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मंगलवार, 5 जुलाई 2016

.............ख़ैरात लगी बंटने

भारत के ही नहीं बल्कि विश्व भर के इस्लामियों और उनके सबसे विश्वस्त दलाल वामपंथियों के पेट में पानी होने लगा है। प्रकट में तो बहसें नहीं कर रहे हैं मगर आंतरिक रूप से लगभग हाहाकार सा मचा है। कारण भी गम्भीर है कि अमेरिका के राष्ट्रपति पद के चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी की ओर से डोनाल्ड ट्रम्प का नाम तय हो गया है। अमरीका में राष्ट्रपति प्रणाली है और उसके चुनाव में भाग लेने वाले प्रत्याशियों को पहले अपने दल का एकमेव प्रत्याशी बनना पड़ता है। वहां भारत जैसी स्थिति नहीं है कि हर पार्टी, वरिष्ठ नेताओं की बपौती हो। अमेरिका में वास्तविक लोकतंत्र है। विभिन्न चरणों में ट्रम्प ने रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्याशियों पर बढ़त हासिल की और अब वो अमेरिका के अगले राष्ट्रपति बनने की मार्ग पर अग्रसर हो गए हैं।

अपने चुनावी अभियान में उन्होंने "हम अमेरिका में मुसलमानों का आना रोक देंगे" जैसा गम्भीर बयान दिया। विश्व राजनीति के मंच पर ऐसी सोच के अमेरिकी राष्ट्रपति का संभावित अवतरण विश्व भर के इस्लामियों और उनके सबसे विश्वस्त दलाल वामपंथियों के लिये चिंता का विषय होना भी चाहिये। ऐसा अमेरिकी राष्ट्रपति विश्व में ऐसी वैचारिक उथल-पुथल मचा सकता है जिससे सैकड़ों वर्षों से चले आ रहे इस्लामी मनमानेपन की नींव खिसक सकती है।

आइये इतिहास के प्रकाश में देखें कि अमेरिका क्या है ? आज एक देश के रूप में सुगठित अमेरिका सरलता से देश नहीं बना। स्वतंत्र देश बनने की प्रक्रिया में अमेरिकी राष्ट्र तात्कालिक विश्व-शक्ति ब्रिटेन से लड़ा। उसने भयानक गृह-युद्ध भी झेला। उसे देश और राष्ट्र बनने वाले लोग उसी मूल के थे जिन्होंने वहां के मूल निवासियों का संहार किया मगर उनके वंशजों ने शेष बचे मूल निवासियों को अधिकार दिये। स्त्रियों की बराबरी को संविधान द्वारा पुष्टि किया। हर प्रकार के अधिकारों से हीन अफ्रीका से पकड़ कर लाये गये दासों को स्वतंत्र कर उन्हें अमेरिका की बराबरी की नागरिकता दी। अमेरिका में विचारों को प्रकट करने की अबाध स्वतंत्रता तय की। देश के लिये वयस्क-मताधिकार की प्रजातान्त्रिक प्रणाली तय की। हर वयस्क का मत एक समान बनाया। स्वतंत्र न्याय प्रणाली बनायी। न्याय के शासन को स्थापित करने के लिये विभिन्न संस्थान बनाये।


जबकि इस्लामी चिंतन में तो बराबरी के चिंतन का स्थान ही नहीं है। यह समाज तो आक़ा { स्थानानुसार मुहम्मद / अली/ बादशाह/ क़बीले के सरदार } के ग़ुलामों का समाज है। यह इस मानसिक ग़ुलामी को इतना उपयुक्त मानता है कि उसके बाद यह मनुष्यों में अपने लिये विशेषाधिकार मानता, मांगता, बरतता है। मुसलमानों को ऊँचा और अमुस्लिमों को तुच्छ, घृणित मानना स्वयं क़ुरआन में है। उनसे युद्ध के आदेश ख़ुद क़ुरआन में हैं। क़त्ताल फ़ी सबीलिल्लाह { अल्लाह के नाम पर क़त्ल करो } जिहाद फ़ीसबीलिल्लाह { अल्लाह के लिये जिहाद करो } स्वयं क़ुरआन के आदेश हैं। कुछ आयतें दृष्टव्य हैं।

ओ मुसलमानों तुम गैर मुसलमानों से लड़ो. तुममें उन्हें सख्ती मिलनी चाहिये { 9-123 }
और तुम उनको जहां पाओ कत्ल करो { 2-191 }
काफिरों से तब तक लड़ते रहो जब तक दीन पूरे का पूरा अल्लाह के लिये न हो जाये { 8-39 }
ऐ नबी ! काफिरों के साथ जिहाद करो और उन पर सख्ती करो. उनका ठिकाना जहन्नुम है { 9-73 और 66-9 }

यह अजीब सा चिंतन मानव समाज में इस्लाम की प्रमुखता के बाद स्त्रियों को तुच्छ और उपभोग की वस्तु समझता है। औरत को नाक़िस उल अक़्ल { बुद्धि-हीन } कहा गया है। इस्लामी न्याय में स्त्री की गवाही तक आधी मानी जाती है। उसे बुर्क़े में ठूंस कर रखा जाता है। आज भी इस्लामी समाजों में जहाँ जहाँ संभव है ग़ुलाम, लौंडी रखी जाती हैं। 6-7 की बच्चियों के साथ विवाह इस्लामी क़ानून के अनुसार उचित है।

"तुम्हारी औरतें तुम्हारे लिये खेतियों के समान हैं। अपनी खेती में जिस तरह से चाहो जाओ" { 2-223 }
हे नबी' ! हमने तुम्हारे लिए तुम्हारी पत्नियां हलाल { अवर्जित } कर दीं जिनके 'मह्र' तुमने दे दिये हैं और तुम्हारी लौंडियाँ जो अल्लाह ने तुम्हें ग़नीमत के माल में दी हैं और तुम्हारे चाचा की बेटियां, तुम्हारी फूफियों की बेटियां और तुम्हारे मामूं.........{ 33-50 }

एक सामान्य बुद्धि वाला जिन व्यवहारों को घृणित समझता उन्हें इस्लाम स्वाभाविक और उचित मानता है। क्या ऐसा है कि इस्लामी देशों से आने वाले आव्राजकों में सभ्य देशों में आने पर इस असभ्य मानसिकता पर विश्वास कम या समाप्त हो जाता है। हम देख सकते हैं हैं कि वो शरण / नागरिकता मिलते ही हलाल मांस, हिजाब, शरिया, औरतों के दमन, मदरसे खोलने पर जुट जाते हैं। हाल ही में सीरिया, ईराक़, यमन से जर्मनी, फ़्रांस, ब्रिटेन में शरणार्थियों की बाढ़ आ गयी है और शरणार्थियों की बाढ़ के साथ ही नशीली दवाओं के कारोबार, लूट-पाट, बलात्कार जैसे अपराधों की भी बाढ़ आ गयी है। आप ही बताइये कि ऐसी बर्बर मानसिकता वाले समूह को कोई क्यों अपने देश में स्थान दे ? डोनाल्ड ट्रम्प ने इसी को दृष्टिगत करते हुए यही कहा है "हम अमेरिका में मुसलमानों का आना रोक देंगे। क्योंकि वो हमसे नफ़रत करते हैं।" ट्रम्प ग़लत कह रहे हैं या सही कोई भी इसका परीक्षण कर सकता है।

क्या किसी को 9-11 के ट्विन टावर के हमले के समय एक भी मुसलमान का खिन्न स्वर सुनाई दिया ? क्या किसी भी मुसलमान ने ट्विन टावर को ध्वस्त किये जाने को बुरा बताया ? संसार भर में उन हत्यारों की फ़ोटो वाली टी शर्ट बिकीं। उन्हें पहन कर कौन घूमता था ? फ़्रांस, बेल्जियम के हमलों के हत्यारों को किसने अपने घरों में शरण दी ? अगर वो शरण या नागरिकता पाए हुए केवल और केवल मुसलमान नहीं थे तो कौन थे ? दूसरे देशों को छोड़िए, भारत में आपने किसी मुसलमान को देश पर आक्रमण करने वाले महमूद गज़नवी, मुहम्मद ग़ौरी, अलाउद्दीन ख़िलजी, मुहम्मद तुग़लक़, बाबर जैसे हत्यारों की निंदा करते देखा है ? औरंगज़ेब जैसे धर्मांध राक्षस को दुष्ट बताते हुए किसी को सुना है ? इस सबके उपरांत भी हर मुसलमान को हर अमुस्लिम देश में बराबरी के अधिकार हैं। अमुस्लिम देशों में पूरी स्वतंत्रता, छूट मिलने के बाद भी हर अमुस्लिम देश में इस्लामी जनता शिकायतों का अम्बार लगाए रहती है। इसके उलट हर मुस्लिम देश में अमुस्लिम समाज को दूसरे दर्जे की नागरिकता मिलती है। एक हिंदी कहावत में कहें तो ये "चित मैं जीता, पट तुम हारे, सिक्का मेरे बाप का" की शातिर शैली है।

इन तथ्यों के बाद भी सदैव से अमेरिकी राजनीति का हर व्यक्ति इन विषयों पर मौन रहता था। पहली बार ट्रम्प ने साँपों का पिटारा खोल दिया है। हॉलीवुड की अनेकों फ़िल्में अंतरिक्ष से आये एलियन द्वारा पृथ्वी पर क़ब्ज़े की कोशिश और मनुष्यों के उन्हें पराजित करने पर बनी हैं। उनमें कई बार पृथ्वी पर एलियन द्वारा वायरस फैलाने और उस वायरस को नष्ट करने की योजनाओं के दृश्य हैं। यह बर्बर मानसिकता भी हत्यारा वायरस है। सभ्य समाज को जीवित रहने के लिये प्राणप्रण से इस वायरस को समाप्त करने में जुटना चाहिये। ट्रम्प यही कह रहे हैं। इसी लिये खलबली मच रही है। हम सब को भी इस यज्ञ में यथासम्भव आहुति डालनी चाहिये। अमेरिका में यदि आपका कोई मित्र, सम्बन्धी है तो उसे डोनाल्ड ट्रम्प के पक्ष में लेन के लिये कार्य कीजिये। ट्रम्प की विजय सुनिश्चित करना भारत के सर्वधर्म संभव के लिये भी आवश्यक है।

तुफ़ैल चतुर्वेदी

4 टिप्‍पणियां:

  1. तुफ़ैल जी, आपके आलेख को यदि कोई मनुष्य अपनी धार्मिक कट्टरता को छोड़कर पढ़ें तो समझ सकता है लेकिन हद इस कदर हो गई है कि हमारे देश में तो हिन्दू ही क़त्लेआम करने वालों का साथ देते हैं । आपके विचारों पर हिन्दू लोग भी अनेक मिलेंगे जो आलोचना करेंगे ।मानवता के प्रति आपके आलेख में चिंता है ।

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    1. अाभार बंधु, अाप ठीक कह रहे हैं मगर यही अपना राष्ट्र है और इसी से काम चलना है। इसी से तेजस्वी लोग निकल रहे हैं। अागे भी निकलेंगे ही।

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  2. तुफ़ैल जी, आपके आलेख को यदि कोई मनुष्य अपनी धार्मिक कट्टरता को छोड़कर पढ़ें तो समझ सकता है लेकिन हद इस कदर हो गई है कि हमारे देश में तो हिन्दू ही क़त्लेआम करने वालों का साथ देते हैं । आपके विचारों पर हिन्दू लोग भी अनेक मिलेंगे जो आलोचना करेंगे ।मानवता के प्रति आपके आलेख में चिंता है ।

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  3. अाभार बंधु, यही अपना राष्ट्र है और इसी से तेजस्वी लोग निकल रहे हैं। अागे भी निकलेंगे ही।

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