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शनिवार, 17 सितंबर 2016

बंधुओ, कल डॉ सुधीर व्यास द्वारा अहमदाबाद के अपोलो अस्पताल में हुए बलात्कार पर लिखी पोस्ट पर लम्बी बातचीत हुई। बलात्कार अक्षम्य अपराध है। उन दुष्टों को बुरे से बुरा दंड मिलना चाहिये मगर उस डॉक्टर का पाकिस्तानी हिन्दू बता कर हाई लाइट किया जाना मेरी समझ में अनुचित है। इस अपराध क़ानून-व्यवस्था का है और इससे उसी को निबटना चाहिये। इसी तरह किसी पाकिस्तान हिंदू या भारतीय के पाकिस्तानी जासूस होने की समस्या भी क़ानून-व्यवस्था की ही है।

बंधुओ, कल डॉ सुधीर व्यास द्वारा अहमदाबाद के अपोलो अस्पताल में हुए बलात्कार पर लिखी पोस्ट पर लम्बी बातचीत हुई। बलात्कार अक्षम्य अपराध है। उन दुष्टों को बुरे से बुरा दंड मिलना चाहिये मगर उस डॉक्टर का पाकिस्तानी हिन्दू बता कर हाई लाइट किया जाना मेरी समझ में अनुचित है। इस अपराध क़ानून-व्यवस्था का है और इससे उसी को निबटना चाहिये। इसी तरह किसी पाकिस्तान हिंदू या भारतीय के पाकिस्तानी जासूस होने की समस्या भी क़ानून-व्यवस्था की ही है। आपमें से कई मित्रों ने इसमें हस्तक्षेप भी किया।

कई बंधुओं को यह एक ही पथ के दो पथिकों का आपस में जूझना लगा। डॉ सुधीर व्यास मेरे अनुज-वत मित्र हैं और राष्ट्रीय विषयों पर लिखते हैं। इस विषय को पूरी समग्रता में देखा जाना आवश्यक है अतः अलग से इस पर अपनी बात लिख रहा हूँ और डॉ व्यास के लेख पर पधारे आप सब सहभागी मित्रों को भी इसी लिये टैग कर रहा हूँ। जिन मित्रों को मैं टैग नहीं कर पा रहा हूँ उन्हें कृपया डॉ व्यास आप टैग कर दीजिये। यह विषय इतना बड़ा है कि इसे एक लेख में समाया नहीं जा सकता अतः इसे दो या तीन भागों में लिखूंगा। करबद्ध निवेदन कृपया लेख-माला पूरी होने तक अपने कॉमेंट्स विवाद की ओर मत ले जाइयेगा।

डॉ सुधीर व्यास पहले जोधपुर में रहते थे। जोधपुर में पिछले कुछ वर्षों में हज़ारों पाकिस्तानी हिंदुओं ने शरण ली है। डॉ व्यास इन पाकिस्तानी हिंदुओं के भारत में शरण लेने के घोर ख़िलाफ़ हैं। उनके विरोध में थाना-कचहरी करते रहे हैं। इसी तरह मेरे एक और अनुज-वत मित्र डॉ राकेश रंजन हैं। यह हिंदू महासभा के अधिकारी रहे हैं । मेरे जीवन में आये सर्वाधिक विद्वानों में से एक, प्रखर अध्ययनशील हैं। अपने कार्य के सम्बन्ध में 40-45 देशों में घूमे हैं। इन्हीं को रूस में गीता पर प्रतिबन्ध लगाये जाने पर मुक़दमा लड़ कर प्रतिबन्ध हटवाने का यश प्राप्त है। पाकिस्तान के भारत में शरण लेने के इच्छुक हिंदुओं के भारत लाने के क़ानूनी प्रयासों को जी-जान से करते रहे हैं। इन्हीं की निजी ज़मानत के कारण 38,000 से अधिक पाकिस्तानी हिंदू भारत में शरण ले पाए। इस कार्य में डॉ राकेश रंजन की दो-ढाई करोड़ की जमापूंजी समाप्त हो गयी मगर वह अब भी हिंदू-हित के कार्यों में लगे हुए हैं।

डॉ व्यास से मेरी पहली भेंट kruhaad की बैठक के समय हुई और दूसरी भेंट JNU के मार्च के समय हुई। कार्यक्रम के बाद हम लोग घर आ गए। डॉ राकेश रंजन भी साथ थे। डॉ राकेश रंजन ने डॉ व्यास तक पाकिस्तानी हिंदुओं के बारे में अपने विचार पहुंचाये। अपने इतने परिश्रम का कारण बताया मगर डॉ व्यास ने मन नहीं बदला। डॉ व्यास के पास यही तर्क थे। हम खिन्न हुए मगर किसी भी सूरत एक प्रखर राष्ट्रवादी लेखक को खो नहीं सकते थे अतः उस समय चुप लगा गये। यह विषय अब फिर उठा है अतः अब अपनी दृष्टि में उचित सत्य का कहा जाना आवश्यक है। इसी कारण मैंने उनकी पोस्ट पर अपना दृष्टिकोण रखा था।

अब विषय......... भारत के विभाजन के समय पाकिस्तान-बंगला देश में करोड़ों हिंदू छूट गए थे। उनके भारत आने और भारत से पाकिस्तान जाने की इच्छा रखने वाले मुसलमानों को भेजने के सम्बन्ध में भारत-पाकिस्तान का पैक्ट हुआ है। वर्तमान पाकिस्तानी हिन्दू पैक्ट में तय समय-सीमा समाप्त होने के बाद भारत आ रहे हैं। डॉ व्यास का कहना है कि पाकिस्तान से आने वाले इन हिंदुओं को भारत को शरण नहीं मिलनी चाहिये। इसका कारण पोस्ट पर लिखे उनके ही शब्दों में {Once a Pakistani, always Pakistani Swine, not Hindu.....भारत मात्र कोई पुण्यभूमि नहीं बल्कि हमारा देश है कोई कचरादान नहीं कि सब जगह का भर लें, ना काम के ना काज के ... घर वापसी चलायें, शुद्धीकरण करें कचरा भरे, ये सूअर को मानव कैसे बना सकेंगे? एक पाकिस्तानी का रोजगार मेरे भारतीय हिन्दू के परिवार में कम से कम 4 जनों को भूखा सुलाने को मजबूर करता है, ऐसी भाईचारगी की बेचारगी किसी काम की नहीं}...... मैं तो तथाकथित घरवापसी का समर्थन ही नहीं करता ... मुरदों में जान नहीं फूंक सकते ना ही सनातन के हिसाब में वही हिन्दू आत्मा उनमें पुन: बसेगी ... सबसे पहली बात पाकिस्तान से आता हर तथाकथित हिन्दू व्यक्ति, हिन्दू, पीडित ही है अवांछनीय नहीं ...? यानी यह तय है कि डॉ व्यास पाकिस्तानी हिंदुओं के हर प्रकार से विरोधी हैं।

आपने पूजा, यज्ञ करते समय कभी संकल्प लिया होगा। उसके शब्द ध्यान कीजिये। ऊँ विष्णुर विष्णुर विष्णुर श्रीमद भगवतो महापुरुषस्य विष्णुराज्ञा प्रवर्तमानस्य श्री ब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्री श्वेत वराहकलपे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारत वर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गत ब्रह्मावर्तेकदेशे पुण्यप्रदेशे ......यह संकल्प भारत ही नहीं सारे विश्व भर के हिंदुओं में लिया जाता है और इसके शब्द लगभग यही हैं। क्या साम्य शब्दों के प्रयोग का कारण नहीं होना चाहिये? आख़िर यह जम्बूद्वीपे भारत वर्षे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गत ब्रह्मावर्तेकदेशे है क्या ? धर्मबंधुओ! जम्बू द्वीप सम्पूर्ण पृथ्वी है। भारत वर्ष पूरा यूरेशिया है। भरत खंड एशिया है। आर्यावर्त वर्तमान भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफ़ग़ानिस्तान है। आर्यावर्तान्तर्गत ब्रह्मावर्त बचाखुचा वर्तमान भारत है। आसिंधु सिंधु पर्यन्ता की परिभाषा आज गढ़ी गयी है। यह परिभाषा मूल भरतवंशियों के देश की परिचायक नहीं है।

वस्तुतः जम्बू द्वीप यानी सम्पूर्ण पृथ्वी ही षड्दर्शन को मानने वाली थी और इस ज्ञान का केंद्र ब्रह्मावर्त अर्थात वर्तमान भारत था। काल का प्रवाह आज से लगभग 5000 वर्ष पूर्व ज्ञान और संस्कृति के केंद्र वर्तमान भारत में भयानक युद्ध हुआ। जिसे हम आज महाभारत के नाम से जानते हैं और उसके बाद सारी व्यवस्थायें ध्वस्त हो गयीं। ज्ञानज्योति ऋषि वर्ग, पराक्रमी राजा कालकवलित हुए। परिणामतः ब्राह्मणों, आचार्यों, ज्ञानियों का केंद्र से सारी पृथ्वी का प्रवास रुक गया। धीरे-धीरे संस्कृति की भित्तियां ढहने लगीं। चतुर्दिक धर्म ध्वज फहराने वाले लोग भृष्ट हो कर वृषल हो गए। परिणामस्वरूप इतने विशाल क्षेत्र में फैला षड्दर्शन की महान देशनाओं का धर्म नष्ट हो गया। अनेकानेक प्रकार के मत-मतान्तर फ़ैल गये। टूट-बिखर कर बचे केवल ब्रह्मावर्त का नाम भारत रह गया। कृपया सोचिये कि सम्पूर्ण योरोप, एशिया में भग्न मंदिर, यज्ञशालाएं क्यों मिलती हैं ? ईसाइयत और इस्लाम के अपने से पहले इतिहास को जी-जान से मिटाने की कोशिश के बावजूद ताशक़न्द के एक शहर का नाम चार्वाक क्यों है ? वहां की झील चार्वाक क्यों कहलाती है ? ख़ैर इस विषय को लेख के अगले भाग में लेना ठीक होगा।

इस टूटन-बिखराव में पीड़ित आर्यों { गुणवाचक संज्ञा } का अंतिम शरणस्थल सदैव से आर्यावर्त के अन्तर्गत आने वाला ब्रह्मावर्त यानी भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफ़ग़ानिस्तान और अब वर्तमान भारत रहा है। इसी लिए इस क्षेत्र को पुण्यभूमि कहा जाता है। जिज्ञासु मित्रों को दिल्ली के हिंदूमहासभा भवन के हॉल को देखना चाहिये। उसमें राजा रवि वर्मा की बनायी हुई पेंटिंग लगी है जिसका विषय महाराज विक्रमादित्य के दरबार में यूनानियों का आना और आर्य धर्म स्वीकार करना { हिन्दू बनना } है। ज्ञान की प्यास बुझाने के लिए ही नहीं अपितु विपत्ति में भी सदैव से भरतवंशी केंद्र की ओर लौटते रहे हैं तो पाकिस्तान के हिंदुओं ने ही क्या बिगाड़ा है कि उनको धिक्कारा जाये ?

1947 में पाकिस्तान, बांग्लादेश से करोड़ों हिंदुओं ने कटे-फटे भारत में शरण ली। यूगांडा से ईदी अमीन ने निष्काषित किया तो हिन्दू भारत आये। 1971 में एक करोड़ से अधिक हिन्दू बांग्लादेश से भारत आये। अभी कुछ वर्ष पहले बांग्लादेश के चट्टोग्राम से चकमा जनजाति के हज़ारों हिन्दू सीमा पर कर भारत आये हैं। श्रीलंका में संघर्ष हुआ तो हज़ारों हिंदुओं ने समुद्री मार्ग से पलायन कर तमिलनाडु में शरण ली। अफ़ग़ानिस्तान से तालिबान ने हिंदुओं को भगाया तो वहां के बचे-खुचे सिक्ख भारत आये हैं। कोई भी दिल्ली के गफ़्फ़ार मार्किट में इन अफ़ग़ानी सिक्खों से मिल सकता है। आज भी विदेश से हज़ारों हिंदू जो NRI हैं प्रति वर्ष देश की दोहरी नागरिकता ले रहे हैं।

अब इस तर्क पर आइये कि "एक पाकिस्तानी का रोजगार मेरे भारतीय हिन्दू के परिवार में कम से कम 4 जनों को भूखा सुलाने को मजबूर करता है।" यह तर्क स्वीकार कर लिया जाए तो क्या उपरोक्त करोड़ों लोगों ने पहले से बसे हुए हिंदुओं का कारोबार नहीं छीना ? यह तर्क बहुत ख़राब दिशा में जाता है। इसका चरम हर बोली बोलने वाले के हिस्से में भारत का उसकी अपनी बोली वाला हिस्सा लेना यानी भारत के हज़ारों टुकड़े हैं।

ध्यान रहे कि विभाजन के समय सिंध प्रान्त बहुत दुर्गम-दुरूह मरुस्थल था। कराची, नवाबशाह, थट्टा, हैदराबाद, सक्खर, उमरकोट, जैकोबाबाद जैसे नगरों में रहने वाला, सड़कों से जुड़े इलाक़ों में रहने वाला हिंदू समाज पाकिस्तान से भाग कर भारत आ गया मगर दुर्गम क्षेत्रों, गांवों में बसने वाला हिंदू समाज जान ही नहीं सका कि हज़ारों साल से उसके पूर्वजों की धरती गाँधी, नेहरू, मुहम्मद अली जिनाह, मांउटबेटन जैसे दुरात्माओं के राक्षसी षड्यंत्र के कारण उसकी नहीं रही है। उसे तो यह तब पता चला जब नगरों से चल कर तब्लीग़ी मुल्ला उस तक पहुंचे और उस पर हिन्दू धर्म छोड़ कर इस्लाम क़ुबूल करने के लिए दबाव डाला। धर्म न छोडने पर मुसलमानों ने उस पर भयानक अत्याचार किये। उसके बच्चों को जलाया। आप स्वयं सोचें रातों-रात यह दुर्बल-भोला हिंदू अपनी धरती छोड़ कर कैसे आ सकता था ? सबसे बड़ा चाक़ू उसके सीने में ज़िया उल हक़ के इस्लामी शरीयत को पाकिस्तान का राजधर्म बना देने से लगा।

धर्मबंधुओ ! सदैव स्मरण रखिये कि राष्ट्र, देश से धर्म बड़ा होता है। इस्लाम के 46 देशों का उदाहरण देखिये बल्कि स्वधर्म का ही उदाहरण देखिये। प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारत के अंदर और बाहर 60-70 से अधिक देशों का हिन्दू राष्ट्र होना सम्भावित था। जिसकी केंद्र भूमि भारत को होना था। नेपाल के प्रधानमंत्री राणा, महामना मदनमोहन मालवीय, लाल लाजपतराय, स्वातन्त्र्यवीर सावरकर इत्यादि ने इसके लिये प्राण-प्रण से प्रयास किया था। आपकी जानकारी के लिये यह सब हिंदूमहासभा के लोग हैं और उस समय हिंदूमहासभा 46 देशों में सक्रिय थी। उस समय भारत के दो हिस्सों में बंटने की कल्पना नहीं थी बल्कि प्रिंसली स्टेटों के अलग-अलग राष्ट्रों के रूप में होने की कल्पना थी। कल्पना कीजिये कि यह प्रयास साकार हो गया होता तो भारत के अतिरिक्त श्रीलंका, सिंगापुर, बर्मा, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो, मॉरीशस, पाकिस्तान का वर्तमान उमरकोट और न जाने कितने हिन्दू राष्ट्र विश्व पटल पर जगमगा रहे होते। क्या तब भी इन राष्ट्रों के लोगों को हम इन्हीं कड़वे शब्दों से पुकारते जैसे निराश्रित पाकिस्तानी हिंदुओं को पुकार रहे हैं ? विश्व भर के असहाय हिंदुओं का भारत आश्रयस्थल है, पुण्य भूमि है।

कृपया नेट पर Yazidi डालिये। आपको ईराक़-सीरिया के बॉर्डर पर रहने वाली, मोर की पूजा करने वाली जाति के बचे-खुचे लोगों का पता चलेगा। कार्तिकेय के वाहन मोर की पूजा कौन करता है ? Kafiristan डालिये। आपको पता चलेगा कि इस क्षेत्र के हिंदुओं को 1895 में मुसलमान बना कर इसका नाम nuristan नूरिस्तान रख दिया गया है। kalash in pakistan देखिये। आप पाएंगे कि आज भी कलश जनजाति के लोग जो दरद मूल के हैं पाकिस्तान के चित्राल जनपद में रहते हैं। इस दरद समाज की चर्चा महाभारत, मनुस्मृति, पाणिनि की अष्टाध्यायी में है। जिस तरह लगातार किये गए इस्लामी धावों ने अफ़ग़ानिस्तान केवल 150 वर्ष पहले मुसलमान किया, हमें क्यों अपने ही लोगों को वापस नहीं लेना चाहिए ? एक-एक कर हमारी संस्कृति के क्षेत्र केवल 100 वर्ष में धर्मच्युत कर वृषल बना दिए गये। होना तो यह चाहिये था कि हम केंद्रीय भूमि से दूर बसे अपने समाज के लोगों को सबल कर धर्मभष्ट हो गए अपने लोगों को वापस लाने का प्रयास करते। भारत के टूटने का कारण सैन्य पराजय नहीं है बल्कि धर्मांतरण है। हमने अपने समाज की चिंता नहीं की। इसी पाप का दंड महाकाल ने हमारे दोनों हाथ काट कर दिया और हम भारत के दोनों हाथ पाकिस्तान, बांग्लादेश की शक्ल में गँवा बैठे।

जो वस्तु जहाँ खोयी हो वहीँ मिलती है। हमने अपने लोग, अपनी धरती धर्मांतरण के कारण खोयी थी। यह सब वहीँ से वापस मिलेगा जहाँ गंवाया था। इसके लिए अनिवार्य शर्त अपने समाज को समेटना, तेजस्वी बनाना और योद्धा बनाना है। लेख के अगले भाग में महान भरतवंशी पूर्वजों के सम्पूर्ण यूरेशिया में प्रताप के प्रमाण दूंगा। इससे अनुमान लगेगा कि हमें शत्रुओं से पाकिस्तानी हिंदुओं की दुर्दशा का ही नहीं और भी बहुत सारा हिसाब करना है

तुफ़ैल चतुर्वेदी

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