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सोमवार, 1 अगस्त 2016

========गुजरात के ऊना पर अनिवार्य हस्तक्षेप======

========अनिवार्य हस्तक्षेप======

सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टजः 
कट्यां कृतांको निर्वास्यहः स्फिचं वास्यावर्कतयेत :मनु स्मृति, अध्याय 8 श्लोक 281 

जो शूद्र ब्राह्मण के साथ एक आसान पर बैठना चाहे तो राजा उसकी कमर पर दगवा कर उसे देश से निकलवा दे, व उसके चूतड़ कतरवाले। इसी तरह की असह्य बातें मनु स्मृति के श्लोक नम्बर 277, 279, 280, 282, 283 में कही गयी हैं। आप, मैं या कोई भी कोई भी सामान्य मेधा, ज्ञान को उपलब्ध व्यक्ति इस तरह की बातों को सिरे से अनुचित और बुरा बतायेगा। इसी मनुस्मृति में इस प्रकार के श्लोक भी मिलते हैं 


शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम 
क्षत्रियाज्जातमेवम तु विध्याद्वैश्यात्तथैव च :मनु स्मृति अध्याय10 श्लोक 65

ब्राह्मण शूद्र बन सकता है और शूद्र ब्राह्मण हो सकता है। इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य भी अपना वर्ण बदल सकते हैं। 

मनु स्मृति :अध्याय 2  श्लोक 168 जो ब्राह्मण वेदों को न पढ़ कर अन्य अन्य शास्त्रों में ही परिश्रम करता है, वह जीते जी कुटुंब सहित शीघ्र शूद्र बन जाता है। 


यहाँ एक वैदिक ऋषि की चर्चा करना उपयुक्त होगा। ऋषि कवष ऐलूष ने वेद में अक्ष-सूक्त जोड़ा है। अक्ष जुए खेलने के पाँसे को कहते हैं। इस सूक्त में ऋषि कवष ऐलूष ने अपनी आत्मकथा और जुए से जुड़े सामाजिक आख्यान, उपेक्षा, बदनामी की बात करुणापूर्ण स्वर में लिखी है। कवष इलूष के पुत्र थे जो शूद्र थे। ऐतरेय ब्राह्मण बताता है कि सरस्वती नदी के तट पर ऋषि यज्ञ कर रहे थे कि शूद्र कवष ऐलूष वहां पहुंचे। सामाजिक रूप से प्रताड़ित जुआरी कवष ऐलूष को ऋषियों ने यज्ञ में भाग लेने के लिये मना किया और अपमानित कर निष्काषित कर ऐसी भूमि पर छोड़ा गया जो जलविहीन थी। कवष ऐलूष ने उस जलविहीन क्षेत्र में देवताओं की स्तुति में सूक्त की रचना की और कहते हैं सरस्वती नदी अपना स्वाभाविक मार्ग बदल कर शूद्र कवष ऐलूष के पास आ गयीं। सरस्वती की धारा ने कवष ऐलूष की परिक्रमा की, उन्हें घेर लिया। यज्ञकर्ता ऋषि दौड़े-दौड़े आये और शूद्र कवष ऐलूष की अभ्यर्थना की। उन्हें ऋषि कह कर पुकारा। उनके ये सूक्त ऋग्वेद के दसवें मंडल में मिलते हैं। इस घटना से ही पता चलता है कि शूद्र का ब्राह्मण वर्ण में आना सामान्य घटना ही थी। ध्यान रहे कि वर्ण और जातियों में अंतर है। वर्णों में एक-दूसरे में आना-जाना चलता था और इसे उन्नति या अवनति नहीं समझा जाता था। ये केवल स्वभाव के अनुसार आर्थिक विभाजन था। भारत में वर्ण जन्म से नहीं थे और इनमें व्यक्ति की इच्छा-क्षमता के अनुसार बदलाव होता था। वर्ण-व्यवस्था समाज को चलाने की एक व्यवस्था थी। 


दोनों प्रकार के श्लोक मनुस्मृति और इस तरह के अन्यान्य ग्रन्थों में मिलते हैं। किसे ठीक माना जाये ? स्पष्ट है कि मनुस्मृति वेद से बड़ी और प्रमुख तो नहीं हो सकती अतः निश्चित रूप से मनुस्मृति के यह श्लोक प्रक्षिप्त हैं। वेद के मूल स्वर के विपरीत वेदांग और स्मृतियाँ नहीं हो सकते और कहीं हैं तो स्वीकार नहीं किये जा सकते। मगर यह तो शास्त्रीय पक्ष है। व्यवहार में बहुत भिन्नता है। व्यवहार का सत्य यह है कि 1978 में अल्मोड़ा के रघुनाथ मंदिर के सामने से एक हरिजन की घोड़े पर निकलती विवाह की यात्रा पर आक्रमण होता है और कई लोगों की हत्या कर दी जाती है। दक्षिण के अनेकों मंदिरों में, नाथद्वारा के मंदिर में आज भी हरिजनों का प्रवेश घोषित रूप से बंद है। यह सच है कि इन मंदिरों में प्रवेश के समय कोई जाति नहीं पूछता मगर ऐसी दुष्ट घोषणा जो वेद-विरोधी, मानवता-विरोधी है कैसे सही जा सकती है ?

गुजरात के ऊना में मृत गौ की खाल उतारने वाले लोगों पर प्राणघाती आक्रमण होता है। यह ठीक है कि गुजरात के ऊना में दलितों की पिटाई के मामले में साजिश खुल गयी है। दलित परिवार ने बताया है कि गांव के सरपंच प्रफुल कोराट ने ही उनकी पिटाई करवाई थी। यह सरपंच लोकल कांग्रेस विधायक का करीबी है। मारपीट का जो वीडियो वायरल हुआ वो सरपंच प्रफुल कोराट के मोबाइल फोन से ही बनाया गया था। सीआईडी के सूत्रों के मुताबिक खुद प्रफुल्ल कोराट भी मारपीट वाली जगह पर मौजूद था। जांच में यह बात भी साफ हो चुकी है कि वीडियो में जो लोग मारपीट करते दिख रहे हैं उनका गोरक्षा समितियों से कोई लेना-देना नहीं है। पुलिस से पूछताछ में भी उन्होंने यह बात कबूली है कि इससे पहले उन्होंने गायों की रक्षा से जुड़े किसी काम में हिस्सा नहीं लिया था। पीड़ित परिवार का आरोप है कि सरपंच की नजर उनके इस्तेमाल में आ रही एक जमीन पर थी। इसे खाली कराने के लिए उसने बालू सरवैया को कई बार धमकियां दी थीं। 


बंधुओ, यह तथ्यात्मक रूप से ही ठीक है मगर पर्याप्त नहीं है। यह पाप कांग्रेस के व्यक्तियों ने किया, जानना भर काफ़ी नहीं है। अन्यथा ऐसा कैसे हो गया कि इस भयानक घटना के विरोध में होने वाली महारैली में विश्व हिन्दू परिषद्, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बजरंग दल, हिन्दू जागरण मंच, आर्य समाज, हिन्दू महासभा जैसे संगठनों के लोग अपने बैनरों के साथ सम्मिलित नहीं हुए। धरातल पर वास्तविकता यह है कि समाज के सारे राष्ट्रवादी संगठनों के अधिकारी, हम सब राष्ट्रवादी मित्तल, त्यागी, पाठक, तोमर, मलिक, अवस्थी, कंसल, यादव, गुप्ता चौधरी, राव, रेड्डी, नायक.........मौन हैं और इस मौन से यही सन्देश जा रहा है कि जय मीम जय भीम का कुटिल नारा लगाने वालों की बात ठीक है। हिन्दू समाज की जाति व्यवस्था भयानक रूप से अन्यायी है। यह अपने ही हिस्से को मानव-जीवन के मूल अधिकार भी नहीं देना चाहती। इस सड़न का उपचार नहीं किया जा सकता और उसे छोड़ कर मुसलमान या ईसाई बनना ही उपयुक्त है। 

हम संगठनों को प्रेरित करें यह आवश्यक है मगर अपने स्तर पर ईमानदारी से अपने दिल पर हाथ रख कर सोचिये। क्या आपने कभी अपने घर में सफ़ाई के लिये आने वाली मेहतरानी को, सड़क पर झाड़ू लगाने वाले व्यक्ति को उसी प्याले में चाय पिलायी है जिसमें आप पीते हैं ? गर्मी में घर में आये इस अन्त्यज को अपने वाले गिलास से ठंडा पानी पिलाया है ? आपके जूते की मरम्मत करने वाले गरीब को भाई की दृष्टि से देखा है ? जब आपके नगर के दलित बंधु अंबेडकर जी की शोभा-यात्रा निकलते हैं तो उसमें भगवा पटका गले में डाल कर हर हर महादेव के नारे लगते हुए अग्रणी पंक्ति में निकलने की सोची है ? आख़िर अम्बेडकर जी वही महापुरुष हैं जिन्होंने इस्लामियों के प्रबल लालच के बाद भी मुसलमान बनने की जगह बौद्ध बनना तय किया। जिनके कारण दलित बंधु मुसलमान नहीं बने। 


बंधुओ , यह व्यवहार अक्षम्य है। यह घोर पाप है। अपने बंधुओं के साथ यह व्यवहार न केवल हमें बल्कि सम्पूर्ण हिन्दू समाज को कम्भीपाक नर्क में सड़ायेगा। हर हिन्दू को इसका हर प्रकार से विरोध करना चाहिये। आज हम यह नहीं कह सकते कि हम विरोध कैसे करें। टीवी, समाचारपत्र हमारी बात नहीं प्रसारित करते। हमारे पास सोशल मीडिया का सहारा है। हमें इस पर अपनी आवाज़ ऊँची करनी चाहिए। सारे भारत में ज़ोरशोर से यह सन्देश जाना ही चाहिये कि हिन्दू समाज ऐसी हर घटना का विरोध कर रहा है।

तुफ़ैल चतुर्वेदी 

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