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रविवार, 16 अगस्त 2015

ग़ज़वा-ए-हिन्द के सदियों पुराने सपने को साकार करने के लिये वृहत्तर भारत पर विभिन्न तकनीकें सैकड़ों वर्षों से प्रयोग में लायी जा रही हैं।

ग़ज़वा-ए-हिन्द के सदियों पुराने सपने को साकार करने के लिये वृहत्तर भारत पर विभिन्न तकनीकें सैकड़ों वर्षों से प्रयोग में लायी जा रही हैं। उन्हीं में से एक प्रमुख तकनीक शत्रु पक्ष में विभाजन की तकनीक है। आपको पंचतंत्र की बूढ़े पिता और उसके चार बेटों की कहानी ध्यान होगी। बूढ़ा अपने आपस में झगड़ने वाले बेटों को बुला कर 10-12 पतली-पतली लकड़ियों के बंधे हुए गट्ठर को तोड़ने के लिये देता है। सारे बेटे एक-एक करके असफल हो जाते हैं। फिर वो गट्ठर को खोल कर एक-एक लकड़ी तोड़ने के लिये देता है। देखते हो देखते बेटे हर लकड़ी तोड़ डालते हैं। बूढ़ा पिता बेटों को समझता है "एक लकड़ी को तोडना आसान होता है किन्तु बंधी लकड़ियों को तोडना असंभव होता है' तुम सबको साथ रहना चाहिये। यही तकनीक हिन्दुओं की विभिन्न जातियों को इस्लाम के अधीन करने के लिये सदियों से प्रयोग में लायी जा रही है। उत्तर प्रदेश में जाट, त्यागी समाज के धर्मान्तरित लोग मूले जाट, मूले त्यागी कहलाते हैं। इसी तरह से राजस्थान, गुजरात में राजपूत भी मुसलमान बने हैं। अन्य समाज भी धर्मान्तरित हुए हैं मगर ये आज भी अपनी जाट, त्यागी, राजपूत पहचान के लिये मुखर हैं और तब्लीगियों की प्रचंड हाय-हत्या के बाद भी अभी तक उसी टेक पर क़ायम हैं। धर्मांतरण चाहने वाली इन जमातों की कुदृष्टि सदियों से इसी तरह हमारे दलित, अनुसूचित जातियों पर लगी हुई है। जय भीम और जय मीम तो आज का नारा है। इस कार्य को सदियों से मुल्ला पार्टी जी-जान से चाहती है मगर उसकी दाल गल नहीं पा रही। आइये इस षड्यंत्र की तह में जाते हैं।



सामान्य हिन्दू-मुस्लिम दंगों के बारे में छान-फटक करें तो बड़े मज़ेदार तथ्य हाथ आते हैं।  झगड़े चाहे मस्जिद के आगे से शोभा यात्रा निकलने पर पथराव के कारण, किसी लड़की को छेड़ने, लव जिहाद की परिणति, किन्हीं दो वाहनों की टक्कर, भुट्टो को पाकिस्तान में फांसी, ईराक़ पर अमरीकी हमला, किसी भी उत्पात से शुरू होते होते हों; पहली झपट में हिन्दू समाज की ओर से आवाज़ उठाने वाले जाट, गूजर, बाल्मीकि-भंगी, चमार, इत्यादि जातियों के लोग पाये जाते हैं। जाट और गूजर ऐतिहासिक योद्धा जातियां हैं और इनके अनेकों राजवंश रहे हैं। गुजरात प्रान्त का तो नाम ही गुर्जर प्रतिहार शासकों के कारण पड़ा है। सेना में आज भी जाट रेजीमेंट्स हैं अर्थात लड़ना इनके स्वभाव में है, मगर समाज के सबसे ख़राब समझे जाने वाले कामों को करने वाले पिछड़े, दमित, दलित लोगों में इतना साहस कहाँ से आ गया कि वो इस्लामी उद्दंडता का बराबरी से सामना कर सकें ? सदियों से पिछड़ी, दबी-कुचली समझी जाने वाली इन जातियों के तो रक्त-मज्जा में ही डर समा जाना चाहिये था। ये कैसे बराबरी का प्रतिकार करने की हिम्मत कर पाती हैं ? मगर ये भी तथ्य है कि आगरा, वाराणसी, मुरादाबाद, मेरठ, बिजनौर यानी घनी मुस्लिम जनसंख्या के क्षेत्रों के प्रसिद्ध दंगों में समाज की रक्षा इन्हीं जातियों के भरपूर संघर्ष के कारण हो पाती है।



आइये इतिहास के इस भूले-बिसरे दुखद समुद्र का अवगाहन करते हैं। यहाँ एक बात ध्यान करने की है कि इस विषय का लिखित इतिहास बहुत कम है अतः हमें अंग्रेज़ी के मुहावरे के अनुसार 'बिटवीन द लाइंस' झांकना, जांचना, पढ़ना होगा। सबसे पहले बाल्मीकि या भंगी जाति को लेते हैं। बाल्मीकि बहुत नया नाम है और पहले ये वर्ग भंगी नाम से जाना जाता था। ये कई उपवर्गों में बंटे हुए हैं। इनकी भंगी, चूहड़, मेहतर, हलालखोर प्रमुख शाखाएं हैं। इनकी किस्मों, गोत्रों के नाम बुंदेलिया, यदुवंशी, नादों, भदौरिया, चौहान, किनवार ठाकुर, बैस, गेहलौता, गहलोत, चंदेल, वैस, वैसवार, बीर गूजर या बग्गूजर, कछवाहा, गाजीपुरी राउत, टिपणी, खरिया, किनवार-ठाकुर, दिनापुरी राउत, टांक, मेहतर, भंगी, हलाल इत्यादि हैं। क्या इन क़िस्मों के नाम पढ़ कर इस वीरता का, जूझारू होने का कारण समझ में नहीं आता ? बंधुओ ये सारे गोत्र  भरतवंशी क्षत्रियों के जैसे नहीं लगते हैं ? किसी को शक हो तो किसी भी ठाकुर के साथ बात करके तस्दीक़ की जा सकती है। इन अनुसूचित जातियों में ये नाम इनमें कहाँ से आ गये ? ऐसा क्यों है कि अनुसूचित जातियों की ये क़िस्में उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्य प्रदेश में ही हैं ? जो इलाक़े सीधे मुस्लिम आक्रमणकारियों से सदियों जूझते रहे हैं उन्हीं में ये गोत्र क्यों मिलते हैं ? हलालखोर शब्द अरबी है। भारत की किसी जाति का नाम अरबी मूल का कैसे है ? क्या अरबी आक्रमणकारियों या अरबी सोच रखने वाले लोगों ने ये जाति बनायी थी ? इन्हें भंगी क्यों कहा गया होगा ? ये शुद्ध संस्कृत शब्द है और इसका अर्थ 'वह जिसने भंग किया या तोड़ा' होता है। इन्होने क्या भंग किया था जिसके कारण इन्होने ये नाम स्वीकार किया।



चमार शब्द का उल्लेख प्राचीन भारत के साहित्‍य में कहीं नहीं मिलता है। मृगया करने वाले भरतवंशियों में भी प्राचीन काल में आखेट के बाद चमड़ा कमाने के लिये व्याध होते थे। ये पेशा इतना बुरा माना जाता था कि प्राचीन काल में व्याधों का नगरों में प्रवेश निषिद्ध था। इस्‍लामी शासन से पहले के भारत में चमड़े के उत्पादन का एक भी उदाहरण नहीं मिलता है। हिंदू चमड़े के व्यवसाय को बहुत बुरा मानते थे अतः ऐसी किसी जाति का उल्लेख प्राचीन वांग्मय में न होना स्वाभाविक ही है। तो फिर चमार जाति कहाँ से आई ? ये संज्ञा बनी ही कैसे ? चर्ममारी राजवंश का उल्लेख महाभारत जैसे प्राचीन भारतीय वांग्मय में मिलता है। प्रतिष्ठित लेखक डॉ विजय सोनकर शास्त्री ने इस विषय पर गहन शोध कर चर्ममारी राजवंश के इतिहास पर लिखा है। इसी तरह चमार शब्द से मिलते-जुलते शब्द चंवर वंश के क्षत्रियों के बारे में कर्नल टाड ने अपनी पुस्तक 'राजस्थान का इतिहास' में लिखा है। चंवर राजवंश का शासन पश्चिमी भारत पर रहा है। इसकी शाखाएं मेवाड़ के प्रतापी सम्राट महाराज बाप्पा रावल के वंश से मिलती हैं। आज जाटव या चमार माने-समझे जाने वाले संत रविदास जी महाराज इसी वंश में हुए हैं जो राणा सांगा और उनकी पत्नी के गुरू थे। संत रविदास जी महाराज लम्बे समय तक चित्तौड़ के दुर्ग में महाराणा सांगा के गुरू के रूप में रहे हैं। संत रविदास जी महाराज के महान, प्रभावी व्यक्तित्व के कारण बड़ी संख्या में लोग इनके शिष्य बने। आज भी इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में रविदासी  पाये जाते हैं।



उस काल का मुस्लिम सुल्तान सिकंदर लोधी अन्य किसी भी सामान्य मुस्लिम शासक की तरह भारत के हिन्दुओं को मुसलमान बनाने की उधेड़बुन में लगा रहता था। इन सभी आक्रमणकारियों की दृष्टि ग़ाज़ी उपाधि पर रहती थी। सुल्तान सिकंदर लोधी ने संत रविदास जी महाराज मुसलमान बनाने की जुगत में अपने मुल्लाओं को लगाया। जनश्रुति है कि वो मुल्ला संत रविदास जी महाराज से प्रभावित हो कर स्वयं उनके शिष्य बन गए और एक तो रामदास नाम रख कर हिन्दू हो गया। सिकंदर लोदी अपने षड्यंत्र की यह दुर्गति होने पर चिढ गया और उसने संत रविदास जी को बंदी बना लिया और उनके अनुयायियों को हिन्दुओं में सदैव से निषिद्ध खाल उतारने, चमड़ा कमाने, जूते बनाने के काम में लगाया। इसी दुष्ट ने चंवर वंश के क्षत्रियों को अपमानित करने के लिये नाम बिगाड़ कर चमार सम्बोधित किया। चमार शब्‍द का पहला प्रयोग यहीं से शुरू  हुआ। संत रविदास जी महाराज की ये पंक्तियाँ सिकंदर लोधी के अत्याचार का वर्णन करती हैं।


वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान
फिर मैं क्यों छोड़ूँ इसे पढ़ लूँ झूट क़ुरान
वेद धर्म छोड़ूँ नहीं कोसिस करो हजार
तिल-तिल काटो चाही गोदो अंग कटार



चंवर वंश के क्षत्रिय संत रविदास जी के बंदी बनाने का समाचार मिलने पर दिल्ली पर चढ़ दौड़े और दिल्‍ली की नाकाबंदी कर ली। विवश हो कर सुल्तान सिकंदर लोदी को संत रविदास जी को छोड़ना पड़ा । इस झपट का ज़िक्र इतिहास की पुस्तकों में नहीं है मगर संत रविदास जी के ग्रन्थ रविदास रामायण की यह पंक्तियाँ सत्य उद्घाटित करती हैं



बादशाह ने वचन उचारा । मत प्‍यारा इसलाम हमारा ।।
खंडन करै उसे रविदासा । उसे करौ प्राण कौ नाशा ।।
जब तक राम नाम रट लावे । दाना पानी यह नहीं पावे ।।
जब इसलाम धर्म स्‍वीकारे । मुख से कलमा आप उचारै ।।
पढे नमाज जभी चितलाई । दाना पानी तब यह पाई ।।



भारतीय वांग्मय में आर्थिक विभाजन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के रूप में मिलता है। मगर प्राचीन काल में इन समाजों में छुआछूत बिल्कुल नहीं थी। कारण सीधा सा था ये विभाजन आर्थिक था। इसमें लोग अपनी रूचि के अनुसार वर्ण बदल सकते थे। कुछ संदर्भ इस बात के प्रमाण के लिये देने उपयुक्त रहेंगे। मैं अनुवाद दे रहा हूँ। संस्कृत में आवश्यकता होने पर संदर्भ मिलाये जा सकते हैं।



मनु स्मृति 10:65 ब्राह्मण शूद्र बन सकता है और शूद्र ब्राह्मण हो सकता है। इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपना वर्ण बदल सकते हैं।

मनु स्मृति 4:245 ब्राह्मण वर्णस्थ व्यक्ति श्रेष्ठ, अति-श्रेष्ठ व्यक्तियों का संग करते हुए और नीच-नीचतर व्यक्तियों का संग छोड़ कर अधिक श्रेष्ठ बनता जाता है। इसके विपरीत आचरण से पतित हो कर वह शूद्र बन जाता है।

मनु स्मृति 2:168 जो ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा वैश्य वेदों का अध्ययन और पालन छोड़ कर अन्य विषयों में ही परिश्रम करता है, वह शूद्र बन जाता है। उसकी आने वाली पीढ़ियों को भी वेदों के ज्ञान से वंचित होना पड़ता है।



आप देख सकते हैं ये समाज के चलने के लिए काम बंटाने और उसके इसके अनुरूप विभाजन की बात हैं और इसमें जन्मना कुछ नहीं है। एक वर्ण से दूसरे वर्ण में जाना संभव था। महर्षि विश्वामित्र का जगत-प्रसिद्ध उदाहरण क्षत्रिय से ब्राह्मण बनने का है। सत्यकेतु, जाबालि ऋषि, सम्राट नहुष के उदाहरण वर्ण बदलने के हैं। एक गणिका के पुत्र  जाबालि, जिनकी माँ वृत्ति करती थीं और जिसके कारण उन्हें अपने पिता का नाम पता नहीं था, ऋषि कहलाये। तब ब्राह्मण भी आज की तरह केवल शिक्षा देने-लेने, यज्ञ करने-कराने, दान लेने-देने तक सीमित नहीं थे। वेदों में रथ बनाने वाले को, लकड़ी का काम करने वाले बढ़ई को, मिटटी का काम करने वाले कुम्हार को ऋषि की संज्ञा दी गयी है। सभी वो काम जिनमें नया कुछ खोजा गया ऋषि के काम थे।


यहाँ एक वैदिक ऋषि की चर्चा करना उपयुक्त होगा। वेद सृष्टि के उषा काल के ग्रन्थ हैं। भोले-भाले, सीधे-साधे लोग जो देखते हैं उसे छंदबद्ध करते हैं। ऋषि कवष ऐलूष ने वेद में अक्ष-सूक्त जोड़ा है। अक्ष जुए खेलने के पाँसे को कहते हैं। इस सूक्त में ऋषि कवष ऐलूष ने अपनी आत्मकथा और जुए से जुड़े सामाजिक आख्यान, उपेक्षा, बदनामी की बात करुणापूर्ण स्वर में लिखी है। कवष इलूष के पुत्र थे जो शूद्र थे। ऐतरेय ब्राह्मण बताता है कि सरस्वती नदी के तट पर ऋषि यज्ञ कर रहे थे कि शूद्र कवष ऐलूष वहां पहुंचे। यज्ञ में सामाजिक रूप से प्रताड़ित जुआरी के भाग लेने के लिये ऋषियों ने कवष ऐलूष को अपमानित कर निष्काषित कर दिया और उन्हें ऐसी भूमि पर छोड़ा गया जो जलविहीन थी। कवष ऐलूष ने उस जलविहीन क्षेत्र में देवताओं की स्तुति में सूक्त की रचना की और कहते हैं सरस्वती नदी अपना स्वाभाविक मार्ग बदल कर शूद्र कवष ऐलूष के पास आ गयीं। सरस्वती की धारा ने कवष ऐलूष की परिक्रमा की, उन्हें घेर लिया। यज्ञकर्ता ऋषि दौड़े-दौड़े आये और शूद्र कवष ऐलूष की अभ्यर्थना की। उन्हें ऋषि कह कर पुकारा। उनके ये सूक्त ऋग्वेद के दसवें मंडल में मिलते हैं।

इस घटना से ही पता चलता है कि शूद्र का ब्राह्मण वर्ण में आना सामान्य घटना ही थी। ध्यान रहे कि वर्ण और जातियों में अंतर है। वर्णों में एक-दूसरे में आना-जाना चलता था और इसे उन्नति या अवनति नहीं समझा जाता था। ये केवल स्वभाव के अनुसार आर्थिक विभाजन था। भारत में वर्ण जन्म से नहीं थे और इनमें व्यक्ति की इच्छा के अनुसार बदलाव होता था। कई बार ये पेशे थे और इन पेशों के कारण ही मूलतः जातियां बनीं। कई बार ये घुमंतू क़बीले थे, उनसे भी कई जातियों की पहचान बनी। वर्ण-व्यवस्था समाज को चलाने की एक व्यवस्था थी मगर वो व्यवस्था हज़ारों साल पहले ही समाप्त हो गयी। वर्णों में एक-दूसरे में आना-जाना चलता था ये भी सच है कि कालांतर में ये आवागमन बंद हो गया।


उसका कारण भारत पर लगातार आक्रमण और उससे बचने लिये समाज का अपने में सिमट जाना था। समाज ने इस आक्रमण और ज़बरदस्ती किये जाने वाले धर्मांतरण से बचाव के लिये अपनी जकड़बन्दियों की व्यवस्था बना ली। अपनी जाति से बाहर जाने की बात सोचना पाप बना दिया गया। रोटी-बेटी का व्यवहार बंद करना ऐसी ही व्यवस्था थी। इन जकड़बन्दियों का ख़राब परिणाम यह हुआ कि सारी जातियों के लोग स्वयं में सिमट गए और अपने अतिरिक्त सभी को स्वयं से हल्का, कम मानने लगे। वो दूरी जो एक वैश्य समाज जाटव वर्ग से रखता था वही जाटव समाज भी बाल्मीकि समाज से बरतने लगा। आपमें से कोई भी जांच-पड़ताल कर सकता है। केवल 5 उदाहरण भी भारत भर में जाटव लड़की के बाल्मीकि लड़के से विवाह के नहीं मिलेंगे। अब महानगरों में समाज बदल गया है और अंतर्जातीय विवाह समय बात हो गयी है मगर आज से 30 वर्ष पूर्व ऐसी घटना लगभग असंभव थी। आज बदलते समाज में शायद ये कुछ न दिखाई दे मगर आज से सौ साल पहले पंचों द्वारा व्यक्ति या परिवार से समाज का रोटी-बेटी का, हुक्का-पानी का व्यवहार बंद करना, उसका जीवन असंभव बना देता था। इसका अर्थ अंतिम संस्कार के लिये चार कंधे भी न मिलना होता था। इसका लक्ष्य अपने लोगों का धर्मांतरण न होने देना था। ये बंधन इतने कठोर थे कि अकबर के मंत्री बीरबल, टोडरमल तक उसका सारा ज़ोर लगा देने के बाद भी उसके चलाये धर्म दीने-इलाही और उसके पुराने धर्म इस्लाम में दीक्षित नहीं हुए।

प्राचीन भारत में भारत में शौचालय घर के अंदर नहीं होते थे। लोग इसके लिये घर से दूर जाते थे। समाज के लोगों में ये भाव कभी था ही नहीं कि उनका अकेले-दुकेले बाहर निकलना जीवन को संकट में डाल सकता है। मगर ये विदेशी आक्रमणकारी हर समय आशंकित रहते थे। उन्हें स्थानीय समाज से ही नहीं अपने साथियों से प्राणघाती आक्रमण की आशंका सताती थी। इसलिए उन्होंने क़िलों में सुरक्षित शौचालय बनवाये और मल-मूत्र त्यागने के बाद उन पात्रों को उठाने के लिये पराजित स्थानीय लोगों को लगाया। भारत में इस घृणित पेशे की शुरुआत यहीं से हुई है। इन विदेशी आक्रमणकारियों में इसके कारण अपनी उच्चता का आभास भी होता था और ऐसा घोर निंदनीय कृत्य उन्हें अपने पराजित को पूर्णरूपेण ध्वस्त हो जाने की आश्वस्ति देता था।


इन आक्रमणकारियों ने पराजित समाज के योद्धाओं को मार डाला और उनके बचे परिवार को इस्लाम या घृणित कार्यों को करने का विकल्प दिया। जो लोग डर कर, दबाव सहन न कर पाने के कारण मुसलमान बन गए, उन्हीं के वंशज आज के मुसलमान हैं। जो लोग मुसलमान नहीं बने, उन्होंने अपने प्राणों से प्रिय शिखा-सूत्र  काट दिये और अपने धर्म को न छोड़ने के कारण भंगी-चमार संज्ञा स्वीकार की। यहाँ ये बात आवश्यक रूप से ध्यान रखने की है कि इन प्रतिष्ठित योद्धा जाति के लोगों ने पराजित हो कर भी धर्म नहीं छोड़ा। इस्लाम के भयानक अत्याचार सहे, आत्मा तक को तोड़ देने वाला सिर पर मल-मूत्र ढोने का अत्याचार सहा, पशुओं की खाल उतारने  कार्य किया, चमड़ा कमाने-जूते बनाने का कार्य किया मगर मुसलमान नहीं हुए। ये जाटव, बाल्मीकि समाज के लोग हमारे उन महान वीर पूर्वजों की संतानें हैं। आज भी इन योद्धा जातियों के वंशजों के बड़े हिस्से में अपने नाम के साथ सिंह लगाने की परम्परा है। अपने सिर पर मल-मूत्र ढोने वाले, जूते बनाने वाले कहीं सिंह होते हैं ? ये वस्तुतः सिंह ही हैं जिन्हें गीदड़ बनने पर विवश करने के लिये इस तरह अपमानित किया गया।


बाबा साहब अम्बेडकर ने भी अपने लेखों में लिखा है कि हम योद्धा जातियों के लोग हैं। यही कारण है कि 1921 की जनगणना के समय चमार जाति के नेताओं ने वायसराय को प्रतिवेदन दिया था कि हमें राजपूतों में गिना जाये। हम राजपूत हैं। अँगरेज़ अधिकारियों ने ही ये नहीं माना बल्कि हिन्दू समाज भी इस बात को काल के प्रवाह में भूल गया और स्वयं भी इस महान योद्धाओं की संतानों से वही घृणित दूरी रखने लगा जो आक्रमणकारी रखते थे। होना यह चाहिए था कि इनकी स्तुति करता, नमन करता, इनको गले लगता मगर शेष हिन्दू समाज स्वयं आक्रमणकारियों के वैचारिक फंदे में फंस गया।



भारत में विदेशी मूल के मुसलमान सैयद, पठान, तुर्क आज भी स्थानीय धर्मांतरितों को नीची निगाह से देखते हैं। स्वयं को अशराफ़ { शरीफ़ का बहुवचन } और उनको रज़ील, कमीन , कमज़ात, हक़ीर कहते हैं। रिश्ता-नाता तो बहुत दूर की बात है, ऐसी भनक भी लग जाये तो मार-काट हो जाती है मगर सामने इस्लामी एकता का ड्रामा किया जाता है। ये समाज अपने ही मज़हब के लोगों के लिए कैसी हीनभावना रखता है इसका अनुमान इन सामान्य व्यवहार होने वाली पंक्तियों से लगाया जा सकता है।

ग़लत को ते से लिख मारा जुलाहा फिर जुलाहा है


तरक़्क़ी ख़ाक अब उर्दू करेगी
जुलाहे शायरी करने लगे हैं  



अपने मज़हब के लोगों के लिए घटिया सोच रखने वाला समूह इन दलित भाइयों का धर्मांतरण करने  के लिये गिद्ध जैसी टकटकी बाँध कर नज़र गड़ाए हुए रहता है। वो हिंदू समाज के इन योद्धा-वर्ग के वंशजों को अब भी अपने पाले में लाना चाहता है। दलित समाज के राजनेताओं ने भी इस शिकंजे में फंस जाने को अपने हित का काम समझ लिया है। ऐसे राजनेता जिनका काम ही समाज के छोटे-छोटे खंड बाँट कर अपनी दुकान चलाना है, इस दूरी को बढ़ाने में लगे रहते हैं। जिस समाज के लोगों ने सब कुछ सहा मगर राम-कृष्ण, शंकर-पार्वती, भगवती दुर्गा को नहीं त्यागा अब उन्हीं के बीच के राजनैतिक लोग समाज के अपने हित के लिए टुकड़े-टुकड़े करने का प्रयास कर रहे हैं। लक्ष्य वही ग़ज़वा-ए-हिन्द है और तकनीक शेर के छोटे-छोटे हज़ार घाव देने की है। जिससे धीरे-धीरे ख़ून बहने से शेर की मौत हो जाये



तुफैल चतुर्वेदी     

शनिवार, 1 अगस्त 2015

महामहिम तथागत राय और याक़ूब मेनन की फांसी

दोस्तो सार्वजनिक जीवन के स्थापित लोगों में एक मर्द निकल आया। जी हाँ मैं त्रिपुरा के राज्यपाल महामहिम तथागत राय की बात कर रहा हूँ। जिन्होंने  याक़ूब मेनन जैसे दुर्दांत हत्यारे और उसके हिमायतियों के बारे में सच कह दिया।

उसके पापों का चिटठा ये है। याक़ूब मेनन अपने पापी ख़ानदान सहित मुंबई के सीरियल बम धमाकों जिनमें 270 लोग मारे गए और हज़ारों लोग बुरी तरह घायल हुए, में सम्मिलित था। याक़ूब मेनन का अपराध हताहतों की संख्या की दृष्टि से ही बहुत बड़ा नहीं है बल्कि देशद्रोह भी है। उसने, उसके बाप, माँ, भाई, भाभी अन्य परिवारीय लोगों ने अपनी तरफ से यथासंभव भारत को चोट पहुँचाने का भरसक प्रयास किया। याक़ूब मेनन और उसके परिवार पर सेशन से शुरू हो कर हाई कोर्ट में अपील, सुप्रीम कोर्ट में अपील तक मुकद्दमा चला। इसके परिवार में कइयों को सज़ाएं हुईं और याक़ूब को हर जगह से फांसी की सजा हुई।  जिसके बाद राष्ट्रपति से क्षमादान की याचिका और उसे निरस्त कर देने के बाद फिर से पुनरीक्षण याचिका डाली गयी। वो भी निरस्त हुई। रात के 2 बजे कुछ राजनीति प्रेरित कुटिल वकीलों ने फिर से …… के घोड़े खोले।

ऐसे दुष्ट प्राणी को मिटटी में दबाने के समय लाखों लोगों का उपस्थित होना क्या कह रहा है ? आख़िर एक देशद्रोही के जनाज़े में सम्मिलित होने वाले लोग कुछ सोच कर तो अपने काम पर न जा कर क़ब्रिस्तान पहुंचे होंगे ? उनके मानस में कोई तो अंतर्धारा बह रही होगी ? उस अंतर्धारा की पहचान और वो देश, राष्ट्र के लिए हानिकर है तो उसकी रोकथाम राजनेता नहीं करेंगे तो और कौन करेगा ?

आख़िर लालू प्रसाद यादव, नितीश कुमार, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव, आज़म खान, अबू आज़मी, कांग्रेस के सचिन पायलेट, शकील अहमद, मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन के अकबरुद्दीन ओवैसी-असदुद्दीन ओवैसी, साम्यवादी पार्टी के प्रकाश करात, वृंदा करात, आप के अरविन्द केजरीवाल, आप से निष्काशित प्रशांत भूषण, ममता बनर्जी जैसे मुस्लिम वोटों के लिये जीभ लपलपाते राजनेता उसके पक्ष में अकारण तो लार नहीं टपकाने लगे।

फांसी लगने के बाद याक़ूब मेनन का शरीर पूरा उसके घर वालों को सौंप दिया गया। जिसके दफ़नाते समय लाखों मुसलमान एकत्र हुए। यहाँ ये ध्यान में आना आवश्यक है कि इन हत्यारों के किये विस्फोटों के बाद सैकड़ों लोगों के छिन्न-भिन्न शव मिले। जिनके टुकड़े इकट्ठे कर के अंतिम संस्कार किया गया। सैकड़ों घायल हुए लोग आज भी विकलांग का जीवन जी रहे हैं। देवबंदी मुल्लाओं ने तो कहा था आतंकवादियों की नमाज़े-जनाज़ा जायज़ नहीं है। वो सारे कहाँ हैं ? बोलते क्यों नहीं ? मुंह में दही जमा हुआ है या ज़बान बिल्ली ले गयी ? आज ये सब तो ऐसे चुप बैठे हैं जैसे गोद में सांप बैठा हो और हिलना मना हो।

तो बंधुओ जो बोल रहे हैं उनके पक्ष आवाज़ नहीं उठानी चाहिये। क्या ये समय त्रिपुरा के राज्यपाल महामहिम तथागत राय का आभार प्रकट करने, उनकी स्तुति गान का नहीं है ? इसी तरह से समाज अपनी आवाज़ ऊँची नहीं करेगा तो कैसे राषट्रीय-धारा के स्वर सामने आएंगे ? और कुछ नहीं तो महामहिम तथागत राय के चरणों में एक अकिंचन लेखक प्रणाम तो कर ही सकता है। महामहिम कृतज्ञ राष्ट्र का प्रणाम स्वीकारिये

तुफ़ैल चतुर्वेदी 

……………………… हिंदी बनाम उर्दू …………… उर्दू बनाम फारसी यानी विदेशी मानसिकता

सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय खंड-पीठ का फैसला आ गया है कि उत्तर प्रदेश सरकारी भाषा { संशोधन } कानून 1989 संविधान सम्मत है और राज्य में उर्दू को सरकारी काम-काज की दूसरी भाषा घोषित करने का फैसला सही था. इस वाद और उस पर आये फैसले का कारण उत्तर प्रदेश में बने इस कानून के खिलाफ उत्तर प्रदेश हिंदी सम्मेलन का न्यायालय में अपील करना था. कुछ पत्रकारों और समाचारपत्रों ने इसे हिन्दू-उर्दू की लड़ाई अब तक जारी है का नाम दिया है. इसके पक्ष में 2001 की जनगणना के आंकड़े आये हैं कि हिंदी, बंगला, तेलगू और तमिल के बाद उर्दू छटे स्थान पर है. 2001 की जनगणना के अनुसार पूरे देश की जनसँख्या का 5.01 प्रतिशन भाग उर्दूभाषी है अर्थात देश के पांच करोड़ से अधिक व्यक्तियों ने स्वयं को उर्दूभाषी लिखवाया है. ध्यान देने की बात यह है कि उत्तर प्रदेश में देश के उर्दूभाषियों की आबादी का केवल एक चौथाई भाग ही रहता है. शेष लोग बिहार, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्णाटक, तमिलनाडु इत्यादि प्रदेशों में रहते हैं. मैं मुशायरों में इन क्षेत्रों में खूब घूमा हूँ. यहाँ मदरसों में उर्दू मजहबी कारणों से पढाई जाती है मगर कम ही लोग अपने बच्चों को इस दकियानूस शिक्षा के लिए भेजते हैं. आपसी बातचीत में सब लोग स्थानीय भाषा का ही इस्तेमाल करते हैं. हाँ गाली-गलौज की मादर-पिदर उर्दू में ही होती है, शायद इसका कारण उर्दू की गालियों में जो विशिष्ट भौगोलिक चित्रण, लैंगिक इच्छा, धर-पटक और एक दूसरे के निकट सम्बन्धी बनने कि इच्छा व्यक्त करने यथा पिता, बहनोई, दामाद बनने का पवित्र विचार है, वैसी गुणवत्ता और इच्छा की अभिव्यक्ति तथा संतुष्टि स्थानीय भाषाओँ में नहीं हो पाती होगी. 
ज्ञातव्य है कि केवल मुसलमानों ने ही उर्दू को अपनी मातृ भाषा लिखवाया है. आइये विचार करें कि स्थानीय भाषा के बोलने वाले इन मुसलमानों ने स्वयं को उर्दूभाषी क्यों लिखवाया होगा ? कर्णाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र का स्थानीय मुसलमान बहुसंख्य रूप से बुनकर है. ताम्बे-पीतल का काम करता है यानी छोटे-मोटे काम करता है. ये सारे लोग धर्मान्तरित हैं. इनके पुरखे हिन्दू थे. जाहिर है वो सब स्थानीय बोलियाँ बोलते थे.  तो अब क्या हो गया कि मुसलमान बनने के बाद इनकी मातृभाषा मलयालम, तेलगू, तमिल, अवधी, भोजपुरी, मैथिली, मराठी, इत्यादि की जगह उर्दू बनने लगी ? ये लोग स्थानीय बोलियों में बात करते हैं मगर स्वयं को स्थानीयता में समरस नहीं करते. वो अपनी अलग पहचान क्यों बना रहे हैं ?
भारत की तमाम भाषाओँ के मिश्रण का परिणाम उर्दू है. ढेरों बोलियों, बानियों, साखियों के समरस होने के कारण, व्यापारियों, साधुओं, नाथों, फकीरों के व्यापक जनसम्पर्क के कारण एक बोली उभरी. उसको कपड़छन किया गया, जिसका परिणाम उर्दू है. ये किसी भी नई भाषा के उभरने, बनने, संवरने की स्वाभाविक प्रक्रिया है. इसी तरह कन्नड़, तमिल, तेलगू का वर्तमान स्वरुप बना है. इनके भाषायी क्षेत्रों के सीमांत से लगती मराठी इन भाषाओँ से प्रभावित है तो मनमाड, जालना, औरंगाबाद से लगते इलाकों की मराठी हिंदी प्रभावित. भाषाएँ इसी तरह रूप-स्वरूप बदलने का कार्य करती हैं. इसमें किसी को विरोध भी नहीं होता. तो उत्तर प्रदेश हिंदी सम्मेलन ने उत्तर प्रदेश में उर्दू के काम-काजी भाषा बनाये जाने के विरोध में न्यायालय में जाने का काम क्यों किया ? क्या उत्तर प्रदेश हिंदी सम्मेलन के लोग इतने भोले हैं कि वो इतनी सामने की बात देख-समझ नहीं सकते ? 
मित्रो ये विवाद बहुत पुराना है. इस पर विचार करने के लिए इसकी जड़ तक जाना होगा. मैं यहाँ कुछ बहुत प्रसिद्ध पंक्तियाँ उद्धृत करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा.  

इलाही खाना-ए-अँगरेज़ गिर जा 
ये गिरजाघर ये गिरजाघर ये गिरजा 

शेख ने मस्जिद बना मिस्मार बुतखाना किया 

हैं वही काफिर नहीं मुश्ताक जो इस्लाम के 
                                                          मेरे इन पंक्तियों के चयन से ये मत मान लीजियेगा कि मैंने एक चतुर वकील की तरह अपनी बात मनवाने के लिए कुछ तथ्य इस तरह इकट्ठे किये हैं, जिससे मुकद्दमा जीता जा सके. जी नहीं यही उर्दू का मूल स्वर है. पहले शेर में ब्रिटिश भारत में रहे लोअर कोर्ट के जज अकबर इलाहाबादी बड़े अलंकारिक रूप से ईसाइयों के गिरजाघर के गिर जाने की दुआ मांग रहे हैं. दूसरी पंक्ति तरह की पंक्ति है { एक तरह की समस्यापूर्ति और शायरी के नियमों के अनुसार हर हिन्दू-मुसलमान शायर इसका प्रयोग अपनी ग़ज़ल में करने के लिए बाध्य है } में कहा गया है कि मुल्ला ने मंदिर तोड़ कर मस्जिद बना ली. तीसरी पंक्ति भी जो तरह की ही पंक्ति में कहा गया है कि जो इस्लाम के प्रति इच्छुक नहीं वो काफिर हैं.
मैं पहले ही निवेदन कर चुका हूँ कि उर्दू भारतीय बोलियों-भाषाओँ के कपड़छन से बनी है. इसके सर्वनाम, क्रियापद इत्यादि सभी कुछ भारतीय हैं मगर कपड़छन का कपड़ा विदेशी { ईरानी-तुर्की-अफगानी } है. उर्दू का मानस और वातावरण भारत भर ही नहीं पाकिस्तान और बांग्ला देश में ईरानी, तुर्की, मुग़ल विजय के घमंड और इस पूरी शताब्दी से देवबंदी, बरेलवी मदरसों और तब्लीगी जमातों का बनाया-बिगाड़ा जा रहा वातावरण है. बंगाली जड़ें बहुत मज़बूत हैं उन्होंने ऐसे किसी भी झांसे में आने से इंकार कर दिया. ढाका के लोगों को ये गौरव प्राप्त है कि उन्होंने इस्लामी विश्व के सबसे बड़े विद्वानों में से एक मौलाना मौदूदी को उर्दू की हिमायत करने पर जूतों के हार पहनाये थे और हार के विभिन्न भागों से उनकी सार्वजनिक धुलाई की थी और अंततः तंग आ कर पाकिस्तान से अलग हो गये. मराठी, कन्नड़, तेलगू, तमिल, बृजभाषा,अवधी, भोजपुरी, मैथिली बोलने वाला वर्ग अपने आपको उस भाषा को बोलने वाला बता रहा है जो उसकी है ही नहीं, उसे आती ही नहीं. उर्दू और उर्दू का वातावरण भारतीयों को अपनी जड़ों से अलग करना चाहता है. ये विष इतना अधिक है कि उर्दू के सभी हिन्दू शायर मुस्लिम मानस का तुष्टिकरण करते रहे हैं. फ़िराक़ गोरखपुरी, जो उद्दंडता की सीमा की चरम-सीमा को पार जाते हुए शायर थे, हमेशा हिंदी को, हिंदी कविता को, हिंदी कवियों को गालियां बकते थे. उनके अनुसार हिंदी गंवारों की भाषा थी. मैं स्वयं कई बार अपने काव्य गुरु स्वर्गीय कृष्ण बिहारी नूर से उलझ चुका हूँ. एक अवसर मैं लखनऊ में उनके कमरे में बैठा हुआ था. चर्चा में उन्होंने अपनी मौसी और मामी के लिए खाला और मुमानी शब्द का प्रयोग किया. मैं उन्हें भौंचक्का हो कर देखता रहा. 
मैं स्वयं ग़ज़ल का ठीक-ठाक जाना-पहचाना शायर हूँ मगर क्या मुझे गजल में अपनी योग्यता मनवाने के लिए अपने पिता को अब्बा जान, मौसी को खाला, मामी को मुमानी कहना आवश्यक है ? बंधुओ! आवश्यक है. अगर मैं गजल का अच्छा शायर होने के साथ-साथ स्वयं को आधा-पौना मुसलमान प्रकट न करूँ, इस्लामी संस्कृति न ओढूँ, न दिखाऊं तो मुझे उर्दू के वातावरण में कोई टिकने नहीं देगा. ये घोर सांप्रदायिक वातावरण मुझे अछूत बना देगा. उर्दू के सबसे बड़े माने जाने वाले शायर इकबाल का कलाम अमुस्लिमों के लिए शब्दशः विष-भरा है. उसे बड़ा माना ही इसी लिए जाता है कि वो पाकिस्तान के मूल चिंतकों-जनकों में से एक था. वो इस्लामी श्रेष्ठता, इस्लामी उम्मा यानी अलगाववाद के गुण गाता था. इसका परिणाम देखिये. जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला अपने राम-काव्य में भगवन राम के वन-गमन का वर्णन करते हुए लिखते है 
रुखसत हुआ वो बाप से ले कर खुदा का नाम
भगवान राम के लिए रुखसत हुआ और महाराज दशरथ के लिए बाप शब्द, भगवान राम जो स्वयं ईश्वर का अवतार हैं के लिए खुदा का नाम का ले कर विदा हुआ जैसा गधेपन का प्रयोग उर्दू में अपने को मनवाने के लिए आवश्यक ही नहीं बल्कि अनिवार्य हैं. जब तक तुफैल चतुर्वेदी में चतुर्वेदी बाकी हैं उर्दू का वातावरण उसका मानसिक खतना करने में लगा रहता हैं. मुझे यहाँ अपने पहली बार पाकिस्तान जाने की एक घटना याद आती हैं. पाकिस्तान के किसी शायर ने हम भारत के शायरों से कहा कि पाकिस्तान ने उर्दू को ये शायर दिया-वो शायर दिया, ये लेखक दिया-वो लेखक दिया, ये आलोचक दिया-वो आलोचक दिया. हिन्दुस्तान ने उर्दू को क्या दिया. एक भारतीय मुस्लिम शायर का तुरंत जवाब था 'हिन्दुस्तान ने उर्दू को पाकिस्तान दिया'. 

यहाँ उपयुक्त होगा कि एक ही बोली की इन दोनों शैलियों की तुलना की जाये. इससे विषय अधिक स्पष्ट हो सकेगा. अमीर खुसरो तथा कुछ अन्य आचार्यों के बहुत प्रसिद्ध दोहे देखिये

गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस 
चल खुसरो घर आपने रेन भई चहुँ देस 

कागा सब तन खाइयो चुनि-चुनि खइयो मास
दुइ नैना मत खाइयो पिया मिलन की आस 

कागा नैन निकास ले पिया पास ले जाय
पहले दरस दिखाय दे पाछे लीजो खाय

अब उर्दू के सबसे बड़े माने जाने वाले दो शायर मीर और ग़ालिब के शेर देखिये

जाता है यार तेगबकफ गैर की तरफ 
ऐ कुश्ता-ए-सितम तिरी गैरत को क्या हुआ ..मीर तकी मीर

आमदे-सैलाबे-तूफाने-सदा-ए-आब है
नक़्शे-पा जो कान में रखता है उंगली जादह से ...ग़ालिब 

आपको जान कर आश्चर्य होगा कि ये दोहे अपने मूल स्वरूप में फारसी लिपि में लिखे गये हैं और इनके रचनाकार भी मुस्लिम हैं. आप या कोई भी इन्हें उर्दू कहेगा या हिंदी ? ये वो भाषाई स्वरूप है जो भारत की तमाम भाषाओँ के मिश्रण का परिणाम था. ढेरों बोलियों, बानियों, साखियों के समरस होने के कारण, व्यापारियों, साधुओं, नाथों, फकीरों के व्यापक जनसम्पर्क के कारण ये बोली उभरी. उर्दू मूलतः इस भारतीयता से ओतप्रोत भाषा को फारसी की फोटोकॉपी बनने का प्रयास है. उर्दू भारतीय भाषाओँ पर फारसी-तुर्की की कलम है और ध्यान रहे कलम पेड़ का मूल चरित्र पूरी तरह बदलने के लिए लगायी जाती है. ये गंगा-यमुनी सभ्यता नहीं है. गंगा-दजला या यमुना-फुरात की सभ्यता को मिलाने का कार्य है और इस सायास कोशिश के साथ ये काम है कि गंगा पर दजला और यमुना पर फुरात हावी हो जाये. उर्दू भारत के धर्मांतरित हिन्दुओं को पहले मुसलमान फिर कट्टर मुसलमान और अंततः तालिबानी बनने का एक और इस्लामी उपकरण है. 
उर्दू पढ़ायेगा कौन ? ...मदरसे का मुल्ला. उसकी ट्रेनिंग क्या है ?.... तालिबानी सोच. उर्दू के पढने और बढ़ने से हिंदी या अन्य हिंदुस्तानी भाषाओँ की ही हानि नहीं हुई है अपितु हिन्दुस्तान की भी भयंकर हानि हुई है. इसके कारण ही उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान न्यायालय में गया. 
न्यायपालिका को सायास जनसामान्य से दूर रखा गया है. किन्तु ऐसा नहीं हो सकता कि उसे समाज के विभिन्न हिस्सों का मानस क्या है इसका पता न हो.  उसमें जैसी अराष्ट्रीय धारा बह रही है उसे बदलने के लिए उसे भी योगदान करना चाहिए. उसके फैसले संविधान के दायरे के साथ-साथ राष्ट्र के दूरगामी हित की दृष्टि से भी देखे जाते तो कितना अच्छा होता. राष्ट्रविरोधी कार्यों को रोका जाना आवश्यक है. पाकिस्तान का आंदोलन, उसमे मारे गये लाखों लोग, करोड़ों लोगों का विस्थापन क्या एक बार पर्याप्त नहीं है जो दुबारा वही पौधा रोपा जा रहा है ? राजनीतिकों के तो क्षुद्र स्वार्थ हैं, जिसके चलते वो ऐसा कर रहे हैं. मेरे देखे इसका एक ही हल है कि उर्दू की लिपि स्थानीयता के हिसाब से देवनागरी या वहीँ की कोई आंचलिक की जाये और इसे पूर्ण रूप से भारतीय बनाया जाये, बन जाने के लिए बाध्य किया जाये 

तुफैल चतुर्वेदी       

मुसलमानों का दुःख और मेरे बहते आंसू

स्वयं और अन्य बहुत से मानवतावादी खिन्न हैं कि हमारे मुस्लिम भाई खुश नहीं हैं. मैं इनके लिए मनुष्यता में प्रबल विश्वास रखने के नाते दुखी हूँ और आंसुओं में डूबा हुआ हूँ। वो तो नगर के सौभाग्य से मेरी आँखों के ग्लैंड्स ख़राब हैं इसलिये आंसू अंदर-अंदर बह रहे हैं अन्यथा शहर में बाढ़ आ जाती। 
वो मिस्र में दुखी हैं, वो लीबिया में दुखी हैं. वो मोरक़्क़ो में दुखी हैं. वो ईरान में दुखी हैं. वो ईराक़ में दुखी हैं. वो यमन में दुखी हैं. वो अफगानिस्तान में दुखी हैं. वो पाकिस्तान में दुखी हैं. वो बंग्लादेश में दुखी हैं, वो सीरिया में दुखी हैं. वो हर मुस्लिम देश में दुखी हैं. बस दुख ही उनकी नियति हो गया है. सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के आंकड़े इस कारण उपलब्ध नहीं दे पा रहा हूँ कि वहां भयानक तानाशाही है. केवल पानी की लाइन की शिकायत करने सम्बंधित विभाग में 5 लोग चले जाएँ तो देश में विप्लव फ़ैलाने की आशंका में गिरफ्तार कर लिए जाते हैं.
आइये इसका कारण ढूँढा जाये और देखा जाये कि वो कहाँ सुखी हैं. वो ऑस्ट्रेलिया में खुश हैं. वो इंग्लैंड में खुश हैं. वो फ़्रांस में खुश हैं. वो भारत में खुश हैं. वो इटली में खुश हैं. वो जर्मनी में खुश हैं. वो स्वीडन में खुश हैं. वो अमरीका में खुश हैं. वो कैनेडा में खुश हैं. वो हर उस देश में खुश हैं जो इस्लामी नहीं है. विचार कीजिये कि अपने दुखी होने के लिए वो किसको आरोपित करते हैं ? स्वयं को नहीं, अपने नेतृत्व को नहीं, अपने जीवन दर्शन को नहीं को नहीं. वो उन देशों, जहाँ वो खुश हैं की व्यवस्थाओं, उनके प्रजातंत्र को आरोपित करते हैं और चाहते हैं कि इन सब देशों को अपनी व्यवस्था बदल लेनी चाहिए. वो इन देशों से चाहते हैं कि वो स्वयं को उन देशों जैसा बना लें जिन्हें ये छोड़ कर आये हैं
इसी अध्ययन को आगे बढ़ाते हुए ये देखना रोचक रहेगा कि विश्व के भिन्न-भिन्न समाज एक दूसरे के साथ रहते हुए किस तरह की प्रतिक्रिया करते हैं. हिन्दू बौद्धों, मुसलमानों, ईसाइयों, शिन्तो मतानुयाइयों, कन्फ्यूशियस मतानुयाइयों, यहूदियों, अनीश्वरवादियों के साथ सामान्य रूप से शांति से रहते हैं. बौद्ध हिन्दुओं, मुसलमानों, ईसाइयों, शिन्तो मतानुयाइयों, कन्फ्यूशियस मतानुयाइयों, यहूदियों, अनीश्वरवादियों के साथ सामान्य रूप से शांति से रहते हैं. ईसाई मुसलमानों, बौद्धों, हिन्दुओं, शिन्तो मतानुयाइयों, कन्फ्यूशियस मतानुयाइयों, यहूदियों, अनीश्वरवादियों के साथ सामान्य रूप से शांति से रहते हैं. यहूदी ईसाइयों, मुसलमानों, बौद्धों, हिन्दुओं, शिन्तो मतानुयाइयों, कन्फ्यूशियस मतानुयाइयों, अनीश्वरवादियों के साथ सामान्य रूप से शांति से रहते हैं. इसी तरह शिन्तो मतानुयाइयों, कन्फ्यूशियस मतानुयाइयों, अनीश्वरवादियों को किसी के साथ शांतिपूर्ण जीवनयापन में कहीं कोई समस्या नहीं है.
आइये अब इस्लाम की स्थिति देखें. मुसलमान बौद्धों, हिन्दुओं, ईसाईयों, यहूदियों, शिन्तो मतानुयाइयों, कन्फ्यूशियस मतानुयाइयों, अनीश्वरवादियों के साथ कहीं शांति से नहीं रहते. यहाँ तक कि अपने ही मज़हब के तनिक भी भिन्नता रखने वाले किसी भी मुसलमान के साथ चैन से बैठने को तैयार नहीं हैं. अपने से तनिक भी अलग सोच रखने वाले मुसलमान एक दूसरे के लिए खबीस, मलऊन, काफिर, वाजिबुल-क़त्ल माने, कहे और बरते जाते हैं. एक दूसरे की मस्जिदों में जाना हराम है. एक दूसरे के इमामों के पीछे नमाज पढ़ना कुफ्र है. एक दूसरे से रोटी-बेटी के सम्बन्ध वर्जित हैं. सुन्नी शिया मुसलमानों को खटमल कहते हैं और उनके हाथ का पानी भी नहीं पीते. सुन्नी मानते हैं कि शिया उन्हें पानी थूक कर पिलाते हैं.
ये सामान्य तथ्यात्मक विश्लेषण तो यहीं समाप्त हो जाता है मगर अपने पीछे चौदह सौ वर्षों का हाहाकार, मज़हब के नाम पर सताए गए, मारे गए, धर्मपरिवर्तन के लिए विवश किये गए करोड़ों लोगों का आर्तनाद, आगजनी, वैमनस्य, आहें, कराहें, आंसुओं की भयानक महागाथा छोड़ जाता है. इस्लाम विश्व में किस तरह फैला इस विषय पर किन्हीं 4-5 इस्लामी इतिहासकारों की किताब देख लीजिये. काफिरों के सरों की मीनारें, खौलते तेल में उबाले जाते लोग, आरे से चिरवाये जाते काफ़िर, जीवित ही खाल उतार कर नमक-नौसादर लगा कर तड़पते काफ़िर, ग़ैर-मुस्लिमों के बच्चों-औरतों को ग़ुलाम बना कर बाज़ारों में बेचा जाना, काफ़िरों को मारने के बाद उनकी औरतों के साथ हत्यारों की ज़बरदस्ती शादियां, उनके मंदिर, चर्च, सिनेगॉग को ध्वस्त किया जाना......इनके भयानक वर्णनों को पढ़ कर आपके रोंगटे खड़े हो जायेंगे, ख़ून खौलने लगेगा
ये सब कुछ अतीत हो गया होता तो पछतावे के अतिरिक्त कुछ शेष न रहता. भोर की सुन्दर किरणें, चहचहाते पंछी, अंगड़ाई ले कर उठती धरा आते दिन का स्वागत करती और जीवन आगे बढ़ता. मगर विद्वानो ! ये घृणा, वैमनस्य, हत्याकांड, हाहाकार, पैशाचिक कृत्य अभी भी उसी तरह चल रहे हैं और इनकी जननी सर्वभक्षी विचारधारा अभी भी मज़हब के नाम पर पवित्र और अस्पर्शी है. कोई भी विचारधारा, वस्तु, व्यक्ति काल के परिप्रेक्ष्य में ही सही या गलत साबित होता है. इस्लाम की ताक़त ही ये है कि वो न केवल जीवन के सर्वोत्तम ढंग होने का मनमाना दावा करता है अपितु इस दावे को परखने भी नहीं देता. कोई परखना चाहे तो बहस की जगह उग्रता पर उतर आता है. उसकी ताकत उसका अपनी उद्दंड और कालबाह्य विचारधारा पर पक्का विश्वास है.
9-11 के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में घुस कर तालिबान को ढेर कर दिया. उसके अड्डे समाप्त कर दिए. उसके नेता मार दिए मगर क्या इससे अमेरिका और सभ्य विश्व सुरक्षित हो गया ? आज भी अमरीका के रक्षा बजट का बहुत मोटा हिस्सा इस्लामी आतंकवाद से सुरक्षा की योजनाएं बनाने में खर्च हो रहा है.
अमेरिका ने सीरिया और इराक में आई एस आई एस द्वारा स्थापित की गयी ख़िलाफ़त से निबटने के लिए सीमित बमबारी तो शुरू की है मगर पूरी प्रखरता के साथ स्वयं को युद्ध में झोंकने की जगह झरोखे में बैठ कर मुजरा लेने की मुद्रा में है. यानी अमेरिका ने अपनी भूमिका केवल हवाई हमले करने और ज़मीनी युद्ध स्थानीय बलों, कुर्दों के हवाले किये जाने की योजना बनाई है. यही चूक अमेरिका ने अफगानिस्तान में की थी. अब जिन लोगों को सशस्त्र करने की योजना है वो भी इसी कुफ्र और ईमान के दर्शन में विश्वास करने वाले लोग हैं. वो भी काफ़िरों को वाजिबुल-क़त्ल मानते हैं. इसकी क्या गारंटी है कि कल वो भी ऐसा नहीं करेंगे. ये बन्दर के हाथ से उस्तरा छीन कर भालू को उस्तरा थमाना हो सकता है और इतिहास बताता है कि हो सकता नहीं होगा ही होगा. आज नहीं कल इस युद्ध के लिए सम्पूर्ण विश्व को आसमान से धरती पर उतरना होगा. आज तो युद्ध उनके क्षेत्रों में लड़ा जा रहा है. कल ये युद्ध अपनी धरती पर लड़ना पड़ेगा. इस लिए इन विश्वासियों को लगातार वैचारिक चुनौती दे कर बदलाव के लिए तैयार करना और सशस्त्र संघर्ष से वैचारिक बदलाव के लिए बाध्य करना अनिवार्य है.
आई एस आई एस संसार का सबसे धनी आतंकवादी संगठन है. इसे सीरिया के खिलाफ प्रारंभिक ट्रेनिंग भी अमेरिका ने दी है. इसके पास अरबों-खरबों डॉलर हैं. हथियार भी आधुनिकतम अमरीकी हैं. इसके पोषण में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात द्वारा दिया जा रहा बेहिसाब धन भी है. ये देश भी इतना धन इसी लिए लगा रहे हैं चूँकि इन देशों को भी कुफ्र और ईमान के दर्शन पर अटूट विश्वास है. सभ्य विश्व को इस समस्या के मूल तक जाना होगा. इसके लिए आतंकवादियों के प्रेरणा स्रोतों की वामपंथियों, सेक्युलरों की मनमानी व्याख्या नहीं वरन उनकी अपनी व्याख्या देखनी होगी. कुफ्र के खिलाफ जिहाद और दारुल-हरब का दारुल-इस्लाम में परिवर्तन का दर्शन इन हत्याकांडों की जड़ है. इस मूल विषय, इसकी व्याख्या और इसके लिए की जा रही कार्यवाहियां वैचारिक उपक्रम को कार्य रूप में परिणत करने के उपकरण हैं. इनको विचारधारा के स्तर पर ही निबटना पड़ेगा. बातचीत की मेज पर बैठाने के लिए प्रभावी बल-प्रयोग की आवश्यकता निश्चित रूप से है और रहेगी मगर ये विचारधारा का संघर्ष है. ये कोई राजनैतिक या क्षेत्रीय लड़ाई नहीं है.
ये घात लगाये दबे पैर बढे आ रहे हत्यारे नहीं हैं. ये अपने वैचारिक कलुष, अपनी मानसिक कुरूपता को नगाड़े बजा कर उद्घाटित करते, प्रचारित करते बर्बर लोगों के समूह हैं. जब तक इनके दिमाग में जड़ें जमाये इस विचारधारा के बीज नष्ट नहीं कर दिए जायेंगे, तब तक संसार में शांति नहीं आ सकेगी. इसके लिए अनिवार्य रूप से इस विचार प्रणाली को प्रत्येक मनुष्य के समान अधिकार, स्त्रियों के बराबरी के अधिकार यानी सभ्यता के आधारभूत नियमों को मानना होगा. इन मूलभूत मान्यताओं का विरोध करने वाले समूहों को लगातार वैचारिक चुनौती देते रहनी होगी. न सुनने, मानने वालों का प्रभावशाली दमन करना होगा
इसके लिए इस्लाम पर शोध संस्थान, शोधपरक विचार-पत्र, जर्नल, शोधपरक टेलीविजन चैनल, चिंतन प्रणाली में बदलाव के तरीके की प्रभावशाली योजनायें बनानी होंगी. इस तरह के शोध संस्थान आज भी अमेरिका में चल रहे हैं, नए खुल रहे हैं मगर वो सब अरब के पेट्रो डॉलर से हो रहा है. ये संस्थान शुद्ध शोध करने की जगह इस्लाम की स्थानीय परिस्थिति के अनुरूप तात्कालिक व्याख्या करते हैं और परिस्थितियों के अपने पक्ष में हो जाने यानी जनसँख्या के मुस्लिम हो जाने का इंतज़ार करते हैं. ये तकनीक इस्लाम योरोप में इस्तेमाल कर रहा है. भारत में सफलतापूर्वक प्रयोग कर चुका है और हमारा आधे से अधिक भाग हड़प चुका है, शेष की योजना बनाने में लगा है.
जब मुसलमानों में से ही लोग सवाल उठाने लगेंगे और समाज पर दबाव बनाने के उपकरण मुल्ला समूह के शिकंजे से मुसलमान समाज आजाद हो जायेगा, तभी संसार शांति से बैठ सकेगा. कभी इसी संसार में मानव बलि में विश्वास करने वाले लोग थे मगर अब उनका अस्तित्व समाप्तप्राय है. मानव सभ्यता ने ऐसी सारी विचार-योजनाओं को त्यागा है, न मानने वालों को त्यागने पर बाध्य किया है, तभी सभ्यता का विकास हुआ है. सभ्य विश्व का नेतृत्व अब फिर इसकी योजना बनाने के लिए कृतसंकल्प होना चाहिए. कई 9-11 नहीं झेलने हैं तो स्वयं भी सन्नद्ध होइए और ऐसी हर विचारधारा को दबाइए. मनुष्यता के पक्ष में सोचने को बाध्य कीजिये. बदलने पर बाध्य कीजिये.
तुफैल चतुर्वेदी