से तंग आ कर भारत वापस भाग आया। उसके दुर्गति करवा कर लौटने के पीछे 'जिहादियों की हर तरह से खिदमत करनी चाहिए' इसी का दर्शन है।


ये भी संभव है कि उसके जीवित बच जाने की अफवाहें उड़ाई जाएँ। ये भी संभव है कि वो इस हमले में जीवित बच जाये मगर उसके नसीब में आगे-पीछे यही निन्दित मृत्यु है। भारतीय परम्परा में मृतक सम्मान पाने का अधिकारी है। हमारा समाज दुष्ट से दुष्ट व्यक्ति का उसके देहांत के बाद सम्मान करता है या चुप लगा जाता है, मगर इस सामान्य-शांत जीवन जीने वाले व्यक्ति का जिस उपद्रवी विचारधारा के कारण रूपांतरण हुआ है उसकी भर्त्सना, निंदा न करने से उसे बढ़ावा मिलता है। ऐसे महादुष्टों की और उन्हें उपजाने, पनपाने वाली विचारधारा की भर्त्सना आवश्यक है। एक-आध दिन में ओसामा बिन लादेन जी के मानसिक सम्बन्धी दिग्विजय जी सार्वजनिक मंच पर असह्य वेदना दिखाते हुए प्रकट होने ही वाले होंगे। उनके निंदा के लिए भी तैयार रहिये।


तुफैल चतुर्वेदी

मंगलवार, 5 जुलाई 2016

घोड़े की टाँग औऱ राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा की मज़बूती

देहरादून में घोड़े की टाँग टूटने का तीजा हो गया यानी तीन दिन बीत गये। उठावनी हो गयी, रंडरोवना बंद हुआ और कौए दूसरी सभा में कांव-कांव करने चले गये। चौबीस घंटे के टी वी चैनलों को आख़िर कुछ तो दिखाना होगा। यहाँ बहुत से दर्शकों सहित मुझे भी ये बात सूझती है कि मीडियाकर्मियों रिपोर्टिंग में एक ख़ास पैटर्न दिखाई देता है।


ये लोग कभी संघ के मुखपत्र पांचजन्य में गौ हत्यारे को मृत्युदंड के वैदिक आदेश पर छाती पीटते हैं। कभी अख़लाक़ की बीबी को गले लगा कर ढाढस बंधाने का प्रयास करते हैं। कभी शुद्ध कूड़ा लिखने वाले लेखकों के जुगाड़ बैठा कर प्राप्त किये गए साहित्य अकादमी पुरस्कार को बिहार चुनाव के लिये लौटाने पर कुकरहाव करते हैं। कभी संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जी के आरक्षण के बयान पर हंगामा करते हैं। कभी हैदराबाद में छात्र की आत्महत्या को ले कर फें फें करके मुंह से झाग निकलने लगते हैं। कभी जे एन यू में भारत के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी आयोजित करने वाले राष्ट्रद्रोहियों को ले कर डकराते हैं मगर नासिर, आमिर, मयस्सर सहित 15-20 बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा डाक्टर पंकज नारंग की पीट-पीट कर की गयी हत्या जैसे विषय पर इनके मुंह में तत्काल दही जम जाता है। उस समय नयी-नवेली बहू की तरह घूंघट काढ़ कर कैमरामैन को ससुर समझ लेते हैं और उस तरफ पर्दानशीं हो जाते हैं, कोई बाइट नहीं देते। इसका भयानक तात्पर्य यह है कि हम खंडित भारत के बचे-खुचे भारतवासी अपनी धरती पर भी सुरक्षित नहीं हैं।


देहरादून में भाजपा ने उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार के विरोध में प्रदर्शन का आह्वान किया था। प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिये विधानसभा से पहले पुलिस ने बैरिकेटिंग की हुई थी। इस तरफ़ लोग इकट्ठा थे। नारेबाजी हो रही थी। कुछ भाजपा विधायक कार्यकर्ताओं सहित विधान सभा से निकले और बैरिकेटिंग की दूसरी ओर पुलिस वाली तरफ़ नारेबाज़ी करने लगे। वहां तैनात घुड़सवार पुलिस ने उन लोगों पर घोड़े दौड़ा दिये। इस हड़बोंग में हल्द्वानी के भाजपा कार्यकर्त्ता प्रदीप बोरा ज़मीन पर गिर गये। मंसूरी के भाजपा विधायक गणेश जोशी ने उसे बचाने के लिये घुड़सवार के हाथ से बेंत छीन लिया और घोड़े को पीछे हटाने के लिये उसके मुंह के आगे ज़मीन पर बेंत पटकने लगे। घोड़ा बिदक कर पीछे हटने लगा। सड़क के किनारे पी डब्लू डी के लगाये हुए पार्टीशन के भूतपूर्व पिलर थे। यानी पिलर तो हटाया जा चुका था मगर उसका ज़मीन में धंसा हुआ ढांचा शेष था। पीछे हटते हुए घोड़े का पैर उसकी मुड़ी हुई लोहे की पट्टी में फंस गया। घोड़े ने पैर बाहर निकालने के लिये ज़ोर लगाया तो पैर टूट गया। ख़ून बहने लगा। प्रदर्शन रुक गया। भाजपा कार्यकर्ता और पुलिस वालों ने मिल कर घोड़े का पैर बाहर निकाला मगर मीडिया और कोंग्रेसियों ने इसे भाजपा विधायक गणेश जोशी द्वारा घोड़े की तांग तोड़ना बना दिया।


थोड़ी सी समझ वाले किसी भी व्यक्ति को समाचार देखते समय ही सूझ रहा था कि घोड़े की टांग डंडा मार कर नहीं तोड़ी जा सकती। घोड़े की टांग तोड़ने के लिये डंडा उपयुक्त शस्त्र ही नहीं है फिर पशुओं के इतिहास में कभी भी कोई घोड़ा गाँधीवादी नहीं हुआ है। उसकी पिछली टाँग पर कोई डंडा मरेगा तो वो दूसरी टांग सामने करने की जगह मारने वाले के ऐसी दुलत्ती लगायेगा कि तबियत हरी हो जाएगी। ये पुलिस लाइन का घोडा है। ये एक दुलत्ती से शेर का जबड़ा तोड़ सकता है। इस फांय-फांय में एक बहुत अच्छी बात सामने ये भी आई है कि अपने कार्यकर्ता को बचने के लिये विधायक सामने आये और उन्होंने प्राणप्रण से प्रयास किया। काश यही समझ डाक्टर पंकज नारंग पर हुए हमले के समय उसके पड़ौसियों में भी होती तो पांसा पटल गया होता।


कुछ प्रश्न आप सब से, कृपया इस पर गहन विचार कीजिये। परिवार के लोगों, सम्बन्धियों, मित्रों, परिचितों से बात कीजिये। आप आरामदायक घर बनते हैं। फ़र्नीचर ख़रीदते हैं, मोटरसाइकिल-कार ख़रीदते हैं। डिनर-सैट, बर्तन, क़ालीन, आभूषण ख़रीदते हैं। प्लाट लेते हैं। फैक्ट्री लगते हैं। विवाह करते हैं। परिवार बढ़ाते हैं। यदि बुरा समय आया तो आपके पास परिवार, घर, फ़र्नीचर, मोटरसाइकिल-कार, डिनर-सैट, बर्तन, क़ालीन, आभूषण, फैक्ट्री की सुरक्षा की क्या व्यवस्था है ? ऐसा नहीं है कि राष्ट्र पर बुरा समय नहीं आया। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अभी हाल ही में हम कश्मीर से मार कर निकले गए हैं। ऐसा अवसर फिर आया तो आप अपनी व अपने परिवार की रक्षा घर, फ़र्नीचर, मोटरसाइकिल-कार, डिनर-सैट, बर्तन, क़ालीन, आभूषण, फैक्ट्री, से करेंगे ?

आपने अपनी सुरक्षा पुलिस के भरोसे छोड़ दी है। हमारे राष्ट्र के पास आतंरिक सुरक्षा के लिये पर्याप्त बल नहीं है। किसी भी राष्ट्र के पास आंतरिक सुरक्षा के लिये पर्याप्त बल कभी भी नहीं होता। आख़िर कोई राष्ट्र अपने सौ करोड़ लोगों की रक्षा के लिये दस करोड़ का सैन्य बल नहीं बन सकता। यदि कोई आंतरिक विप्लव हो तो समाज को ही उससे निबटना पड़ता है। समाज की रक्षा समाज के पौरुष पर ही निर्भर करती है। पता नहीं डाक्टर पंकज नारंग के परिवार के लोगों और उनके पड़ौसियों को ये पता है या नहीं कि संविधान हमें आत्मरक्षा में हमलावर के प्राण लेने की भी छूट देता है। मगर साहब जी इसके लिये घर में अस्त्र-शस्त्र चाहिए होते हैं। आपके पास तो नाख़ून भी नहीं हैं जिनसे नृसिंह अवतार की तरह राक्षस का पेट फाड़ा जा सके। तो चलिये नाख़ून बढ़ाते हैं


तुफ़ैल चतुर्वेदी

सभ्य समाज और राक्षसी चिंतन

सभ्य समाज एक दिन में इस स्थिति में नहीं आया. सैकड़ों वर्षों के विकास के कारण समाज इस स्थिति में पहुंचा है कि उसे सभ्य कहा जा सकता है. आपसी सौहार्द के नियमों में लगातार कांट-छांट और बढ़ोत्तरी, प्रत्येक जीवन को समान महत्व देने के नियम, स्त्रियों के समान अधिकार, व्यक्ति या समूह के विशेषाधिकारों का निषेध, प्रजातंत्र और प्रत्येक व्यक्ति के वोट का समान महत्व जैसी अनेक बातों का अनुसरण करते-करते यानी जीवन शैली में लगातार परिवर्तन करते-करते समाज ऐसी स्थिति में पहुंचा है जिसे अपेक्षाकृत सभ्य कहा जा सकता है. ये बातें परंपरागत भी हैं और वर्तमान काल में तय की हुई भी. इन्हें विशेषकर इस कारण लिखित रूप दिया गया है कोई भी इनकी मनमानी अवहेलना न कर सके।

फिर भी सभ्य समाज को पीड़ा देने वाले व्यक्ति और समूह मिल ही जाते हैं. इसी कारण इन्हें असामाजिक तत्व कहा जाता है. इनकी असभ्यता की रोकथाम के दंड-विधान की व्यवस्था है. कभी-कभी ये आचरण इतने बुरे होते हैं समाज मृत्यु-दंड की व्यवस्था करता है मगर ये दंड मनमर्ज़ी पर नहीं होता. इसके लिये विभिन्न चरणों की सजग न्याय-प्रणाली होती है. मृत्यु-दंड भी बिरले ही दिया जाता है. अब तो विभिन्न देशों में मृत्यु-दंड पर रोक लगायी जा चुकी है. इसका तर्क ये है कि मनुष्य को जीवन का मौलिक अधिकार है और ये अधिकार बुरे से बुरे मनुष्य से भी नहीं छीना जा सकता. अधिकतम उस व्यक्ति को उसकी अंतिम साँस तक जेल में बंद कर समाज से दूर रक्खा जा सकता है. ये सर्वमान्य और सर्वस्वीकृत तथ्य हैं. सभ्य समाज की इस स्थिति के बावजूद आइये अपनी जानकारी में कुछ बढ़ोत्तरी की जाये।

ईराक में  एक अल्पसंख्यक समूह है. जिसे वहां यज़ीदी पुकारा जाता है. यज़ीदी समाज मूलतः कुर्द है. ये लोग उस क्षेत्र के सबसे पुराने निवासी हैं और पारसी, ईसाई और इस्लाम के संक्षिप्त रिवाजों को मानते हैं. उनके अनुसार ये रिवाज मूलतः उनके हैं जिन्हें दूसरे समाजों ने अपना लिया है. ये ईसाईयों की तरह बपतिस्मा करते हैं, मुसलमानों की तरह खतना करते हैं और पारसियों की तरह अग्नि को पूज्य मानते हैं. इन सब बातों के बाद भी ये अपनी जड़ें अरबी नहीं मानते. ये मलक ताऊस अर्थात मोर फ़रिश्ते को भी पवित्र मानते हैं. इस समाज के पीछे इन दिनों आई एस आई एस के आतंकवादी पड़े हुए हैं और औरतों बच्चों सहित 500 लोगों को क़त्ल कर चुके हैं. इस समाज के लोगों की सामूहिक कब्रे मिलीं हैं. इन कब्रों में यजीदी लोगों को जीवित ही दफना दिया गया।


ये दंड मुस्लिम सत्ता के काल में भारत में भी दिया जाता था. दसवीं पादशाही गुरु गोविन्द सिंह जी महाराज के 2 साहबज़ादों को दीवार में चुन कर मार डाले जाने का प्रसंग प्रत्यक्ष है. ऐसा नहीं है कि ये हत्या कांड अभी हो रहे हैं. 18वीं, 19वीं शताब्दी में तुर्की खिलाफत के काल में { जिसे प्रथम विश्व युद्ध में ख़त्म कर दिया गया था और इसे वापस लाने के लिए कांग्रेस और गांधी जी ने भी ज़ोर लगाया था } भी इनका 72 बार नरसंहार हुआ था. अब ये ६ लाख से भी कम रह गये हैं.  इन्हीं लोगों को आई एस आई एस के गुंडे मार धमका कर उस देश से जो मूलतः इनका ही है, भगा देना चाहते हैं. यही इस्लामी आतंकवादियों ने कश्मीर में किया था. यही बंगाल और असम के बांग्ला देश से लगते सीमावर्ती क्षेत्रों में हो रहा है. सभ्य समाज इस स्थिति पर इन परिस्थितियों पर मौन है।

ख़ामोशी या निस्तब्धता केवल कह पाने कि असमर्थता ही नहीं होती. सच के पक्ष में हाथ उठाने में भय की अनुभूति, समाज की नसों में शताब्दियों से प्रसारित और व्याप्त डर भी खामोश कर देता है. अन्यथा कोई कारण नहीं कि ईराक के इन हत्याकांडों पर भारतीय प्रेस और राजनैतिक दल मौन रहें. इसी तरह अंग्रेजी प्रेस तो पीड़ितों के पक्ष को थोड़ा समझने का प्रयास कर भी रहा है मगर हिंदी मीडिया को तो सांप सूंघ गया है. इतिहास के कूड़ेदान में फेंके जा चुके वामपंथी और तालिबानी मानसिकता वाले लोग हमेशा की तरह इस्लामी आतंकवादियों और आई एस आई एस के पक्ष में बोल रहे हैं।

सामान्य घरेलू तथा पड़ौस के झगड़े भी इस तरह शांत नहीं होते. और इस विषय में तो आक्रामक स्वयं को मनमाने तर्क से सही और दूसरे को गलत ठहरा रहे हैं. क्या मुझे अधिकार है कि मैं किसी के एकेश्वरवाद को गलत ठहराऊं ? यदि नहीं तो आप मेरी उपासना पद्यति की आलोचना करने वाले और मुझे वाजिबुल-क़त्ल ठहरने वाले कौन हैं. हम सबके जीवन में कुछ न कुछ ऐसा मिल जायेगा जो दूसरे की दृष्टि में गलत होगा. तो क्या सभ्य संसार ऐसी हत्यारी सोच को केवल इस लिए सहता रहेगा कि वो किसी की निजी उपासना पद्यति का हिस्सा है ? यदि ये मौन रहने की जगह है तो सभ्य समाज ने नरमांस-भक्षण करने वाले समूहों को क्यों नष्ट कर दिया ? उनकी सोच में और इस सोच में केवल मांस खाने का ही तो अंतर है अन्यथा मनुष्य की हत्या तो उससे भी कहीं अधिक अर्थात समूह की, की जा रही है. नरमांसभक्षी तो केवल खाने के लिये मारते थे यहाँ तो इन हत्याकांडों के धर्म ग्रन्थ में तर्क भी ढूंढे जाते हैं. ये कैसी आस्था-प्रणाली है जो अपने कुढब मापदंडों पर संसार को जांचती है. आंकती है और फिर उसे हांकती है. उसकी आस्थाएं तार्किक हैं या विचित्र, उसके मापदंड सभ्य हैं या जंगली उसे इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता. चलिए ऐसा ही सही चूँकि हर उत्पाती के पास अपने उत्पात को सही ठहरने के लिये तर्क होते हैं मगर सभ्य समाज जो इससे प्रभावित है उसे क्या हो गया है ?

इतिहास के विद्यार्थियों को ध्यान होगा माओ ने एक समय स्टालिन को एक बर्बर सलाह दी थी कि रूस को अमरीका पर हमला कर देना चाहिए. उसके पीछे उसकी सोच थी कि चीनी लोग विश्व की सबसे बड़ी जनसँख्या हैं. युद्ध के उपरांत जितने भी लोग बचेंगे उनमें चीनी लोगों का बाहुल्य होगा. अतः युद्ध के बाद संसार पर चीनी मूल के लोगों का शासन हो जायेगा. अब यही सोच सऊदी अरब के वहाबी शासकों और उनसे पैसा पाने वाले अल क़ायदा, बोको हराम, लश्करे-तय्यबा, आई एस आई एस, हमास जैसे संगठनों की है. तार्किक रूप से इस सोच को पराजित करने के साथ-साथ इनका बीज नष्ट करने के अतिरिक्त सभ्य समाज के पास और कोई विकल्प नहीं है।


हत्वा वा प्राप्यसे स्वर्गं जित्वा वा भोक्षसे महीम
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृत निश्चयः { भगवद-गीता }


तुफैल चतुर्वेदी

बिसाहड़ा के निर्दोष बच्चों के प्रति हमारा कर्तव्य

Account Details
Sanjay Rana, Syndicate bank, Account no 87672200060453
IFSC code SYNB0008767, Bisahara distt Gautambudh nagar

मित्रो, बिसाहड़ा के अख़लाक़ के घर से बरामद किये गये मांस की रिपोर्ट आ गई है और वह गौमांस निकला है। जब अख़लाक़ और उसके परिवार ने गौहत्या का पाप किया है तो उन पर् इस सज्ञेय अपराध के लिये मुक़दमा चलना चाहिये। उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य मंत्री श्री अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री कोष से जो लगभग एक करोड़ रुपये और नोएडा में तीन फ़्लैट इन अभियुक्तों को दिये हैं वो सरकार को ज़ब्त कर लेने चाहिये। मुख्यमंत्री कोष अभियुक्तों की सहायता के लिये नहीं होता।

अभी तक इस विषय पर मेरा योगदान केवल यह था कि मैंने पांचजन्य में इस विषय पर एक लेख लिखा था। जिसको ले कर प्रेस में कई दिन तक हंगामा मचता रहा था "संघ के मुख पत्र में लेखक ने गौ हत्या करने वाले का वध उचित ठहराया है, वेदसम्मत बताया है " । मेरी दृष्टि में इस विषय पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, हिन्दू जागरण मंच, विश्व हिन्दू परिषद, अधिवक्ता परिषद, भाजपा, भाजपा की स्थानीय विधायक विमला बाथम, भाजपा के स्थानीय सांसद/ मंत्री डॉक्टर महेश शर्मा सक्रिय थे और यथायोग्य कर रहे थे। यानी अभियुक्त ठहराये और बंदी बनाये गये 18 बच्चों की चिंता हो रही थी।

अब नई परिस्थिति पैदा हो गयी तो मन किया कि चलिये बिसाहड़ा चला जाये और छह दिन पहले मैं तथा फ़ेस बुक के एक मित्र निर्भय यादव बिसाहड़ा चले गये। जीवन की मार से त्रस्त, थके-थके चेहरे, बुझी-बुझी अांखें, ऐसे नितांत निर्धन लोग जिनके बदन पर् कपड़े तक कटे-फटे थे, से भेंट हुई। मुख्य अभियुक्त के पिता श्री संजय राणा जो भाजपा और संघ के 30 वर्ष पुराने कार्यकर्ता हैं के अनुसार, 9 माह में उन लोगों से मिलने वाला मैं दूसरा और सहायता करने वाला पहला व्यक्ति हूँ। ज्ञात हुअा कि इन 18 बच्चों में से 6 के परिवार में रोटियों के भी लाले हैं।

मैं कुछ देर के लिये सुन्न रह गया। जिसे ब्लैक अाउट कहते हैं, ऐसी स्थिति अा गयी। कुछ देर बाद जब दिमाग़ से अंधेरा हटा तो जो पहले विचार उभरे वो यह थे...... " क्या हम हिन्दू ....समाज हैं भी ? हममें जीवित रहने का कोई लक्षण है भी ? हमारे संगठन क्या कर रहे हैं ? मैं ही कितना स्वार्थी-अालसी हूँ कि  मेरी अांखें नौ माह बाद अपने भाइयों के अाँसुओं को देख पाईं ? देश में लाचार, बेसहारा हिंदुओं की चिंता करने वाला कोई है भी ?

हिन्दू संगठनों के नेताओं की उस समय की प्रेस कॉन्फ्रेंस, टी वी बाइट, अख़बारों में बयानबाज़ी ध्यान कीजिये। लोग गांव में मन्दिर तक जाते थे। प्रेस को इंटरव्यू दे कर कर्तव्य पूर्ण हुअा समझ लेते थे। बंधुओ, गिरफ़्तार 18 लोगों में अभी भी 17 लोग जेल में हैं। कोई आर्थिक सहायता, वकीलों की व्यवस्था कभी नहीं हुई।  गांव वालों ने अापस में चंदा एकत्र कर दो लाख रुपये जमा किये हैं। जिन वकीलों को इन पीडितों ने कोर्ट में खड़ा किया उन्होंने निश्चित रूप से अपनी ओर से कुछ नहीं मांगा। उसी 2 लाख से जो इन्होंने वकीलों को दिया वो उन्होंने बिना कुछ कहे चुपचाप रख लिया।

अभी पांचजन्य के पिछले किसी अंक में मेवात पर यह रिपोर्ट अाई है। मेवात देश की राजधानी दिल्ली से मात्र 60 किलोमीटर की दूरी पर गुड़गांव से अलवर के रास्ते आगे बढ़ने पर सोहना के बाद शुरू हो जाता है। 1947 में बंगलादेश में करीब 30 प्रतिशत और मेवात में भी लगभग 30 प्रतिशत हिन्दू थे। जैसे बंगलादेश में करीब 8 प्रतिशत हिन्दू रह गए हैं, यही स्थिति मेवात की भी हो गई है। आज हरियाणा के मेवात में हिन्दुओं के साथ वह सब हो रहा है जो बंगलादेश या पाकिस्तान में हिन्दुओं के साथ होता है। हिन्दू लड़कियों और महिलाओं का अपहरण और फिर किसी मुस्लिम के साथ जबरन निकाह। हिन्दू व्यापारियों से जबरन पैसे की वसूली करना। मंदिरों और श्मशान के भूखंडों पर कब्जा करना। बंगलादेशी घुसपैठियों को बसाना। हिन्दुओं को झूठे मुकदमों में फंसाना। हिन्दुओं के यहां डाका डालना।

अब मैं यह प्रश्न सबसे पहले अापसे फिर सभी हिन्दू संगठनों के नेताओं से पूछना चाहता हूंं कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश के बाद वर्तमान कटे-फटे-शेष बचे भारत को बचाने का रास्ता क्या है ? बंगाल तथा असम के बांग्लादेश से लगते अनेकों ज़िलों, बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, हरियाणा, पंजाब के विभिन्न क्षेत्रों में तेज़ी से उभर रही इस समस्या का समाधान क्या है ? क्या तेजस्वी हिंदुओं को प्रभावी, शक्तिशाली बनाने, उनके साथ हर प्रकार से खड़े होने के अतिरिक्त कोई मार्ग है ? क्या बंद कमरों के भाषण, फ़ेस बुक की गर्मागर्म पोस्टिंग, लाइक, शेयर इस सिलसिले में कुछ भी कर सकते हैं ? हमारा सारा तेज अगर हमारी अपनी जेब से धन नहीं निकलवा सकता तो कुछ समय बाद कैराना, मेवात और इसी तरह के गांवों, नगरों, बस्तियों को उजड़ने से कौन रोक सकता है ? हम जूझ नहीं सकते तो लड़ने वालों के साथ तो खड़े हो सकते हैं।

मेरा प्रस्ताव है कि हमें उन अट्ठारह बच्चों के लिये प्रति बच्चा एक लाख रुपया उनके परिवारों तक पहुंचाना चाहिए। इससे उनका और प्रत्येक तेजस्वी चिंतन वाले व्यक्ति का सम्बल बढ़ेगा। ऐसे लोगों तक यह संदेश जाना कि अाप अकेले नहीं हैं, समाज साथ खड़ा है, उनकी उर्जा को बढ़ायेगा। समाज में इन वीरों का अनुकरण के लिये लोग तैय्यार होंगे और यही हल है। महाराणा प्रताप के इन सिसोदिया वंशजों के साथ खड़े होने के लिये भामाशाह बनिए। स्वयम पर दबाव डाल कर अपनी मासिक आमदनी का 10% या 5,000 जो भी अधिक हो दीजिये। मित्र-बंधुओं की भी प्रेरित कीजिए। अाश्वस्त रहिये कि ऊपर दिए गये इस अकाउंट में जमा धन उन 18 बच्चों के परिवार तक बराबर बांटा जायेगा। 

तुफ़ैल चतुर्वेदी

.............ख़ैरात लगी बंटने

भारत के ही नहीं बल्कि विश्व भर के इस्लामियों और उनके सबसे विश्वस्त दलाल वामपंथियों के पेट में पानी होने लगा है। प्रकट में तो बहसें नहीं कर रहे हैं मगर आंतरिक रूप से लगभग हाहाकार सा मचा है। कारण भी गम्भीर है कि अमेरिका के राष्ट्रपति पद के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की ओर से डोनाल्ड ट्रम्प का नाम तय हो गया है। अमरीका में राष्ट्रपति प्रणाली है और उसके चुनाव में भाग लेने वाले प्रत्याशियों को पहले अपने दल का एकमेव प्रत्याशी बनना पड़ता है। वहां भारत जैसी स्थिति नहीं है कि हर पार्टी, वरिष्ठ नेताओं की बपौती हो। अमेरिका में वास्तविक लोकतंत्र है। विभिन्न चरणों में ट्रम्प ने रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्याशियों पर बढ़त हासिल की और अब वो अमेरिका के अगले राष्ट्रपति बनने की मार्ग पर अग्रसर हो गए हैं।

अपने चुनावी अभियान में उन्होंने "हम अमेरिका में मुसलमानों का आना रोक देंगे" जैसा गम्भीर बयान दिया। विश्व राजनीति के मंच पर ऐसी सोच के अमेरिकी राष्ट्रपति का संभावित अवतरण विश्व भर के इस्लामियों और उनके सबसे विश्वस्त दलाल वामपंथियों के लिये चिंता का विषय होना भी चाहिये। ऐसा अमेरिकी राष्ट्रपति विश्व में ऐसी वैचारिक उथल-पुथल मचा सकता है जिससे सैकड़ों वर्षों से चले आ रहे इस्लामी मनमानेपन की नींव खिसक सकती है।

आइये इतिहास के प्रकाश में देखें कि अमेरिका क्या है ? आज एक देश के रूप में सुगठित अमेरिका सरलता से देश नहीं बना। स्वतंत्र देश बनने की प्रक्रिया में अमेरिकी राष्ट्र तात्कालिक विश्व-शक्ति ब्रिटेन से लड़ा। उसने भयानक गृह-युद्ध भी झेला। उसे देश और राष्ट्र बनने वाले लोग उसी मूल के थे जिन्होंने वहां के मूल निवासियों का संहार किया मगर उनके वंशजों ने शेष बचे मूल निवासियों को अधिकार दिये। स्त्रियों की बराबरी को संविधान द्वारा पुष्टि किया। हर प्रकार के अधिकारों से हीन अफ्रीका से पकड़ कर लाये गये दासों को स्वतंत्र कर उन्हें अमेरिका की बराबरी की नागरिकता दी। अमेरिका में विचारों को प्रकट करने की अबाध स्वतंत्रता तय की। देश के लिये वयस्क-मताधिकार की प्रजातान्त्रिक प्रणाली तय की। हर वयस्क का मत एक समान बनाया। स्वतंत्र न्याय प्रणाली बनायी। न्याय के शासन को स्थापित करने के लिये विभिन्न संस्थान बनाये।