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शनिवार, 1 अगस्त 2015

मुसलमानों का दुःख और मेरे बहते आंसू

स्वयं और अन्य बहुत से मानवतावादी खिन्न हैं कि हमारे मुस्लिम भाई खुश नहीं हैं. मैं इनके लिए मनुष्यता में प्रबल विश्वास रखने के नाते दुखी हूँ और आंसुओं में डूबा हुआ हूँ। वो तो नगर के सौभाग्य से मेरी आँखों के ग्लैंड्स ख़राब हैं इसलिये आंसू अंदर-अंदर बह रहे हैं अन्यथा शहर में बाढ़ आ जाती। 
वो मिस्र में दुखी हैं, वो लीबिया में दुखी हैं. वो मोरक़्क़ो में दुखी हैं. वो ईरान में दुखी हैं. वो ईराक़ में दुखी हैं. वो यमन में दुखी हैं. वो अफगानिस्तान में दुखी हैं. वो पाकिस्तान में दुखी हैं. वो बंग्लादेश में दुखी हैं, वो सीरिया में दुखी हैं. वो हर मुस्लिम देश में दुखी हैं. बस दुख ही उनकी नियति हो गया है. सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के आंकड़े इस कारण उपलब्ध नहीं दे पा रहा हूँ कि वहां भयानक तानाशाही है. केवल पानी की लाइन की शिकायत करने सम्बंधित विभाग में 5 लोग चले जाएँ तो देश में विप्लव फ़ैलाने की आशंका में गिरफ्तार कर लिए जाते हैं.
आइये इसका कारण ढूँढा जाये और देखा जाये कि वो कहाँ सुखी हैं. वो ऑस्ट्रेलिया में खुश हैं. वो इंग्लैंड में खुश हैं. वो फ़्रांस में खुश हैं. वो भारत में खुश हैं. वो इटली में खुश हैं. वो जर्मनी में खुश हैं. वो स्वीडन में खुश हैं. वो अमरीका में खुश हैं. वो कैनेडा में खुश हैं. वो हर उस देश में खुश हैं जो इस्लामी नहीं है. विचार कीजिये कि अपने दुखी होने के लिए वो किसको आरोपित करते हैं ? स्वयं को नहीं, अपने नेतृत्व को नहीं, अपने जीवन दर्शन को नहीं को नहीं. वो उन देशों, जहाँ वो खुश हैं की व्यवस्थाओं, उनके प्रजातंत्र को आरोपित करते हैं और चाहते हैं कि इन सब देशों को अपनी व्यवस्था बदल लेनी चाहिए. वो इन देशों से चाहते हैं कि वो स्वयं को उन देशों जैसा बना लें जिन्हें ये छोड़ कर आये हैं
इसी अध्ययन को आगे बढ़ाते हुए ये देखना रोचक रहेगा कि विश्व के भिन्न-भिन्न समाज एक दूसरे के साथ रहते हुए किस तरह की प्रतिक्रिया करते हैं. हिन्दू बौद्धों, मुसलमानों, ईसाइयों, शिन्तो मतानुयाइयों, कन्फ्यूशियस मतानुयाइयों, यहूदियों, अनीश्वरवादियों के साथ सामान्य रूप से शांति से रहते हैं. बौद्ध हिन्दुओं, मुसलमानों, ईसाइयों, शिन्तो मतानुयाइयों, कन्फ्यूशियस मतानुयाइयों, यहूदियों, अनीश्वरवादियों के साथ सामान्य रूप से शांति से रहते हैं. ईसाई मुसलमानों, बौद्धों, हिन्दुओं, शिन्तो मतानुयाइयों, कन्फ्यूशियस मतानुयाइयों, यहूदियों, अनीश्वरवादियों के साथ सामान्य रूप से शांति से रहते हैं. यहूदी ईसाइयों, मुसलमानों, बौद्धों, हिन्दुओं, शिन्तो मतानुयाइयों, कन्फ्यूशियस मतानुयाइयों, अनीश्वरवादियों के साथ सामान्य रूप से शांति से रहते हैं. इसी तरह शिन्तो मतानुयाइयों, कन्फ्यूशियस मतानुयाइयों, अनीश्वरवादियों को किसी के साथ शांतिपूर्ण जीवनयापन में कहीं कोई समस्या नहीं है.
आइये अब इस्लाम की स्थिति देखें. मुसलमान बौद्धों, हिन्दुओं, ईसाईयों, यहूदियों, शिन्तो मतानुयाइयों, कन्फ्यूशियस मतानुयाइयों, अनीश्वरवादियों के साथ कहीं शांति से नहीं रहते. यहाँ तक कि अपने ही मज़हब के तनिक भी भिन्नता रखने वाले किसी भी मुसलमान के साथ चैन से बैठने को तैयार नहीं हैं. अपने से तनिक भी अलग सोच रखने वाले मुसलमान एक दूसरे के लिए खबीस, मलऊन, काफिर, वाजिबुल-क़त्ल माने, कहे और बरते जाते हैं. एक दूसरे की मस्जिदों में जाना हराम है. एक दूसरे के इमामों के पीछे नमाज पढ़ना कुफ्र है. एक दूसरे से रोटी-बेटी के सम्बन्ध वर्जित हैं. सुन्नी शिया मुसलमानों को खटमल कहते हैं और उनके हाथ का पानी भी नहीं पीते. सुन्नी मानते हैं कि शिया उन्हें पानी थूक कर पिलाते हैं.
ये सामान्य तथ्यात्मक विश्लेषण तो यहीं समाप्त हो जाता है मगर अपने पीछे चौदह सौ वर्षों का हाहाकार, मज़हब के नाम पर सताए गए, मारे गए, धर्मपरिवर्तन के लिए विवश किये गए करोड़ों लोगों का आर्तनाद, आगजनी, वैमनस्य, आहें, कराहें, आंसुओं की भयानक महागाथा छोड़ जाता है. इस्लाम विश्व में किस तरह फैला इस विषय पर किन्हीं 4-5 इस्लामी इतिहासकारों की किताब देख लीजिये. काफिरों के सरों की मीनारें, खौलते तेल में उबाले जाते लोग, आरे से चिरवाये जाते काफ़िर, जीवित ही खाल उतार कर नमक-नौसादर लगा कर तड़पते काफ़िर, ग़ैर-मुस्लिमों के बच्चों-औरतों को ग़ुलाम बना कर बाज़ारों में बेचा जाना, काफ़िरों को मारने के बाद उनकी औरतों के साथ हत्यारों की ज़बरदस्ती शादियां, उनके मंदिर, चर्च, सिनेगॉग को ध्वस्त किया जाना......इनके भयानक वर्णनों को पढ़ कर आपके रोंगटे खड़े हो जायेंगे, ख़ून खौलने लगेगा
ये सब कुछ अतीत हो गया होता तो पछतावे के अतिरिक्त कुछ शेष न रहता. भोर की सुन्दर किरणें, चहचहाते पंछी, अंगड़ाई ले कर उठती धरा आते दिन का स्वागत करती और जीवन आगे बढ़ता. मगर विद्वानो ! ये घृणा, वैमनस्य, हत्याकांड, हाहाकार, पैशाचिक कृत्य अभी भी उसी तरह चल रहे हैं और इनकी जननी सर्वभक्षी विचारधारा अभी भी मज़हब के नाम पर पवित्र और अस्पर्शी है. कोई भी विचारधारा, वस्तु, व्यक्ति काल के परिप्रेक्ष्य में ही सही या गलत साबित होता है. इस्लाम की ताक़त ही ये है कि वो न केवल जीवन के सर्वोत्तम ढंग होने का मनमाना दावा करता है अपितु इस दावे को परखने भी नहीं देता. कोई परखना चाहे तो बहस की जगह उग्रता पर उतर आता है. उसकी ताकत उसका अपनी उद्दंड और कालबाह्य विचारधारा पर पक्का विश्वास है.
9-11 के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान में घुस कर तालिबान को ढेर कर दिया. उसके अड्डे समाप्त कर दिए. उसके नेता मार दिए मगर क्या इससे अमेरिका और सभ्य विश्व सुरक्षित हो गया ? आज भी अमरीका के रक्षा बजट का बहुत मोटा हिस्सा इस्लामी आतंकवाद से सुरक्षा की योजनाएं बनाने में खर्च हो रहा है.
अमेरिका ने सीरिया और इराक में आई एस आई एस द्वारा स्थापित की गयी ख़िलाफ़त से निबटने के लिए सीमित बमबारी तो शुरू की है मगर पूरी प्रखरता के साथ स्वयं को युद्ध में झोंकने की जगह झरोखे में बैठ कर मुजरा लेने की मुद्रा में है. यानी अमेरिका ने अपनी भूमिका केवल हवाई हमले करने और ज़मीनी युद्ध स्थानीय बलों, कुर्दों के हवाले किये जाने की योजना बनाई है. यही चूक अमेरिका ने अफगानिस्तान में की थी. अब जिन लोगों को सशस्त्र करने की योजना है वो भी इसी कुफ्र और ईमान के दर्शन में विश्वास करने वाले लोग हैं. वो भी काफ़िरों को वाजिबुल-क़त्ल मानते हैं. इसकी क्या गारंटी है कि कल वो भी ऐसा नहीं करेंगे. ये बन्दर के हाथ से उस्तरा छीन कर भालू को उस्तरा थमाना हो सकता है और इतिहास बताता है कि हो सकता नहीं होगा ही होगा. आज नहीं कल इस युद्ध के लिए सम्पूर्ण विश्व को आसमान से धरती पर उतरना होगा. आज तो युद्ध उनके क्षेत्रों में लड़ा जा रहा है. कल ये युद्ध अपनी धरती पर लड़ना पड़ेगा. इस लिए इन विश्वासियों को लगातार वैचारिक चुनौती दे कर बदलाव के लिए तैयार करना और सशस्त्र संघर्ष से वैचारिक बदलाव के लिए बाध्य करना अनिवार्य है.
आई एस आई एस संसार का सबसे धनी आतंकवादी संगठन है. इसे सीरिया के खिलाफ प्रारंभिक ट्रेनिंग भी अमेरिका ने दी है. इसके पास अरबों-खरबों डॉलर हैं. हथियार भी आधुनिकतम अमरीकी हैं. इसके पोषण में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात द्वारा दिया जा रहा बेहिसाब धन भी है. ये देश भी इतना धन इसी लिए लगा रहे हैं चूँकि इन देशों को भी कुफ्र और ईमान के दर्शन पर अटूट विश्वास है. सभ्य विश्व को इस समस्या के मूल तक जाना होगा. इसके लिए आतंकवादियों के प्रेरणा स्रोतों की वामपंथियों, सेक्युलरों की मनमानी व्याख्या नहीं वरन उनकी अपनी व्याख्या देखनी होगी. कुफ्र के खिलाफ जिहाद और दारुल-हरब का दारुल-इस्लाम में परिवर्तन का दर्शन इन हत्याकांडों की जड़ है. इस मूल विषय, इसकी व्याख्या और इसके लिए की जा रही कार्यवाहियां वैचारिक उपक्रम को कार्य रूप में परिणत करने के उपकरण हैं. इनको विचारधारा के स्तर पर ही निबटना पड़ेगा. बातचीत की मेज पर बैठाने के लिए प्रभावी बल-प्रयोग की आवश्यकता निश्चित रूप से है और रहेगी मगर ये विचारधारा का संघर्ष है. ये कोई राजनैतिक या क्षेत्रीय लड़ाई नहीं है.
ये घात लगाये दबे पैर बढे आ रहे हत्यारे नहीं हैं. ये अपने वैचारिक कलुष, अपनी मानसिक कुरूपता को नगाड़े बजा कर उद्घाटित करते, प्रचारित करते बर्बर लोगों के समूह हैं. जब तक इनके दिमाग में जड़ें जमाये इस विचारधारा के बीज नष्ट नहीं कर दिए जायेंगे, तब तक संसार में शांति नहीं आ सकेगी. इसके लिए अनिवार्य रूप से इस विचार प्रणाली को प्रत्येक मनुष्य के समान अधिकार, स्त्रियों के बराबरी के अधिकार यानी सभ्यता के आधारभूत नियमों को मानना होगा. इन मूलभूत मान्यताओं का विरोध करने वाले समूहों को लगातार वैचारिक चुनौती देते रहनी होगी. न सुनने, मानने वालों का प्रभावशाली दमन करना होगा
इसके लिए इस्लाम पर शोध संस्थान, शोधपरक विचार-पत्र, जर्नल, शोधपरक टेलीविजन चैनल, चिंतन प्रणाली में बदलाव के तरीके की प्रभावशाली योजनायें बनानी होंगी. इस तरह के शोध संस्थान आज भी अमेरिका में चल रहे हैं, नए खुल रहे हैं मगर वो सब अरब के पेट्रो डॉलर से हो रहा है. ये संस्थान शुद्ध शोध करने की जगह इस्लाम की स्थानीय परिस्थिति के अनुरूप तात्कालिक व्याख्या करते हैं और परिस्थितियों के अपने पक्ष में हो जाने यानी जनसँख्या के मुस्लिम हो जाने का इंतज़ार करते हैं. ये तकनीक इस्लाम योरोप में इस्तेमाल कर रहा है. भारत में सफलतापूर्वक प्रयोग कर चुका है और हमारा आधे से अधिक भाग हड़प चुका है, शेष की योजना बनाने में लगा है.
जब मुसलमानों में से ही लोग सवाल उठाने लगेंगे और समाज पर दबाव बनाने के उपकरण मुल्ला समूह के शिकंजे से मुसलमान समाज आजाद हो जायेगा, तभी संसार शांति से बैठ सकेगा. कभी इसी संसार में मानव बलि में विश्वास करने वाले लोग थे मगर अब उनका अस्तित्व समाप्तप्राय है. मानव सभ्यता ने ऐसी सारी विचार-योजनाओं को त्यागा है, न मानने वालों को त्यागने पर बाध्य किया है, तभी सभ्यता का विकास हुआ है. सभ्य विश्व का नेतृत्व अब फिर इसकी योजना बनाने के लिए कृतसंकल्प होना चाहिए. कई 9-11 नहीं झेलने हैं तो स्वयं भी सन्नद्ध होइए और ऐसी हर विचारधारा को दबाइए. मनुष्यता के पक्ष में सोचने को बाध्य कीजिये. बदलने पर बाध्य कीजिये.
तुफैल चतुर्वेदी

37 टिप्‍पणियां:

  1. विडंबना है सर , इनको तो ये भी नहीं कह सकते की शिक्षा का आभाव है , ये जितने ज्यादा शिछित है उतने ज्यादा मूर्ख (कट्टर) हैं ,,,,,,

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  2. सबसे पहले तो ब्लॉग शुरू करने पर मेरी बधाई स्वीकार कीजिये सर...
    आपके पोस्ट फेसबुक पर हमेशा पढता था, आगे भी पढूंगा क्युकी आपसे सीखने को बहुत कुछ मिलता है...
    ये ब्लॉग पढ़ के बहुत अच्छा लगा...
    ऐसे ही लिखते रहिये सर...
    कहीं तो रौशनी की मशाल जलती रहे :)

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  3. ये सही है | वहां तो पुरानी पोस्ट पढ़ने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती थी | यहाँ सभी पोस्ट पढ़ सकेंगे |

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    1. अाभार, प्रयास करूंगा कि समय से अाप सब तक पहुच सकूं।

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  4. Aapki lekhni ko parnaam sir. Fb k baad yaha bhi chaa gaye aap.

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  5. ब्लॉग पर लिखने के लिए बहुत बहुत बधाई व् आभार आपका
    अब बिना किसी परेशानी के आपका कोई भी लेख कभी भी हम पढ़ पाएंगे

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    1. अाभार, प्रयास करूंगा कि समय से अाप सब तक पहुच सकूं।

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  6. तुफैल भैया आपको सैल्यूट आपने हर बात को दिल से समझाने की कोशिश की हैं

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  7. ब्लॉग के लिए बधाई व् आभार

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  8. प्रणाम सर... आपका प्रत्येक लेख पढने के लिए मन लालायित रहता है... फेसबुक पर आपकी मित्रता सूची में सम्मिलित न हो पाने का जो मलाल था, वो अब कम हो गया है... आपके द्वारा इस समस्या का एकदम सटीक विश्लेषण किया गया है... समस्या का मूल विचारधारा ही है, परन्तु उस विचारधारा पर कोई आघात नहीं कर रहा है... हम जडों में पानी दे रहे हैं और पत्ते तोड-तोड कर पेड को खत्म करना चाहते हैं... अब समय आ गया है कि हमें इस विषवृक्ष की जडें खोदनी ही होंगी.. अन्यथा इसका विष समस्त उद्यान को नष्ट कर देगा...

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    1. अापने इस विष-वृक्ष के मूल को समझ लिया है। इसका प्रसार कीजिये। बहुत समय नहीं है जीबी अापकी अांखें इसे नष्ट होते हुए देखेंगी। जड़ से उखड़ने से पहले उत्पात होगा मगर यह समाप्त होगा। यशस्वी होइये।

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  9. प्रणाम सर... आपका प्रत्येक लेख पढने के लिए मन लालायित रहता है... फेसबुक पर आपकी मित्रता सूची में सम्मिलित न हो पाने का जो मलाल था, वो अब कम हो गया है... आपके द्वारा इस समस्या का एकदम सटीक विश्लेषण किया गया है... समस्या का मूल विचारधारा ही है, परन्तु उस विचारधारा पर कोई आघात नहीं कर रहा है... हम जडों में पानी दे रहे हैं और पत्ते तोड-तोड कर पेड को खत्म करना चाहते हैं... अब समय आ गया है कि हमें इस विषवृक्ष की जडें खोदनी ही होंगी.. अन्यथा इसका विष समस्त उद्यान को नष्ट कर देगा...

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    1. अापने इस विष-वृक्ष के मूल को समझ लिया है। इसका प्रसार कीजिये। बहुत समय नहीं है जीबी अापकी अांखें इसे नष्ट होते हुए देखेंगी। जड़ से उखड़ने से पहले उत्पात होगा मगर यह समाप्त होगा। यशस्वी होइये।

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  10. बहुत सारगर्भित और निर्मम विश्लेषण

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  11. ये सबसे अघिक भारत में सुखी है,इधर जर्मनी ने सारे विश्व से होड़ लगा रखी है इन्हें सर्वाधिक सुख उपलब्ध कराने की,और इसके लिए वह युद्ध स्तर पर लगा हुआ है मेरी जर्मनी को हार्दिक शुभकामनाएँ
    😊😀😜😎

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  12. muslimo ka kuchh nahi hone wala, pahle dusre dharam walo ko niptao, fir jab koi nahi bache to khud me maarkaat suru kar do.
    Sare secular country muslim country me badal gaye aane wale samay me jo halat ban rahen hain bharat bhi is se achhuta nahi rahega.
    Inka ek hi upay hai abhi se ink daban suru kar deni chahiye.
    aur haan inko jyada bache paida karne se rokna hoga

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  13. आदरणीय ब्लाग के लिये बधाई। आप ने भगवान परशुराम के अनुगामी बनकर विचार क्रान्ति की जो मशाल जलाई है,वह निश्चित रूप से अपने लक्ष्य को प्राप्त हो यही शुभकामना,परम पिता से प्रार्थना । पुन:साधुवाद।

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  14. मुसलमान सवाल उठाने लगेंगे और मुल्ला समूह के शिकंजे से आजाद हो जाएंगे, ऐसी आशा दूर दूर तक नहीं। अच्छे लोग हर समाज में होते हैं।
    कुछ लोग उनमें भी हैं, परन्तु अपने मुसलमान समाज में वे कभी भी प्रभावशाली नहीं बन सकते।

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  15. मुसलमान सवाल उठाने लगेंगे और मुल्ला समूह के शिकंजे से आजाद हो जाएंगे, ऐसी आशा दूर दूर तक नहीं। अच्छे लोग हर समाज में होते हैं।
    कुछ लोग उनमें भी हैं, परन्तु अपने मुसलमान समाज में वे कभी भी प्रभावशाली नहीं बन सकते।

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