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मंगलवार, 5 जुलाई 2016

घोड़े की टाँग औऱ राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा की मज़बूती

देहरादून में घोड़े की टाँग टूटने का तीजा हो गया यानी तीन दिन बीत गये। उठावनी हो गयी, रंडरोवना बंद हुआ और कौए दूसरी सभा में कांव-कांव करने चले गये। चौबीस घंटे के टी वी चैनलों को आख़िर कुछ तो दिखाना होगा। यहाँ बहुत से दर्शकों सहित मुझे भी ये बात सूझती है कि मीडियाकर्मियों रिपोर्टिंग में एक ख़ास पैटर्न दिखाई देता है।


ये लोग कभी संघ के मुखपत्र पांचजन्य में गौ हत्यारे को मृत्युदंड के वैदिक आदेश पर छाती पीटते हैं। कभी अख़लाक़ की बीबी को गले लगा कर ढाढस बंधाने का प्रयास करते हैं। कभी शुद्ध कूड़ा लिखने वाले लेखकों के जुगाड़ बैठा कर प्राप्त किये गए साहित्य अकादमी पुरस्कार को बिहार चुनाव के लिये लौटाने पर कुकरहाव करते हैं। कभी संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जी के आरक्षण के बयान पर हंगामा करते हैं। कभी हैदराबाद में छात्र की आत्महत्या को ले कर फें फें करके मुंह से झाग निकलने लगते हैं। कभी जे एन यू में भारत के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी आयोजित करने वाले राष्ट्रद्रोहियों को ले कर डकराते हैं मगर नासिर, आमिर, मयस्सर सहित 15-20 बांग्लादेशी घुसपैठियों द्वारा डाक्टर पंकज नारंग की पीट-पीट कर की गयी हत्या जैसे विषय पर इनके मुंह में तत्काल दही जम जाता है। उस समय नयी-नवेली बहू की तरह घूंघट काढ़ कर कैमरामैन को ससुर समझ लेते हैं और उस तरफ पर्दानशीं हो जाते हैं, कोई बाइट नहीं देते। इसका भयानक तात्पर्य यह है कि हम खंडित भारत के बचे-खुचे भारतवासी अपनी धरती पर भी सुरक्षित नहीं हैं।


देहरादून में भाजपा ने उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार के विरोध में प्रदर्शन का आह्वान किया था। प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिये विधानसभा से पहले पुलिस ने बैरिकेटिंग की हुई थी। इस तरफ़ लोग इकट्ठा थे। नारेबाजी हो रही थी। कुछ भाजपा विधायक कार्यकर्ताओं सहित विधान सभा से निकले और बैरिकेटिंग की दूसरी ओर पुलिस वाली तरफ़ नारेबाज़ी करने लगे। वहां तैनात घुड़सवार पुलिस ने उन लोगों पर घोड़े दौड़ा दिये। इस हड़बोंग में हल्द्वानी के भाजपा कार्यकर्त्ता प्रदीप बोरा ज़मीन पर गिर गये। मंसूरी के भाजपा विधायक गणेश जोशी ने उसे बचाने के लिये घुड़सवार के हाथ से बेंत छीन लिया और घोड़े को पीछे हटाने के लिये उसके मुंह के आगे ज़मीन पर बेंत पटकने लगे। घोड़ा बिदक कर पीछे हटने लगा। सड़क के किनारे पी डब्लू डी के लगाये हुए पार्टीशन के भूतपूर्व पिलर थे। यानी पिलर तो हटाया जा चुका था मगर उसका ज़मीन में धंसा हुआ ढांचा शेष था। पीछे हटते हुए घोड़े का पैर उसकी मुड़ी हुई लोहे की पट्टी में फंस गया। घोड़े ने पैर बाहर निकालने के लिये ज़ोर लगाया तो पैर टूट गया। ख़ून बहने लगा। प्रदर्शन रुक गया। भाजपा कार्यकर्ता और पुलिस वालों ने मिल कर घोड़े का पैर बाहर निकाला मगर मीडिया और कोंग्रेसियों ने इसे भाजपा विधायक गणेश जोशी द्वारा घोड़े की तांग तोड़ना बना दिया।


थोड़ी सी समझ वाले किसी भी व्यक्ति को समाचार देखते समय ही सूझ रहा था कि घोड़े की टांग डंडा मार कर नहीं तोड़ी जा सकती। घोड़े की टांग तोड़ने के लिये डंडा उपयुक्त शस्त्र ही नहीं है फिर पशुओं के इतिहास में कभी भी कोई घोड़ा गाँधीवादी नहीं हुआ है। उसकी पिछली टाँग पर कोई डंडा मरेगा तो वो दूसरी टांग सामने करने की जगह मारने वाले के ऐसी दुलत्ती लगायेगा कि तबियत हरी हो जाएगी। ये पुलिस लाइन का घोडा है। ये एक दुलत्ती से शेर का जबड़ा तोड़ सकता है। इस फांय-फांय में एक बहुत अच्छी बात सामने ये भी आई है कि अपने कार्यकर्ता को बचने के लिये विधायक सामने आये और उन्होंने प्राणप्रण से प्रयास किया। काश यही समझ डाक्टर पंकज नारंग पर हुए हमले के समय उसके पड़ौसियों में भी होती तो पांसा पटल गया होता।


कुछ प्रश्न आप सब से, कृपया इस पर गहन विचार कीजिये। परिवार के लोगों, सम्बन्धियों, मित्रों, परिचितों से बात कीजिये। आप आरामदायक घर बनते हैं। फ़र्नीचर ख़रीदते हैं, मोटरसाइकिल-कार ख़रीदते हैं। डिनर-सैट, बर्तन, क़ालीन, आभूषण ख़रीदते हैं। प्लाट लेते हैं। फैक्ट्री लगते हैं। विवाह करते हैं। परिवार बढ़ाते हैं। यदि बुरा समय आया तो आपके पास परिवार, घर, फ़र्नीचर, मोटरसाइकिल-कार, डिनर-सैट, बर्तन, क़ालीन, आभूषण, फैक्ट्री की सुरक्षा की क्या व्यवस्था है ? ऐसा नहीं है कि राष्ट्र पर बुरा समय नहीं आया। पाकिस्तान, बांग्लादेश और अभी हाल ही में हम कश्मीर से मार कर निकले गए हैं। ऐसा अवसर फिर आया तो आप अपनी व अपने परिवार की रक्षा घर, फ़र्नीचर, मोटरसाइकिल-कार, डिनर-सैट, बर्तन, क़ालीन, आभूषण, फैक्ट्री, से करेंगे ?

आपने अपनी सुरक्षा पुलिस के भरोसे छोड़ दी है। हमारे राष्ट्र के पास आतंरिक सुरक्षा के लिये पर्याप्त बल नहीं है। किसी भी राष्ट्र के पास आंतरिक सुरक्षा के लिये पर्याप्त बल कभी भी नहीं होता। आख़िर कोई राष्ट्र अपने सौ करोड़ लोगों की रक्षा के लिये दस करोड़ का सैन्य बल नहीं बन सकता। यदि कोई आंतरिक विप्लव हो तो समाज को ही उससे निबटना पड़ता है। समाज की रक्षा समाज के पौरुष पर ही निर्भर करती है। पता नहीं डाक्टर पंकज नारंग के परिवार के लोगों और उनके पड़ौसियों को ये पता है या नहीं कि संविधान हमें आत्मरक्षा में हमलावर के प्राण लेने की भी छूट देता है। मगर साहब जी इसके लिये घर में अस्त्र-शस्त्र चाहिए होते हैं। आपके पास तो नाख़ून भी नहीं हैं जिनसे नृसिंह अवतार की तरह राक्षस का पेट फाड़ा जा सके। तो चलिये नाख़ून बढ़ाते हैं


तुफ़ैल चतुर्वेदी

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