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शनिवार, 14 जनवरी 2017

.......................भविष्यवाणी
..............{ काश गलत हो मगर होगी नहीं }

फारसी का एक मुहावरा है खाकम-ब-दहन यानी मेरे मुंह में खाक. लेख के शुरू में ही ये वाक्य अपने लिए प्रयोग कर रहा हूँ कि जिस भविष्यगत बात को ले कर कोई और आशंकित होगा मैं निश्चिन्त हूँ कि वही होगी. विषय कश्मीर का है. इसके लिए इतिहास में संक्षिप्त रूप से जाना आवश्यक है. आइये आपको थोड़ा अतीत में ले चलूँ.

भारतीयों के स्थान-स्थान पर यथा-संभव विरोध, 1945 में समाप्त हुए द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इंग्लैंड की भग्न दशा, भारतीय उपमहाद्वीप पर होने वाले व्यय की अधिकता और आय में अनुपातिक कमी, द्वितीय विश्व युद्ध के लिए ब्रिटेन द्वारा अधीन भारत से लिए गए करोड़ों-करोड़ पौंड का ऋण { जिसे आज तक लौटाया नहीं गया है और वो आज भी हमारी बेलेंस शीट में दिखाया जाता है }, आज़ाद हिन्द फ़ौज के सैनिकों पर चलाये गए मुकदमों के कारण ब्रिटिश भारतीय सेना में गहरी बेचैनी, हिन्दुओं-मुसलमानों को लगातार लड़ाते जाने की ब्रिटिश नीति के विस्फोट के क्षण का निकट आते जाना, अमरीका का दबाव जैसे ढेरों कारण थे कि अंग्रेज भारत छोड़ने के लिए विवश हो गए. देश का शासन मूलतः आई. सी. एस. अधिकारी चलाते थे. गांधीवादियों के मनमाने दावे ' दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल' के विपरीत अँगरेज़ 1935 से ही स्वयं को भारत को स्वतंत्र करने के बारे में तय कर चुके थे. बिना खड्ग या खड्ग के साथ स्वतंत्रता मिलनी ही थी. अंग्रेज़ों की मनस्थिति और उनकी तत्कालीन विवश परिस्थितियों की जानकारी इस तथ्य से ही लगती है कि अंग्रेज़ों ने 1939 से ही आई. सी. एस. की भर्ती बंद कर दी थी. वो येन केन प्रकारेण देश चला रहे थे और अधिकतम ब्रिटिश हित सुरक्षित रखते हुए भारत से निकलने का रास्ता ढूंढ रहे थे.

द्वितीय महायुद्ध समाप्त होते-होते इंग्लैंड में भारतीय स्वतंत्रता के विरोधी चर्चिल की जगह एटली की सरकार आ गयी. ये पार्टी लड़ी ही इस आश्वासन पर थी कि अगर वो सरकार में आएगी तो ब्रिटेन पर अब बोझ बन गए उपनिवेशों को स्वतंत्र कर देगी. अपने चुनावी वादे के अनुसार उसने भारत को उसके हाल पर छोड़ कर जाने का निर्णय ले लिया. ब्रिटिश हित सुरक्षित रखने के लिए देश का खून-खराबे वाला अधीर विभाजन और भारत के विभाजित हिस्सों का कॉमन वेल्थ में होना सुनिश्चित कराया गया. ब्रिटिश सेना के गुप्त दस्तों चर्च के स्कूलों, संस्थानों की संपत्ति भारतीय संघ में सुरक्षित रहना निश्चित किया गया. इस विभाजन के लिए अंग्रेजों ने अपने सीधे अधीन क्षेत्रों में हिन्दू भारत और मुस्लिम पाकिस्तान के लिए जनमत संग्रह कराया. इन क्षेत्रों के निवासियों ने निर्णय ले लिया. इसके अतिरिक्त भारत में रजवाड़े थे. उनको नरेशों की स्वतंत्र इच्छा पर छोड़ा गया कि वो अपने राज्य का भारत अथवा पाकिस्तान में विलय का निर्णय ले लें. यह निर्णय सशर्त था. इस निर्णय को लेते समय नरेश को ध्यान रखना था कि उसके राज्य की सीमा विलय के निर्णय वाले देश की सीमा से लगती हो. अर्थात भोपाल या रामपुर रियासत अपना विलय पाकिस्तान में नहीं कर सकती थी और सिंध की बहावलपुर रियासत का राजा स्वयं को हिन्दुस्तान में विलीन नहीं कर सकता था.

एक एक कर सभी राजाओं ने आगे-पीछे अपने-अपने राज्यों का भारत या पाकिस्तान में विभिन्न संधियों के अनुरूप विलय कर दिया. इस विलय के लिए एक मात्र नरेश ही अधिकारी थे. सभी अन्य नरेशों की तरह कश्मीर के महाराजा हरी सिंह जी ने भी अपने राज्य का 26 अक्टूबर 1947 को भारत में विलय कर दिया. ये उनकी पैतृक संपत्ति-अपने राज्य का, अपने राज्य से टैक्स इकठ्ठा करने के अधिकार, न्याय, सुरक्षा इत्यादि का भारत में उसी तरह विलय था जैसे अन्य राजाओं ने भारत या पाकिस्तान में अपने राज्य का विलय किया था. यह विलय अपरिवर्तनीय थे यानी विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने के बाद नरेश स्वयं उस विलय पर पुनर्विचार नहीं कर सकते थे.

तत्कालीन प्रधान-मंत्री जवाहर लाल नेहरू महाराजा हरि सिंह तथा डोगरों को घृणा की हद तक नापसंद करते थे. उन्होंने महाराजा और डोगरों को नीचा दिखाने के लिए विलय के 3 वर्ष बाद 26 जनवरी 1950 में धारा 370 लागू की. ये धारा अपने प्रावधानों के अनुसार भी अस्थाई है. इस धारा का जम्मू कश्मीर रियासत के भारत में विलय से कुछ भी लेना-देना नहीं है. ये विलय अपरिवर्तनीय है. धारा 370 एक सामान्य अस्थाई उपबंध है और इस धारा को कश्मीरी राजनेताओं के बड़बोले दावों के विपरीत भारत के महामहिम राष्ट्रपति के केवल एक आदेश से निरस्त किया जा सकता है.

ये कोई बड़ी बात नहीं थी मगर शेख अब्दुल्ला और उसके साथियों को नेहरू जी सहायता के कारण भारत को ब्लैक मेल करने का उपकरण मिल गया. परिणामतः कुछ लाख कश्मीरी न केवल पूरे जम्मू और लद्दाख के लोगों की असह्य उपेक्षा करते हैं वरन करोड़ों भारतीयों के परिश्रम से अर्जित संसाधनों पर अपना मनमाना अधिकार समझते हैं. सारा देश तब से ही कश्मीरी मुसलमानों की सुरक्षा, उनकी दैनंदिन आवश्यकताओं, उनकी विकास परियोजनाओं, उनके कर्मचारियों के वेतन, उनके ठाठ-बाट का खर्च उठता है. बदले में तरह-तरह की धौंस-पट्टी, उद्दंडता, आँखें दिखाना सहता है. जम्मू-कश्मीर के अपने संसाधन तो इतने भी नहीं हैं कि वो राज्य के कर्मचारियों का वेतन भी दे सके. भारतीयों की गाढ़ी कमाई के करोड़ों-करोड़ रुपये कश्मीरियों के तुष्टिकरण के लिए शुरू से मुफ्तखोरी की भट्टी में झोंके जाते रहे हैं. ये एकतरफा बदमाशी है. जम्मू-कश्मीर में जम्मू और लद्दाख की जनसँख्या कश्मीर घाटी से अधिक है मगर विधयक कश्मीर घाटी से अधिक चुने जाते हैं अतः वो जम्मू और लद्दाख के अधिकारों को मनमाने ढंग से हड़प लेते हैं.

उनके अक्षमता का अंदाज़ा इस बात से लगाइये कि वर्तमान में आई बाढ़ में जम्मू-कश्मीर का प्रशासन एक पानी के एक थपेड़े ने ध्वस्त कर दिया. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला अपने निवास से 3 दिन तक बाहर नहीं निकल सके. भारतीय सेना तुरंत आगे बढ़ी और कश्मीर के निवासियों को खाना-पानी, दवाएं पहुंचाईं. भारत के संसाधन फिर एक बार कश्मीरियों के लिए लगा दिए गए हैं. करोड़ों के बजट स्वीकृत किये जा रहे हैं, हमारे वीर सैनिक जान पर खेल कर, ध्यान रहे उन दुष्टों को बचा रहे हैं जो इन पर पत्थर फेंकते रहे हैं. आतंकवादियों को सूचनाएं, खाना-पानी, दवा-दारू, सुरक्षित पनाहें उपलब्ध करते रहे हैं. ये वही दुष्ट लोग हैं जिन्होंने अपने ही क्षेत्र से अपने ही रक्त के बंधु 4 लाख हिन्दुओं के क्रूर निष्काशन पर मौन सम्मति दी. कभी उनके निकाले जाने का विरोध नहीं किया बल्कि उनकी छोड़ी हुई जमीनों, मकानों पर कब्जा कर लिया.

भारतीय राज्य की ये विवशता है भी कि अपने समाज पर आई विपदा के समय उसकी चिंता, सहायता करे. फिर इस समय नरेंद्र मोदी जी प्रधानमंत्री हैं जिनका सेवा कार्यों में अचूक व्यवस्था का रेकॉर्ड है. कच्छ भुज के भूकम्प के समय उनके कार्यों की विश्व भर में भूरि-भूरि प्रशंसा हुई थी. अब पानी उतर रहा है और देखिएगा ये कश्मीरी लोग अपनी करनी पर फिर उतरेंगे. कितनी भी सेवा कर ली जाये ये बदलने वाले नहीं है. फिर सहायता के नाम पर मुफ्तखोरी का कटोरा ले कर खड़े हो जायेंगे, आँखें दिखाएंगे, गुर्रायेंगे, पत्थर फेंकेंगे. सेना और भारत को बदनाम करेंगे.

सदियों से चली आई एक कहावत है अव्वल अफगान, दोयम कम्बोह, सोयम बदजात कश्मीरी. पहले नंबर के धूर्त अफगान होते हैं दूसरे नंबर के कम्बोह { एक भारतीय मुस्लिम जाति } तीसरे नंबर के धूर्त कश्मीरी होते हैं. ये कहावत हैदराबाद राज्य के शब्दकोष फरहंगे-आसिफिया में दर्ज थी. इसको तरक्की उर्दू बोर्ड ने सत्तर के दशक में छापा. कश्मीरियों ने बहुत बवाल किया, ऊधम मचाया और उर्दू बोर्ड ने शब्दकोष वापस लिए. पन्ने बदले गए. बंधुओ ! कहावतें समय बनाता है और समय का देखा-कहा अचूक और बिलकुल ठीक होता है. मेरे मुंह में खाक..काश मेरा कहा झूठा साबित हो और कश्मीरी अच्छे देश वासी बन कर दिखाएँ

तुफैल चतुर्वेदी

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